Sunday, December 10, 2017

लास अशेष


सांझ भई, 
सूरज अस्ताचल,
चला आपने देश।  
काजल बिंदिया, 
लाज ललाई,  
छोड़ आपने वेश।
सांकल बाजी, 
खुली अर्गला, 
आवन लगे सन्देश।  
रैन घिरी,  
करिया रही, 
तबहुँ लास अशेष।

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Friday, December 8, 2017

ज़िंदगी और मौत की नदी: गंगा

ज़िंदगी और मौत की नदी: गंगा


अखबार खोलते ही दक्षिण कोरिया से कुम्भ मेले को यूनेस्को द्वारा विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में सम्मिलित किए जाने की खबर पढ़ कर चित्त चटक हो चला। अपनी अत्यंत प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराओं पर गौरवान्वित हो उठा। सोचने लगा सचमुच हमारे हिन्दोस्तां का सारे जहान में कोई जोड़ नहीं। जितनी आस्था और भक्ति के साथ करोड़ों लोग देश के कोने कोने से गठरी-मुठरी लादे इस मेले में रेला लगाए जुटते हैं, और अनुष्ठान, स्नान-ध्यान, चर्चा-परिचर्चा करके जितनी शान्ति से अपने-अपने ठिकाने लौट जाते हैं, बिना किसी झगड़े-टंटे के, वैसा कहीं और नहीं देखा जाता। बचपन से ही देखते आए गंगा-यमुना के संगम पर इलाहाबाद में लगने वाले मेले की याद आने लगी। लेकिन यह मन-माधुरी ज्यादा देर टिक नहीं पायी।

मुंबई से प्रवीण जी द्वारा भेजी गयी उनके एक मित्र - विक्टर मैलेट - की लिखी किताब 'रिवर ऑफ़ लाइफ, रिवर ऑफ़ डेथ' भी उसी दिन खोलने का मौक़ा मिला। पहले कुछ पन्ने पलटते ही दिल्ली से कलकत्ता तक छोटी सी डोंगी में डगमग डगमग चलते हुए ' गंगा मइया' की दीन-दलित मलिन दशा देख कर दिल भर आने के पल, 'मइया' को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए दशकों से चलाए जा रहे अभियान, परियोजनाओं के बखान, उमा भारती जी से ले कर पंत प्रधान जी के संकल्प और निलय उपाध्याय जी की पीड़ा, गहन रूप घुमड़ने लगे - उस किताब में यह पढ़ कर:
"As Winston Churchill once said of the River Thames and Britain, the Ganges is the ' golden thread' of Indian History. On its banks are great cities, some living, others ruined and abandoned. that have been there for thousands of years and date back to the era when India was the world's largest economy, greater than China or the Roman Empire and three times the size of Western Europe.

So how can the Ganges be worshipped by so many Indians and be simultaneously abused by the same people? Why do Indians and their governments tolerate for even a week the over-exploitation of their holy river – sometimes to the point of total dehydration – by irrigation dams, and its poisoning by human waste and industrial toxins? Is it true that Hindu insist their Ganga is so pure that she can not be sullied by such pollution? Can the river be saved ?" (Victor Mallet 2017: River of Life, River of Death: The Ganges and India's Future. Oxford University Press: P. 4).

इस व्यक्तव्य में उठाए गए प्रश्न अपने, अपने देश और संस्कृति पर पड़े जोरदार तमाचे जैसे लगे, और आखरी लाइन में दी गयी चुनौती पढ़ करअपने निरीह हालात पे जार-जार रोना आया।

'गंगा जिएगी तभी भारत का भविष जिएगा और गंगा मरी तो भारत भी मर जाएगा', गंगा-प्रेमी लेखक की यह चेतावनी बहुत सरल शब्दों में कितना कुछ बयान कर रही है !!!!!!
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Thursday, November 30, 2017

7. अन्नपूर्णा

7. अन्नपूर्णा
उनका चेहरा, उनकी काया, कभी नहीं देख पाया। भोर में पौ फटने से पहले ही गाँव के पूर्वी छोर से आती प्रायवेट-बस के स्टार्ट होने की गुर्राहट से नींद खुलती और खाट छोड़ उसे पकड़ने लपकता। बात है सन उन्नीस-सौ -उन्यासी (1979) की। 'पलामू की प्रस्तर-युगीन सभ्यताओं' पर शोध के सिलसिले में सर्वेक्षण के लिए निकला था, घोर गरमी के मौसम में। अंतर्मन भी उत्तपत्त, ऎसी लागी लगन की लय कि किसी तरह जल्दी से थीसिस पूरी करके बसेरा जोड़ने को आतुर।
सुबह की सुहानी तरंग में 'पंडा' या 'पांडो नदी' के आस-पास की खूबसूरत पहाड़ियां और ढलान छानते ताप बढ़ने लगता। आज 'बड़ी छपली', 'नटवा पहाड़', 'खरहा चर' तो अगले दिन 'खोंड़हर', 'तोरलवा', 'केतार', 'मेलावन टोला' के आसपास ज़मीन पर पड़े प्रस्तर-उपकरण तलाशती आँखे दोपहर आते-आते तेज़ धूप में चौंधियाने लगतीं, हाथ लगाते ही गरम पत्थर चपक लेते।
दोपहरी में छांह खोजते महुए के गाछ तले डेरा जमाते, पथरीली आंच में समय काटते। कुछ आदिवासी कुछ दूरी के फासले से बड़ी उत्सुकता से देर तक देखते रहते। भरी दुपहरी इस तरह पहाड़ों पर भटकते वाली यह काया उन्हें भू-सुंघवा भूत-परेत ही समझ आती। धूप ढलते जब दोबारा अपने काम में रमने लगता तो वे दूर टहल जाते। शाम का अंधियारा उतरता और घाटी में मादल के बोल दमकने-लहराने लगते तो झोलों में बटोरे प्रस्तर-उपकरणों के ढेर संभाले माटी-पसीने में सना धीरे धीरे बस पकड़ने की फ़िराक में गाँव-सड़क की राह धरता, अकेला, निरा अकेला । बस पकड़ने के लिए एक ठाकुर साहब के दुआरे घड़ी भर रुकता तो गुड़-पानी पेश कर के मेरा थका चेहरा निहारते इतना ज़रूर कहते 'एतना सुकुंवार होए के इतना मेहनत काहे ------।' एक दिन बस आती देख मेरे वजनी झोले उठाने लगे तो उठे नहीं, तब अचरज से भर कर बोले "बड़ हरेठ ह-उ-आ----'।
'सिसरी गाँव' के अपने ठिकाने अटते-अटते रात खासी गहरा जाती। यह ठिकाना विश्वविद्यालय में पढने वाले एक छात्र 'अनिल जायसवाल' की कृपा से टिक सका था। वहां पहुँचते ही झोले पटक कर गाँव के पास के पहाडी जल-स्रोत में जा उतरता। जब तक लौटता गाँव भर सो चुका होता। मेरे ठिकाने पर खाट पे बिछौना और सिरहाने एक स्टूल पर एक थाली से ढकी दूसरी थाली में चावल-दाल-सब्जी-अचार और स्वादिष्ट तिलौरी और बगल में एक लोटा पानी करीने से सजे मिलते। थकावट से चूर चुपचाप छक कर गहरी नींद सोने से पहले सोचा करता कभी जल्दी पहुँच पाया तो यह सब परोसने-सजाने वाले को देख-सुन उनके हाथ के जादू की तारीफ़ करूंगा लेकिन वह दिन नहीं आया, ऐसे ही एक दिन मुंह अँधेरे 'सिसिरी-खरौंधी' से विदा हो लिया। यह सतरें लिख कर, चलने से पहले, उस अनाम, अदेखी असुनी अन्नपूर्णा के प्रति सादर आभार दर्ज कर रहा हूँ।
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Sunday, November 19, 2017

'उड़ा मन पद्मा-जमुना तीर'*

Rakesh Tewari added 3 new photos.
Published by Rakesh TewariYesterday at 6:25pm
'उड़ा मन पद्मा-जमुना तीर'*

बात की शुरुआत उन दिनों से होती है जब हमारे कदम ज़मीन से ऊपर ऊपर ही पड़ते बढ़ते थे। तब तेईस साल की उम्र की दहलीज़ भी नहीं लांघ पायी थी। हवा में ही उड़ते खयाल और रूमानी सपने। उन्हीं में से एक मनसूबा रहा दूर-दूर तक नदिया में नाव चलाते जाने का। किस नदी में चलें कि सबसे लंबा सफर नदी-नाव संयोग में बीते। नक्शों में टटोलते हुए खाका खींच लिया दिल्ली से चल कर बा-रास्ते यमुना-गंगा-पद्मा ढाका तक डाँड़ खींचने का। लेकिन मन की उड़ान के लिए हमारे संसाधनों की डोर छोटी पड़ गयी। ढाका तक जाने के लिए ज़रूरत भर के संसाधन नहीं जुट पाए। नतीज़तन बजाए फरक्का के आगे पद्मा नहीं भागीरथी के रास्ते, कोलकाता तक नौका के डाँड़ खींचते, 'ओए दादा s s s s !!!!!! तोमार बाड़ी कोथाय' सुन कर ही, सबर कर लेना पड़ा।
उस सफलता से परचा मनबढ़ मन अब ढाका से भी कहीं आगे और आगे अफ्रिका की पूरी की पूरी नील और यूरोप की डैन्यूब-राईन नदियों के बहाव में पैरने लगा। लाइब्रेरी से उनका इतिहास-भूगोल खंगाल कर बाकायदा योजना बना ली। दूरदर्शन और अखबारों के ज़रिये प्रचार-प्रसार कर के पैसे जुटाने का जुगाड़ लगाया लेकिन हिसाब नहीं बना। फिर नौकरी में आ गए तो यह उफान भी दब सिमट कर दुबक गया। मन मार कर चाकरी के कामों में खोपड़ी धँसानी पड़ी। फिर भी बचपन की लगन की तरह बीच-बीच में दबी-खुची उड़नतरानी जब तक हुमुकती रहती।
यूं ही एक दशक से ज्यादा समय सरक गया। तभी १९८९ में पण्डित जवाहर लाल नेहरू की जन्म शताब्दी मनाने के लिए विभाग में आए बजट ने अनायास ही भूले बिसरे फितूर की याद कुरेद दी। सोचा नेहरू जी के प्रकृति प्रेम का हवाला दे कर क्यों न इस बार आज के लोहित के पास से ब्रह्मपुत्र में नौका उतार कर ढाका तक पाल उड़ा लिया जाय। आनन फानन में एक प्रोपोज़ल बना कर दाखिल कर आए। उस समय के हमारे विभाग के आला अफसर रहे बांग्ला मोशाय (आलोक सिन्हा) को यह इरादा सबसे भालो लगा। आनन-फानन में बजट, परमीशन मिले, विदेश मंत्रालय और उच्चायोग को भी लिख दिया गया। सबकुछ तय होते होते अपने राम अगले ऊंचे पद के लिए चयनित हो गए। और फिर लाख मनौनी करने पर भी दादा मोशाय ने जाने का फरमान वापस ले कर कहा पहले नयी ज़िम्मेदारी सम्भालिए उसके बाद नदी-नाव की सोचिएगा। इस तरह एक बार फिर हाथ आयी बटेर फुर्र हो गयी।
तब यह बात दूर दूर तक मेरी समझ में नहीं आ सकी कि मेरे लेखे में कुछ और ही लिखा है। ऊपर वाले की मेहरबानी से पिछले दिनों जर्मनी और आस्ट्रिया की छापा मार यात्रा दरमियान राईन और दान्यूब में नाव से तो नहीं लेकिन उनके किनारे की सैर कर बहती धारा को हसरत से निहारने का मौक़ा पा ही गया। तब भी नहीं समझ पाया कि अब अगली नदियों की बारी है।
ऊपर वाले की रहमत तो देखिए, जहाँ नौका से जाने की सोचा वहाँ बिमान से भेजने का सरोसामान जुटा दिया, जहांगीर नगर युनिवेर्सिटी (ढाका) से एक पीएच डी की मौखिक परीक्षा का परीक्षक बनने का आमंत्रण भिजवा कर। और, उसी सिलसिले में वीसा के लिए आवेदन कर सोचने लगा - लोग सही ही कहते हैं कि सच्चे दिल से मांगी मुराद पूरी जरूर होती है लेकिन कब और कैसे यह तो वही जानता है; वाह रे परवरदिगार !लगता है अब नील नदी के दर्शन के दिन भी करीब ही हैं। फिर ललचाया और पछताया भी - काश जो अगर यह ज्ञान पहले ही हाथ लग गया होता तो इतना सा ही क्यों चाहा होता। दिल से और दिल खोल कर और भी बहुत कुछ चाह लेता।
तब तक ट्रेवल एजेंट से वीसा मिलने की खबर मिली और गुरुग्राम में बैठे बैठे ही आवारा मन पल भर में उड़ चला - 'पद्मा-जमुना तीर'*।
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* बांग्लादेश में गंगा को पद्मा और ब्रह्मपुत्र को जमुना कहा जाता है।
फोटो १. रिवर डाइरीज़ (साभार)
फोटो २. Padma River and boats (1860)
फोटो ३. joiseyshowaa (साभार)

Sunday, November 12, 2017

आसरा यह रहा

आसरा यह रहा
मिलने वालों का रेला, ऐसा लगा,
आए बैठे, मगर, बात कर ना सका।
दोस्तों ने बुलाया, नहीं जा सका,
सिलसिला उन के शिकवों का ऐसा रहा।
बात सच्ची नहीं, उनने जैसा कहा,
कुछ हमने कहा, कुछ नहीं कह सका।
देखता रह गया, वक्त बढ़ता गया,
दिल में था जो हमारे, नहीं कह सका।
ना अकेला हुआ, ना मुखातिब हुआ,
आँखों आँखों ने बोला, उन्हीं ने सुना।
आएँगे फिर वहां, आसरा यह रहा,
बैठ लेंगे कहीं, जो ये जीवन रहा।
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Thursday, November 2, 2017

क्यूँ बताया नहीं


क्यूँ बताया नहीं

आने जाने का मंज़र, हवा वो ज़मी,
लोग बदले हैं लेकिन डगर तो वही।
हैं कतारें वही, घाट-ओ-मन्दिर वही,
है चलन कुछ नया, पर किनारा वही।
हिलते डुलते चलें, हैं वो बजड़े वही,
झिल-मिलाती हुई हैं ये लहरें वही।
देवता फिर से उतरें, है आशा वही,
सज गयी फिर दियाली, है धारा वही।
लौट पाएंगे फिर से वहीँ तो नहीं,
बैठ लेंगे कहीं पर, घड़ी दो घड़ी।
आ सको गर तो आओ मिलेंगे वहीं,
कैसे लगते हो बस देख लेंगे यही।
ना समय ही रहा, ना वो बातें रहीं,
गुफ्तुगू फिर भी कुछ तो करेंगे कहीं।
बात होगी, कहो, कैसी तुम्हरी कटी,
कितनी मीठी वो कितनी कसैली रही।
काशी नगरी में ठहरेंगे दो दिन वहीं,
फिर न कहना हमें क्यूँ बताया नहीं।
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Tuesday, October 24, 2017

शरद सुहावन

संझा शरद सुहावन आये, गाढ़े मधुर मधुर मधुराय,
फूलै धवल राग गहराये, मादक सत-पर्णी मुस्काय।