Friday, January 23, 2015

आगे > कुस्तुनतुनिया

'अतातुर्क'

वालंटियर के साथ मोबाइल में सिम लगवाने निकले। इसी बहाने थोड़ी चहल कदमी हो गई।  जितना देखा उतना शहर 'मुस्तफा कमाल अतातुर्क' के 'मोर दैन लाइफ साइज' के इश्तहारी बोर्ड, बुतों और उनके नाम वाले संस्थानों के नाम के साए में उसी तरह बढ़ता दिखा जैसे हमारा मुल्क कभी नेहरू जी के प्रभामंडल में दिखता रहा।


होटल के सामने की सड़क पर सवारियों का आना जाना रुक रुक कर चलता दिखा। लॉबी में आते जाते एक टेबल पर एक रिसेप्शनिस्ट नज़र आता।  रतजगे से उनींदे कमरे में आ कर कुछ देर खिड़कियों से झाँक कर देखा, एक ओर मीनार, सामने नयी इमारत पर खपरैल का ताज, नीचे सड़क का नज़ारा, आज कल बहुत आसान हो गया है सब फोन के कैमरे में कैद कर लेना।




एक नींद ले कर जागा तो विकिपीडिआ की मार्फ़त ज़ेहन में मंडरा रहे 'मुस्तफा कमाल अतातुर्क' के बारे में तफ्सील टटोलने बैठ गया - 'मुस्तफा' से 'केमाल' से 'अतातुर्क' तक उठने की उन की लम्बी कहानी जानी, तो लगा - एक आदमी की रहनुमाई किसी मुल्क और जमात को क्या से क्या बना सकती है।

आज से करीब सादे पांच सौ बरस बीते 'उस्मान ग़ाज़ी ने 'कांस्टेंटिनोपल (इस्तांबुल)' फतह कर के अपनी सल्तनत कायम की। नाम बिगाड़ने में अंग्रेज़ों के क्या कहने, उस्मान या ओस्मान तो बोला नहीं गया, जुबान तोड़ कर बोलने लगे 'ऑटोमान', फिर, ज़बर के पीछे लग ली सारी दुनिया, 'सल्तनत-ई-उस्मान' मशहूर हुआ  'ऑटोमन एम्पायर' के नाम से।    
आगे चल कर बाजै लगे याकै 'सुलेमान आलीशान'। उनके सल्तनत की सरहदें फ़ैल गईं पूरब में फारस, उत्तर-पश्चिम में हंगरी, दख्खिन में मिस्र, और उत्तर में अपनी रामायणी कैकेयी वाले काकेशश तक। उनके जहाजी दस्ते भू मध्य सागर, लाल सागर और फारस की खाड़ी में दनदनाते घुमते। तालीम, टैक्स और जुर्म के मामलों में सुलेमान के कानून उनके इंतकाल के बाद भी लम्बे वक्त तक चले, शायरी और सोनारी में भी उनकी खासी दखल रही। हुनर, अदब और इल्म-इ-तामीर को बड़ा बढ़ावा मिला।


'ऑटोमन सल्तनत' की ज़द्दोज़हद पर अंकुश लगाया १६८३ में विएना की ज़ंग में मिली हार ने। रही सही चमक उतरी १९१८ में पहले वर्ल्ड वार में हारने के बाद।  इत्तेहादी ताकतों ने  इसको कई टुकड़ों में छांट दिया।

डूबे से उबारा इस खित्ते को १८८१ में जन्मे 'मुस्तफा' ने। 'मैथ्स' पढ़ाने वाले उस्ताद ने उनकी काबिलियत के मद्दे नज़र नाम रखा 'केमाल', इस तरह नाम पड़ा - 'मुस्तफा केमाल'।
बचपन से ही फौजी तालीम ले कर १८९९ में ऑटोमन मिलिट्री अकादेमी और कालेज में पढ़ कर १९०५ में ग्रेजुएशन किया। पहले वर्ल्ड वार के वक्त फौजी अफसर रहे। ऑटोमन एम्पाएर की शिकस्त के बाद तुर्की की ज़ंग-इ-आज़ादी की रहनुमाई करते हुए अंकारा में सूबाई सरकार बना कर संयुक्त ताकतों को हराया। फिर २९ अक्टूबर १९२३ को रिपब्लिक ऑफ टर्की की मुनादी की। उस बरस दुनिया के सबसे मशहूर रिसाले 'टाइम' के ऊपरी सफे पर साया उनकी तस्वीर पर लिखा गया: Mustafa Kamal Pasha - "Where is a Turk his own master ?"



अंकारा शहर को दारुल हुकूमत का दर्ज़ा मिला। पुराना खलीफा राज ख़त्म, आईन (संविधान) का राज कायम हुआ। मज़हब और सियासत के रास्ते ज़ुदा हुए। तालीम को ख़ास तवज्जो मिली। नया सेक्युलर क़ानून आया। पुरज़ोर खिलाफत के बाद भी साइंस और बढ़ती हुई तहज़ीब के लिए गैर ज़रूरी समझे गए रवायती इदारे बंद हुए। औरतों-मर्दों के साथ साथ बढ़ने के रास्ते, म्यूजियम के दरवाज़े और प्राचीन अनातोलिआ के इतिहास के पन्ने खोले गए। तुर्की भाषा को लिखने के लिए अरबी की जगह लैटिन अल्फाबेट की मदद से बने नए तुर्की हर्फों और मर्दों के लिए पश्चिमी ड्रेस कोड का चलन चला। दो ही बरस में पढ़े-लिखों की तादाद १०% से बढ़ कर ७०% से ज़्यादा हो गई। अंकारा में यूनिवर्सिटी खुलवाई और इस्ताम्बुल की पहले वाली को आगे बढ़ाया। ब्रिटेन - रूस - ग्रीस - दक्षिण पूर्वी यूरोप की बाल्कन पहाड़ियों के मुल्कों (रोमानिया - युगोस्लाविया वगैरह) - अफ़ग़ानिस्तान - ईरान से तालमेल बनाया। सरकारी कारखाने लगवाए। बड़ी तादाद में उपजने वाली तम्बाकू पर काबिज़ गैर मुल्कियों से फुर्सत पाई, कपास की उपज, चीनी जैसी देशी जिंसों से जुड़े उद्यमों को बढ़ावा दिया, बैंक खोले, बड़े पैमाने पर रेल - रोड - पुल के जाल बिछाए। ज़मीनी मोटर कार से आगे आकाश की ताकत कूत कर हवाई दस्ते और उन्हें बनाने वालेकारखाने की बुनियाद रखी।

निजी फ्रंट पर मुस्तफा कमाल का एक नहीं, दो नहीं, चार-चार मोहतरमाओं से मोर्चा पड़ा। गोद लिए तेरह बच्चों में से सबीहा नाम की एक बच्ची  ने तुर्की  ही नहीं अक्खा दुनिया की पहली लड़ाका महिला हवाबाज़ बनने का नाम कमाया।

आखिर तो एक दिन सबको जाना है, उनका भी पयाम आया, १० नवंबर १९३८ को, केवल सत्तावन बरस में ही, लेकिन, देखिए जो काम लोग सौ बरस पार करके नहीं कर पाते, मुस्ताफ उन्हें करने का कमाल कर गए। क्या शानदार शख्शियत और कैसी नायाब कामयाबी।

जाते जाते भी अपनी जायदाद का ज़्यादा हिस्सा सामाजिक सरोकारों के नाम वसीयत कर गए। इसी लिए टर्की ने उनकी यादें संजोईं 'हवालिमानी' से ले कर बंदरगाहों और दीगर संस्थानों के नामों में, जगह जगह लगे ऊंचे घुड़सवारी बुतों में। सरकारी इमारतों-स्कूलों के दर्जों, स्कूली किताबों, बैंक की नकदी पर और बहुत से घरों के ड्राइंग रूम में साया तस्वीरों में।  हर साल १० नवम्बर को, ठीक उनके जाने के वक्त पर, समूचा टर्की एक मिनट के लिए जहां का तहाँ थम कर उन्हें याद करता है। हिन्दुस्तान सहित दुनिया भर के मुल्कों ने उनकी याद संजोई अपनी सड़कों, बागों, वनों, बगीचों, यादगारों के नामकरण, अवार्ड और अलंकरणों में।

इतना सब जान कर ही समझ पाया कि टर्की गणराज्य के पहले राष्ट्रपती को, १९३४ में वहाँ की पार्लियमेंट ने 'अतातुर्क' (फादर ऑफ दी तुर्क्स, तुर्को के पिता; वैसे ही जैसे अपने बापू कहलाए 'राष्ट्र-पिता') की पदवी से नवाज़ने और आगे किसी को वह ओहदा नहीं दिए जाने का कलमतोड़ फैसला, यूं ही नही ले लिया, और, उनका पूरा नाम 'मुस्तफा - केमाल - अतातुर्क' क्यों और कैसे पड़ा।

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बकिया आगे 

आगे > कुस्तुनतुनिया : 5

January 23, 2015 at 8:54am
चूड़ियाँ, बिंदिया और हिना: ३ मई २०१४

समंदर के किनारे-किनारे इस्तांबुल शहर की ओर बढ़ते, अगल-बगल आगे-पीछे सब नया और अनदेखा, झांक ताक कर आँखों में समेटते रहे।  'प्रोफेसर सलह जर्रार' की पेशानी अब भी चढ़ी रही, जाने क्या मंसूबे ले कर चले होंगे और यहाँ आते ही खुश आमदीद नहीं, खैर मकदम नहीं, ऊपर से ऐसा बरताव ?? कारों की कतार थोड़ा सा सरकती फिर थम जाती, फिर चलती, फिर रुक जाती।  ज़र्रार साहब संजीदा ही बने रहे।




जगह जगह मुस्तफा कमाल अतातुर्क की 'टालर दैन लाइफ साइज़्ड तस्वीरों' के होर्डिंग्स, ज़दीद और पुराने दोनों ही चलन की इमारतें। तभी बाज़ू वाली इमारत पर लगे नोटिस बोर्ड पर लिखा दिखा - 'वकिफ बैंक (VakıfBank)' जाना समझा लगा, मुझे बरबस लखनऊ के 'वक्फ बोर्ड' याद आ गए।  मतलब समझने के लिए ज़र्रार साहब से पूछा तो अपने में आए। जाने पहचाने लफ़्ज़ों की बात सुन कर उनके चेहरे की रौनक लौट आयी। कहने लगे हिन्द में बोले जाने वाले अरबी लफ़्ज़ों की एक फेहरिस्त बनाने के प्रोजेक्ट पर अच्छा काम किया जा सकता है।




यूरोपियन सैलानियों की चहल कदमी देखते, हलकी ऊंचाइयों पर सजे खूबसूरत मकानों की कतारों के साथ साथ घूमते पश्चिमी इस्तांबुल के पूर्वी सिरे की और बढे। कार की खिड़की से झांकते साफ़ सुथरी सड़को पर कहीं-कहीं नोटिस बोर्ड पर लिखी इबारतों के 'वक्फ बैंक' (Vakif bank) जैसे जाने-पहचाने लफ्ज़ो पर निगाह अटक जाती। ज़्यादातर चेहरे भी देखे देखे से लगते। लड़कियों के हिज़ाब और जींस-टीशर्ट वाले पहनावे से यहां चल रही इस्लामी और पश्चिमी तहज़ीबों की गलबाँही का अंदाज़ दिखा। दूर तक फैले शहर की इमारतों के बीच ऊपर उठती मस्जिदों की मीनारें और कोलोनियल बिल्डिंग्स के सिरे एक अलहदा नज़ारे बनाते यह बताते दिखे कि आप पश्चिम एशिया के एक मुल्क में हैं। ऊंचाइयों पर लहराते लाल परचम टर्की की ख़ास कौमी पहचान कायम करते दीखते।   

'क्रिस थ्रोम्प्टन' ने अपने एक ई मेल में जिस 'नोटोरिअस ट्रैफिक' के बारे में आगाह किया था उसे रूबरू देख कर सोचता रहा अगर इसे ही 'नोटोरियस' कहा जाय तो बनारस-दिल्ली के चिल्ल-पों में बिना बात चीखते-बजते तरह-तरह के हॉर्न वाले ट्रैफिक को क्या कहेंगे।


एक कतार में करीने से खामोश रेंगती कारों की लम्बी लाइन में रेंगते आखिर 'ऑर्टकोय प्रिंसेस होटल' में डेरा पड़ा उस मुकाम पर जहां से एक ओर दीखता है इस्ताम्बूल के यूरोपियन और एशियन खित्तों को जोड़ने वाला लहराते समुद्री पानी पर झूलता लोहे का बहुत लंबा पुल। होटल के कमरे से नीचे सड़क से गुज़रती सवारियों और पास ही ऊंची पुरानी मस्जिद का नज़ारा नज़र आता।  






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बकिया आगे

आगे > कुस्तुनतुनिया : 4

January 20, 2015 at 7:15pm
हवालिमानी: ३ मई २०१४

बगल की सीट पर विराजमान भद्र-पुरुष दोनों हाथों की तर्जनी उठा उठा कर अपने पास की विंडो -सीट पर सुशोभित शुभ्रा सहयात्री को गांधी के बाद के भारत में प्रभावी तत्त्वों पर टिपिकल बंगला अंदाज़ में लंबा भासन देते रहे। थोड़ी देर बाद उनका ध्यान मेरी ओर घूमा तो टर्की जाने का सबब पूछा।

बातों बातों में उनके स्वतंत्र स्थापित स्तंभकार होने का पता चला।  एक तो बोंगाली मोशाय, ऊपर से पत्रकार। सुनते ही चुरकी सटक गई।

मेरी वृत्ति और सेवा से निवृत्ति की जानकारी पा कर पूछने लगे कि आगे क्या करने का इरादा है।  थोड़ा और गहरे उतरे, और जब जाना कि वे प्रेसीडेंसी कालेज, कोलकाता की ही उपज हैं तो उन्हें दो चार कराया प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के अवसर और दूसरी सरकारी सेवा के विकल्प में से किसी एक को चुनने की दुविधा से। जिसे सुन कर वे बेबाक बोले - 'बिना बिचारे प्रेसीडेंसी ज्वाइन करो, बड़ा वॉयब्रैंट वताबरन मिलेगा। सरकारी नौकरी में कितना ही ऊँचा सीट हो, बाबू लोगों का नीचे और बेबात का दुसरा-दुसरा दखलंदाज़ी जुरूर रहेगा।' उनकी इस नसीहत पर बोला तो कुछ नहीं लेकिन देर तक अन्दर ही अन्दर उसे गुनता-जोड़ता-घटाता रहा।



उतरने की तैयारी में जहाज चक्कर लगा कर इस्ताम्बूल के समंदर पर मंडराने लगा। नीचे समंदर के क्रीक में  हिलोरें मारते नीले जल-विस्तार के आर-पार आते-जाते क्रूज़ नज़र आने लगे। 'बाबू मोशाय' पहले भी यहां घूम गए थे, इस्ताम्बुल की बाज़ार घूम लेने और क्रूज़  की सवारी का लुत्फ़ उठाने की सलाह दी।

साढ़े छह घंटे का फासला पार करके तुर्की के वक्त के मुताबिक़ सुबह साढ़े दस बजे से कुछ मिनट पहले ही विमान गोता लगा कर समंदर के किनारे ही कुछ ऊँचाई पर बने रनवे पर दौड़ने लगा। सामने तुर्किश एयर लाइन्स के जहाजों की कतार नज़र आई। उतरे तो बाबू मोशाय आगे अंकारा की उड़ान के लिए बढे, कुछ दिन अपनी बेटी और जमाई बाबू के साथ बिताने वास्ते।    

क्रिस के इ-मेल ने जिस भीड़ भाड़ के लिए आगाह किया था वह कहीं नहीं दिखी, उनसे मिली सलाह के मुताबिक़ इम्मीग्रेशन से बाहर निकल कर असबाब (बैगेज) सम्भालने में आसानी हुई, लेकिन आगे किसी आयोजक के ना मिलने पर आग़ा का फोन नंबर टटोलने की सलाह आज़माने की नौबत नहीं आई। निकास के बाहर एक तख्ती पर हमारा नाम उठाए एक वालंटियर ने लपक कर अगवानी की। उसी समय जॉर्डन से आए नुमाइंदे 'प्रोफेसर सलह जर्रार' भी हमारी ही सवारी के साथी बने।



अभी हम अतातुर्क हवालिमानी  (एयर पोर्ट) का बोर्ड पढ़ते पोर्टिको भी नहीं लांघ पाए थे कि टर्की पोलिस के स्मार्ट जवानों ने रोक लिया। गाड़ी के कागज़ नहीं थे, पूछताछ करने के बाद गाड़ी सहित हमारी फोटो खींच कर जब उन्होंने हमारा पासपोर्ट माँगा तो अपन तो उनकी हरकतों का मज़ा लेते रहे, लेकिन प्रोफेसर साहब का पारा चढ़ गया - वो हमारा फोटो कैसे ले सकते हैं, हमारे पासपोर्ट कैसे स्कैन  कैसे कर सकते हैं वो. हमें क्या समझते हैं वो ? अभी और इसी वक्त यहीं से वापस अपने मुल्क वापस जा सकता हूँ मैं। वो हमसे आतंकवादियों की तरह पेश आ रहे हैं। मैं बड़े हूकुमात से बात करूंगा। (How can they take our photographs and scan our passports ? What are they thinking about us. I can go back right now to my country. They are treating us like terrorists. I shall complain to the authorities.)

वालंटियर और गाड़ी के ड्राइवर के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी।  बड़ी बेचैनी से बार-बार मोबाइल पर टर्किश में ना जाने किसे किसे खटखटाने लगे। फिर, एक टैक्सी ले कर चले तो 'टर्की पोलीस' को कोसते हुए हमसे माफी मांगते नहीं थके। ऐसे ही कुछ हादसे पुलिस वालों को बदनाम करने में कसर नहीं छोड़ते, चाहे वो टर्की की पुलिस हो या हिन्द की।  

मेरी निगाह कुछ देर एयर पोर्ट के नाम के हवा लिमानी पर टंगी रह गई। हवा से हवाई और लिमानी ??? अड्डा होना चाहिए, तो इसका तर्जुमा हुआ - हवाई अड्डा (विमान पत्तन)। तुर्की-बतुर्की तुर्की बोली के कुछ कुछ लफ्ज़ जाने सुने लगने लगे।

तो, सचमुच ही पहुँच गए सपनीले कुस्तुनतुनिया शहर के कूचे पर।   

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बकिया आगे 

कुस्तुनतुनिया : 3: (आगे)

January 18, 2015 at 10:28am
ताहि घटै 

दिल्ली की क्या बताएँ,  हर बात निराली।
मामला निचली अदालत से सुलटा तो ऊंची अदालत में उछला। इधर-उधर टटोलने पर एक ही सलाह मिली - यहां का कोई भरोसा नहीं, जाने कितना वक्त लगे।

फिर भटका, फिर से पूरब की ओर बंगाल का रुख दीखने लगा। सोच-समझ कर महीने के आखीर तक कोलकाता में डेरा डालने का मन बना लिया और प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी को इसकी इत्तिला भेजते हुए कहीं रह्ने-खाने का ठिकाना दिलाने की दरख्वास्त भी दर्ज़ करा दी।   

थम कर बैठा तो अकुलाया - नाहक टर्की-तूरान का हाथ आया न्यौता ठुकराया। ज़मीन पर उतरा सपना फिर से सपना बन गया।

अनमना सा पाँव पसार कर लैप-टॉप खोला। बुझे मन से ईमेल चेक करने लगा तो इनबॉक्स में कई मैसेज एक साथ अवतरित हुए, जिओग्राफिआ वाले क्रिस, विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्क केनोयर और टर्की के बड़े अफसरान के।  सबका लब्बो-लुबाब एक ही - ये नाचीज़ अगर कॉन्फरन्स में नहीँ आया तो मेरे आप्त वचनों से महरूम हो कर वे बड़े घाटे में रहेंगे और हमारे हवाई टिकट और दुसरे इंतज़ामों पर खर्च रकम भी बेकार जाया होगी।  दोनों नफ़ा-नुकसानों में से किसका पलड़ा भारी रहा यह समझते हुए भी उनकी शराफत की दाद तो देनी ही पड़ी। इस तरह फिर से मिले खोए धन जैसी टर्की जाने की आस नए सिरे से हाथ आयी।   

लेकिन अब भी वीसा का लटका लगा रहा। ऑनलाइन ई-वीसा-फार्म के लिए ज़रूरी महीनों के भारी बैंक-बैलेन्स और शेनज़ेन वीसा की शर्तें कहां से पूरी होतीं। इंटरनेट पर साया टर्की गए सैलानियों के ऑन एराइवल और ई-वीसा की ज़लालतों क़े तजुर्बों ने भी आगाह किया।  

सारा हवाल क्रिस को लिखा तो उसने तसल्ली देते हुए समझाया कि सबर बनाए रखिए टर्की मैं सब होता है लेकिन आखीरी वक्त पर। लेकिन जब दो ही दिन बचे तो मेरा सबर छूटने लगा। फिर लिखा तो जवाब अमरीका से क्रिस का नहीं, टर्की से मुराद और इंटीरियर मिनिस्ट्री के किसी आला अफ़सर क़े, भारत में टर्की की शफारत क़ो भेजे मेसेज और तुर्की भाषा में लिखे वीसा के साथ, अब भला उसे पढता तो कौन, फिर उसकी स्कैन कापी का एक हिस्सा भी नदारद। केनोयर ने खबर पाई तो समझ लिया कि इंडियन इमीग्रेशन इस कागज़ के भरोसे तो जहाज में चढ़ने नहीं देगा सो उसका तर्जुमा भी भेजने पर ज़ोर ड़ाला।

जाने कहाँ से अकल आयी कि कौन पड़े ई-वीसा और तुर्की-बतुर्की के पचड़े में, क्यों न कल चल कर तुरकी एम्बेसी में ही हाथ आजमा लिया जाय। फोन करने पर लगा वीसा अफसर मेरा इन्तिज़ार ही कर रहा है।  जाते ही हाथो हाथ लिया, वीसा फीस भी माफ, आनन फानन में ग्रैटिस वीसा सहित पासपोर्ट हाज़िर। मगन मन केनोयर और क्रिस को इस्तांबुल में देख़ा-देखी का पैगाम भेजा।

कुछ देर से, केनोयर का दिल-मसोस जवाब आया अस्पताल से - 'माइनर हार्ट अटैक के चलते टर्की में न मिल पाने का मलाल रहेगा मगर वहां पाकिस्तान से आ रहे क़ासिद मल्लाह से मिलना ना भूलें।'

दिल्ली की अदालत और दरबार के मसले वहीँ पटके, सामान समेटते हुए फेस बुक पर हाल-ए-दिल चस्पा किया -

किस्मत ने फिर अपनी सुन ली, न्योता दे बुलवाया है,
इस बखरी की खटपट छोड़ो, वहाँ नज़ारा न्यारा है।  

जिनका जाना पक्का था, नहीं जा पाए, और जिनके जाने के इरादों पर उलट-पलट कर दरांती चली वो आखिर ३ मई २०१४ को सुबह ६ बजे 'टर्किश एयरवेज' की खातिरदारी में ४५६० किलोमीटर के हवाई सफर पर, सात घंटे के लिए उड़ लिए।



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बकिया आगे

कुस्तुनतुनिया : 2

January 15, 2015 at 9:03pm
जेहि बिधि लेखा  

बचपन से ही जिन जिन देशों के किस्से पढता सुनता, सब जगह उड़ आने के सपने देखा करता।  उनमें से कुछ सपने तो दिल में गहरे पैठ कर बार बार दीखते, हसरत जगाते रखते कभी तो सच होंगे।  

चीन की दीवार चढ़ लेने का सपना आई. सी. एच. आर. की बदौलत सच हुआ।

सांतियागो (चिली) देखने का सपना छप्पर फाड़ कर उतरा, डाक्टर मणी की मारफत, छत्तीस घंटे की उड़ान भर कर।

सोचा करता अब तीसरा कब कैसे पूरा होगा !!!

बरस बरस बीता किए कोई जुगाड़ बनता नही दिखा। साठ बरस पर पेंशन पाने की उमर नजिकाई तो 'नज़ीर' की कहन याद आने लगी - ''चलने की फिकर करो बाबा' ! सपने देखने के दिन लद गए। अब कौन पूछेगा बबुआ ! 

तभी, अचानक, बिना मौसम की बरसात जैसा वो सपना बजरिए ईमेल आसमान से टपका।

दुनिया में चल रहे संस्कृतियों में टकराव के मुकाबले 'नेशनल जिऑग्रफिक सोसाइटी' के सौजन्य से चल रही 'संस्कृतियों में वार्ता' (Dialogue between World Civilizations) की मुहिम में मुल्क-इ-टर्की में बिछे दस्तरख्वान का निवाला पाने का बुलावा मिला।

एक बार फिर से माना, दिल से चाहा सब नहीं तो भी ज़्यादा तो अपना होता ही है। पलक झपकते रज़ामंदी भेजी, लौटती मेल से नक्की। फिर तो, जब जाते तब जाते, जब तब मंडराने लगे कुस्तुंतुनिया की विकिपीडिआ पर।

चलने के दिन पास आए।  टिकट - होटल सब बुक।

लेकिन वक्त का बछड़ा पगहा तोड़ाने को तेज़ी से उछला। प्रेसीडेन्सी यूनिवर्सिटी से प्रोफेसरशिप का 'ऑफर लेटर' उसी वक्त आया तो फूला नहीं समाया। कोलकाता के कालेज स्ट्रीट के देश के इस सबसे पुराने मशहूर कालेज में पढ़ने-पढ़ाने की इज़्ज़त। अहा, यही तो है वो कालेज जहां राजेंदर बाबू, दादा अमर्त्य सेन और चाचा चक्रवर्ती जैसे भद्र लोक पढ़ कर निकले। अब लगने लगा - रिटायरमेंट के बाद का ठिकाना लखनऊ में नही, पंद्रह सौ किलोमीटर पूरब उतरेगा।

 तभी पांच सौ किलोमीटर पश्चिम, दिल्ली की बड़ी अदालत में हाज़िरी का हुकुम दस्ती मिला। हम तो चुप बैठे देख रहे थे दिनन क़े फेर, और जब नीके दिन आए तो ऐसे कि तूरान से बंगाल और दूर दीखती दिल्ली भी लगने लगी पास।

अब क्या करें, तूरान चलेँ तो कहीँ हाथ आई कलकत्ता की थाली परे ना सरक जाए। फिर टर्की का वीजा भी अब आया तब आया करते लटका नज़र आया, और चलने के दिन भी बचे दो ही चार।  सोचा - सेमिनार-कान्फरेन्स के मौके मिलेंगे बहुतेरे, चलो पहले दिल्ली का दिल ही टटोला जाए। नेशनल जिओग्राफिआ को इत्तिला भेजी - और भी गम हैं यहाँ वीसा के सिवा, इसलिए मेरे आने की गुंजाइश खलास समझिए।

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कुस्तुनतुनिया

January 14, 2015 at 9:59pm
पिछले मई महीने में कुस्तुनतुनिया (टर्की) जाने का मौक़ा मिलने पर दो चार लाइनें  लिखी - दूर देश की उस सरहद पर पूरब का दर खुलता है,
जादू वाला एक शहर भी, उस मुकाम पर बसता है।

दादा-दादी, नाना-नानी के किस्सों में रमता है, 
कुस्तुनतुनिया नाम निराला कब से रहा लुभाता है।

किस्मत ने फिर अपनी सुन ली, न्योता दे बुलवाया है,
इस बखरी की खटपट छोड़ो, वहाँ नज़ारा न्यारा है।



तब सोचा था कि देखा-सुना दोस्तों से साझा करूंगा लेकिन लौट कर नए झमेलों में उलझ कर अटक-अटक कर ही कुछ लिख पाया। 
अगर बसियौटा ना लगे तो थोड़ा थोड़ा कर के अब बयां कर दूँ।  

Saturday, January 3, 2015

सुनी कही बस यही कहानी

सुनी कही बस यही कहानी 

घर के भीतर ही, कितनी दीवारें होती हैं, 
रोज़ रोज़ ही, बड़ी बड़ी सी उठती जाती हैं। 

इक चूल्हे पर चढ़ती बटुली साझा पकती है, 
चूल्हे चूल्हे चढ़ती बटुली बुदबुद करती हैं। 
   
मेड़ी मेड़ी खेतों की पैमाइश होती है,
बढतीं जितनी उतनी कम पैदाइश होती है। 
   
बचपन में जो पढ़ी कहानी भूली जाती है,
एक एक कर लकड़ी कैसे तोड़ी जाती है।  

जाल लिए उड़ती चिड़ियों की टोली जाती है, 
एक एक कर चिड़िया यूं ही पकड़ी जाती है।    

सुनी कही बस यही कहानी हमने जानी है, 
बड़ी लड़ाई साथ साथ ही जीती जाती है।  
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