Sunday, August 13, 2017

बस देखता ही रहा

बस देखता ही रहा
जिस तरह अकस्मात दिल्ली की चाकरी में आए उससे ज्यादा अनिश्चय में उससे अवमुक्त हो कर लगा मानो एक झंझावात से पार हो गए। पता चला सरकारी मकान में छह महीने तक मामूली किराए पर रहा जा सकता है। यह जान कर सोचा तीन बरस 'लुटियन्स डेल्ही' में रह कर भी नज़र उठाने का मौक़ा नहीं मिला, पड़ोस के खान मार्केट को देश दुनिया के सैलानी देखने आते हैं और मैं वहां भी तबीयत से चहल कदमी नहीं कर सका, चलो अब फुरसत से यह सब भी कर लिया जाए। मन करे तो पाँव पसार कर आराम किया जाए या लिखा पढ़ा जाए। यहां रह कर जिनसे मिलना जुलना भी हो जाए।
लगे सुबह-शाम भारती नगर की घनी हरियाली में टहलने। सुबह चाय के साथ अखबार की खबरें और अपना राशि-फल इत्मिनान से पढ़ते। इसी बीच मलेशिया से न्यौता मिला तो वहाँ चलने की तैयारी करने लगा। तभी एक दिन इंडियन एक्सप्रेस में छपी यह भविष्यवाणी पढ़ी :
Libra (Sep 24-Oct 23) :
Your nomadic qualities are being stirred up. Short journeys are likely to be made on the basis of family needs, rather than pleasure, but there is bound to be stimulation for you in encountering new places and environments. The more you travel, the richer your experience will be.
पढ़ कर लगा कि कभी कभी कितनी सटीक बैठती हैं ये भविष्यवाणियां भी। फिर तो और ज्यादा ध्यान से राशिफल पढ़ने लगा। टी वी पर बतायी जाने वाली ग्रह-दशाओं और भविष्य पर भी गौर करने लगा। अक्सर उनमें स्थान-परिवर्तन और खासे उथल-पुथल की संभावनाएं घोषित होने लगीं तो सोचा अब ऐसा क्या होने वाला है !!!! फिर भी, अपनी योजना के अनुसार बहुत दिनों से सो रहे प्राइवेट पासपोर्ट पर मलेशिया का वीसा लगवा लाए। ध्यान साध कर तीन-तीन लेख लिख कर छपने भी भेज दिए। लम्बे समय तक प्रवास पर जाने से पहले, पूरे छह महीने का मकान का किराया एडवांस में जमा कराके उधर से निशा खातिर हो जाने के इरादे से विभागीय अधिकारियों को जब तब फोन मिला कर कोंचने लगा, उन्हें लगता छह महीने बहुत होते हैं नाहक परेशान हो रहे हैं।
पहली अगस्त के इण्डियन एक्सप्रेस में उस हफ्ते की इस भविष्यवाणी ने एक अलग ही तरह की जिज्ञासा और सांसत में डाल दिया:
Surprises await. I can not promise that everything will be easy but I can assure that in amongst the thorns, roses will bloom. Be patient and wait until next week for the real magic, though. But, then, at the risk of sounding trite, magic is all around you – all you have to do is look. (तुम्हारे चारों ओर जादू ही है: तुम्हें बस देखते ही रहना है)
बार-बार पढता और ऐसा विचारता कौन सा जादू होने वाला है जिसका केवल दृष्टा ही रह सकता हूँ, कौन से कंटीले झाड़ों में गुलाब के फूल खिलने वाले हैं। इन्हीं उहापोहों में दो अगस्त को पैर पसारे लिखते समय मोबाइल की घण्टी बजी, और उधर से खबर मिली कि मेरे लिए कार्य मुक्त होने के बाद छह महीना नहीं वरन एक माह तक की ही आवासीय सुविधा अनुमन्य है, इससे ज्यादा रहने पर पचास गुना और फिर उससे भी ज्यादा किराया देना होगा, वह भी जुर्माना सहित। सुनते ही सारी मस्ती हवा गयी, तीन से चार दिन में आवास खाली करके सारे सामन सहित लखनऊ पहुँचाना और फिर लौट कर आगे की तैयारी करना कोई हँसी खेल तो ठहरा नहीं, बेचैनी से तन मन त्रस्त और सोच-समझ सब अस्त व्यस्त। सारी योजना उलट पलट हो गयी। मित्रों की मदद से किसी तरह बोरिया-बिस्तर बाँध कर चल दिए लखनऊ। वहां भी बंधा-बंधाया सामान जहाँ तहाँ पटक कर आगे के लिए निकल पड़े।
कहाँ तो छह महीना और कहाँ आनन-फानन में दाना-पानी उठ जाना। एक ही झटके में भारती नगर, दिल्ली की पुरानी मनःस्थिति से पूरी तरह झटक दूर फेंका गए। सब कुछ एक हफ्ते में ही सचमुच के जादू की तरह घटा और मैं नियति की धार में तेजी से बहता हुआ - बस देखता ही रहा।
कहते हैं जो होता है अच्छा ही होता है। अब आगे आगे देखते हैं इन जादुई कंटीले झाड़ों में कौन से गुलाब खिलते हैं या फिर अगर खिल चुके हैं तो कब और कहाँ दिखते हैं, अपने मुल्क में या मलय देश में !!!!!
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कैसी लागी हीय

कैसी आदत पड़ गई कहन-सुनन की मोय,
अब ये चुप्पी तनिक सी नहीं सुहाती तोय।
आहट आवन जान की बहु अकुलावै मोय,
चाहत गुन गुन सुनन की कैसी लागी हीय।

Wednesday, August 9, 2017

मेला मेली

Rakesh Tewari
मेला मेली
जब लौं हिलती डुलती थिरती,
भावों की बहिया फिर उठती।
एक ठिकाने टिक नहीं ठह्ती,
कनकैय्या जस नाचा करती।
हम समझें उस ओर चली,
पर हवा कहाँ किसकी सुनती।
राग विराग ओरहनों वारी,
बुनती गुनती बोझिल उंघती।
सांस चले अटकी लटकी,
हदद हिसाब न गिनती की।
बड़े जतन से धुनिया धूनी,
जुलहा ताना बाना बूनी।
रंगरेजवा ने कस रंग डारी,
रंग बिरंगी सुपनों वारी।
समय काल अस करवट बदली,
पल भर में उधरी बुनिवाई।
चार दिनन की मेला मेली,
हिल मिल खेलो, मिले मिताई।
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Saturday, July 22, 2017

वजूद

Rakesh Tewari
Published by Rakesh TewariJuly 19 at 7:51pm

वजूद

यूं तो धूल-ओ-गुबार से
नाता रहा है अपना।
कहीं भी बैठे या पसरे, 
क्या बिगड़ गया अपना।
भटकते हुए अजनबियों के घर भी,
डेरा डाल रहे अपना।
अनजानों से भी मांग के खाया,
मनभाया अपना।
ऐसा ही आवारा अदना सा
वजूद है अपना।

जैसा भी है अपना वजूद,
तो अपना ही है।
ऐसा भी नहीं कि
बिना बुलाए ही,
चला जाए 'कहीं' भी।
फिर चाहे वो
ताज़ो-तख़्त,
महफ़िल-ए-सदारत,
या स्वप्निल संसार,
ही क्यों न हो।
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Saturday, July 15, 2017

अखरती

अखरती

कानों में कूजन की गूजन झनकती,
लतरन में, डालिन में, अंखियाँ अरझतीं।  

बगिया की पगिया सूनी अखरती,
चहकती चिरइया की चुप्पी अखरती।  

बारिश की बहिया में मछरी तड़पती,                          
तलइया में छप-छप छपइया अखरती।        

करिया बदरिया बिजुरिया चमकती, 
झरती छपरिया में रिमझिम अखरती। 

टोला मोहल्ला में नैय्या टहलती, 
लाली बहुटिया की टोली अखरती।  

लइकन कै खेला-लिहाड़ी अखरती, 
पुरनके सँहरियन की बतियाँ अखरती।  

नयकन की टोका-टोकनी अखरती, 
ऐ बाबू ! अमवौ पै  बन्दिश अखरती।  

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Friday, July 14, 2017

हौले से

हौले से
कारवां बावरे बादरों का चला है,
उड़ के अटरिया पे अटका हुआ है।
रूखी हवाओं में तप कर उठा है,
दर-दर में यूं ही भटकता रहा है।
वनों प्रांतरों में खमसता रहा है
घनेरी घटाओं में घुमड़ा हुआ है।
धड़कता बहकता धुंआया हुआ ये,
रह-रह के जब-तब बरसता रहा है।
चुपके से आँगन में हेला हुआ है,
सिहरन जगा कर के खेला किया है,
सपनों की अलकों में छुपता छुपाता,
उनीदी सी आँखों में पसरा हुआ है।
कहना है क्या कुछ नहीं बोलता है,
हौले से पलकों को चूमा किया है।
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Saturday, July 1, 2017

डेराने हुए हो

डेराने हुए हो

बात छोटी सी है, ये समझते नहीं हो,
हसर सबका ऐसा, ये समझे नहीं हो। 

बात ऐसी भी क्या है, बुझाए हुए हो, 
जखम कितना गहरा, जगाए हुए हो। 

गलाने को गम, यूं ही मिटते हुए हो, 
हाथ में साकियों के, बिखरते हुए हो। 

होश मद मे डुबाए, यूं बहके हुए हो, 
अपने वमन में ही, चंहटे हुए हो। 

आप आपे से ऐसा क्या बाहर हुए हो, 
दाग दामन के अपने उघारे हुए हो। 

किनारे पे आ कर, उदासी लिए हो, 
अब तो समझ लो, क्यों बिफरे हुए हो। 

दुनिया वही है, क्यों भूले हुए हो, 
जो बोया है सिर पर, उठाए हुए हो। 

आग से खेलने खुद से शामिल हुए हो, 
कि घर अपना खुद ही जलाए हुए हो। 

लुक्का लगा कर के घूमा किये हो, 
चिता आप अपनी, सजाए हुए हो। 

बिना बात 'घट' सबका फोड़ा किए हो, 
रमा लो भसम, क्यों डेराने हुए हो। 

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