Friday, April 20, 2018

अफ़ग़ानिस्तान २ : सांप - सीढ़ी

अफ़ग़ानिस्तान २ : सांप - सीढ़ी

तेईस बरस पार कर चली वय, दिनों दिन गढाती बचपन वाली लगन में डुब्ब, सुधियों वाली परतें पलटते सुध में आए जब ऑटो वाले ने ठिकाने का पता पूंछा। चौंक कर अपने आप में आया। 
कुछ देर इधर-उधर देख कर लोकेशन समझने की कोशिश करता रहा। फिर मन्दिर और उसके बगल से कॉलोनी में जा रही सड़क देख कर आगे का जाना-पहचाना रास्ता पकड़ लिया।

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उसकी माँ, देखते ही, आँखों में ममता भरी चमक छलछलाते हुए बोलीं - "व्हाट ए प्लीजेंट सरप्राइज़!!! तुम, कब आए ? कैसे आना हुआ ?
वहीँ लॉबी में डाइनिंग टेबल की कुर्सियां खींच कर जमावड़ा जम गया। खिड़की से बाहर का नज़ारा देखते हुए इत्मीनान से बताया - मोटर साईकिल से दुनिया देखने का मंसूबा। श्याम और चंदू के साथ उसी दिन आ कर इलाके के सांसद दीक्षित जी के यहाँ डेरा डालने और वीसा की दौड़म-भागी। फिर, मौका लगते ही चुपचाप श्याम को बता कर खिसक आने की बात।
सारा हवाल सुन कर बोलीं - "ओह ! ऐनदर एक्सपीडिशन। वेरी गुड।"
बुलाए, बिना बुलाए, चाहे जब, जो भी आ जाए, उसके ज़िन्दादिल डैडी हर किसी की आवभगत दिल-खोल कर करते, और उस दिन भी उन्होंने कसर नहीं छोड़ी - "मूंछें भी तो जबर रखाय लिए हो !! कोई फिकर नहीं, काबुल के लिए अपने यहाँ से रोज एक फ्लाइट जाती है, ज़रुरत होगी तो मदद मिल जाएगी। अब आए गए हो तो हो जाए 'कचरमकूट' (भोजन पानी)।" फिर लुंगी लपेट कर, हमेशा की तरह जुट गए, थोड़ी-थोड़ी देर में सोमरस गटकते, स्वादिष्ट भोजन बनाने के जुगाड़ में। उनके बारे में यूं ही नहीं कहा जाता रहा - 'हॉस्पिटैलिटी हिज फोर्टे।'

और फिर जब हमीं दोनों रह गए, उसने नेहरस में बूड़े बोलों में मनुहार किया - "हमें भी ले चलो अपने साथ, बड़े मज़े आएँगे। जहाँ मन करेगा टेंट लगा कर, स्लीपिंग बैग फैला लेंगे।"
जब तक कुछ जवाब जुटाता, उसी समय उधर से गुज़र रही, माँ ने दुलरा कर सचेत किया - "इसे मत ले जाना साथ में, तंग हो जाओगे। बार बार भूल जाते हो 'महेश बाबू' की कही बात।"
और, उसके बाद, अगल-बगल देश-दुनिया, गहराती सांझ, किसी बात का कोई होश नहीं रहा। बातें और बातें, बेतरतीब बातें, कैसे यह ट्रिप बना, घर की, हॉस्टल की, कैरियर की, पढ़ाई की -------- बातों बातों में कब खाना लगा, कब घर के सब लोग खा कर सो गए, कुछ आभास नहीं। आँखों आँखों में रात कटी, पौ फूट चली।

श्याम जी ने जाने क्या पढ़ा दिया था सबको कि अगले दिन डेरे पर लौटने पर, रात में ना लौटने के बारे में, किसी ने कोई सवाल नहीं किया। जल्दी जल्दी तैयार हो कर पहुँच गए साऊथ ब्लॉक स्थित विदेश मंत्रालय के ऑफिस। यहाँ भी लाट साहब का रूक्का तो जो काम आना था वह तो आया ही, श्याम जी के खुशदिल और चुलबुले अंदाज़ ने मिलते ही मंत्रालय के एस एन. पुरी और तलवार साहब के दिल जीत लिए। उसके बाद आनन फानन में पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरानी दूतावासों से ग्रैटिस वीसा इश्यू करने के सरकारी अनुरोध-पत्र हमारे तरकश में सज गए।
अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के दूतावासों ने हमें हाथो हाथ लिया, झटपट वीसा ठोंक कर पासपोर्ट हमारे हवाले कर दिए। लेकिन पाकिस्तानी दूतावास में ना तो हमारे तीर चले और ना तुक्के। कई दिन दौड़ाने के बाद कुछ पसीजे भी तो सादा-सीधा टूरिस्ट वीसा देने तक ही राज़ी हुए, खैबर दर्रे के रास्ते मोटर साईकिल से जाने के लिए ज़रूरी 'ट्रांज़िट वीसा' कितनी ही फ़रियाद और हुज्जत के बाद भी नहीं ही दिया।जब पाकिस्तान के रास्ते नहीं जा सकते तो आगे के अफ़ग़ानिस्तान वगैरह हमारी मोटर साईकिल उड़ कर तो जाती नहीं। हमारे मंसूबों की लहलहाती फसल पर पाला पड़ गया।

मुंह लटकाए डेरे पर आए, श्याम सहित कोई किसी से नहीं बोला, चुपचाप बोरिया-बिस्तर समेट कर अगली वाली गाडी से लखनऊ चले आए। लूडो के खेल की तरह जल्दी जल्दी सीढ़ी चढ़ कर ऊपर तक तो आसानी से चढ़ गए लेकिन तब तक सर्पराज ने गटक कर पहुंचा दिया सबसे नीचे के पायदान पर, जहां से चले थे वहीँ।

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Sunday, April 15, 2018

अफ़ग़ानिस्तान १: मानेगा नहीं !!

Rakesh Tewari added 2 new photos.
Published by Rakesh TewariApril 10 at 8:27pm
अफ़ग़ानिस्तान १:  मानेगा नहीं !!

थाह नहीं मिलती ज़िंदगी की पहेलियों की, जाने कब क्या कैसी होनी हो जाए।
एकबारगी तबीयत कुलबुलाने लगी अफ़ग़ानिस्तान के सफर के दास्तान सबसे साझा करने की। इसी नीयत से आलमारी में धरी उसकी ज़िल्द की धूल झाड़ कर पलटने लगा तो हैरान रह गया उसे लिखने की शुरूआती तारीख - ९ अप्रैल १९७७ - देख कर। यानी अब से ठीक इकतालीस बरस पहले इसी दरमियान इसे लिखना शुरू किया था। जाने कैसे इतने अरसे बाद अपने मिज़ाज़ की कुदरती घडी का एलार्म उसी वक्त की नोक पर आ कर टुनटुनाए जा रहा है।
यह सोच कर कि लगता है क्लासीफाइड दस्तावेज़ों को सामने लाने की मुक़र्रर साइत अब आ ही गयी है, आहिस्ता-आहिस्ता किश्तों में शुरू करता हूँ, उन्हें याद करते हुए जिनकी बदौलत इस सफर का जुगाड़ बना। इस दुनिया से बहुत दूर कर जहां कहीं भी होंगे हँसते हुए यही कह रहे होंगे - किसी ना किसी बहाने से लिखे बिना मानेगा नहीं ये !! ----
वे थे मेरे जिगरी दोस्त और अपने आप में निराले इंसान। कांच खा लेते, तेज़ाब पी जाते, फ़ुटबाल के तीन-चार ब्लैडरों में एक साथ तब तक नथुनों से हवा भरते जब तक भड़ाम ना हो जाएं, सीने पर से जीप गुजरवा लेते और सोलह पौंड वाला लोहे का गोला झेल जाते। और भी जाने क्या क्या, जिनकी वजह से हमजोलियों ने कालेज के दिनों में ही मस्तमौला 'श्याम' से बदल कर उनका नाम 'आइरन मैन' रख दिया। अपने करतब दिखलाने के चक्कर में अफ़ग़ानिस्तान-ईरान जाने के उनके मंसूबे सुन कर मेरे जेहन में बुज़कशी का खेल, उत्तरापथ /रेशम मार्ग से गुज़रते कारवां, काबुल-कंदहार, हिन्दूकुश और आमू दरया, जैग्रोस-एलबुर्ज़ जितना जानते रहे सब चक्कर मारने लगे। बोल पड़ा -
"अरे वाह ! अकेले कैसे जाओगे ? मैं भी चलूँगा।"
"हुकुम करो। बिलकुल ले चलेंगे।"
"मोटर साइकिल से चलो तो और भी अच्छा रहेगा। रास्ते में रावलपिंडी के पास तुमहार पुश्तैनी ठिकाना और उससे आगे खैबर दर्रा भी देखते चलेंगे"
थोड़ा ना नू करते 'पुश्तैनी ठिकाने' वाले चारे में फंस कर उसके लिए भी राज़ी हो गए। तब मुझे आगे की लग पड़ी -
"मगर मेरा पासपोर्ट ?"
"फिकिर काहे की ! मैं अभी ज़िंदा हूँ।"
उस ज़माने के सूबे के लाट साहब से उनके घरेलू ताल्लुकात के चलते उनके मुहर लगे रुक्के की बदौलत पासपोर्ट घर बैठे हाथ आ गया।
फिर क्या था, उछाह भरे उछल चले वीसा लेने दिल्ली की ओर।
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Thursday, April 5, 2018

घुम्मकड़ राज'

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Published by Rakesh Tewari3 hrs
'घुम्मकड़ राज'
(एक और पीडीएफ: आपके लिए)

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वो कहते हैं ना, घूमने वालों ने दुनिया बनाई और घर-घुस्सुओं ने पाई हुई भी गंवा दी।
बिना घुमक्क्ड़ी पुरा-विद्या का ककहरा भी नहीं पढ़ा जा सकता। मतलब पुरवा-पथरा-सील-लोढ़ा के अठारह पुराण मथने से साथ 'घुमक्क्ड़-शास्त्र' का मंथन किए बिना नव-रतनों की तो कहा कहे एग्गो रतन पाने की बात तक नहीं सोची जा सकती। इतनी साधारण सी बात अगर हमारे शिक्षा जगत के 'विद्यावान गुनी अति चातुरों' के भेजे में धंस पायी होती तो अब तक दुनिया जहान के हर कोने में हमारी कीर्त्ति पताकाएं फरफरा रही होतीं।
बस इतना ही तो करना रहा कि 'घुमक्क्ड़ शास्त्र' भी पुरातत्व के कोर्स में शामिल कर लेते। असल विडंबना तो ई हौ कि आपने देश की बड़का युनिवर्सिटी से लगायत कैम्ब्रिज-ऑक्सफ़ोर्ड पलट बड़कवा लोग आजमगढ़ वाले डॉन 'दाऊद' का नाम तो खूब चुभलाते हैं लेकिन कुछ बहके हुए बहल्लों को छोड़ कर उसी जिले में जन्मे घुमक्कड़-राज 'राहुल बाबा' और उनके लेखे इस 'शास्त्र' के बारे में जानते ही नहीं। औरों की देखी सुनी नहीं अपनी लेखी दावे से कहता हूँ कि इस ज़िंदगी में थोड़ा बहुत जो कुछ बन पाया राहुल बाबा के भूले से पड़ गए छीटों का ही सुफल है। इसी लिए जब किसी लायक बन पाए तो राहुल जी की शतवार्षिकी पर प्रकाशित 'प्राग्धारा' का तीसरा अंक उन्हें समर्पित करना नहीं भूले।
'प्राग्धारा' का वह अंक छप कर आने पर उसके वितरण की सोच ही रहे थे कि हमारे विभाग की आला अफसरान ऑफिस का औचक निरीक्षण करने आ धमकीं। उनकी कड़क मिज़ाज़ी और अर्दब के दूर दराज़ तक कहे सुने जाते किस्सों के चलते हम सब उन्हें देखते ही हलकान हो गए। एक एक कमरे, कोने अतरे में इधर उधर बेअंदाज़ बिखरे कागज़ पत्तर, पुरवा पथला का मुआइना करते, इसके पहले कि उनका पारा चढ़ता, उनकी तीखी नज़र मेज़ पर धरे 'प्राग्धारा' के अंकों पर पड़ गयी। उनके पूछने पर बताया - हमारी वार्षिक शोध पत्रिका है, अभी अभी छप कर आयी है। वे एक प्रति उठा कर पलटने लगीं, हम उनके चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश करते रहे और वे पहला पन्ना उलटते ही उस पर छपी राहुल जी की तस्वीर कर अटक कर रह गयीं - 'अरे मैं तो अभी 'राहुल सांकृत्यायन सेंटेनरी कमेटी' की मीटिंग से आ रही हूँ। किसी को इनके बारे में कुछ ठीक-ठाक पता ही नहीं था, मुझे भी नहीं। और यहाँ तो यह पब्लीकेशन भी हो गया, विभाग के लिए क्रेडिट की बात है।' उनकी आँखों में प्रसन्नता की कौंध देख सांस में सांस आयी।
'अब क्या करोगे आप इसका ?' उनका अगला सवाल था।
'अब इसे डिस्ट्रीब्यूट कराने का इरादा है।'
'नहीं। इसे गवर्नर साहब से रिलीज़ कराया जाएगा। उसकी तैयारी करिए।
आनन - फानन में श्री राज्यपाल की सहमति, कार्यक्रम का अनुमोदन सब हासिल कर के राजभवन के सभागार में शानदार लोकार्पण अखबारों की सुर्ख़ियों में छा गया।
हमसे जैसा बन पड़ा वैसा लिख कर हमने राहुल जी की स्मृति में प्राग्धारा में अर्पित किया था वह 'सेंटेनरी कमिटी' के सदर कौशिक जी को ऐसा भाया कि उन्होंने सूचना विभाग से उसकी हजारों प्रतियां छपवा कर बंटवाने की संस्तुति कर दी। पुरातत्व के नज़रिए से की गयी हमारी इस कोशिश में अत्यन्त विशाल व्यक्तित्व और दर्शन, यात्रा, इतिहास आदि की तनिक सी झलक भर ही थी इसलिए इस अप्रत्याशित डेवलपमेंट से हम आश्चर्यचकित रह गए लेकिन कमेटी के एक माननीय सदस्य को हमारा यह मान तनिक भी रास नहीं आया। उनके लगाए भेंड़ का नतीजा यह निकला की वह संस्तुति ठंढे बस्ते के हवाले हो गयी। हम पर इसका कोई ख़ास असर नहीं पड़ा, ऐसे ही पहले जैसे ही धरती खूंदते रहे। कभी कभी यह जरूर मसोसता कि अगर यह ज्यादा लोगों तक पहुँच गया होता तो शायद 'विद्यावानों' के कमलनयन प्रस्फुटित हो जाते।
अब पचीस बरस बाद ९ अप्रैल २०१८ को जब 'राहुल जी की' एक सौ पचीसवीं जयंती आ रही है, उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, उन पर लिखे अपने पुराने लेख की पीडीएफ प्रति उन सभी साथियों के लिए तैयार कर ली है जो उसे पढ़ने, घुम्मकड़ी और 'घुम्मकड़ राज राहुल जी' में रूचि रखते हों।
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Tuesday, April 3, 2018

कण्ठ भरी

कण्ठ भरी
कुछ नज़दीकी, कुछ से दूरी,
कुछ उथली, कुछ से हमजोली,
कुछ कडुवी, कुछ से रसभीनी, 
कुछ गांठबंधी, कुछ से सफरी।
क्यों ठेस लगी इतनी गहरी,
क्यों घेर रही अनमन इतनी,
यह दुनिया ही है चलाचली,
चलती है यह हिलती डुलती।
फिर मृदल मृदुल भई भोरहरी,
फिर से बयार, यह मदिर बही,
फिर ऋतु आयी, नव् वसन धरी.
आयी है फिर से बनी ठनी।
शाखों पर नव कोपल फूटी,
बगियों में कोयल कूक रही,
फिर मनपाँखी सा उड़ा रही,
फिर लगा टिकोरे टेर रही।
मन साधो, सांची राह यही,
ना देखो आधी, या पूरी,
यह रंग भरी, या बदरंगी,
है अमिय हलाहल कण्ठ भरी।
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2. April 2018

Monday, March 19, 2018

भरोसा

भरोसा

Published by Rakesh Tewari

कुछ नाते बनते हैं, कितने कोमल संवेदी,
पल में खिलते कुम्हलाते, सपन्दित ऐसे सोई ।
लगते ही कैसी भी, थोड़ी सी भी चुप्पी,
आशंका होने लगती है, जाने वो कैसी कैसी।
जी अकुलाने लगता है, ऐसी भी क्या मज़बूरी,
उत्कंठा होने लगती है, कुशल-क्षेम पा लेने की।
सम्बल मिलता रहता है, होती ऐसी पूछाताछी,
फिर एक भरोसा मिलता है, पोढ़ी दुनिया मीतों वाली।

'राग दरबारी' के बहाने'

Rakesh Tewari added 6 new photos.
Published by Rakesh TewariMarch 17 at 6:17pm
'राग दरबारी' के बहाने'
असलहा बाबू का ठिकाना तलाशता कचहरी में भटक रहा था जब जेब में फंसा फोन कुनकुनाया।
उधर से निरुपम जी के बोल सुन पड़े - '18 मार्च को लखनऊ में रहेंगे ? 'रागदरबारी' के प्रकाशन के पचास बरस पूरे होने पर 'राजकमल प्रकाशन' उस दिन 'बतकही' का आयोजन कर रहा है। दरबार और लेखक दोनों से आपके वास्ते के मद्देनज़र आपकी भागीदारी प्रासंगिक रहेगी।'
तुरत ही सहमति जताते 'रागदरबारी' के लेखक 'श्रीलाल जी' का मुस्कुराता हुआ चेहरा याद आ गया। दशकों पहले एक शादी में उनका अभिवादन करते ही मेरे हाथ में थमी राईफल देख मेरी और लपके - "ये हुई ना मर्दों वाली बात।" फिर राईफल का निरिक्षण परिक्षण करके बोले - "तीन सौ पन्द्रह ब्वार की जगह तीन-सौ-पचहत्तर मैगनम होत तो औरौ रोआब रहत।'
श्रीलाल जी के अस्सी बरस पूरा होने के उपलक्ष्य में आयोजित 'अमृत महोत्सव' के अंतर्गत 'नामवर सिंह जी' के सम्पादन में प्रकाशित 'श्रीलाल शुक्ल: जीवन ही जीवन' में स्वयं शुक्ल जी के सुझाए लेखकों में शामिल होने का दुर्लभ आशीर्वाद मुझे भी मिला। उनसे जुड़े और भी अनेक प्रसंग याद आते गए इसलिए 'बतकही' में भागीदारी का बुलउआ पा कर मन उमगने लगा। सोचने लगा उनके चलते अपनी भी कुछ पूँछ हो गयी।
'बतकही' के लिए तैयारी करते समय घबराया भी, वहां तो बड़े-बड़े जमे हुए साहित्यकार मनीषियों का जुटान होगा उनके अंगना में ई भकुआ का करेगा। लेकिन यह सब तो हँकारी सुनकर हुंकारी भरते समय सोचना था अब तो भागीदारी करने से बच नहीं सकते।
फिर सोचा, कल की कल देखा जाएगा - कैसा और क्या-क्या भाख-बूक पाएंगे। फिलहाल इसी बहाने 'शुक्ल जी' का सादर स्मरण करते हुए 'श्रीलाल शुक्ल: जीवन ही जीवन' में प्रकाशित अपना लेख - 'इंडोलॉजी और श्रीलाल जी'- चेंप रहा हूँ, पढ़ कर परखिए कहाँ ठहरता है।
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उन्हें ही कोसेंगे इसके लिए भी ?????

Rakesh Tewari added 2 new photos.
Published by Rakesh TewariMarch 15 at 8:36pm

उन्हें ही कोसेंगे इसके लिए भी ?????

अरसे से सुनते रहे सरकारी महकमों में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार के बारे में, सड़क नाली नगर नियोजन सब बेमशरफ़ होने के बारे में, बरसात में जलभराव, गर्मी में छाया नहीं, वातावरण पॉल्यूटेड, वगैरह वगैरह।
सेवानिवृत्त हो कर टिक कर रहने पर करने को कुछ ख़ास रहा नहीं तो सुबह शाम जब तक मोहल्ले में सैर पर निकलने लगे और देखा मोहल्ले के समुचित नियोजन के तहत हर सेक्टर में पार्कों की व्यवस्था, सड़क किनारे तरतीब से लगाए गए पेड़, आस-पास के सुधी निवासियों के प्रयास से कुछ पार्कों में खासी हरियाली और टहलने के लिए ट्रैक का सराहनीय रख रखाव। सुबह शाम पेड़ों पर चिड़ियों की चहचहाहट चित्त काया चैतन्य कर देतीं। हवा के झोंकों से बसी सप्तपर्णी पर लदे फूलों की गमक के बीच टहलता गुनगुनाता -
संझा शरद सुहावन आये, गाढ़े मधुर मधुर मधुराय,
फूलै धवल राग गहराये, मादक सत-पर्णी मुस्काय।
सोचता कुछ बरसों में बढ़ती हरियाली बरहों मास शुद्ध हवा गर्मियों में छाया देने लगेगी और लुप्त होती चिड़ियों की तादाद भी और बढ़ जाएगी। तब समझ में आया सब कुछ बुरा ही नहीं हुआ है, नियोजन और वृक्षारोपण करने वाले भी सरकारी विभागों में काम करने वाले हमारे भाई बंद ही हैं, इन सकारात्मक कामों का श्रेय तो उन्हें मिलना ही चाहिए। लेकिन ये भाव धीरे धीरे दरकने लगे।
सरकारी विभागों के लोगों को जो करना है, अच्छा या खराब, करेंगे ही। हमें अपनी करनी के इन नमूनों पर ज्यादा गौर कर लेना चाहिए। एक पार्क के एक बगल की तकरीबन पूरी लम्बाई की बीस फ़ीट चौड़ी सरकारी जमीन उनसे लगे प्रतिष्ठित नामी गिरामी निवासियों द्वारा बाकायदा घेराबंदी करके कब्जियायी दिखी। कुछ पार्कों में मकानों के लिए लायी गयी गिट्टी-मोरंग-बालू या मलबों के ढेर और घरों से निकला कूड़ा सामने की नालियों में अंटा हुआ ------
और, सबसे ज्यादा बेरहमी दिखी हरे पेड़ों को ले कर। इस सिलसिले में एक ही उदाहरण काफी होगा - एक हरे भरे पेड़ को ले कर अलग अलग लोगों के अपने ही नज़रिए सुनने को मिले - गर्मियों में धूप के ताप से बचने के लिए लोग बैठक लगाते और उसकी छाया पड़ोस के ब च्चे खेलते रहते, इस सबसे बगल के घर के रखवाले के आराम में खलल पड़ता। एक साहब पेड़ की छाया में अपना वाहन खड़ा करते तो उसकी डालियाँ उससे टकराने लगतीं, एक दिन उन्होंने यह बात कही। उधर पास में ही झोंपड़-पट्टी में रह रहे कुछ लोगों को जलावन की जरूरत थी । यूं तो इस पेड़ की कुछ शाखाएं बरसात के पहले छांट कर दोनों समस्याओं का निदान आसानी से हो जाता, बरसात आते ही फिर से हरिया जाता लेकिन बगल वाले के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, कांट छांट पर लगने वाला पैसा बचाने और समस्या के समूल नाश के लिए उसने झोंपड़ पट्टी वालों के साथ नायाब प्लान बनाया।
एक सुबह जब तक लोग ठीक से जागते हरा-भरा पेड़ ठूंठ में तब्दील करा दिया गया, मोटी मोटी शाखाएं जलावन बन गयीं बिना किसी लागत के !! लोगों की पूंछाताछी पर दोष मढ़ दिया - 'वाहन स्वामी पर कि उनके कहने पर कटवाया है', और वाहन मालिक बोले - ऐसा काटने को तो नहीं कहा था।बेचारी निरीह चिड़ियाँ चीं चीं करती देर तक सुबकती रहीं ठूँठे पेड़ के इर्द गिर्द, नंगे तारों पर बदहवास। सूने उदास पेड़ का विषाद-विलाप किसी ने नहीं सुना, काठ हो चुकी संवेदनाओं के चलते। आते जाते ठूंठ पर पड़ती हर नज़र भीतर तक एक तीखी टीस कचोट जाती है। लेकिन इससे किसी को क्या लेना देना ?
ऐसी की तैसी वृक्षारोपड़, हरियाली, गौरैया बचाने, बायो-डायवर्सिटी संजोने, आक्सीजन बढ़ाने, पॉल्यूशन मिटाने जैसे अभियानों, और हरे छायादार पेड़ कटवाने के लिए बने नियमों-कानूनों की !!!
पानी पी-पी कर जिन सरकारी विभागों को हम हर दिन हर मौके पर कोसते रहते हैं, क्या उन्हें ही कोसेंगे इस दुर्दशा के लिए भी ?????
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