Saturday, December 30, 2017

जशन मनाए मतवाला

जशन मनाए मतवाला

उत्सवधर्मी हिन्द देश यह, मौज मनाता अलबेला,
बरस बरस का परब संजोए हँसता गाता मनमाना।
गंगा जाए, माघ नहाए, कुम्भ जुटाए कस मेला,
व्रत उपवास मकर-संक्रान्ती एकादशी अमावस्या।
चन्दन-षष्ठी भानु-सप्तमी घाट-कुँआ पानी पूजा,
होली हो या हो दिवाली, सूर्य-ग्रहण चन्दा पूरा।
गुड़हल फूला, आज अष्टमी कल से नवरातन पूजा,
हरसिंगार बन महुआ फूला, सप्तपर्ण महकै वाला।
करमा नाचै, बिरहा गाए, मादल बाजै, माटी वाला,
सात वार में नौ त्योहारी, पण्डित अपना दिलवाला।
पल प्रतिपल है समय बदलता नया साल बन कर आता
विशू, बिहू, उगड़ी, बैसाखी, चेटी चण्ड नाम धर आता।
कहीं कहे पोहिला बैशाख ,पुथनडु, बेस्तु बरस कहलाता,
सागर तट से अखिल हिमालय नए नए नव नाम धराता।
विक्रम-शाके-ईसा-फसली, साल नए हर दिन लाता,
बहक ठुमक कर 'हैप्पी वाला' जशन मनाए मतवाला।
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फोटो : the-different-ways-to-celebrate-the-indian-new-year
(http //www.tourtravelworld.com/blog)

Thursday, December 28, 2017

'निकल पड़ो मैदान में'

'निकल पड़ो मैदान में'

वो दिन गए जब बड़े मिंया फाख्ते उड़ाते थे। इस मसल के मायने, साठा चढ़ते जाने के साथ ज्यादा उजले दिखने लगे हैं।

एक समय था सपने देखने के ही नहीं धरती पर उतारते चलने के, आसमान में उड़ने और पहाड़ लांघने के मनसूबे बांधते और जितना हो पाता पूरा भी करते। ऐसा ही एक सपना देखा प्राचीन यात्रा पथों को नाप कर उनका ब्यौरा लिख जाने का। जब जब मौक़ा पाया पनही फटफटाने में कसर नाहीं राखी। कभी अपने बूते, कभी नौकरी के बहाने, कभी 'एकला चलो रे' की तर्ज पर तो कभी मनमाने के मेले में। कैम्ब्रिज वाले दादा चक्रबर्ती और बी.एच.यू. वाले दाढ़ी बाबा के साथे दक्षिणापथ के आर-पार। लेकिन अब लगने लगा है कुछ सपने सच कर पाना अपने बूते का नहीं रहा, इसलिए नयकों से साझा करने का मन करने लगा है, अब उन्हीं का बल है इनसे पार पाने का। यह भरोसा गढ़ाता जा रहा है, फेसबुक पर दिनों-दिन बढ़ती जा रही घुमक्कड़-शेरों की जमातों के जमावड़े - जैसे 'पग पग सनीचर', 'ठेलुआ क्लब', 'घुमक्क्ड़ी दिल से', 'यात्रा वृत्तांत', 'देसी ट्रवेलेर', 'चलत मुसाफिर' देख कर, उनसे जुड़े मस्तानों के लेखे व खीसों की ठेलम ठेल देख कर, और ऐसे हौंसले जान कर - "सोचता हूँ कदमों से नाप लूंगा भूगोल को त्रिविक्रम की तरह।" ऐसे में कोई ना कोई माई का लाल मेरे सपने को पूरा करने का 'बीड़ा' जरूर चाभ लेगा।

आज से कम से कम 2500-2600 बरस पहले भारतीय उपमहाद्वीप में दो महापथों के चलते रहने का ज़िक्र बाकायदा प्राचीन साहित्य में मिलता है। एक रहा तक्षशिला को पाटलिपुत्र से जोड़ते हुए दोनों सिरों को और आगे तक जोड़ने वाला 'उत्तर पथ' और दूसरा इस महापथ को दक्षिण भारत से जोड़ने वाला 'दक्षिणापथ'। 'उत्तरपथ' आगे के रास्तों को जोड़ता रहा बा-रास्ते काबुल-कंदहार-हेरात से आगे पश्चिम एशिया को, उत्तर में आमू दरया के उस पार मध्य एशिया, उत्तर पश्चिम में भू-मध्य सागर के पार बाकू और पूर्वी यूरोप, और पूरब में महास्थान हो कर अराकान के पार म्यांमार आदि देशों से।

उधर 'दक्षिणापथ' जोड़ता रहा पश्चिमी और पूर्वी समुद्री-तटों के बन्दरगाहों के जरिए समुंदरों के पार बसे ठिकानों से। प्राचीन साहित्य को मथ कर इन पथों और उन पर चलने वाले घुमक्क्ड़ों के बारे में बड़ा ही विस्तृत और दुर्लभ विवरण संजो गए हैं, मेरे जनम के पहले ही, परम मनीषी डाक्टर मोतीचंद्र अपनी कालजयी पुस्तक 'सार्थवाह' में। युवा और भावी घुमक्कड़ों में से जिन्होंने नहीं पढ़ा है इसे ज़रूर पढ़ें और जो हमारे सपने को सच करने का संकल्प साधना चाहते हैं वे तो इसे हर हाल में बांच कर गंठिया लें। क्योकि साहित्य में लिखे से ही कहानी पूरी नहीं होती, आगे बची है 'कठिन लड़ाई गढ़ महोबे की' तरह और भी कड़ी चुनौती - 'इन पथों के फैलाव के एक एक ठिकाने और उनकी प्राचीनता को मुकम्मल सबूतों के दम पर चिन्हित और साबित करके ढंग से लिखने की'। पिछली दो दशकों में हमने इस डायरेक्शन में कुछ पहल भी की है। इनका सिजरा जानने के लिए हमारे लेख और खास तौर पर दादा चक्रवर्ती की 'डेकन रूट्स' और दूसरी किताबें पलटी जा सकती हैं। आगे पीछे के सन्दर्भ इन्हीं में मिल जाएंगे।
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यह चुनौती हमारे लिए और भी ज्यादा अहम हो गयी है क्योंकि 'उत्तरापथ' को 'विश्व विरासत की अस्थायी सूची' में दर्ज़ कर लिया गया है जिसे पक्का करने के लिए यह निशानदेही और प्रकाशन सबसे बुनियादी शर्त है। इसके अलावा इसी तरह का दर्ज़ा अभी दक्षिणापथ को भी हासिल कराना है। ऐसा कर के रुपए में चार नहीं सोलह चवन्नियां भुनाई जा सकेंगी। हम समझ सकेंगे बहुत पुराने समय से ही हो रहे संस्कृतियों के समुच्चय, संपर्कों, आर्थिक-राजनीतिक जैसे बहुतेरे पहलुओं के अलावा सोतों-प्रपातों, गुहा-कांतारों, वादियों-पहाड़ों में पुराने डीहों-ठीहों पर डेरा डाल कर घुमक्क्ड़ी का मज़ा पाने का मौक़ा मिलेगा सो अलग से।
मध्य चीन को मध्य एशिया तक चलने वाले कथित 'रेशम मार्ग' और दक्षिण अमरीका के चिली, अर्जेंटीना, बोलीविआ, पेरू, कोलम्बिआ और इक्वाडोर देशों के आर-पार ' Qhapaq Ñan, Andean Road System' मार्ग पहले ही विश्व विरासत फहरिस्त में चस्पा हो चुके हैं।
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http://whc.unesco.org/en/qhapaqnan/

चीन ने तो किसी भी मुल्क से आने वाले ऐसे पथों को 'रेशम-मार्ग' नाम दे डाला है जो उससे कहीं से भी जुड़ते हों मानो 'रेशम मार्ग' न हुआ 'गंगा मइया' हो गयीं जिसमें मिलने वाली सारी नदियां गंगा ही कहलाने लगती हैं - 'जब मिलि गए तब एक बरन ह्वै, गंगा नाम परौ'। इस तरह का दावा हम भी करने लगें तो पूरे एशिया में कहीं से भी गुजरने वाले सारे मुख्य पथ 'उत्तरपथ' कहलाने लग जाएं। यह सब जान कर हमारे घुम्मकड़ इस मामले में अब और पिछड़ना चाहेंगे, कम से कम मुझे तो नहीं लगता। 'अब लौं नसानी अब ना नसैहों', जो बीत गया सो बीत गया आगे की सुध लेय।

भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण की चंडीगढ़, आगरा, लखनऊ, सारनाथ, पटना और कलकत्ता सर्किल के घुमक्कड़ पुराविद इस चुनौती को स्वीकार कर पहले ही इस मुहिम में जुट चुके हैं। लेकिन यह ललकार किसी एक व्यक्ति या संस्था के लिए नहीं, तजुर्बेकार हुनरमंदों के अलावा सभी सर्वेक्षक घुमक्कड़ों के लिए है और उन्हें इसके लिए हर हाल में आगे आना होगा। हमें तो बस इतनी ही हंकारी लगानी है - "आज कसौटी की बेला है, निकल पड़ो मैदान में"।

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Sunday, December 10, 2017

लास अशेष


सांझ भई, 
सूरज अस्ताचल,
चला आपने देश।  
काजल बिंदिया, 
लाज ललाई,  
छोड़ आपने वेश।
सांकल बाजी, 
खुली अर्गला, 
आवन लगे सन्देश।  
रैन घिरी,  
करिया रही, 
तबहुँ लास अशेष।

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Friday, December 8, 2017

ज़िंदगी और मौत की नदी: गंगा

ज़िंदगी और मौत की नदी: गंगा


अखबार खोलते ही दक्षिण कोरिया से कुम्भ मेले को यूनेस्को द्वारा विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में सम्मिलित किए जाने की खबर पढ़ कर चित्त चटक हो चला। अपनी अत्यंत प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराओं पर गौरवान्वित हो उठा। सोचने लगा सचमुच हमारे हिन्दोस्तां का सारे जहान में कोई जोड़ नहीं। जितनी आस्था और भक्ति के साथ करोड़ों लोग देश के कोने कोने से गठरी-मुठरी लादे इस मेले में रेला लगाए जुटते हैं, और अनुष्ठान, स्नान-ध्यान, चर्चा-परिचर्चा करके जितनी शान्ति से अपने-अपने ठिकाने लौट जाते हैं, बिना किसी झगड़े-टंटे के, वैसा कहीं और नहीं देखा जाता। बचपन से ही देखते आए गंगा-यमुना के संगम पर इलाहाबाद में लगने वाले मेले की याद आने लगी। लेकिन यह मन-माधुरी ज्यादा देर टिक नहीं पायी।

मुंबई से प्रवीण जी द्वारा भेजी गयी उनके एक मित्र - विक्टर मैलेट - की लिखी किताब 'रिवर ऑफ़ लाइफ, रिवर ऑफ़ डेथ' भी उसी दिन खोलने का मौक़ा मिला। पहले कुछ पन्ने पलटते ही दिल्ली से कलकत्ता तक छोटी सी डोंगी में डगमग डगमग चलते हुए ' गंगा मइया' की दीन-दलित मलिन दशा देख कर दिल भर आने के पल, 'मइया' को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए दशकों से चलाए जा रहे अभियान, परियोजनाओं के बखान, उमा भारती जी से ले कर पंत प्रधान जी के संकल्प और निलय उपाध्याय जी की पीड़ा, गहन रूप घुमड़ने लगे - उस किताब में यह पढ़ कर:
"As Winston Churchill once said of the River Thames and Britain, the Ganges is the ' golden thread' of Indian History. On its banks are great cities, some living, others ruined and abandoned. that have been there for thousands of years and date back to the era when India was the world's largest economy, greater than China or the Roman Empire and three times the size of Western Europe.

So how can the Ganges be worshipped by so many Indians and be simultaneously abused by the same people? Why do Indians and their governments tolerate for even a week the over-exploitation of their holy river – sometimes to the point of total dehydration – by irrigation dams, and its poisoning by human waste and industrial toxins? Is it true that Hindu insist their Ganga is so pure that she can not be sullied by such pollution? Can the river be saved ?" (Victor Mallet 2017: River of Life, River of Death: The Ganges and India's Future. Oxford University Press: P. 4).

इस व्यक्तव्य में उठाए गए प्रश्न अपने, अपने देश और संस्कृति पर पड़े जोरदार तमाचे जैसे लगे, और आखरी लाइन में दी गयी चुनौती पढ़ करअपने निरीह हालात पे जार-जार रोना आया।

'गंगा जिएगी तभी भारत का भविष जिएगा और गंगा मरी तो भारत भी मर जाएगा', गंगा-प्रेमी लेखक की यह चेतावनी बहुत सरल शब्दों में कितना कुछ बयान कर रही है !!!!!!
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Thursday, November 30, 2017

7. अन्नपूर्णा

7. अन्नपूर्णा
उनका चेहरा, उनकी काया, कभी नहीं देख पाया। भोर में पौ फटने से पहले ही गाँव के पूर्वी छोर से आती प्रायवेट-बस के स्टार्ट होने की गुर्राहट से नींद खुलती और खाट छोड़ उसे पकड़ने लपकता। बात है सन उन्नीस-सौ -उन्यासी (1979) की। 'पलामू की प्रस्तर-युगीन सभ्यताओं' पर शोध के सिलसिले में सर्वेक्षण के लिए निकला था, घोर गरमी के मौसम में। अंतर्मन भी उत्तपत्त, ऎसी लागी लगन की लय कि किसी तरह जल्दी से थीसिस पूरी करके बसेरा जोड़ने को आतुर।
सुबह की सुहानी तरंग में 'पंडा' या 'पांडो नदी' के आस-पास की खूबसूरत पहाड़ियां और ढलान छानते ताप बढ़ने लगता। आज 'बड़ी छपली', 'नटवा पहाड़', 'खरहा चर' तो अगले दिन 'खोंड़हर', 'तोरलवा', 'केतार', 'मेलावन टोला' के आसपास ज़मीन पर पड़े प्रस्तर-उपकरण तलाशती आँखे दोपहर आते-आते तेज़ धूप में चौंधियाने लगतीं, हाथ लगाते ही गरम पत्थर चपक लेते।
दोपहरी में छांह खोजते महुए के गाछ तले डेरा जमाते, पथरीली आंच में समय काटते। कुछ आदिवासी कुछ दूरी के फासले से बड़ी उत्सुकता से देर तक देखते रहते। भरी दुपहरी इस तरह पहाड़ों पर भटकते वाली यह काया उन्हें भू-सुंघवा भूत-परेत ही समझ आती। धूप ढलते जब दोबारा अपने काम में रमने लगता तो वे दूर टहल जाते। शाम का अंधियारा उतरता और घाटी में मादल के बोल दमकने-लहराने लगते तो झोलों में बटोरे प्रस्तर-उपकरणों के ढेर संभाले माटी-पसीने में सना धीरे धीरे बस पकड़ने की फ़िराक में गाँव-सड़क की राह धरता, अकेला, निरा अकेला । बस पकड़ने के लिए एक ठाकुर साहब के दुआरे घड़ी भर रुकता तो गुड़-पानी पेश कर के मेरा थका चेहरा निहारते इतना ज़रूर कहते 'एतना सुकुंवार होए के इतना मेहनत काहे ------।' एक दिन बस आती देख मेरे वजनी झोले उठाने लगे तो उठे नहीं, तब अचरज से भर कर बोले "बड़ हरेठ ह-उ-आ----'।
'सिसरी गाँव' के अपने ठिकाने अटते-अटते रात खासी गहरा जाती। यह ठिकाना विश्वविद्यालय में पढने वाले एक छात्र 'अनिल जायसवाल' की कृपा से टिक सका था। वहां पहुँचते ही झोले पटक कर गाँव के पास के पहाडी जल-स्रोत में जा उतरता। जब तक लौटता गाँव भर सो चुका होता। मेरे ठिकाने पर खाट पे बिछौना और सिरहाने एक स्टूल पर एक थाली से ढकी दूसरी थाली में चावल-दाल-सब्जी-अचार और स्वादिष्ट तिलौरी और बगल में एक लोटा पानी करीने से सजे मिलते। थकावट से चूर चुपचाप छक कर गहरी नींद सोने से पहले सोचा करता कभी जल्दी पहुँच पाया तो यह सब परोसने-सजाने वाले को देख-सुन उनके हाथ के जादू की तारीफ़ करूंगा लेकिन वह दिन नहीं आया, ऐसे ही एक दिन मुंह अँधेरे 'सिसिरी-खरौंधी' से विदा हो लिया। यह सतरें लिख कर, चलने से पहले, उस अनाम, अदेखी असुनी अन्नपूर्णा के प्रति सादर आभार दर्ज कर रहा हूँ।
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Sunday, November 19, 2017

'उड़ा मन पद्मा-जमुना तीर'*

Rakesh Tewari added 3 new photos.
Published by Rakesh TewariYesterday at 6:25pm
'उड़ा मन पद्मा-जमुना तीर'*

बात की शुरुआत उन दिनों से होती है जब हमारे कदम ज़मीन से ऊपर ऊपर ही पड़ते बढ़ते थे। तब तेईस साल की उम्र की दहलीज़ भी नहीं लांघ पायी थी। हवा में ही उड़ते खयाल और रूमानी सपने। उन्हीं में से एक मनसूबा रहा दूर-दूर तक नदिया में नाव चलाते जाने का। किस नदी में चलें कि सबसे लंबा सफर नदी-नाव संयोग में बीते। नक्शों में टटोलते हुए खाका खींच लिया दिल्ली से चल कर बा-रास्ते यमुना-गंगा-पद्मा ढाका तक डाँड़ खींचने का। लेकिन मन की उड़ान के लिए हमारे संसाधनों की डोर छोटी पड़ गयी। ढाका तक जाने के लिए ज़रूरत भर के संसाधन नहीं जुट पाए। नतीज़तन बजाए फरक्का के आगे पद्मा नहीं भागीरथी के रास्ते, कोलकाता तक नौका के डाँड़ खींचते, 'ओए दादा s s s s !!!!!! तोमार बाड़ी कोथाय' सुन कर ही, सबर कर लेना पड़ा।
उस सफलता से परचा मनबढ़ मन अब ढाका से भी कहीं आगे और आगे अफ्रिका की पूरी की पूरी नील और यूरोप की डैन्यूब-राईन नदियों के बहाव में पैरने लगा। लाइब्रेरी से उनका इतिहास-भूगोल खंगाल कर बाकायदा योजना बना ली। दूरदर्शन और अखबारों के ज़रिये प्रचार-प्रसार कर के पैसे जुटाने का जुगाड़ लगाया लेकिन हिसाब नहीं बना। फिर नौकरी में आ गए तो यह उफान भी दब सिमट कर दुबक गया। मन मार कर चाकरी के कामों में खोपड़ी धँसानी पड़ी। फिर भी बचपन की लगन की तरह बीच-बीच में दबी-खुची उड़नतरानी जब तक हुमुकती रहती।
यूं ही एक दशक से ज्यादा समय सरक गया। तभी १९८९ में पण्डित जवाहर लाल नेहरू की जन्म शताब्दी मनाने के लिए विभाग में आए बजट ने अनायास ही भूले बिसरे फितूर की याद कुरेद दी। सोचा नेहरू जी के प्रकृति प्रेम का हवाला दे कर क्यों न इस बार आज के लोहित के पास से ब्रह्मपुत्र में नौका उतार कर ढाका तक पाल उड़ा लिया जाय। आनन फानन में एक प्रोपोज़ल बना कर दाखिल कर आए। उस समय के हमारे विभाग के आला अफसर रहे बांग्ला मोशाय (आलोक सिन्हा) को यह इरादा सबसे भालो लगा। आनन-फानन में बजट, परमीशन मिले, विदेश मंत्रालय और उच्चायोग को भी लिख दिया गया। सबकुछ तय होते होते अपने राम अगले ऊंचे पद के लिए चयनित हो गए। और फिर लाख मनौनी करने पर भी दादा मोशाय ने जाने का फरमान वापस ले कर कहा पहले नयी ज़िम्मेदारी सम्भालिए उसके बाद नदी-नाव की सोचिएगा। इस तरह एक बार फिर हाथ आयी बटेर फुर्र हो गयी।
तब यह बात दूर दूर तक मेरी समझ में नहीं आ सकी कि मेरे लेखे में कुछ और ही लिखा है। ऊपर वाले की मेहरबानी से पिछले दिनों जर्मनी और आस्ट्रिया की छापा मार यात्रा दरमियान राईन और दान्यूब में नाव से तो नहीं लेकिन उनके किनारे की सैर कर बहती धारा को हसरत से निहारने का मौक़ा पा ही गया। तब भी नहीं समझ पाया कि अब अगली नदियों की बारी है।
ऊपर वाले की रहमत तो देखिए, जहाँ नौका से जाने की सोचा वहाँ बिमान से भेजने का सरोसामान जुटा दिया, जहांगीर नगर युनिवेर्सिटी (ढाका) से एक पीएच डी की मौखिक परीक्षा का परीक्षक बनने का आमंत्रण भिजवा कर। और, उसी सिलसिले में वीसा के लिए आवेदन कर सोचने लगा - लोग सही ही कहते हैं कि सच्चे दिल से मांगी मुराद पूरी जरूर होती है लेकिन कब और कैसे यह तो वही जानता है; वाह रे परवरदिगार !लगता है अब नील नदी के दर्शन के दिन भी करीब ही हैं। फिर ललचाया और पछताया भी - काश जो अगर यह ज्ञान पहले ही हाथ लग गया होता तो इतना सा ही क्यों चाहा होता। दिल से और दिल खोल कर और भी बहुत कुछ चाह लेता।
तब तक ट्रेवल एजेंट से वीसा मिलने की खबर मिली और गुरुग्राम में बैठे बैठे ही आवारा मन पल भर में उड़ चला - 'पद्मा-जमुना तीर'*।
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* बांग्लादेश में गंगा को पद्मा और ब्रह्मपुत्र को जमुना कहा जाता है।
फोटो १. रिवर डाइरीज़ (साभार)
फोटो २. Padma River and boats (1860)
फोटो ३. joiseyshowaa (साभार)

Sunday, November 12, 2017

आसरा यह रहा

आसरा यह रहा
मिलने वालों का रेला, ऐसा लगा,
आए बैठे, मगर, बात कर ना सका।
दोस्तों ने बुलाया, नहीं जा सका,
सिलसिला उन के शिकवों का ऐसा रहा।
बात सच्ची नहीं, उनने जैसा कहा,
कुछ हमने कहा, कुछ नहीं कह सका।
देखता रह गया, वक्त बढ़ता गया,
दिल में था जो हमारे, नहीं कह सका।
ना अकेला हुआ, ना मुखातिब हुआ,
आँखों आँखों ने बोला, उन्हीं ने सुना।
आएँगे फिर वहां, आसरा यह रहा,
बैठ लेंगे कहीं, जो ये जीवन रहा।
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Thursday, November 2, 2017

क्यूँ बताया नहीं


क्यूँ बताया नहीं

आने जाने का मंज़र, हवा वो ज़मी,
लोग बदले हैं लेकिन डगर तो वही।
हैं कतारें वही, घाट-ओ-मन्दिर वही,
है चलन कुछ नया, पर किनारा वही।
हिलते डुलते चलें, हैं वो बजड़े वही,
झिल-मिलाती हुई हैं ये लहरें वही।
देवता फिर से उतरें, है आशा वही,
सज गयी फिर दियाली, है धारा वही।
लौट पाएंगे फिर से वहीँ तो नहीं,
बैठ लेंगे कहीं पर, घड़ी दो घड़ी।
आ सको गर तो आओ मिलेंगे वहीं,
कैसे लगते हो बस देख लेंगे यही।
ना समय ही रहा, ना वो बातें रहीं,
गुफ्तुगू फिर भी कुछ तो करेंगे कहीं।
बात होगी, कहो, कैसी तुम्हरी कटी,
कितनी मीठी वो कितनी कसैली रही।
काशी नगरी में ठहरेंगे दो दिन वहीं,
फिर न कहना हमें क्यूँ बताया नहीं।
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Tuesday, October 24, 2017

शरद सुहावन

संझा शरद सुहावन आये, गाढ़े मधुर मधुर मधुराय,
फूलै धवल राग गहराये, मादक सत-पर्णी मुस्काय।

Thursday, October 19, 2017

मौसम बदला

Rakesh Tewari
मौसम बदला सब कहीं, फूल लगें सब ठौर,
मौसम बन में अस बना, लदे बबूलहुँ फूल।

गुन-गुनाने का

Rakesh Tewari
गुन-गुनाने का
भोरहरी शरद की आयी, खिला है झाड़ चम्पा का,
झरे हैं फूल धरती पर, करें सिंगार देहरी का।
चहलकदमी को मन मचले, गलीचा नरम दूर्वा का,
झलकती शीत की चादर पे तलुए गुदगुदाने का।
हवा में ठंढ की खुनकी, अगौना नए मौसम का,
ठुनकती धूप से बचते बचाते घूम आने का।
घुला है ज़हन में ऐसा, नशा सा खुशगवारी का,
बना है वक्त ही ऐसा तनिक सा टहल लेने का।
बहाना कोई बनना चाहिए, बस बात करने का,
दबे क़दमों की आहट में, गमकते बोल सुनने का।
कि, मौक़ा कोई मिलना चाहिए बाज़ू में चलने का,
करीब आते हुए थोड़ा सा यूं ही गुन-गुनाने का।
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बाती बाली नेह

बाती बाली नेह की, घिउ अगरू लपटाय,
दूरी लाँघि दिगन्त की, जग सगरो महकाय।

बाती ते बाती मिली, बाढ़ै घन अति सोय,
भरि भरि पायी नेह निधि, बड़भागी अस कोय !!!!
मितवा !!! बड़भागी अस कोय !!!!

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Tuesday, October 10, 2017

सोन चिरइया

Published by Rakesh TewariOctober 2 at 8:12am
सुबह सबेरे सोन चिरइया, गीत माधुरी सुना गयी,
फुलवारी में चिहुँक हृदय में रस संचरित समाय गयी।

आपके लिए:

Published by Rakesh TewariSeptember 1
आपके लिए:
समय सहारे वारि कै, उड़ा करौ निर्द्वन्द,
भूले सब संसार में, मिलै परम आनन्द !!!!

मलय देश में (2): अहमकाना कोशिश

Rakesh Tewari added 2 new photos.
Published by Rakesh TewariAugust 19
मलय देश में (2): अहमकाना कोशिश
सोच-समझ कर आए थे - अपने मुल्क से दूर कतई अनजाने मलय देश (मलेशिया) में बस आराम करेंगे, बेफिक्र, खाना और सोना, ना लिखना ना पढ़ना। लेकिन क्या बताएँ दिल है कि मानता ही नहीं। सोने की कोशिश करते औंघाते हुए भी लगा कुलबुलाने - कुआला लम्पुर शहर का नाम क्यों और कैसे पड़ा, इसके मायने क्या हैं ? खाने के लिए निकले तो लगे मलय संस्कृति की पहचान तलाशने। जिस इलाके में निकले वहाँ उसकी झलक ही मिल सकी तो उसकी वजह और शहर और मुल्क के इतिहास के सफे पलटने को आतुर हो कर गूगल बाबा के सहारे मुअस्सर जानकारी टटोलते हुए बीएचयू वाले 'रोबिन्दर' (Ravindra Singh) की बहुत याद आयी। कई साल पहले उनसे कहा था - अब और हिस्ट्री-आर्कियोलॉजी नहीं होगी, सब भूल कर केवल कविता कहानी लिखूंगा, उन्होंने ललकारते हुए कहा था - 'आप और अँकल जी (चक्रबर्ती दादा) इन्हें ओढ़ते बिछाते हैं, कैसे भूल जाएंगे हम भी देखते हैं। इस ज़िदगी में तो ऐसा नहीं कर पाएंगे।'
पता चला हमारे यहां जैसे दो नदियों के मेल को संगम या प्रयाग कहा जाता है वैसे ही यहाँ दो नदियों के मेल या मुहाने को 'कुआला' कहा जाता है, और 'लम्पुर' का मतलब होता है - मटमैला। इसी तर्ज पर गोम्बक और क्लांग नदियों के मटमैले संगम पर बसा शहर कहलाया 'कुआला लम्पुर'। सन 1857 के आस पास 'सेलनगोर राज परिवार' के एक सदस्य द्वारा क्लान्ग-घाटी में चीनी खनिकों को भाड़े पर लगा कर टिन की खदानों की खोज कराने के साथ यहाँ आवासीय गतिविधियां शुरू हुईं। उस समय यहां बसावट के नाम पर एक छोटा सा पुरवा हुआ करता था। इसके बाद यह जगह टिन की खदानों से निकाली गयी सामग्री जुटाने और नाव से दूर दूर तक भेजने का केन्द्र बन गया। धीरे धीरे यहाँ खनिकों की बसावट बढ़ती गयी। खदानों पर कब्ज़े को लेकर खनिक-गिरोहों में मारामारी भी होने लगी। कालान्तर में मलय बादशाह ने इनके नेताओं को 'कापितान चिन' (Kapitan Cina: Chinese headman) की पदवी से नवाज़ा। इनमें से लुकुट-खदान के मालिक Hiu Siew को 'कुआला लम्पुर' का पहला कापितान चुना गया। 'कुआला लम्पुर' के लकड़ी से बने शुरुवाती आवासों की छत ताड़ के पत्तों (अतप) से छायी जाती थीं। पुराने चीनी और मलय ठिकाने क्लान्ग नदी के पूर्वी किनारे पर क्रमशः मार्केट स्क्वायर और जावा स्ट्रीट इलाके में बसे। बाद में मलय लोगों के साथ ही बस गए भारतीय मूल के चेट्टियार और मुस्लिम भी।
सन 1880 में ब्रिटिश प्रशासन ने 'सेलेनगोर राज्य' की राजधानी 'क्लान्ग' से 'कुआला लम्पुर' स्थानांतरित कर दी। खद्दानों पर कब्ज़े के लिए हुए आपसी युद्ध में जलाए जाने, बीमारियों और बाढ़ से त्रस्त बारम्बार उजड़ते-बसते इस नगर के अच्छे दिन आए सन 1882 में यहाँ तैनात किए गए ब्रिटिश रेजिडेंट द्वारा तेज़ी से कराए गए विकास कार्यों के साथ और फिर तो यह एक बड़े नियोजित नगर में तब्दील होता गया। प्रशासनिक इमारतों के लिए नदी के पश्चिम वाला हिस्सा चुना गया। सड़कें चौड़ी और साफ कराई गयीं और 1884 में आग से बचने के लिए पकी ईंटों और खपरैल की इमारतें बनाने का फैसला लिया गया, ईंट बनाने के भट्ठे लगाए गए, ताड़ के पत्तों वाली इमारतें गिरा कर उनकी जगह ईंट-खपरैल वाली बनायी गयीं। सन 1886 में क्लान्ग तक रेलवे लाइन बिछवाई गयी। औसतन 81.95 m (268.9 ft) ऊंचाइयों वाली हरी-भरी पहाड़ियों पर आबाद यह शहर1895 में 0.65 km2 बढ़ कर 974 आते आते 243 km2 के विस्तृत क्षेत्र वाले महानगर में बदल गया है। इसकी आबादी 1890 तक 20, 000, 1920 तक 80, 000 और अब बृहत्तर महानगर की कुल आबादी 70 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है ।
रबर-उत्पादन के साथ बढ़ी रबर की मांग और प्रवासियों के आगमन ने इसमें बड़ा योगदान किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दरमियान 1942 में जापानी कब्ज़े में आया यह शहर जापान की हार के बाद 1945 में फिर से ब्रिटिश शासन के अधीन आ कर अन्ततः 31 अगस्त 1957 को Federation of Malaya के स्वतन्त्र घोषित होने और 1963 में मलेशिया के गठन के बाद भी कुआला लम्पुर ही राजधानी बनी रही। इसी समय लेक गार्डन्स के किनारे 'पार्लिआमेन' की इमारत बन कर तैयार हो गयी। और अब तो जिधर देखिए उधर बहुमंजिली आवासीय और व्यावसायिक इमारतें, बाज़ार, मॉल, रेस्तोरान, सुपर मार्केट, पेट्रोनास दो-मीनारें, केएल टॉवर, आती जाती मेट्रो, चौड़ी सड़कों पर फर्राटे भरती कारें और दुपहिए, दुनिया के विकसित शहरों में शुमार।
जैसे जैसे यह जानकारियां मिलती जा रही हैं अपनी अहमकाना कोशिश पर उतनी ही कोफ़्त बढ़ती जा रही है। जितना जाना है उससे कहीं ज्यादा जानना अभी बाकी है। अब समझ में आ रहा कि ब्रिटिश ज़माने में आकारित विकसित इस आधुनिक शहर में उनकी छाप तो दिखनी ही है। और फिर इसके आज के पॉश इलाकों में प्राचीन मलय-देश की छवि पाने की उम्मीद कितनी बेमानी हो सकती है। अगर वह सब देखना है तब तो पुरानी बस्तियों-बाज़ारों का चक्कर लगा कर तजबीजना पड़ेगा।
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Source: photos
https://limthianleong.wordpress.com/…/panoramic-kuala-lump…/
This panoramic photo of Kuala Lumpur in 1884 was taken from the book “A Vision of the Past – A history of early photography in Singapore and Malaya, The photographs of G.R.Lambert & Co., 1880-1910” by John Falconer published by Times in 1987 in Singapore.