Thursday, February 28, 2013

उड़ जा पट्टू डैना तान



भिनसारे में भोग लगाय, घर कोने में अगर जलाय,
भगत भाव अंतरा उठाय, भज मन पटटू सीता-राम, 
सीताराम जय सीताराम, भज मन पटटू सीता-राम। 

नरिया फूटी सड़क खोदान, सीवर बहैं चलें उफनान,
कागद कोरे खबर सुजान, लूट मची लूटौ मनमान,
लछमी माता को परनाम, भज मन पटटू सीता-राम। 

काम नहीं कछु दफ्तर जाय, पहुँच जाय तो चुहल उड़ाय,
काम किया तो नश्तर मार, कहाँ कटी ना जेब देखाय, 
ऐस जिऐं सब बरखुरदार, भज मन पटटू सीता-राम। 

समतामूलक देश हमार, हिलमिल करते सब रोजगार,
रजधानी हो या परधान, सब की माया अपरम्पार,
लोकतंत्र की जय-जयकार, भज मन पटटू सीता-राम। 

पढ़ा लिखी होइगै व्यापार, अल्पकाल विद्या सब आन, 
बात करै जो अब आचार, धकियावा जावै सब व्वार,
आज सबै को यहु स्वीकार, भज मन पटटू सीता-राम। 

सबजन सब समाज सबवाद, सबकै एकै सधा निशान, 
राम-रहीम भए एकसार, चौदह पर अब तनै कमान, 
कैसे हू हो बेड़ा पार, भज मन पटटू सीता-राम। 

आना, दो आना, ना यार, पनरह आना बहे बयार, 
डांणी मारौ या तलवार, सबका चला करै व्यवहार,
संविधान कर अंगीकार, भज मन पटटू सीता-राम। 

हरिणाकश्यप बजै हज़ार, होरी में बरिगे प्रहलाद,
घर बारौ जो अपनौ आय, खेलौ रंग लूट बाज़ार,
रघुपति राघव राजाराम, भज मन पटटू सीता-राम। 

फगुआ चारहुं ओर उडाय, मौसम यहै बरोबर आय,
दांव लगाओ अब अर्राय, रुपियन कै अम्बार लगाय,
लै के वीर दाऊ कै नाम, भज मन पटटू सीता-राम। 

फगुआ समदर्शी यहु आन, सबके माथ धरे बहकान, 
अंधियारा हो या उजियार, फगुआ खेलौ भर अरमान,
तोड़उ पिंजरा खुला बिहान, उड़ जा पट्टू डैना तान. 

भज मन पटटू सीता-राम, --------- 

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Monday, February 18, 2013

रहि रहि टीसै कोर



1.
सुध पाए ही वो मिलीं, अंगुरी थामे धीय, 
पग-पग बाढी वल्लरी, घनी घनी घन पीय। 

2.
नेह घना उनका भया, धीय भई परनीय,
बाना ऐसा बुन चला, सम एकहि संगीत। 

3.
बिधना बिधि ऎसी बनी, छूट गई डग मोर,        
अपनी बखरी बस रही, सुधियन लपटी लोर। 

4.
आस रही यहु आस की, कबहु मिलें जो फेर, 
वहि बगिया बिरवा तरे, बतियावें रस भेय ।           

5.
लखि अवसर कोई घड़ी, पूछेंगे भरि सैन,
तेरी प्यारी वो लली, भूलहु बिसरै मोय !

6.
जो बिसरै, तो का कहै, बूझेंगे वहि ठौर,
हम तो अब लौं जी रहे, बांधे वाकी डोर।

7.
आस धरे निश दिन गए, जोहत बाट उचाट, 
भूलि कतउं ऐहैं इतै, टोहत टोहत राह।                                          

8.
का उनकौ है याद कछु, सपन लोक सह संग,
बहकी बहकी बतकही, मोहक मोदित अंग ।      

9.
तन उमगै उडतै चलै, मन महकै मकरंद, 
अबहूँ सुमिरन जब करैंसिहर उठै उदरंत।                


10.
भाव भरा मम घट रहे, छुवतै छिन छलकाए,
नियराएँ सुध बुध हरे, बिछुरे हिय हलकाए।  


11.
बरस बरस बीता किए, आस संजोए रैन, 
जीवन दिन सरका किए, जस मुठी से रेत। 

12.
तब लै पंजा भींच कै, आस मरोरी पेंच,  
दांव धरे ज्यों देर से, बाज़ उठाए खेंच।  

13.
वहौ आस अब चुक गई, रीता चिमड़ा डोल,    
कही ना जाए मनकही,  रहि रहि टीसै कोर।  

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Friday, February 15, 2013

ऋतुराजहि आए


1
नरम तपिश लै शीत जुडाए, तरल पवन तन-मन सोह्रराए, 
पीत वसन भू पर लहराए, परग-परग ऋतुराजहि आए। 

2
सकल जगत नवजीवन लाए, अंकवारी भरि-भरि दुलराए, 
कुंद खिले, वन लतर जगाए, मनभावन ऋतुराजहि आए। 

3
उमगन लाए, आस लगाए, उर सनेहरस भाव समाए, 
अंग-राग लपटावत आए, संग अनंग ऋतुराजहि आए। 

4
रंग हरदी पट प्यारे न्यारे, सहजै सुलभ सुरसुती आए, 
गूंगौ गुनगुन गीत गवाए, घर आँगन ऋतुराजहि आए। 

5
रूख्यौ ह्रदय कवित रचवाए,बाग-बगीचा बहु गमकाए, 
प्रीति-पिटारा माथ धराए, लै पराग ऋतुराजहि आए।  

6
चिरई चुनमुन चिंहुकत आए, खंजन कस नैना कजराए,
झुरमुट पातिन में चह्काए, मदमाते ऋतुराजहि आए। 

7
सुधि बिसरी सो बहुरि कुरेदे, भूली राह वही लह्काए,  
दबी राख जो आंच जलाए, अगियारे ऋतुराजहि आए। 

8
लत्ता गरम अटारी छाए, गाँव गली में रंग उडाए,  
कुहू कुहू कोयलिया गाए, सजे धजे ऋतुराजहि आए।  

9
महुआ मधु-गगरी भर लाए, लटकि मंजरी रस टपकाए, 
भीनी झीनी हवा बहाए , बहकत पग ऋतुराजहि आए। 

10 
सरपत कुञ्ज सुरसुरी व्यापे, दबे पाँव दुई प्राणि लुकाए,  
प्रणयीजन व्याकुल भरमाए, कुसुमाकर ऋतुराजहि आए। 

11
जहां तहां उत्सव सजवाए, संगम तीरे कलप बिताए,
वासंती पंचमी नहाए, परब लिए ऋतुराजहि आए।   

12  
वनमाला आवक्ष सजाए, पीताम्बर अनिरुद्ध धराए, 
पुष्पबाण हिय हिय संधाए, इक्षु धरे ऋतुराजहि आए। 

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