Tuesday, October 10, 2017

सोन चिरइया

Published by Rakesh TewariOctober 2 at 8:12am
सुबह सबेरे सोन चिरइया, गीत माधुरी सुना गयी,
फुलवारी में चिहुँक हृदय में रस संचरित समाय गयी।

आपके लिए:

Published by Rakesh TewariSeptember 1
आपके लिए:
समय सहारे वारि कै, उड़ा करौ निर्द्वन्द,
भूले सब संसार में, मिलै परम आनन्द !!!!

मलय देश में (2): अहमकाना कोशिश

Rakesh Tewari added 2 new photos.
Published by Rakesh TewariAugust 19
मलय देश में (2): अहमकाना कोशिश
सोच-समझ कर आए थे - अपने मुल्क से दूर कतई अनजाने मलय देश (मलेशिया) में बस आराम करेंगे, बेफिक्र, खाना और सोना, ना लिखना ना पढ़ना। लेकिन क्या बताएँ दिल है कि मानता ही नहीं। सोने की कोशिश करते औंघाते हुए भी लगा कुलबुलाने - कुआला लम्पुर शहर का नाम क्यों और कैसे पड़ा, इसके मायने क्या हैं ? खाने के लिए निकले तो लगे मलय संस्कृति की पहचान तलाशने। जिस इलाके में निकले वहाँ उसकी झलक ही मिल सकी तो उसकी वजह और शहर और मुल्क के इतिहास के सफे पलटने को आतुर हो कर गूगल बाबा के सहारे मुअस्सर जानकारी टटोलते हुए बीएचयू वाले 'रोबिन्दर' (Ravindra Singh) की बहुत याद आयी। कई साल पहले उनसे कहा था - अब और हिस्ट्री-आर्कियोलॉजी नहीं होगी, सब भूल कर केवल कविता कहानी लिखूंगा, उन्होंने ललकारते हुए कहा था - 'आप और अँकल जी (चक्रबर्ती दादा) इन्हें ओढ़ते बिछाते हैं, कैसे भूल जाएंगे हम भी देखते हैं। इस ज़िदगी में तो ऐसा नहीं कर पाएंगे।'
पता चला हमारे यहां जैसे दो नदियों के मेल को संगम या प्रयाग कहा जाता है वैसे ही यहाँ दो नदियों के मेल या मुहाने को 'कुआला' कहा जाता है, और 'लम्पुर' का मतलब होता है - मटमैला। इसी तर्ज पर गोम्बक और क्लांग नदियों के मटमैले संगम पर बसा शहर कहलाया 'कुआला लम्पुर'। सन 1857 के आस पास 'सेलनगोर राज परिवार' के एक सदस्य द्वारा क्लान्ग-घाटी में चीनी खनिकों को भाड़े पर लगा कर टिन की खदानों की खोज कराने के साथ यहाँ आवासीय गतिविधियां शुरू हुईं। उस समय यहां बसावट के नाम पर एक छोटा सा पुरवा हुआ करता था। इसके बाद यह जगह टिन की खदानों से निकाली गयी सामग्री जुटाने और नाव से दूर दूर तक भेजने का केन्द्र बन गया। धीरे धीरे यहाँ खनिकों की बसावट बढ़ती गयी। खदानों पर कब्ज़े को लेकर खनिक-गिरोहों में मारामारी भी होने लगी। कालान्तर में मलय बादशाह ने इनके नेताओं को 'कापितान चिन' (Kapitan Cina: Chinese headman) की पदवी से नवाज़ा। इनमें से लुकुट-खदान के मालिक Hiu Siew को 'कुआला लम्पुर' का पहला कापितान चुना गया। 'कुआला लम्पुर' के लकड़ी से बने शुरुवाती आवासों की छत ताड़ के पत्तों (अतप) से छायी जाती थीं। पुराने चीनी और मलय ठिकाने क्लान्ग नदी के पूर्वी किनारे पर क्रमशः मार्केट स्क्वायर और जावा स्ट्रीट इलाके में बसे। बाद में मलय लोगों के साथ ही बस गए भारतीय मूल के चेट्टियार और मुस्लिम भी।
सन 1880 में ब्रिटिश प्रशासन ने 'सेलेनगोर राज्य' की राजधानी 'क्लान्ग' से 'कुआला लम्पुर' स्थानांतरित कर दी। खद्दानों पर कब्ज़े के लिए हुए आपसी युद्ध में जलाए जाने, बीमारियों और बाढ़ से त्रस्त बारम्बार उजड़ते-बसते इस नगर के अच्छे दिन आए सन 1882 में यहाँ तैनात किए गए ब्रिटिश रेजिडेंट द्वारा तेज़ी से कराए गए विकास कार्यों के साथ और फिर तो यह एक बड़े नियोजित नगर में तब्दील होता गया। प्रशासनिक इमारतों के लिए नदी के पश्चिम वाला हिस्सा चुना गया। सड़कें चौड़ी और साफ कराई गयीं और 1884 में आग से बचने के लिए पकी ईंटों और खपरैल की इमारतें बनाने का फैसला लिया गया, ईंट बनाने के भट्ठे लगाए गए, ताड़ के पत्तों वाली इमारतें गिरा कर उनकी जगह ईंट-खपरैल वाली बनायी गयीं। सन 1886 में क्लान्ग तक रेलवे लाइन बिछवाई गयी। औसतन 81.95 m (268.9 ft) ऊंचाइयों वाली हरी-भरी पहाड़ियों पर आबाद यह शहर1895 में 0.65 km2 बढ़ कर 974 आते आते 243 km2 के विस्तृत क्षेत्र वाले महानगर में बदल गया है। इसकी आबादी 1890 तक 20, 000, 1920 तक 80, 000 और अब बृहत्तर महानगर की कुल आबादी 70 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है ।
रबर-उत्पादन के साथ बढ़ी रबर की मांग और प्रवासियों के आगमन ने इसमें बड़ा योगदान किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दरमियान 1942 में जापानी कब्ज़े में आया यह शहर जापान की हार के बाद 1945 में फिर से ब्रिटिश शासन के अधीन आ कर अन्ततः 31 अगस्त 1957 को Federation of Malaya के स्वतन्त्र घोषित होने और 1963 में मलेशिया के गठन के बाद भी कुआला लम्पुर ही राजधानी बनी रही। इसी समय लेक गार्डन्स के किनारे 'पार्लिआमेन' की इमारत बन कर तैयार हो गयी। और अब तो जिधर देखिए उधर बहुमंजिली आवासीय और व्यावसायिक इमारतें, बाज़ार, मॉल, रेस्तोरान, सुपर मार्केट, पेट्रोनास दो-मीनारें, केएल टॉवर, आती जाती मेट्रो, चौड़ी सड़कों पर फर्राटे भरती कारें और दुपहिए, दुनिया के विकसित शहरों में शुमार।
जैसे जैसे यह जानकारियां मिलती जा रही हैं अपनी अहमकाना कोशिश पर उतनी ही कोफ़्त बढ़ती जा रही है। जितना जाना है उससे कहीं ज्यादा जानना अभी बाकी है। अब समझ में आ रहा कि ब्रिटिश ज़माने में आकारित विकसित इस आधुनिक शहर में उनकी छाप तो दिखनी ही है। और फिर इसके आज के पॉश इलाकों में प्राचीन मलय-देश की छवि पाने की उम्मीद कितनी बेमानी हो सकती है। अगर वह सब देखना है तब तो पुरानी बस्तियों-बाज़ारों का चक्कर लगा कर तजबीजना पड़ेगा।
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Source: photos
https://limthianleong.wordpress.com/…/panoramic-kuala-lump…/
This panoramic photo of Kuala Lumpur in 1884 was taken from the book “A Vision of the Past – A history of early photography in Singapore and Malaya, The photographs of G.R.Lambert & Co., 1880-1910” by John Falconer published by Times in 1987 in Singapore.

मलय देश में (1):

Published by Rakesh TewariAugust 16
मलय देश में (1):
सेलामत देतांग (Selamat Detang: Welcome)
प्लाज़ा नामक आवासीय इमारत के उन्नीसवें माले के शयन-कक्ष के सामने ही दिख रहा है कुआला लम्पुर के घने हरियाले भू-भाग के आगे की पहाड़ियों से ऊपर उठती बहुमंजिली इमारतों के बीच गगनचुम्बी 421 मीटर ऊँची मीनार। दुनिया भर में बनी ऊंची मीनारों में ऊपर से सातवें पायदान पर आने वाली इस मीनार को मलय लोग इसे मीनार-कुआला लम्पुर और अंग्रेजी में केएल टॉवर पुकारते हैं। और उसके बगल में खड़े हैं दो बुलन्द 'हीरक पेट्रोनास टावर्' (Twin Jewels of Kuala Lumpur)। नीचे दिखता है वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट, पार्क और गोल्फ कोर्स, और बाएं बगल कुछ दूर पर बहुमंजिली इमारतों के जंगल में प्रवेश करती वलयाकार घूमती मेट्रो लाइन पर थोड़ी थोड़ी देर में आती जाती मेट्रो।
नीचे उतर कर आस-पास का चक्कर लगाने पर लकालक्क चौड़ी सड़कों पर ट्रैफिक के नियमों को मानती दौड़ती कोरिया-जापान की बनी चमाचम्म गाड़ियां लेकिन तनिक सा चूके नहीं कि किसी भी ओर से सनसनाती-भन्नाती हुई बेफिक्री से आती दोपहिया सवारियों से टकराने से बचने की फिक्र करना ज़रूरी वरना तो फिर सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। आस पास के बाज़ारों में मॉल, हर माल मिलेगा एक जगह वाली दुकानें और विएतनाम, लेबनान, हिंदी, चीनी व दूसरे मुल्कों के रेस्टोरेंट । दिन दूना रात चौगुना बढ़ती आदमी की आबादी के मद्दे नज़र सीमित जगह में ज्यादा से ज्यादा लोगों को आवासीय, व्यवसायिक और दूसरी ज़रूरतें पूरी कराने के लिए पश्चिमी दुनिया से चली नए चलन वाली नगरीय बसावट और आर्कीटेक्चर के लिहाज़ से एक खूबसूरत आधुनिक शहर।
लेकिन, क्या बताएँ, तकरीबन अक्खा दुनिया में यूरोप-अमरीका से एशिया के तमाम देशों के बड़े-बड़े शहरों में दीखते विकास के इन मानकों के बीच अपुन का खाँटी देशी मन कुछ और ही तलाशता खो सा जाता है। यहाँ भी वही हुआ, इस सबके बीच तरसने लगा 'मलय देश' की अपनी बानगी देखने को, मगर यह मुराद कम से कम शहर के इस खित्ते में तो पूरी नहीं हो सकी।
बहुत मुश्किल से दिखी भी तो कहीं- कहीं मुल्क की तहज़ीब की लाज रखती मोहतरमाओं के लिबास में दिखी, मगर वह भी आजकल की दिल्ली में भारत की संस्कृति का पल्लू थामे चलने वाली साड़ी, सलवार-कमीज या लहंगे में सजी महिलाओं की तादाद से भी कम। अंग्रेजी हुकूमत के जाने के बाद भी यहां अंग्रेज़ी भाषा में लिखे साइन बोर्ड और यहाँ की भाषा को लिखने के लिए अपनायी गयी रोमन लिपि आज भी यहाँ अंग्रेजी परचम फहरा रहे हैं। उनके पहले से यहां बोली जा रही भाषा का तनिक सा ज़ायका पाने की ख्वाहिश एक दूकान पर लिखे Selamat Detang: Welcome और एक रेस्टोरेंट के नाम Keyra (नारियल) पढ़ कर ही पूरी करनी पड़ी।
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Sunday, August 13, 2017

बस देखता ही रहा

बस देखता ही रहा
जिस तरह अकस्मात दिल्ली की चाकरी में आए उससे ज्यादा अनिश्चय में उससे अवमुक्त हो कर लगा मानो एक झंझावात से पार हो गए। पता चला सरकारी मकान में छह महीने तक मामूली किराए पर रहा जा सकता है। यह जान कर सोचा तीन बरस 'लुटियन्स डेल्ही' में रह कर भी नज़र उठाने का मौक़ा नहीं मिला, पड़ोस के खान मार्केट को देश दुनिया के सैलानी देखने आते हैं और मैं वहां भी तबीयत से चहल कदमी नहीं कर सका, चलो अब फुरसत से यह सब भी कर लिया जाए। मन करे तो पाँव पसार कर आराम किया जाए या लिखा पढ़ा जाए। यहां रह कर जिनसे मिलना जुलना भी हो जाए।
लगे सुबह-शाम भारती नगर की घनी हरियाली में टहलने। सुबह चाय के साथ अखबार की खबरें और अपना राशि-फल इत्मिनान से पढ़ते। इसी बीच मलेशिया से न्यौता मिला तो वहाँ चलने की तैयारी करने लगा। तभी एक दिन इंडियन एक्सप्रेस में छपी यह भविष्यवाणी पढ़ी :
Libra (Sep 24-Oct 23) :
Your nomadic qualities are being stirred up. Short journeys are likely to be made on the basis of family needs, rather than pleasure, but there is bound to be stimulation for you in encountering new places and environments. The more you travel, the richer your experience will be.
पढ़ कर लगा कि कभी कभी कितनी सटीक बैठती हैं ये भविष्यवाणियां भी। फिर तो और ज्यादा ध्यान से राशिफल पढ़ने लगा। टी वी पर बतायी जाने वाली ग्रह-दशाओं और भविष्य पर भी गौर करने लगा। अक्सर उनमें स्थान-परिवर्तन और खासे उथल-पुथल की संभावनाएं घोषित होने लगीं तो सोचा अब ऐसा क्या होने वाला है !!!! फिर भी, अपनी योजना के अनुसार बहुत दिनों से सो रहे प्राइवेट पासपोर्ट पर मलेशिया का वीसा लगवा लाए। ध्यान साध कर तीन-तीन लेख लिख कर छपने भी भेज दिए। लम्बे समय तक प्रवास पर जाने से पहले, पूरे छह महीने का मकान का किराया एडवांस में जमा कराके उधर से निशा खातिर हो जाने के इरादे से विभागीय अधिकारियों को जब तब फोन मिला कर कोंचने लगा, उन्हें लगता छह महीने बहुत होते हैं नाहक परेशान हो रहे हैं।
पहली अगस्त के इण्डियन एक्सप्रेस में उस हफ्ते की इस भविष्यवाणी ने एक अलग ही तरह की जिज्ञासा और सांसत में डाल दिया:
Surprises await. I can not promise that everything will be easy but I can assure that in amongst the thorns, roses will bloom. Be patient and wait until next week for the real magic, though. But, then, at the risk of sounding trite, magic is all around you – all you have to do is look. (तुम्हारे चारों ओर जादू ही है: तुम्हें बस देखते ही रहना है)
बार-बार पढता और ऐसा विचारता कौन सा जादू होने वाला है जिसका केवल दृष्टा ही रह सकता हूँ, कौन से कंटीले झाड़ों में गुलाब के फूल खिलने वाले हैं। इन्हीं उहापोहों में दो अगस्त को पैर पसारे लिखते समय मोबाइल की घण्टी बजी, और उधर से खबर मिली कि मेरे लिए कार्य मुक्त होने के बाद छह महीना नहीं वरन एक माह तक की ही आवासीय सुविधा अनुमन्य है, इससे ज्यादा रहने पर पचास गुना और फिर उससे भी ज्यादा किराया देना होगा, वह भी जुर्माना सहित। सुनते ही सारी मस्ती हवा गयी, तीन से चार दिन में आवास खाली करके सारे सामन सहित लखनऊ पहुँचाना और फिर लौट कर आगे की तैयारी करना कोई हँसी खेल तो ठहरा नहीं, बेचैनी से तन मन त्रस्त और सोच-समझ सब अस्त व्यस्त। सारी योजना उलट पलट हो गयी। मित्रों की मदद से किसी तरह बोरिया-बिस्तर बाँध कर चल दिए लखनऊ। वहां भी बंधा-बंधाया सामान जहाँ तहाँ पटक कर आगे के लिए निकल पड़े।
कहाँ तो छह महीना और कहाँ आनन-फानन में दाना-पानी उठ जाना। एक ही झटके में भारती नगर, दिल्ली की पुरानी मनःस्थिति से पूरी तरह झटक दूर फेंका गए। सब कुछ एक हफ्ते में ही सचमुच के जादू की तरह घटा और मैं नियति की धार में तेजी से बहता हुआ - बस देखता ही रहा।
कहते हैं जो होता है अच्छा ही होता है। अब आगे आगे देखते हैं इन जादुई कंटीले झाड़ों में कौन से गुलाब खिलते हैं या फिर अगर खिल चुके हैं तो कब और कहाँ दिखते हैं, अपने मुल्क में या मलय देश में !!!!!
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कैसी लागी हीय

कैसी आदत पड़ गई कहन-सुनन की मोय,
अब ये चुप्पी तनिक सी नहीं सुहाती तोय।
आहट आवन जान की बहु अकुलावै मोय,
चाहत गुन गुन सुनन की कैसी लागी हीय।

Wednesday, August 9, 2017

मेला मेली

Rakesh Tewari
मेला मेली
जब लौं हिलती डुलती थिरती,
भावों की बहिया फिर उठती।
एक ठिकाने टिक नहीं ठह्ती,
कनकैय्या जस नाचा करती।
हम समझें उस ओर चली,
पर हवा कहाँ किसकी सुनती।
राग विराग ओरहनों वारी,
बुनती गुनती बोझिल उंघती।
सांस चले अटकी लटकी,
हदद हिसाब न गिनती की।
बड़े जतन से धुनिया धूनी,
जुलहा ताना बाना बूनी।
रंगरेजवा ने कस रंग डारी,
रंग बिरंगी सुपनों वारी।
समय काल अस करवट बदली,
पल भर में उधरी बुनिवाई।
चार दिनन की मेला मेली,
हिल मिल खेलो, मिले मिताई।
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Saturday, July 22, 2017

वजूद

Rakesh Tewari
Published by Rakesh TewariJuly 19 at 7:51pm

वजूद

यूं तो धूल-ओ-गुबार से
नाता रहा है अपना।
कहीं भी बैठे या पसरे, 
क्या बिगड़ गया अपना।
भटकते हुए अजनबियों के घर भी,
डेरा डाल रहे अपना।
अनजानों से भी मांग के खाया,
मनभाया अपना।
ऐसा ही आवारा अदना सा
वजूद है अपना।

जैसा भी है अपना वजूद,
तो अपना ही है।
ऐसा भी नहीं कि
बिना बुलाए ही,
चला जाए 'कहीं' भी।
फिर चाहे वो
ताज़ो-तख़्त,
महफ़िल-ए-सदारत,
या स्वप्निल संसार,
ही क्यों न हो।
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Saturday, July 15, 2017

अखरती

अखरती

कानों में कूजन की गूजन झनकती,
लतरन में, डालिन में, अंखियाँ अरझतीं।  

बगिया की पगिया सूनी अखरती,
चहकती चिरइया की चुप्पी अखरती।  

बारिश की बहिया में मछरी तड़पती,                          
तलइया में छप-छप छपइया अखरती।        

करिया बदरिया बिजुरिया चमकती, 
झरती छपरिया में रिमझिम अखरती। 

टोला मोहल्ला में नैय्या टहलती, 
लाली बहुटिया की टोली अखरती।  

लइकन कै खेला-लिहाड़ी अखरती, 
पुरनके सँहरियन की बतियाँ अखरती।  

नयकन की टोका-टोकनी अखरती, 
ऐ बाबू ! अमवौ पै  बन्दिश अखरती।  

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Friday, July 14, 2017

हौले से

हौले से
कारवां बावरे बादरों का चला है,
उड़ के अटरिया पे अटका हुआ है।
रूखी हवाओं में तप कर उठा है,
दर-दर में यूं ही भटकता रहा है।
वनों प्रांतरों में खमसता रहा है
घनेरी घटाओं में घुमड़ा हुआ है।
धड़कता बहकता धुंआया हुआ ये,
रह-रह के जब-तब बरसता रहा है।
चुपके से आँगन में हेला हुआ है,
सिहरन जगा कर के खेला किया है,
सपनों की अलकों में छुपता छुपाता,
उनीदी सी आँखों में पसरा हुआ है।
कहना है क्या कुछ नहीं बोलता है,
हौले से पलकों को चूमा किया है।
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Saturday, July 1, 2017

डेराने हुए हो

डेराने हुए हो

बात छोटी सी है, ये समझते नहीं हो,
हसर सबका ऐसा, ये समझे नहीं हो। 

बात ऐसी भी क्या है, बुझाए हुए हो, 
जखम कितना गहरा, जगाए हुए हो। 

गलाने को गम, यूं ही मिटते हुए हो, 
हाथ में साकियों के, बिखरते हुए हो। 

होश मद मे डुबाए, यूं बहके हुए हो, 
अपने वमन में ही, चंहटे हुए हो। 

आप आपे से ऐसा क्या बाहर हुए हो, 
दाग दामन के अपने उघारे हुए हो। 

किनारे पे आ कर, उदासी लिए हो, 
अब तो समझ लो, क्यों बिफरे हुए हो। 

दुनिया वही है, क्यों भूले हुए हो, 
जो बोया है सिर पर, उठाए हुए हो। 

आग से खेलने खुद से शामिल हुए हो, 
कि घर अपना खुद ही जलाए हुए हो। 

लुक्का लगा कर के घूमा किये हो, 
चिता आप अपनी, सजाए हुए हो। 

बिना बात 'घट' सबका फोड़ा किए हो, 
रमा लो भसम, क्यों डेराने हुए हो। 

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Wednesday, June 28, 2017

गौरैया

गौरैया
१.
गरमी की चटक दुपहरी में
नानी के घर खेला करते। 
 आँगन में तुलसी चौरा पर,
गौरैया ताका करते।
 एक सकोरा पानी भरके
दाना छितराया करते।
गरमी से व्याकुल, खुली चोंच,
दल के दल आने लगतीं।
 पहले दूर फुदकती फिर,
ढीठ बनी नियरे आतीं।
 आँख मिचकती, चीं-चीं करतीं,
तिरछे से देखा करतीं।
२.
जब जातीं वे परच चिरइयां,
झांपी-सूपा ले आते।
 रसरी बांध छोटी सी डंडी
उनके नीचे अटका देते।
 थोड़ा सा दाना पानी भी,
नीचे से सरका देते।
 एक हाथ में रसरी थामे,
दूर तनिक बैठे रहते।
बिन बोले बिन कोई आहट,
दम साधे टोहा करते।
दाना चुगती कोई चिरैया
कब आए उनके नीचे।
३.
जैसे ही कोई आती-जाती,
फंसती चारे के चक्कर में।
रसरी खैंच उसे धर लेते,
उछल कूद कर खुश होते।
 तरह तरह के रंगों से,
उनको फिर रंगा करते।
 नानी जग कर गुस्सा करतीं,
कइसन उत्पात मचाए हो।
 'लइकन कै खिलवाड़ बुझाए,
 औ, चिड़ियन कै जिव जाए।'
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Saturday, June 24, 2017

तीन तेरह का फेरा

तीन तेरह का फेरा
'तेरह' की बात आने पर बरबस ही भारत के यशश्वी प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई की याद आती है। बचपन से ही उनकी सादगी, हाज़िर जवाबी, लाजवाब भाषण-कला और लोक प्रियता की चर्चा सुनने का अवसर मिलता रहा, सीतापुर जिले में जन्म पाने और लम्बे समय तक लखनऊ निवास के संयोग से। जब कभी उनकी सभा की सूचना आती हजारों श्रोता अपने आप जुट जाते उनको देखने-सुनने।
एक बार हम लखनऊ रेलवे स्टेशन के एक नंबर प्लेटफार्म पर किसी को छोड़ने गए थे, थोड़ी देर में बाजपेई जी अपने एक सहायक के साथ दिल्ली जाने के लिए आए। ट्रेन चलने में अभी कुछ देर थी इसलिए वे अपने डिब्बे के बाहर ही खड़े अनजान लड़कों से बात करने लगे। थोड़ी ही देर में उनमें ऐसी आत्मीयता बन गयी कि जब ट्रेन चली तो वे अनायास ही नारे लगाने लगे - 'देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो।'
आगे चल कर बाजपेई जी पहली बार 'तेरह' दिन के लिए देश के प्रधान मंत्री बने। उन्हीं दिनों वे लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में आयोजित सभा में बोलने आए। हम भी सुनने गए। वे बीच-बीच में सधे हुए जुमलों से लोगों को लुभाते-हंसाते बहुत ही तार्किक तरीके से अपने निराले अंदाज़ में बोल रहे थे। उसी रौ में उन्होंने अपने 'तेरह दिन' के कार्यकाल और 'तेरह' की संख्या के अशुभ कहे जाने पर मज़ेदार तंज कसते हुए जो दो लाइनें सुनाईं हमें हमेशा के लिए याद हो गयीं - 'तीन में ना तेरह में, राज करेंगे डेरा में।'
कहते हैं लोगों के जीवन से कुछ संख्याओं का बड़ा गहरा नाता रहता है। बाजपेई जी ने दूसरी बार 'तेरह अक्टूबर' को प्रधान मंत्री पद की शपथ ली, इस बार उनकी सरकार 'तेरह' महीने चली। उन्हीं के कार्यकाल में 'तेरह दिसम्बर' २००१ को लोकसभा पर आतंकी हमला हुआ।
यूं तो अपने जीवन से 'तीन-दो-पांच' से प्रायः साबके पड़ते रहे लेकिन यह एक महज इत्तिफाक ही है कि कुछ सन्दर्भों में 'तेरह तारीख' से भी विचित्र मेल हुआ। यह लिखते हुए पढ़ने वालों से एक गुजारिश करना ज़रूरी लग रहा कि भूल से भी कहीं यह न समझ लें कि अपनी तुलना बाजपेई जी से करने की धृष्टता कर रहा हूँ। उनका ज़िक्र तो सिर्फ और सिर्फ 'तेरह' का फेर समझाने के लिए कर रहा हूँ वरना कहाँ 'राजा भोज और कहाँ ------ धूर लोटना '।
अपने महकमे के सर्वौच्च पद पर चयनित हुआ '१३ मई २०१३' को। आगे लगे 'अड़ंगों दर अड़ंगों' के चलते पूरे एक बरस तक कुछ समझ नहीं आया कि ज्वाइन भी कर सकूंगा या नही। तय किया अब वहाँ की सोचना छोड़ो कोई और ठिकाना थामो। मौक़ा भी मिल गया लेकिन अचानक जाने कहाँ से 'तेरह' का ऐसा फेरा घूमा कि '१३ मई २०१४' को आज की सरकार बनने के कुछ ही दिन पहले कार्य-भार ग्रहण करने का मौक़ा पा गया। लेकिन 'तेरह' का फेरा फिर भी ऐसा लगा रहा कि पूरे कार्यकाल में बार बार सफाई देते बीता - सरकारों के फेरे और उनसे जुड़े नदी-नाव संयोगों की। अन्त तक यह फेरा लगता ही रहा, और देखिए तकनीकी तौर पर पिछले मई महीने की तेरह तारीख को मेरे अनुबंध की अवधि पूरी हो रही थी लेकिन उस दिन शनिवार का अवकाश होने की वजह से 'बारह' तारीख को ही कार्यभार सौंपने गया, लेकिन यह बात 'तेरह' को कत्तई गवारा नहीं हुई। उसे लगा कि आखिर इस बार इस मामले में उसके दखल के बिना कैसे फैसला हो सकता है। लिहाजा, कुछ समय के लिए मेरा कार्य-काल बढ़ गया, हम समझे अब कुछ महीने तो रहेगा ही। उधर 'तेरह' चुप नहीं बैठा, अपना फेरा चलाता रहा और मेरी बेदखली का फरमान ले कर '१३ जून' को आ धमका - यहाँ कहाँ घूम रहा है बन्दे, अब सरकारी नहीं अपने डेरे में राज कर।
जय हो 'तेरह के फेरे की।'
'तेरह' के इन फेरों के तजुर्बों ने बहुत कुछ दिखाया, सिखाया और समझाया। बहुत सी गलतियां करायीं, बहुत कुछ अच्छा भी कराया, बहुत सारी असलियतों से साबका कराया, गलत-सही रिश्तों कीपहचान करायी, ढेर सारी साँसतों-असमंजस-संदेहों में झुलाया। इन फेरों से पाला नहीं पड़ता तो ज़िंदगी के बहुत से रहस्यों पर पड़ा पर्दा नहीं उठ पाता, लम्बे समय में जेहन में संजोई सच्चाइयों और रूमानी तस्वीरों का सच कभी नहीं जान पाता। इन तजुर्बों और हासिल-हिसाब पर तफ्सील से लिखने का बहुत मन कर रहा है। यह जान कर करीबी दोस्त न केवल तुरन्त ही सब लिख डालने का दबाव बना रहे हैं, बल्की ख़ास तौर पर तल्ख़ तज़ुर्बों पर ही लिखने के लिए ज्यादा कह रह हैं। उन्हें समझाने के लिए एक बार फिर से बाजपेई जी और बाबू जी (पण्डित अमृत लाल नागर) की एकसा कही गयी बात सुनानी पड़ी - 'ज़िंदगी में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें निजी ही रखना चाहिए।' हाँ, दूसरी बातों पर जरूर लिखेंगे, बहुत कुछ है लिखने बताने के लिए, लेकिन अभी नहीं। जिन्हे मेरे लिखने से वास्ता हो उन्हें मेरे 'कूलिंग ऑफ़ पीरियड' और 'तेरह के अगले फेरे' का इन्तिज़ार करना पडेगा।
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गागर ऐसी प्रीति की, भरि भरि लाएं मीत !!
जित-जित पीवैं बूड़ि कै, तित-तित बाढ़ै रीत !!

'संग-साथ रहो'

'संग-साथ रहो'
पोखर के थिर जल जैसा,
सोया रहता, आ जगा दिया।
भूले भूले, अंतरमन में,
लहरों का लहरा उठा दिया।
रिश्तों-नातों वय-पहर सहित
कल्पों का अंतर मिटा दिया।
मृदुल सरस नम भावों से,
कोमल मन यूँ झिरियाय दिया।
बीते पल में फिर पलट गया,
ऐसा आ कर अनुराग दिया।
 समझा वो आए, साथ मिला,
 डूबे को ऐसा, हाथ दिया।
छवि-छाया, दिखलाए बिना,
 चेहरा भूला झिलमिला दिया।
 मौसम बारिश का ले आए,
घन मेघ-धूम घुमराय दिया।
गीतों में भीगे परछन से,
दुअरे पर ऐसा मान दिया।
 यूँ आन मिले, हिलमिल बैठो,
संग-साथ रहो जब जगा दिया।
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Wednesday, June 14, 2017

'मनकही'

'मनकही'
हो गयी जो भी खता,
जाने-अनजाने कहीं,
छोटे-बड़े आली-वली,
या फिर ज़माने से कहीं,
मांग कर माफ़ी चले.
ये राह इतनी ही रही।
इनने कही उनने कही,
सुनते रहे सबकी कही,
अब न कहना अपकही,
हम पर नहीं चुप्पी रही ,
जो करी तानाकशी,
हम भी करेंगे दिललगी।
हट गयी है बाड़ अपने,
 दरमियानों की कहीं,
खुल गयी है गाँठ वो ,
खूंटे से थी लपटी हुई,
 आ गयी है यह घड़ी,
उड़ती हुई फिरसे वही।
हो चुकी अब चाकरी,
बंधने-बंधाने की कहीं,
बेबात के ही हर कहीं,
डुग्गी बजाने की कहीं,
अब और की मर्ज़ी नहीं,
अपनी चलेगी सब कहीं।
ना रही कोई फिकर,
उनकी ज़ुबानी की कहीं,
धर लेंगे कोई राह अब,
अपने ख्यालों की कहीं,
पसरो कहीं भी छाँह में,
पीपल की, पाकड़ की कहीं ।
अब लगेगी जो भली,
सीरत या सूरत जब कहीं,
ठहरेंगे उनकी ठौर पर, अब
इस गली या उस गली,
थोड़े ही दिन हैं हाथ में,
अब तो करेंगे मन कही।
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Monday, June 12, 2017

' --- समझु न आए'

Rakesh Tewari
16 hrs
' --- समझु न आए'
नील गगन में कबौ उड़ाए,
कबौ उदधि तल बूड़ी जाए,
सपन लोक सुन्दर सजवाए, 
 कबौ घोर अवसाद जुटाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।
लागै थिर यहु जगत सुहाए,
चलत फिरत कारज करवाए,
मन विचरै कहुँ और समाए,
मानो जागत जोग लगाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।
मथ डारै तबही अखुआए,
सुख-दुःख दूनो में रचवाए,
ऐसी यहु साधना कराए,
देखी-सुनी पढ़ी ना जाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।
निकसि भाव अतिरेक मँझाए,
समथर भूमि पाँव धरि पाए,
जब समझै सम-धारा आए,
तनिकै भर में तुला डोलाए।
 मन की गति कछु समझु न आए।।
मन की गति कछु समझु न आए।।

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Friday, May 26, 2017

जोहा करेंगे



जोहा करेंगे

आते शहर में रहते, आ कर के चले जाते, 
हमको पता न लगता, ना इन्तिज़ार करते।

अपने में मगन रहते, ऐसा तो नहीं करते,          
आहट कोई भी सुन कर, यूं तो नहीं हुड़कते। 

सबको बता के आए, यह आस क्यों जगाए,                         
क्या बात है कि आके, मिलने भी नहीं आए।  

इतना भी क्या तकल्लुफ, यूं दूर-दूर रह के, 
थोड़ा सा समय रखते, संग-साथ रह के जाते।  

परदा तनिक सा हटता, दो-चार बात कर के,  
सुन कर सुना के अपनी, दूरी घटा के जाते। 

गर वक्त की कमी थी, हमको ही बुला लेते, 
हिचकी जो आ रही है, कमतर करा के जाते।  

अब जाने कब जुड़ेगा, यह योग आसमां में,
होंगे उन्ही दरों पर, टहलेंगे साथ मिल के।  

गिनती के दिन बचे हैं, साँसों की पोटली में।  
जोहा करेंगे फिर भी, किस्मत की करवटों में।   

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Thursday, May 18, 2017

अक्षय-निधि

अक्षय-निधि
१.
पाय गए, स्नेह धन,
भित्तर लै सिहराय,
ढरकत जाए गीत मय,
घट उप्पर उपराय।
२.
बरबस पाए या निधी,
राखै हिय चबदाय,
हारिल जस लकड़ी गहे,
खुले गगन पत्ताय।
३.
ऐसी लागी लाग यह,
लागी रहै लसाय,
जब लागै चुकता रही,
फिर लागै छलकाय।
४.
डूब-डूब मधु मालती,
होवैं अस मद-अंध,
जागत दुनिया में फिरै,
झिर-झिर विहरै संग।
५.
बरतन लागै कृपन सम,
 राखै सबते गोय,
 पट खोलै एकंत में,
गिन-गुन परतै टोय।
६.
डरपत मन सोचा करे,
कैसेहु छीज ना जाय।
फिकिर सतावै अब हमें,
कस संचैं सरियाय।
७.
समय बली या जगत में,
सबकुछ लेत समाय,
मोरे बिधाना अस करौ,
अक्षय-निधि बन जाय।
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Friday, May 12, 2017

खेवनहार

खेवनहार 

जीवन रस आवा करैं मिले-जुले एकसार,  
मन-व्याकुल डूबै उबर, आर न पावै पार।  

कैसा इस संसार मेंचला करे व्यापार ?
तनुक राह अटपट लगैबदलै सब व्यवहार।

बड़े पुरनिया कहि गए, तबौ नहीं एतबार, 
जब तक अपने नैन ते, नहिं अवलोकहिं आप।  
  
पढ़ा सुना गुनतै रहैंसमझ  पावैं सार,
नियत घड़ी आवै तबैआखर हों साकार।

कभी कभी ऐसा घटैअकिल  पावै पार, 
सब कुछ लागै तयशुदामानै बारमबार।

हम समझैँ हम कर रहेकरता सब करतार,
डाँड़ गहावै  हाथ मेंखेवै खेवनहार।

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(मई २०१३ - मई २०१७)