Sunday, August 13, 2017

बस देखता ही रहा

बस देखता ही रहा
जिस तरह अकस्मात दिल्ली की चाकरी में आए उससे ज्यादा अनिश्चय में उससे अवमुक्त हो कर लगा मानो एक झंझावात से पार हो गए। पता चला सरकारी मकान में छह महीने तक मामूली किराए पर रहा जा सकता है। यह जान कर सोचा तीन बरस 'लुटियन्स डेल्ही' में रह कर भी नज़र उठाने का मौक़ा नहीं मिला, पड़ोस के खान मार्केट को देश दुनिया के सैलानी देखने आते हैं और मैं वहां भी तबीयत से चहल कदमी नहीं कर सका, चलो अब फुरसत से यह सब भी कर लिया जाए। मन करे तो पाँव पसार कर आराम किया जाए या लिखा पढ़ा जाए। यहां रह कर जिनसे मिलना जुलना भी हो जाए।
लगे सुबह-शाम भारती नगर की घनी हरियाली में टहलने। सुबह चाय के साथ अखबार की खबरें और अपना राशि-फल इत्मिनान से पढ़ते। इसी बीच मलेशिया से न्यौता मिला तो वहाँ चलने की तैयारी करने लगा। तभी एक दिन इंडियन एक्सप्रेस में छपी यह भविष्यवाणी पढ़ी :
Libra (Sep 24-Oct 23) :
Your nomadic qualities are being stirred up. Short journeys are likely to be made on the basis of family needs, rather than pleasure, but there is bound to be stimulation for you in encountering new places and environments. The more you travel, the richer your experience will be.
पढ़ कर लगा कि कभी कभी कितनी सटीक बैठती हैं ये भविष्यवाणियां भी। फिर तो और ज्यादा ध्यान से राशिफल पढ़ने लगा। टी वी पर बतायी जाने वाली ग्रह-दशाओं और भविष्य पर भी गौर करने लगा। अक्सर उनमें स्थान-परिवर्तन और खासे उथल-पुथल की संभावनाएं घोषित होने लगीं तो सोचा अब ऐसा क्या होने वाला है !!!! फिर भी, अपनी योजना के अनुसार बहुत दिनों से सो रहे प्राइवेट पासपोर्ट पर मलेशिया का वीसा लगवा लाए। ध्यान साध कर तीन-तीन लेख लिख कर छपने भी भेज दिए। लम्बे समय तक प्रवास पर जाने से पहले, पूरे छह महीने का मकान का किराया एडवांस में जमा कराके उधर से निशा खातिर हो जाने के इरादे से विभागीय अधिकारियों को जब तब फोन मिला कर कोंचने लगा, उन्हें लगता छह महीने बहुत होते हैं नाहक परेशान हो रहे हैं।
पहली अगस्त के इण्डियन एक्सप्रेस में उस हफ्ते की इस भविष्यवाणी ने एक अलग ही तरह की जिज्ञासा और सांसत में डाल दिया:
Surprises await. I can not promise that everything will be easy but I can assure that in amongst the thorns, roses will bloom. Be patient and wait until next week for the real magic, though. But, then, at the risk of sounding trite, magic is all around you – all you have to do is look. (तुम्हारे चारों ओर जादू ही है: तुम्हें बस देखते ही रहना है)
बार-बार पढता और ऐसा विचारता कौन सा जादू होने वाला है जिसका केवल दृष्टा ही रह सकता हूँ, कौन से कंटीले झाड़ों में गुलाब के फूल खिलने वाले हैं। इन्हीं उहापोहों में दो अगस्त को पैर पसारे लिखते समय मोबाइल की घण्टी बजी, और उधर से खबर मिली कि मेरे लिए कार्य मुक्त होने के बाद छह महीना नहीं वरन एक माह तक की ही आवासीय सुविधा अनुमन्य है, इससे ज्यादा रहने पर पचास गुना और फिर उससे भी ज्यादा किराया देना होगा, वह भी जुर्माना सहित। सुनते ही सारी मस्ती हवा गयी, तीन से चार दिन में आवास खाली करके सारे सामन सहित लखनऊ पहुँचाना और फिर लौट कर आगे की तैयारी करना कोई हँसी खेल तो ठहरा नहीं, बेचैनी से तन मन त्रस्त और सोच-समझ सब अस्त व्यस्त। सारी योजना उलट पलट हो गयी। मित्रों की मदद से किसी तरह बोरिया-बिस्तर बाँध कर चल दिए लखनऊ। वहां भी बंधा-बंधाया सामान जहाँ तहाँ पटक कर आगे के लिए निकल पड़े।
कहाँ तो छह महीना और कहाँ आनन-फानन में दाना-पानी उठ जाना। एक ही झटके में भारती नगर, दिल्ली की पुरानी मनःस्थिति से पूरी तरह झटक दूर फेंका गए। सब कुछ एक हफ्ते में ही सचमुच के जादू की तरह घटा और मैं नियति की धार में तेजी से बहता हुआ - बस देखता ही रहा।
कहते हैं जो होता है अच्छा ही होता है। अब आगे आगे देखते हैं इन जादुई कंटीले झाड़ों में कौन से गुलाब खिलते हैं या फिर अगर खिल चुके हैं तो कब और कहाँ दिखते हैं, अपने मुल्क में या मलय देश में !!!!!
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कैसी लागी हीय

कैसी आदत पड़ गई कहन-सुनन की मोय,
अब ये चुप्पी तनिक सी नहीं सुहाती तोय।
आहट आवन जान की बहु अकुलावै मोय,
चाहत गुन गुन सुनन की कैसी लागी हीय।

Wednesday, August 9, 2017

मेला मेली

Rakesh Tewari
मेला मेली
जब लौं हिलती डुलती थिरती,
भावों की बहिया फिर उठती।
एक ठिकाने टिक नहीं ठह्ती,
कनकैय्या जस नाचा करती।
हम समझें उस ओर चली,
पर हवा कहाँ किसकी सुनती।
राग विराग ओरहनों वारी,
बुनती गुनती बोझिल उंघती।
सांस चले अटकी लटकी,
हदद हिसाब न गिनती की।
बड़े जतन से धुनिया धूनी,
जुलहा ताना बाना बूनी।
रंगरेजवा ने कस रंग डारी,
रंग बिरंगी सुपनों वारी।
समय काल अस करवट बदली,
पल भर में उधरी बुनिवाई।
चार दिनन की मेला मेली,
हिल मिल खेलो, मिले मिताई।
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Saturday, July 22, 2017

वजूद

Rakesh Tewari
Published by Rakesh TewariJuly 19 at 7:51pm

वजूद

यूं तो धूल-ओ-गुबार से
नाता रहा है अपना।
कहीं भी बैठे या पसरे, 
क्या बिगड़ गया अपना।
भटकते हुए अजनबियों के घर भी,
डेरा डाल रहे अपना।
अनजानों से भी मांग के खाया,
मनभाया अपना।
ऐसा ही आवारा अदना सा
वजूद है अपना।

जैसा भी है अपना वजूद,
तो अपना ही है।
ऐसा भी नहीं कि
बिना बुलाए ही,
चला जाए 'कहीं' भी।
फिर चाहे वो
ताज़ो-तख़्त,
महफ़िल-ए-सदारत,
या स्वप्निल संसार,
ही क्यों न हो।
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Saturday, July 15, 2017

अखरती

अखरती

कानों में कूजन की गूजन झनकती,
लतरन में, डालिन में, अंखियाँ अरझतीं।  

बगिया की पगिया सूनी अखरती,
चहकती चिरइया की चुप्पी अखरती।  

बारिश की बहिया में मछरी तड़पती,                          
तलइया में छप-छप छपइया अखरती।        

करिया बदरिया बिजुरिया चमकती, 
झरती छपरिया में रिमझिम अखरती। 

टोला मोहल्ला में नैय्या टहलती, 
लाली बहुटिया की टोली अखरती।  

लइकन कै खेला-लिहाड़ी अखरती, 
पुरनके सँहरियन की बतियाँ अखरती।  

नयकन की टोका-टोकनी अखरती, 
ऐ बाबू ! अमवौ पै  बन्दिश अखरती।  

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Friday, July 14, 2017

हौले से

हौले से
कारवां बावरे बादरों का चला है,
उड़ के अटरिया पे अटका हुआ है।
रूखी हवाओं में तप कर उठा है,
दर-दर में यूं ही भटकता रहा है।
वनों प्रांतरों में खमसता रहा है
घनेरी घटाओं में घुमड़ा हुआ है।
धड़कता बहकता धुंआया हुआ ये,
रह-रह के जब-तब बरसता रहा है।
चुपके से आँगन में हेला हुआ है,
सिहरन जगा कर के खेला किया है,
सपनों की अलकों में छुपता छुपाता,
उनीदी सी आँखों में पसरा हुआ है।
कहना है क्या कुछ नहीं बोलता है,
हौले से पलकों को चूमा किया है।
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Saturday, July 1, 2017

डेराने हुए हो

डेराने हुए हो

बात छोटी सी है, ये समझते नहीं हो,
हसर सबका ऐसा, ये समझे नहीं हो। 

बात ऐसी भी क्या है, बुझाए हुए हो, 
जखम कितना गहरा, जगाए हुए हो। 

गलाने को गम, यूं ही मिटते हुए हो, 
हाथ में साकियों के, बिखरते हुए हो। 

होश मद मे डुबाए, यूं बहके हुए हो, 
अपने वमन में ही, चंहटे हुए हो। 

आप आपे से ऐसा क्या बाहर हुए हो, 
दाग दामन के अपने उघारे हुए हो। 

किनारे पे आ कर, उदासी लिए हो, 
अब तो समझ लो, क्यों बिफरे हुए हो। 

दुनिया वही है, क्यों भूले हुए हो, 
जो बोया है सिर पर, उठाए हुए हो। 

आग से खेलने खुद से शामिल हुए हो, 
कि घर अपना खुद ही जलाए हुए हो। 

लुक्का लगा कर के घूमा किये हो, 
चिता आप अपनी, सजाए हुए हो। 

बिना बात 'घट' सबका फोड़ा किए हो, 
रमा लो भसम, क्यों डेराने हुए हो। 

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Wednesday, June 28, 2017

गौरैया

गौरैया
१.
गरमी की चटक दुपहरी में
नानी के घर खेला करते। 
 आँगन में तुलसी चौरा पर,
गौरैया ताका करते।
 एक सकोरा पानी भरके
दाना छितराया करते।
गरमी से व्याकुल, खुली चोंच,
दल के दल आने लगतीं।
 पहले दूर फुदकती फिर,
ढीठ बनी नियरे आतीं।
 आँख मिचकती, चीं-चीं करतीं,
तिरछे से देखा करतीं।
२.
जब जातीं वे परच चिरइयां,
झांपी-सूपा ले आते।
 रसरी बांध छोटी सी डंडी
उनके नीचे अटका देते।
 थोड़ा सा दाना पानी भी,
नीचे से सरका देते।
 एक हाथ में रसरी थामे,
दूर तनिक बैठे रहते।
बिन बोले बिन कोई आहट,
दम साधे टोहा करते।
दाना चुगती कोई चिरैया
कब आए उनके नीचे।
३.
जैसे ही कोई आती-जाती,
फंसती चारे के चक्कर में।
रसरी खैंच उसे धर लेते,
उछल कूद कर खुश होते।
 तरह तरह के रंगों से,
उनको फिर रंगा करते।
 नानी जग कर गुस्सा करतीं,
कइसन उत्पात मचाए हो।
 'लइकन कै खिलवाड़ बुझाए,
 औ, चिड़ियन कै जिव जाए।'
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Saturday, June 24, 2017

तीन तेरह का फेरा

तीन तेरह का फेरा
'तेरह' की बात आने पर बरबस ही भारत के यशश्वी प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई की याद आती है। बचपन से ही उनकी सादगी, हाज़िर जवाबी, लाजवाब भाषण-कला और लोक प्रियता की चर्चा सुनने का अवसर मिलता रहा, सीतापुर जिले में जन्म पाने और लम्बे समय तक लखनऊ निवास के संयोग से। जब कभी उनकी सभा की सूचना आती हजारों श्रोता अपने आप जुट जाते उनको देखने-सुनने।
एक बार हम लखनऊ रेलवे स्टेशन के एक नंबर प्लेटफार्म पर किसी को छोड़ने गए थे, थोड़ी देर में बाजपेई जी अपने एक सहायक के साथ दिल्ली जाने के लिए आए। ट्रेन चलने में अभी कुछ देर थी इसलिए वे अपने डिब्बे के बाहर ही खड़े अनजान लड़कों से बात करने लगे। थोड़ी ही देर में उनमें ऐसी आत्मीयता बन गयी कि जब ट्रेन चली तो वे अनायास ही नारे लगाने लगे - 'देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो।'
आगे चल कर बाजपेई जी पहली बार 'तेरह' दिन के लिए देश के प्रधान मंत्री बने। उन्हीं दिनों वे लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में आयोजित सभा में बोलने आए। हम भी सुनने गए। वे बीच-बीच में सधे हुए जुमलों से लोगों को लुभाते-हंसाते बहुत ही तार्किक तरीके से अपने निराले अंदाज़ में बोल रहे थे। उसी रौ में उन्होंने अपने 'तेरह दिन' के कार्यकाल और 'तेरह' की संख्या के अशुभ कहे जाने पर मज़ेदार तंज कसते हुए जो दो लाइनें सुनाईं हमें हमेशा के लिए याद हो गयीं - 'तीन में ना तेरह में, राज करेंगे डेरा में।'
कहते हैं लोगों के जीवन से कुछ संख्याओं का बड़ा गहरा नाता रहता है। बाजपेई जी ने दूसरी बार 'तेरह अक्टूबर' को प्रधान मंत्री पद की शपथ ली, इस बार उनकी सरकार 'तेरह' महीने चली। उन्हीं के कार्यकाल में 'तेरह दिसम्बर' २००१ को लोकसभा पर आतंकी हमला हुआ।
यूं तो अपने जीवन से 'तीन-दो-पांच' से प्रायः साबके पड़ते रहे लेकिन यह एक महज इत्तिफाक ही है कि कुछ सन्दर्भों में 'तेरह तारीख' से भी विचित्र मेल हुआ। यह लिखते हुए पढ़ने वालों से एक गुजारिश करना ज़रूरी लग रहा कि भूल से भी कहीं यह न समझ लें कि अपनी तुलना बाजपेई जी से करने की धृष्टता कर रहा हूँ। उनका ज़िक्र तो सिर्फ और सिर्फ 'तेरह' का फेर समझाने के लिए कर रहा हूँ वरना कहाँ 'राजा भोज और कहाँ ------ धूर लोटना '।
अपने महकमे के सर्वौच्च पद पर चयनित हुआ '१३ मई २०१३' को। आगे लगे 'अड़ंगों दर अड़ंगों' के चलते पूरे एक बरस तक कुछ समझ नहीं आया कि ज्वाइन भी कर सकूंगा या नही। तय किया अब वहाँ की सोचना छोड़ो कोई और ठिकाना थामो। मौक़ा भी मिल गया लेकिन अचानक जाने कहाँ से 'तेरह' का ऐसा फेरा घूमा कि '१३ मई २०१४' को आज की सरकार बनने के कुछ ही दिन पहले कार्य-भार ग्रहण करने का मौक़ा पा गया। लेकिन 'तेरह' का फेरा फिर भी ऐसा लगा रहा कि पूरे कार्यकाल में बार बार सफाई देते बीता - सरकारों के फेरे और उनसे जुड़े नदी-नाव संयोगों की। अन्त तक यह फेरा लगता ही रहा, और देखिए तकनीकी तौर पर पिछले मई महीने की तेरह तारीख को मेरे अनुबंध की अवधि पूरी हो रही थी लेकिन उस दिन शनिवार का अवकाश होने की वजह से 'बारह' तारीख को ही कार्यभार सौंपने गया, लेकिन यह बात 'तेरह' को कत्तई गवारा नहीं हुई। उसे लगा कि आखिर इस बार इस मामले में उसके दखल के बिना कैसे फैसला हो सकता है। लिहाजा, कुछ समय के लिए मेरा कार्य-काल बढ़ गया, हम समझे अब कुछ महीने तो रहेगा ही। उधर 'तेरह' चुप नहीं बैठा, अपना फेरा चलाता रहा और मेरी बेदखली का फरमान ले कर '१३ जून' को आ धमका - यहाँ कहाँ घूम रहा है बन्दे, अब सरकारी नहीं अपने डेरे में राज कर।
जय हो 'तेरह के फेरे की।'
'तेरह' के इन फेरों के तजुर्बों ने बहुत कुछ दिखाया, सिखाया और समझाया। बहुत सी गलतियां करायीं, बहुत कुछ अच्छा भी कराया, बहुत सारी असलियतों से साबका कराया, गलत-सही रिश्तों कीपहचान करायी, ढेर सारी साँसतों-असमंजस-संदेहों में झुलाया। इन फेरों से पाला नहीं पड़ता तो ज़िंदगी के बहुत से रहस्यों पर पड़ा पर्दा नहीं उठ पाता, लम्बे समय में जेहन में संजोई सच्चाइयों और रूमानी तस्वीरों का सच कभी नहीं जान पाता। इन तजुर्बों और हासिल-हिसाब पर तफ्सील से लिखने का बहुत मन कर रहा है। यह जान कर करीबी दोस्त न केवल तुरन्त ही सब लिख डालने का दबाव बना रहे हैं, बल्की ख़ास तौर पर तल्ख़ तज़ुर्बों पर ही लिखने के लिए ज्यादा कह रह हैं। उन्हें समझाने के लिए एक बार फिर से बाजपेई जी और बाबू जी (पण्डित अमृत लाल नागर) की एकसा कही गयी बात सुनानी पड़ी - 'ज़िंदगी में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें निजी ही रखना चाहिए।' हाँ, दूसरी बातों पर जरूर लिखेंगे, बहुत कुछ है लिखने बताने के लिए, लेकिन अभी नहीं। जिन्हे मेरे लिखने से वास्ता हो उन्हें मेरे 'कूलिंग ऑफ़ पीरियड' और 'तेरह के अगले फेरे' का इन्तिज़ार करना पडेगा।
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गागर ऐसी प्रीति की, भरि भरि लाएं मीत !!
जित-जित पीवैं बूड़ि कै, तित-तित बाढ़ै रीत !!

'संग-साथ रहो'

'संग-साथ रहो'
पोखर के थिर जल जैसा,
सोया रहता, आ जगा दिया।
भूले भूले, अंतरमन में,
लहरों का लहरा उठा दिया।
रिश्तों-नातों वय-पहर सहित
कल्पों का अंतर मिटा दिया।
मृदुल सरस नम भावों से,
कोमल मन यूँ झिरियाय दिया।
बीते पल में फिर पलट गया,
ऐसा आ कर अनुराग दिया।
 समझा वो आए, साथ मिला,
 डूबे को ऐसा, हाथ दिया।
छवि-छाया, दिखलाए बिना,
 चेहरा भूला झिलमिला दिया।
 मौसम बारिश का ले आए,
घन मेघ-धूम घुमराय दिया।
गीतों में भीगे परछन से,
दुअरे पर ऐसा मान दिया।
 यूँ आन मिले, हिलमिल बैठो,
संग-साथ रहो जब जगा दिया।
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Wednesday, June 14, 2017

'मनकही'

'मनकही'
हो गयी जो भी खता,
जाने-अनजाने कहीं,
छोटे-बड़े आली-वली,
या फिर ज़माने से कहीं,
मांग कर माफ़ी चले.
ये राह इतनी ही रही।
इनने कही उनने कही,
सुनते रहे सबकी कही,
अब न कहना अपकही,
हम पर नहीं चुप्पी रही ,
जो करी तानाकशी,
हम भी करेंगे दिललगी।
हट गयी है बाड़ अपने,
 दरमियानों की कहीं,
खुल गयी है गाँठ वो ,
खूंटे से थी लपटी हुई,
 आ गयी है यह घड़ी,
उड़ती हुई फिरसे वही।
हो चुकी अब चाकरी,
बंधने-बंधाने की कहीं,
बेबात के ही हर कहीं,
डुग्गी बजाने की कहीं,
अब और की मर्ज़ी नहीं,
अपनी चलेगी सब कहीं।
ना रही कोई फिकर,
उनकी ज़ुबानी की कहीं,
धर लेंगे कोई राह अब,
अपने ख्यालों की कहीं,
पसरो कहीं भी छाँह में,
पीपल की, पाकड़ की कहीं ।
अब लगेगी जो भली,
सीरत या सूरत जब कहीं,
ठहरेंगे उनकी ठौर पर, अब
इस गली या उस गली,
थोड़े ही दिन हैं हाथ में,
अब तो करेंगे मन कही।
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Monday, June 12, 2017

' --- समझु न आए'

Rakesh Tewari
16 hrs
' --- समझु न आए'
नील गगन में कबौ उड़ाए,
कबौ उदधि तल बूड़ी जाए,
सपन लोक सुन्दर सजवाए, 
 कबौ घोर अवसाद जुटाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।
लागै थिर यहु जगत सुहाए,
चलत फिरत कारज करवाए,
मन विचरै कहुँ और समाए,
मानो जागत जोग लगाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।
मथ डारै तबही अखुआए,
सुख-दुःख दूनो में रचवाए,
ऐसी यहु साधना कराए,
देखी-सुनी पढ़ी ना जाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।
निकसि भाव अतिरेक मँझाए,
समथर भूमि पाँव धरि पाए,
जब समझै सम-धारा आए,
तनिकै भर में तुला डोलाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।

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Friday, May 26, 2017

जोहा करेंगे



जोहा करेंगे

आते शहर में रहते, आ कर के चले जाते, 
हमको पता न लगता, ना इन्तिज़ार करते।

अपने में मगन रहते, ऐसा तो नहीं करते,          
आहट कोई भी सुन कर, यूं तो नहीं हुड़कते। 

सबको बता के आए, यह आस क्यों जगाए,                         
क्या बात है कि आके, मिलने भी नहीं आए।  

इतना भी क्या तकल्लुफ, यूं दूर-दूर रह के, 
थोड़ा सा समय रखते, संग-साथ रह के जाते।  

परदा तनिक सा हटता, दो-चार बात कर के,  
सुन कर सुना के अपनी, दूरी घटा के जाते। 

गर वक्त की कमी थी, हमको ही बुला लेते, 
हिचकी जो आ रही है, कमतर करा के जाते।  

अब जाने कब जुड़ेगा, यह योग आसमां में,
होंगे उन्ही दरों पर, टहलेंगे साथ मिल के।  

गिनती के दिन बचे हैं, साँसों की पोटली में।  
जोहा करेंगे फिर भी, किस्मत की करवटों में।   

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Thursday, May 18, 2017

अक्षय-निधि

अक्षय-निधि
१.
पाय गए, स्नेह धन,
भित्तर लै सिहराय,
ढरकत जाए गीत मय,
घट उप्पर उपराय।
२.
बरबस पाए या निधी,
राखै हिय चबदाय,
हारिल जस लकड़ी गहे,
खुले गगन पत्ताय।
३.
ऐसी लागी लाग यह,
लागी रहै लसाय,
जब लागै चुकता रही,
फिर लागै छलकाय।
४.
डूब-डूब मधु मालती,
होवैं अस मद-अंध,
जागत दुनिया में फिरै,
झिर-झिर विहरै संग।
५.
बरतन लागै कृपन सम,
 राखै सबते गोय,
 पट खोलै एकंत में,
गिन-गुन परतै टोय।
६.
डरपत मन सोचा करे,
कैसेहु छीज ना जाय।
फिकिर सतावै अब हमें,
कस संचैं सरियाय।
७.
समय बली या जगत में,
सबकुछ लेत समाय,
मोरे बिधाना अस करौ,
अक्षय-निधि बन जाय।
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Friday, May 12, 2017

खेवनहार

खेवनहार 

जीवन रस आवा करैं मिले-जुले एकसार,  
मन-व्याकुल डूबै उबर, आर न पावै पार।  

कैसा इस संसार मेंचला करे व्यापार ?
तनुक राह अटपट लगैबदलै सब व्यवहार।

बड़े पुरनिया कहि गए, तबौ नहीं एतबार, 
जब तक अपने नैन ते, नहिं अवलोकहिं आप।  
  
पढ़ा सुना गुनतै रहैंसमझ  पावैं सार,
नियत घड़ी आवै तबैआखर हों साकार।

कभी कभी ऐसा घटैअकिल  पावै पार, 
सब कुछ लागै तयशुदामानै बारमबार।

हम समझैँ हम कर रहेकरता सब करतार,
डाँड़ गहावै  हाथ मेंखेवै खेवनहार।

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(मई २०१३ - मई २०१७)

Tuesday, May 9, 2017

कभी ना कभी

कभी ना कभी
नेह रखना बचा कर के थोड़ा अभी,
वक्त रखना संजो कर के थोड़ा अभी।
आएंगे, एक दिन, तुमसे मिलने कभी,
बैठ कर, बात करने को, तुमसे कभी।
घाट पर जा के नइया लगेगी कभी,
रेत पर रात फिर से बिताने कभी।
फिर से नन्हे घरौंदे बनेंगे कभी,
गीली बालू पे चुप-चुप चलेंगे कभी।
बिना बोले भी बातें करेंगे कभी,
खुल के हंसते हंसाते रहेंगे कभी।
ये है पूरा भरोसा मिलेंगे कभी,
ये ही चाहत सहेजे कभी ना कभी। 
नेह रखना बचा कर के थोड़ा अभी,
वक्त रखना संजो कर के थोड़ा अभी। 

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Saturday, May 6, 2017

वो बात

वो बात जो उनसे कहनी है,
सलाम करते हैं, नज़र करते हैं।

बड़े लोगों के क्या कहने,
जो कहते हैं वो करते हैं।

पकड़ कर एक जुमले को,
'पितामह' बन के जीते हैं।

उनसे बेहतर वो छोटे हैं,
जो गलती मान लेते हैं।

कही जो बात कुछ उल्टी,
तो नुक्ता ठीक करते हैं।

दोस्त


क़दर दोस्तों के नज़रिए की कीजिए बेशक, 
मगर ऐसी कि वास्ता बराबरी का रवां रहे।

डर लगता है सजा कर करीने से न रख देना, 
सराहना ठीक है लेकिन यारी बनाए रखना।

हो जाता है गुमान


हो जाता है गुमान कुछ लोगों को अपनी खुद्दारी का कुछ ऐसा,
कि अपनी ख़ुदग़रज़ी में भी गलत होने का एहसास नहीं होता।

समझते हैं वही सच है मुकम्मल जो उनके ज़ेहन में पलता है,
बकिया के सब का वज़ूद उनकी ही ज़हनियत से तुलता है।

Saturday, April 29, 2017

जियरा जुड़ाय

जियरा जुड़ाय

१. 
लहका लगा के कहवां गइलें हो लुकाय,
हेरि हेरि हेरैं हरी कतौं न लखांय।  

२. 
चिरइयन क चुनमुन, बिहाने न भाय, 
ओ गाछे पै कूजन, न संझवै सुहाय।  

३. 
उचरल ह हियरा, न कइस्यउ थिराय, 
समझि नहीं आवत अ, कवनो उपाय।  

४. 
दिनवा बिसरि के, सकारे में आय, 
गोरु गोधुरिया में जस गोठियाय।  

५. 
हारी ह बेमारी ओ न हलवै बताय, 
सोच-सोच उंच-नीच धीरज ओराय।  

६. 
चिठिया न पतिया संदेशवौ न आय,   
जल बिन मीन अस बिरवा झुराय। 

७. 
भूल-भाल आवैं हरी झलकी देखांय,  
थोरकै अनन्द पाए, जियरा जुड़ाय।  

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Monday, April 24, 2017

बहु बहु बिम्ब बनाईं

बहु बहु बिम्ब बनाईं
मारग कठिन चलैं बहुताई,
धूर पंकमय स्वेद बहाई।
वै प्रकटे इक वीथी आई, 
झाँकि-ताकि लागे पिछुआई।।
घेरि घेरि फिर राह छेंकाई,
ठहि ठहि ठहरि हीय अकुलाई।
पइठे जस मोहन मधुराई,
कुतरैं उर चित-चोर के नाईं।।
आहट पाय आस हलकाई,
लहकि लपकि पट खोलहिं जाई।
हरसैं हरष सन्देसा पाई,
जस बगिया में फूल खिलाई।।
शीतल मन्द वात लहराई,
बरखा मनो पहिल फुहराई।
जस मयूर नाचै अमराई,
नव पल्लव तरुवन अंकुराई।।
मम गोपन जानै कोइ कोई,
कटु-मीठो रस भावै सोई।
मूंदे पलक परम सुख पाईं
मोदित मन मंगल धुन गाईं।।
लखि पाती समझे सहजाई,
जेहि बिधि वै संदेस पठाई,
आखर भखैं अंजोर मति होई,
तीख बुद्धि संदीपन सोई।।
चाहत चित अधिकै अधिकाई
होइहैं कस यहु मरम बझाई।
लहि-लहि यहु लालसा लसाई,
केहु बिधि छवि अवलोकैं ताईं।।
सांवर, गोर, कितौ कंचनाई,
कौन बरन मनभावन होई।
सम सुतार सुन्दर सुघराई,
थूल कृशी, कस काया पाई।।
बिन देखे बोले बतियाए, उन्ह अस लगन लगाई।
अंग-अंग मुख नैन अभासी, बहु बहु बिम्ब बनाई।।
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Wednesday, April 19, 2017

तुनुन तुनुन तुन गाए।

तुनुन तुनुन तुन गाए। 

१.
छुईमुई अस तन-मन पाए,
तनिकै में कुम्हलाए,
इकतारे जस अंगुरी परसे,
तुनुन तुनुन तुन गाए,
सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
२.
एक परग पुरसा भर डूबे,
दूजा, झूरे पर तड़फाए,
 आस निराशा उरझे सुरझे,
कइसा खेल खेलाए,
सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
३.
इक पल लागे दुनिया जीते,
दूजे, हिया बुझाए,
धूप छाँव अस आवै जावै,
लागै सब भरमाए,
सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
४.
नाता नाज़ुक या जग पाए,
कइसे धरम निभाएं,
मन आए की कही न जाए,
तर उप्पर उतराए,
सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
५.
लाज लगे अस हाथ बढ़ाए,
 डर डर कदम धराए,
 सूख पात जस चिनगी चटकै,
चिन्ता अगिन बराए,
सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
६.
सपन लोक सोवत में जागे,
जागत सपन देखाए,
मति नहिं मोरी चतुर-सुजाने,
छन छन पलक मुंदाए,
 सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
७ .
राह परे मिलते गए,
नैनन नेह गढ़ाए,
कसक छोड़ छूटा किए,
दो-मुहान पर आय,
 सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
८.
आए मिले मिल लगन रचाए,
आगे गए बिलगाए,
मधुर महक बगिया की लाए,
साँसनि भरि गमकाए,
साधो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए ।
९.
धीरज धरम हाथ नहिं आए,
डोलत तुला तोलाए,
ज़िम्मेवारी निशि-दिन बाढ़ै,
पल पल पर गरुआए,
सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
१० .
धीरे धीरे गुरिया डोले,
सीता-राम जपाए,
धीरे धीरे तन ढल जाए,
मनवा गगन उड़ाए,
सा-s-धो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
११.
जो बीते सो बीत गए,
सुधियन पइठे जाए,
गठियाए गठरी लिए,
बकिया जिए अघाए ,
साधो !!! तुनुन तुनुन तुन गाए।
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Saturday, April 8, 2017

-- सूफियाना क्या ???

--- सूफियाना क्या ???
१.
इसी धरती पे जनमे हैं,
कि आदमजात खालिस हम, 
कि जीते हैं ज़माने में,
कि हमसे फकीराना क्या।

२. बसे हैं अपनी मढिया में,
बजाते बेसुरा भी हम,
न पाप-ओ-पुण्य देखे हैं, 
कि हमसे रहीमाना क्या।

३. गिरे तो रो के उठते हैं,
ख़ुशी में खिलखिलाते हम,
बने हैं हांड़ माटी के, 
कि हमसे कबीराना क्या।

४. न गफलत में कभी रहते, 

कि हमसे मसीहाना क्या, 
नहीं बाना धरा गेरुआ,
कि हमसे जोगियाना क्या।


५. रपटते फिर रहे पनही, 
बजाते चाकरी हैं हम,
पहनते मोह का चोला, 
कि हमसे रामनामा क्या।  

६. जरा सा गौर से देखो,
असल क्या अक्स रखते हम,
कि रागो-ओ-रंज में रमते,
कि हमसे मलंगाना क्या।  

७, जिलाए आग जीते हैं, 
कि फिर धूनी रमाना क्या,
कि बहते चल रहे हैं हम,
कि हमसे फक्कड़ाना क्या। 

८. जिधर देखा उधर लहके,
बहकते चल रहे हैं हम,
तनिक रहते सलीके से,
कि हमसे शरीफाना क्या।  

९. न समझो हमको बैरागी,
सरासर दुनिया वाले हम,
नशे-मन हम तो रहते हैं, 
कि हमसे सूफियाना क्या।  

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Monday, April 3, 2017

चलती है ज़िन्दगी


चलती है ज़िन्दगी 

अब क्या मिले हो यार, 
डगर ही सिमट रही।  

क्या गुफ़्तुगू करेंगे अब,
अलाव बुझ चली।  

हैं काफिले अब भी, मगर, 
वो बानगी नहीं।  

उड़ने को उड़ रहे, मगर, 
डैनों में ख़म नहीं।

ता-ज़िन्दगी ढूंढा, मगर  
वो नज़र आया नहीं।  

क्या करोगे जान कर, 
उनका पता नहीं।

हो तुम बहुत प्यारे, मगर
वो हमसफ़र नहीं। 

क्या सुनाएं दिल-लगी,
अब तो चला-चली।  

फिर भी चलो, जिस मोड़ तक,
चलती है ज़िन्दगी।  

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Thursday, March 30, 2017

जोगीरा सारा रा रा

जोगीरा सारा रा रा 

जोगीरा सारा रा रा ------------ बूझो कौन
होरियारे धावन लगे, बाजन लागे चंग,
 फाग उड़ाते डोलते, उड़ै केसरिया रंग।
सोचत ते आराम से, पहुंड़ रहेंगे घर,
लेकिन आलस टूटि गा, चढ़ा गुलाबी रंग।
तन मन बौरावन लगे, फरकन लागे अंग,
पग अपनौ बहकन लगे, चढ़ गयी थोरी भंग।
चुहल भरी होरी मिली, हरिनाकश्यप संग,
आपौ थोरा भीज कर, छको फाग के तंज।
जोगीरा सारा रा रा, जोगीरा सारा रा रा -----
सारा रा रा -----सारा रा रा -----सारा रा रा -----
१.
आज बिरज में होरी मेरे रसिया,
आज बिरज में होरी बृजबसिया।
 नब्बे पार शतक का चस्का,
रस भीने ज्यों छलका ढरका।
 पदम् राग सोहै माथे पर,
रंग गुलाल शोभै गाले पर।
 छूटत नाहीं रंग ये गहरा,
बाबा फिर फिर बन गए रसिया।
 राधे राधे गुनती दुनिया !!!!!
(जोगीरा सारा रा रा --- , जोगीरा सारा रा रा --- बूझो कौन)
२.
काशी में केशव मिले
फागुन में बौराय,
अल्ल बल्ल बकने लगे,
अस्सी में पतियाय।
 उज्जर केश केशनि किए
केशव समझ न पांय,
बानर बालक एक से
बाबा कहि कहि जांय।
ऐसी वय तुम्हरी भयी,
प्रभु ही करैं सहाय।
(जोगीरा सारा रा रा --- , जोगीरा सारा रा रा --- बूझो कौन)
३.
हरिद्रोही हद्दई करैं
पकै उद्द की दाल।
 लखनउआ बानी धरैं,
बनी सजीली चाल।
 उमर भई बन में ह्लैं
चुस्की लें मुस्काय।
सबै कहीं विचरा करैं
नारद मुनि की नाय।
बड़े बड़े बूड़ा किये,
माया समझ न आय।
(जोगीरा सारा रा रा --- , जोगीरा सारा रा रा --- बूझो कौन)
४.
रश्मिरथी के रंग में,
रंगी गैंती देख,
नए नए रंग में रंगी,
परत उतरती देख।
 देख रंगीली पॉटरी,
उठती नयी उमंग,
साठ पार पाठा भए,
मोछा भरे तरंग।
(जोगीरा सारा रा रा --- , जोगीरा सारा रा रा --- बूझो कौन)
५.
दाढ़ी में रंग बहुत हैं,
जित देखौ तित रंग,
चित चंचल मानत नहीं,
चितवन चरिहुँ लंग।
सबकी होरी बर रही
बरस बरस के रोज़,
वै लूका थामे फिरैं,
गली गली में तंग।
 होरियारे मानें नहीं,
घेर लिए लै रंग,
होरी में उनकौ किए,
चारों खाने चित्त।
(जोगीरा सारा रा रा --- , जोगीरा सारा रा रा --- बूझो कौन)
६.
लागी ऐसी लग गयी,
एकहि एक लकीर,
गंगा तीरे बस गयी,
उनकी सब तदबीर।
जाय द्वारिका बस रही,
गोकुल की तसवीर।
 ब्रज की छूटी अस बसी
गोपिन भईं अधीर।
 उद्धव गति लेकर फिरैं,
अगिया वारे बीर।
(जोगीरा सारा रा रा --- , जोगीरा सारा रा रा --- बूझो कौन)