Thursday, January 21, 2016

लरिकाईं

लरिकाईं

May 9, 2012 at 8:52pm



लरिकाईं  उर  में  अटीं, अंगनाई  के  छोर, 
इक  दिन  भोरहि  उड़  चलीं,  सँग  लिए  हिय  मोर. 

कितनउ  थिरके  गगन  में, खींचै  बांधे  डोर,   
वहि  सुवास,  सिहरन  भरी, चितवन  चारिहु  ओर.

Sunday, January 17, 2016

पवन ऐसा डोलै: अध्याय पाँच - ५

'रापटगंज कै मसा'
१९८३ में उत्तराखण्ड की तैनाती पूरी करके उतर आए लखनऊ 'उत्खनन एवं सर्वेक्षण अधिकारी' बन कर। एक बार फिर मिर्ज़ापुर की राह धरी इस बार स्वयं नहीं अपने साथियों के अभियान के तहत। इस बार छाना गया दक्षिणी मिर्ज़ापुर के दुद्धी के इलाके को। तीन महीने की मशक्कत की बदौलत एक फेहरिस्त तैयार हुई लघु प्रस्तर और नव पाषाण युगीन उपकरण वाले स्थलों और एक मध्यकालीन स्थल 'शिव पहाड़ी' की। उस इलाके की हलकी पहाड़ियों में शैलाश्रयों, प्राचीन आवासीय स्थलों, मंदिरों आदि के चीन्ह हाथ नहीं आए।


पी एच डी के शोध-प्रबंध के सिलसिले में फोटोग्राफी के इरादे से छोटे पण्डित राम गोपाल के साथ मोटर साईकिल से निकल पड़े एक बार फिर से मिर्ज़ापुर की ओर। पहला मुकाम इलाहाबाद और दूजा सीधे रापटगंज के आगे चुरुक के फारेस्ट विभाग के बंगले में। अगले दिन निकले मऊ रमना के शैलचित्रों के चित्रण के लिए। मऊ पहुँचने पर मऊ कलां गाँव में कुछ ऐसी पुरा प्रस्तर-प्रतिमाओं का सुराग मिला तो उनके अभिलेखीकरण का इरादा बना लिया। उमा-महेश, अर्द्ध-नारीश्वर, तीर्थंकर ---- एक एक कर पण्डित जी ने सबको अपने तस्वीरी डब्बे में समेट लिया।

एक जैन-प्रतिमा की पाद-पीठ पर अंकित लेख देख कर पढ़ कर समझने की जिज्ञासा जागी कि - पढ़ कर देखा जाए कि उस पर लिखा क्या है लेकिन अभ्यास की कमी से मार खा गए। सोचा इसकी फोटो से बाद में पढ़ने का जतन कर लिया जाएगा लेकिन उतने भर से मन नहीं भरा। उसका छापा उतारने का भी मन गया ताकि पढ़ते समय कोई कसर नहीं रह जाए। अब समस्या यह आयी कि हमारे पास ना कागज़ ना स्याही, छापा उतारें तो कैसे। रापटगंज लौट कर बाज़ार से कागज़ स्याही जुटा कर अगला दिन इसी काम में लगाया। 

उसके अगले दिन घेर-घेर घिरे बादल ऐसा झमाझम बरसे कि बस बरसते ही रहे। धारा-धार उतरती चली आ रही झड़ी को देख देख पस्त होते रहे। ऐसे में हमारी मोटर साईकिल के पहिए लसलसी माटी में लपट कर चिरुई-मरकुंड़ी गाँव तक पहुंचा नहीं पाते। तभी बगल के कमरे में टिके जंगलात विभाग के अफसरों से मिल कर लौटे पण्डित जी ने खबर सुनाई - 

'उधर कहीं किसी ने फारेस्ट बंगले में ठहरे किसी अफसर का गोली मार कर मर्डर कर दिया है। ये लोग उसी सिलसिले में कल जीप से चिरुई मरकुडी के दौरे पर जा रहे हैं। उनसे बात कर के देखा जाए शायद ले चलने को तैयार हो जाएं।' उनसे बात की तो उनके साहब राय साहब तुरत राज़ी हो गए - 'चार छह जन, बबुरा वाले बाबू साहब (फारेस्ट रेंजर) और एक जवान दुनाल बंदूक के साथ। आप लोग भी चलो, जितने ज़्यादा लोग चलें उतना अच्छा रहेगा।'

इस तरह हम भी उनकी जीप में सवार हो कर पहुँच गए चिरुई चौकी पर। रहने खाने का सब इंतिज़ाम चौंचक। निकल ही पड़े तो कुछ ना कुछ नया मिलना ही था। जंगलात वाले निकल गए अपने काम से और हमने गाँव वालों के साथ रुख किया केरवा घाट का। वहाँ के चित्रों की छवि उतारते बोनस में खबर मिली गांव के पूरब में कुछ ही दूर पर स्थित भांवा/उटहिया की खोहों के बारे में, हमें इनकी जानकारी पहले नहीं मिल सकी थी। केरवा का काम निपटा कर वहां पहुंच कर खोह की सतह पर अंकित चित्रों को निरखते परखते दो लम्बी गरदन वाली बड़ी बड़ी चिड़ियों के अंकन पर आँखें अटक गयीं -




'इतनी लम्बी गरदन वाले मोर तो होते नहीं। ये कौन से पक्षी हैं ?' पण्डित जी बोले - 

'शुतुरमुर्ग या एमू हो सकते हैं, उन्ही के जैसे लगते हैं।

यह कहने पर कि - 'ये पक्षी इस इलाके में नहीं, अफ्रीका अरब तक ही पाए जाते हैं।

पण्डित जी ने अंदाज़ा लगाया - 'क्या पता उस ज़माने में रहे हों यहाँ भी।

उन्हें समझाया - 'पण्डित जी ! इतना आसान नहीं है यह मान लेना भी। बड़े लोगों की मानें तो भारत में भी कभी ये पक्षी रहते तो थे लेकिन कम से कम पंद्रह-बीस हज़ार साल पहले, उसके बाद यहाँ से लुप्त हो गए। और अगर यह बात मान लें तो ये चित्र भी उतने पुराने होने चाहिए जबकि शैलचित्र इतने पुराने माने नहीं जाते।' 'तब तो दो ही बातें हो सकती हैं - एक तो यह कि ये पक्षी बाद में भी यहाँ पाए जाते रहे हों। दूसरी यह कि ये कोई और ही पक्षी हों या फिर चित्र बनाने वालों ने गलती से गरदन लम्बी बना दी होगी।' इतना कह कर पण्डित जी अपने काम में लग गए। और मेरा मन इनकी पहचान की संभावनाओं के खटके पर अटका रहा। रात घिरते प्रसन्न मन बंगले पर लौट कर दिन भर की नयी अनोखी खोजों के लिए राय साहब, बबुरा वाले बाबू साहब और पण्डित जी को लाख-लाख साधुवाद देते नहीं थका। रात भर मच्छरों ने जी भर कर चोभा, सुबह उठते माथा चढ़ते ज्वर से ठनकने लगा और वर्षा रुकने का नाम ना ले। लेकिन, युवा तन-मन की लगन इस सब की फिकर ही कहाँ करती है । बरसते बादलों की छाँव में ही निकल दिए चुर्क से, भल्दरिया की फोटोग्राफी निपटा कर, बनारस पहुँचने के लिए। रास्ते में भल्दरिया के इस पार मोटर साईकिल टिकाते सामने भलभलाती खलभालती धारा का उफान देख एकबारगी सहम गए - इसे पार कर कैसे पहुंचेंगे उस पार की खोह तक। हम देखें पण्डित जी को और वो देखें मेरी ओर। कुछ देर उफनती धारा ताकते बढ़ लिए चट्टानों के बीच से पग साधते धरते, काई में फिसलते, काँटों में बिंधते और झाड़ों की डालियाँ थामते। और, आखिर में जो चाहा तिन पा कर ही माने।

पण्डित जी ने मेरे माथे पर हाथ धरते चिन्ता जताई - 'भाई साहब। आप का बुखार तो एक सौ तीन से कम नहीं होगा। ऐसे में आगे कैसे चलेंगे।'  

सोचा हुआ काम पूरा कर लेने की प्रसन्नता से अघाये मन की ऊर्जा के सहारे बुखार-वुखार की परवाह किये बिना उसी हालत में मोटर-साईकिल लहराते बनारस पहुँच कर डेरा डाला अभय गुरु के साथ, डाक्टर भानू शंकर मेहता के डेरे पर। 

हफ्ता बीतते भी ताप का वहै हाल देख अभय, अजय, मम्मी सब हलकान होने लगे। पण्डित जी के लखनऊ रवाना कर के वहीं रुक कर इलाज कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। एक शाम अभय ने 'लहुरा बीर' की बैठकी में मेरे ताप की चर्चा चलाई - 'डाक्टर साहब तो बहुतै कोशिश कर लेँ, कइयौ दवा अजमइलैं, लाख जतन करै बादौ बुखार उतरै के नामै ना लेत हौ। जब एक सौ चार के पार होवै लगे तो माथे पर बरफ की पट्टी अलट-पलट के धरल जा ली, हाथ-पाँव पर बरफ का फेरा लगावै लें फिरहू नहीं उतरत आ।

उनके एक के डाक्टर भाई ने मेरा यह हाल सुनते ही पहला सवाल किया - 'चन्दौली रापटगंज की ओर तो नहीं गए रहे ?'

अभय के बताने पर एक ख़ास दवा देते हुए पूरे भरोसा दिलाया - 'चिंता जिन करा। दुइऐ खोराकी में बुखार उतर जाई। ओहर के मच्छरन से जउन मलेरिया हो ला ना ऊ इहै दवा से उतरा ला।'

अभय गुरु ने सीधे डेरा पर आ कर दवा खिलाई और दूसरे ही दिन बुखार उतरते देख अपने आप में आ गए - 'अब लौं तो जानत रहली कइसन हो लें मनई तनई, खोह कनरा, भाल-तेनुआ ओह इलाके कै, बकी और सब तो जौन हौ ऊ तौ हइऎ हौ रापटगंज कै मसौ (मच्छर) अलगै हो लैं, ई तो अजवै बुझाइल।'
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पवन ऐसा डोलै - अध्याय पाँच :४

'थिरकते शैल चित्र'

संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ ने १९८२ में ओबरा में दक्षिणांचल के वनवासी नृत्य-संगीत पर उत्सव का आयोजन कराया तो अपने लिए भी बुलउवा आया। 

शैलाश्रयों में निरूपित दृश्यों की अनुकृतियाँ उलटते-पलटते सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व दिखा नृत्य-दृश्यों का। एक दूसरे की बांह या कमर में बांह डाले नाचते नर्तक, एक पाँति में नाचते, चकरिया बना कर चकराते, इधर उधर झूलते झूमते, नर्तक युग्म, एकल नर्तक और मेघा-नृत्य। थिरकते पग, काया, अंग-उपांग, पाहन-पाहन, खोह-कन्दरा में चित्रित। मचलते भावों की चपलता से प्रतिध्वनित तत्कालीन उत्सवजीवी आनन्द धन सम्पन्न वनवासी जीवन की थिरकन ने ज़िंदगी में पहली बार नृत्य की व्युत्पत्ति पर सोचने को बाध्य कर दिया। नृत्य शास्त्र का '' भी जाने बिना जो कुछ सोच-समझ में आया लिखने लगा - 

'नृत्य मूलतः अन्तर्मन के आनन्द से उद्भूत हुआ। श्यामल मेघों का घिराव देख मयूरों का थिरकना, हरियाले वन-प्रांतर में उल्लिसित मृग छौनों की किल्लोलें, मृगया से छके सिंह शावकों की मस्त कलाबाजियां, विशिष्ट अवसरों पर चिड़ियाँ की चहकन-फुदकन की तरह किन्ही अवसरों पर अन्दर से उपजे उमंग के ज्वार ने आदिम मानव के अंग-अंग में चपलता भर कर उन्हें बाहें और पैर फैला कर, गरदन, कमर सिर लचका कर नाचने के लिए उद्यत किया होगा। आखेट खेलने चले तो सफल मृगया की कामना से नाचे, कबीले भर की भूख मिटाने लायक बड़ा पशु गिरा लिया तो सफलता की उमंग में नाचे, अहेर अलाव पर भुनने लगा तो सुस्वादु मांस की लालसा में नाचे। पवन, वर्षा, वन, नदी, गाछ, सूरज और चाँद जो भी पारलौकिक लगता या जिससे हित सधता या जिससे भय खाते उन सबकी उपासना में नाचते। कमर, कंधे और बांह में बांह डाल कर नाचते।


आनन्द से जुड़े नृत्य में नर्तक नाम का कोई कलाकार नहीं होता। उमंग से भर कर सभी नर्तक बन जाते। कालान्तर में अनेक कारणों से इस सर्व सामान्य आनन्दाभिव्यक्ति ने कला का रूप लेना प्रारम्भ किया। एक बड़े मानव समाज में नर्तकों का एक अलग वर्ग बन गया। कलाकार साधना के बल पर नृत्य का अभिनय करने लगे। धीरे धीरे आदिम नृत्य तराश कर शास्त्रीय नृत्य में ढाला गया लेकिन उसकी दुरूहता के कारण सामान्य जन उससे कटते गए। फिर भी नृत्य का सहज स्वरुप लोक नृत्यों की शैलियों में उभरा। जीवन की जटिलताओं में सहज आनन्द के स्रोत सूखते जाने के कारण लोक में भी स्वाभाविक नृत्य की प्रवृत्ति कम होती गयी और नृत्य कला में तब्दील हो गया। अपवाद स्वरुप गहन कान्तारों और गावों में कुछ अवसरों पर अभी भी सारे निवासी उफनते आनन्द के ज्वार में थिरकने लगते हैं और शादी ब्याह जैसे मौकों पर जैसा मन चाहे के अंदाज़ में थिरक लेते हैं।

मिर्ज़ापुर के शैलचित्रों की प्रतिकृतियों में ३९७ नर्तक मिले। इन्हे अपने आप में मगन बिना विभिन्न मुद्राओं में नाचते, हाथ में हाथ थाम कर नाचते, घेरे में नाचते, अनिश्चित क्रम में समूह में, एकल या युगल नृत्य के वर्गों में रख कर वर्णित किया। 

इस प्रकार कुल ६० नृत्य दृश्यों को चिन्हित कर उनका विस्तृत विवरण लिख डाला। कितना सही लिखा कितना गलत यह तो नृत्य-शास्त्री जानें। इस सबकी फिकर किए बिना जो कुछ सूझा लिख कर 'थिरकते शैल चित्र' के नाम से एक लघु-पुस्तिका का रूप दे दिया। श्याम जी की अगुवाई में साथियों के जुटाए साधनों से बनी 'युवा परिभ्रमण एवं सांस्कृतिक समिति' के सौजन्य से प्रकाशित करा कर पहुँच गया ओबरा के उस उत्सव में हाथ धोने।


शुकुल जी को पता चला तो फूले नहीं समाए, आयोजन की मुख्य अतिथि लोक कलाओं की प्रख्यात विदुषी पुपुल जयकर और नृत्य कला पर पी एच डी, प्रतिष्ठित नृत्यविद, डाक्टर सुनील कोठारी से मिलवाया। समन्दर की लहरों की तरह झकझोरते उठते-उतरते बोलों के साथ थिरकते वनवासियों की कतारों से बहकते, कुछ ज़्यादा ही महुआ छाने, मादल-वादकों के प्रदर्शन के बीच, 'थिरकते शैल चित्र' का लोकार्पण करवाया। केसरी जी ने जाना, ओबरा वाले नीरव जी ने जाना, जिसने भी जाना हाथों हाथ लिया। बरसों की मेहनत का ऐसा उपहार पा कर धन्य हो गया।
------------------------- तिवारी, राकेश १९८२ थिरकते शैल चित्र, युवा परिभ्रमण एवं सांस्कृतिक समिति, लखनऊ।

पवन ऐसा डोलै: अध्याय पाँच- ३

'साज बिबिध सिर माथे सोहैं'

लखनऊ प्रवास के बीच हमेशा की तरह एक बार बाबू जी (पद्म भूषण पण्डित अमृत लाल नागर ) की बैठकी ने जिन्दगी का चक्का एक नए मोड़ पर चला दिया। नए नए चित्रित शैलाश्रयों की खोज के हाल-हवाल सुन कर उन्होंने मुंंह खोल कर अपने इस बन्दर से कुछ माँगा तो आवाक रह गया -

'बेटा ! एक कृपा करो मुझ पर। ------ '

मन ही मन उहापोह में चकराया - 'पता नहीं क्या मांगेंगे ? पूरा भी कर सकूंगा ?'

'भीख माँगता हूँ बेटा ! मिर्ज़ापुर के शैल-चित्रों पर शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत कर दो। बहुत उपकार होगा मुझ पर। ------ '

कहाँ तो समझ रहा था मुझसे कुछ मांगेगे और कहाँ मेरी ही झोली भर दी। ना कहने की गुंजाईश कहाँ रखी। जैसी हो भवितव्यता तैसी मिलै सहाय, आप न जावै जो जहां ताहि तहाँ लै जाय। रजिस्ट्रेशन करा कर जुट गया एक-एक अध्याय पर काम करना।

नए उत्साह से कुछ और खोज की, शैलचित्रों की प्रतिकृतियां तैयार कीं, उनके बहुपक्षीय अध्ययन के बाद पहला अध्याय तैयार करने लगे मानव आकृतियों की निराली केश एवं सिरो-सज्जा पर। साथी गिरीश जी ने जाना तो झट से डाक्टर वासुदेव शरण अग्रवाल के हवाले से बताने लगे - 'मौर्य-शुंग-कुषाण-गुप्त कालीन प्रस्तर और मृण्मूर्तियों में प्रदर्शित केश-पाश की विधाओं पर कालिदास के साहित्य में वर्णित नायिकाओं के विन्यास के आधार पर बहुत लिखा गया है । भांति-भांति के केश-विन्यास - अलकावलि, भ्रमरक, हनी काम्ब, चूड़ा-पाश, लम्बकेश, वलिभृत, वलयक, त्रिशिख, आदि, आदि।' कोशिश कर के भी केशपाश के अलावा उनमें से किसी से भी शैलचित्रों की केश-सज्जाओं का मेल नहीं बैठा पाया तो महाजनों का पथ छोड़ जिधर सूझा चल पड़ा जैसा समझ पाया लिखने लगा - 

'प्रकृतया मानव अपनी विशिष्ट पहचान और सुन्दर दिखने के लिए परिंदों के परों, पत्तियों, फूलों आदि से तरह तरह के रूप धरने लगा होगा। चित्ताकर्षक मोरपंख, मुर्गे की कलगी, अरनों के शानदार सींग निश्चय ही उन्हें आकृषक लगे होंगे और उनकी तरह सुन्दर और रोबीला दिखने की चाहत से इनकी सज्जा सिर-माथे चढ़ी होगी। मृगया से मिले या वनों में बिखरे सींग और तरह तरह के रंगीले पंख आसानी से मिल जाते होंगे। घुंघराली अलकों और केशराशि में अलग-अलग ऋतुओं में फूलते लाल-पीले-नीले चमचमाते पुष्प पिरो कर प्रिय या प्रेयसी को लुभाने की प्रक्रिया अनायास ही चल पड़ी होगी। काम काज में सुविधा और सज्जा के लिए बिखरे केश बाँधने, समेट कर जूड़ा बनाने, और वेणियां गूंथने की स्वाभाविक प्रक्रिया चली होगी। आखेट के लिए निकलने वाले सजग अहेरी भोले वन्य-जीवों को भरमा कर मारने के लिए घास-फूस, चिड़िया के पंख और सींगों की सिरोभूषा धारण कर वन्य वनस्पतियों में लुक-छुप कर धीरे धीरे उनकी ओर बढ़ते होंगे लेकिन अहेर समझते होंगे कि उधर उनके जैसा ही कोई पशु-पक्षी विचर रहा होगा या खर-पतवार लहरा रही होगी और जब निकट आ कर वे अचानक उन्हें भाले-तीर से बींधने लगते तो संभलने तक का अवसर नहीं पाते।


जैसा कि आज के ट्राइबल समूहों में आज भी देखा जा सकता है कुछ सिरो-सज्जाएं वनवासी समूहों में अन्य विशिष्ट व्यक्तियों की पहचान और समूह में उनके महत्त्व यथा मुखिया, वीरता, आखेट में सफलता, ओझा-सोखा जैसे दरजों को भी दर्शाती रही होंगी। वनवासी परम्पराओं के अध्ययन से इस विषय में और अधिक प्रामाणिक जानकारी जुटाई जा सकती है।


एक-एक कर शैल-चित्रों में प्रदर्शित केश-सज्जा की लगभग उनहत्तर विधाएँ पहचानी। उन्हें अलग-अलग वर्गों में रखा। फिर, दूसरे इलाकों और दूर-दूर के देशों-महाद्वीपों के ऐसे चित्रों में आपसी समानता देख मानव मन की विश्व्यापी एकरूपता पा कर बड़ा अचरज हुआ। संगीत, कला, राग-विषाद, गाने और सजने सुन्दर दिखने की प्रवृत्ति जैसे भाव देश-काल की सीमाओं के आर-पार सब कहीं एक सा दीखते हैं।


पूरा लेख लिख कर साथियों को दिखलाया। पढ़ कर कुंवर की काया चैतन्य हो गयी, चोटी खोल कर बोले - 'यू काम तुम बहुत नीक कीन्ह्यौ। तिसरी-दुसरी शताब्दी इस्वी पूर्व के पहिले औ वनवासिन की केश-सज्जा पर अइस लेख तो कोऊ अब तक लिखा नहीं। कम-अस-कम सात-आठ हजार बरस क्यार परम्परा तो समझ मा आय जायी एहिसे। बहुत जनी जउन बहुत मॉडर्न बनी लटक-झटक के छल्ला बनाए चलती आंय ना, सपन्यौ मा नहीं सोचिन होइहैं कि बन मा रहै वाल्यौ एत्ते बरस से, अइस सजत-धजत रहे होइहैं। एहिका छपवाए डारौ तो बढ़िया रही।'

हिम्मत पा कर वह लेख 'संग्रहालय पुरातत्व पत्रिका' के लिए भेज दिया। स्टेट म्यूज़ियम के तब के मुखिया डाक्टर आर. सी. शर्मा ने उसे अगले अंक में पहले नम्बर पर प्रकाशित किया जिससे उत्साहित हो कर अगला अध्याय लिखने में जुट गया।
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तिवारी राकेश १९८२ मिर्ज़ापुर के शैलचित्रों में साज-सज्जा की प्रवृत्ति, संग्रहालय पुरातत्त्व पत्रिका २९-३०, पृष्ठ १-१६.