Saturday, July 22, 2017

वजूद

Rakesh Tewari
Published by Rakesh TewariJuly 19 at 7:51pm

वजूद

यूं तो धूल-ओ-गुबार से
नाता रहा है अपना।
कहीं भी बैठे या पसरे, 
क्या बिगड़ गया अपना।
भटकते हुए अजनबियों के घर भी,
डेरा डाल रहे अपना।
अनजानों से भी मांग के खाया,
मनभाया अपना।
ऐसा ही आवारा अदना सा
वजूद है अपना।

जैसा भी है अपना वजूद,
तो अपना ही है।
ऐसा भी नहीं कि
बिना बुलाए ही,
चला जाए 'कहीं' भी।
फिर चाहे वो
ताज़ो-तख़्त,
महफ़िल-ए-सदारत,
या स्वप्निल संसार,
ही क्यों न हो।
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Saturday, July 15, 2017

अखरती

अखरती

कानों में कूजन की गूजन झनकती,
लतरन में, डालिन में, अंखियाँ अरझतीं।  

बगिया की पगिया सूनी अखरती,
चहकती चिरइया की चुप्पी अखरती।  

बारिश की बहिया में मछरी तड़पती,                          
तलइया में छप-छप छपइया अखरती।        

करिया बदरिया बिजुरिया चमकती, 
झरती छपरिया में रिमझिम अखरती। 

टोला मोहल्ला में नैय्या टहलती, 
लाली बहुटिया की टोली अखरती।  

लइकन कै खेला-लिहाड़ी अखरती, 
पुरनके सँहरियन की बतियाँ अखरती।  

नयकन की टोका-टोकनी अखरती, 
ऐ बाबू ! अमवौ पै  बन्दिश अखरती।  

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Friday, July 14, 2017

हौले से

हौले से
कारवां बावरे बादरों का चला है,
उड़ के अटरिया पे अटका हुआ है।
रूखी हवाओं में तप कर उठा है,
दर-दर में यूं ही भटकता रहा है।
वनों प्रांतरों में खमसता रहा है
घनेरी घटाओं में घुमड़ा हुआ है।
धड़कता बहकता धुंआया हुआ ये,
रह-रह के जब-तब बरसता रहा है।
चुपके से आँगन में हेला हुआ है,
सिहरन जगा कर के खेला किया है,
सपनों की अलकों में छुपता छुपाता,
उनीदी सी आँखों में पसरा हुआ है।
कहना है क्या कुछ नहीं बोलता है,
हौले से पलकों को चूमा किया है।
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Saturday, July 1, 2017

डेराने हुए हो

डेराने हुए हो

बात छोटी सी है, ये समझते नहीं हो,
हसर सबका ऐसा, ये समझे नहीं हो। 

बात ऐसी भी क्या है, बुझाए हुए हो, 
जखम कितना गहरा, जगाए हुए हो। 

गलाने को गम, यूं ही मिटते हुए हो, 
हाथ में साकियों के, बिखरते हुए हो। 

होश मद मे डुबाए, यूं बहके हुए हो, 
अपने वमन में ही, चंहटे हुए हो। 

आप आपे से ऐसा क्या बाहर हुए हो, 
दाग दामन के अपने उघारे हुए हो। 

किनारे पे आ कर, उदासी लिए हो, 
अब तो समझ लो, क्यों बिफरे हुए हो। 

दुनिया वही है, क्यों भूले हुए हो, 
जो बोया है सिर पर, उठाए हुए हो। 

आग से खेलने खुद से शामिल हुए हो, 
कि घर अपना खुद ही जलाए हुए हो। 

लुक्का लगा कर के घूमा किये हो, 
चिता आप अपनी, सजाए हुए हो। 

बिना बात 'घट' सबका फोड़ा किए हो, 
रमा लो भसम, क्यों डेराने हुए हो। 

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