Sunday, November 19, 2017

'उड़ा मन पद्मा-जमुना तीर'*

Rakesh Tewari added 3 new photos.
Published by Rakesh TewariYesterday at 6:25pm
'उड़ा मन पद्मा-जमुना तीर'*

बात की शुरुआत उन दिनों से होती है जब हमारे कदम ज़मीन से ऊपर ऊपर ही पड़ते बढ़ते थे। तब तेईस साल की उम्र की दहलीज़ भी नहीं लांघ पायी थी। हवा में ही उड़ते खयाल और रूमानी सपने। उन्हीं में से एक मनसूबा रहा दूर-दूर तक नदिया में नाव चलाते जाने का। किस नदी में चलें कि सबसे लंबा सफर नदी-नाव संयोग में बीते। नक्शों में टटोलते हुए खाका खींच लिया दिल्ली से चल कर बा-रास्ते यमुना-गंगा-पद्मा ढाका तक डाँड़ खींचने का। लेकिन मन की उड़ान के लिए हमारे संसाधनों की डोर छोटी पड़ गयी। ढाका तक जाने के लिए ज़रूरत भर के संसाधन नहीं जुट पाए। नतीज़तन बजाए फरक्का के आगे पद्मा नहीं भागीरथी के रास्ते, कोलकाता तक नौका के डाँड़ खींचते, 'ओए दादा s s s s !!!!!! तोमार बाड़ी कोथाय' सुन कर ही, सबर कर लेना पड़ा।
उस सफलता से परचा मनबढ़ मन अब ढाका से भी कहीं आगे और आगे अफ्रिका की पूरी की पूरी नील और यूरोप की डैन्यूब-राईन नदियों के बहाव में पैरने लगा। लाइब्रेरी से उनका इतिहास-भूगोल खंगाल कर बाकायदा योजना बना ली। दूरदर्शन और अखबारों के ज़रिये प्रचार-प्रसार कर के पैसे जुटाने का जुगाड़ लगाया लेकिन हिसाब नहीं बना। फिर नौकरी में आ गए तो यह उफान भी दब सिमट कर दुबक गया। मन मार कर चाकरी के कामों में खोपड़ी धँसानी पड़ी। फिर भी बचपन की लगन की तरह बीच-बीच में दबी-खुची उड़नतरानी जब तक हुमुकती रहती।
यूं ही एक दशक से ज्यादा समय सरक गया। तभी १९८९ में पण्डित जवाहर लाल नेहरू की जन्म शताब्दी मनाने के लिए विभाग में आए बजट ने अनायास ही भूले बिसरे फितूर की याद कुरेद दी। सोचा नेहरू जी के प्रकृति प्रेम का हवाला दे कर क्यों न इस बार आज के लोहित के पास से ब्रह्मपुत्र में नौका उतार कर ढाका तक पाल उड़ा लिया जाय। आनन फानन में एक प्रोपोज़ल बना कर दाखिल कर आए। उस समय के हमारे विभाग के आला अफसर रहे बांग्ला मोशाय (आलोक सिन्हा) को यह इरादा सबसे भालो लगा। आनन-फानन में बजट, परमीशन मिले, विदेश मंत्रालय और उच्चायोग को भी लिख दिया गया। सबकुछ तय होते होते अपने राम अगले ऊंचे पद के लिए चयनित हो गए। और फिर लाख मनौनी करने पर भी दादा मोशाय ने जाने का फरमान वापस ले कर कहा पहले नयी ज़िम्मेदारी सम्भालिए उसके बाद नदी-नाव की सोचिएगा। इस तरह एक बार फिर हाथ आयी बटेर फुर्र हो गयी।
तब यह बात दूर दूर तक मेरी समझ में नहीं आ सकी कि मेरे लेखे में कुछ और ही लिखा है। ऊपर वाले की मेहरबानी से पिछले दिनों जर्मनी और आस्ट्रिया की छापा मार यात्रा दरमियान राईन और दान्यूब में नाव से तो नहीं लेकिन उनके किनारे की सैर कर बहती धारा को हसरत से निहारने का मौक़ा पा ही गया। तब भी नहीं समझ पाया कि अब अगली नदियों की बारी है।
ऊपर वाले की रहमत तो देखिए, जहाँ नौका से जाने की सोचा वहाँ बिमान से भेजने का सरोसामान जुटा दिया, जहांगीर नगर युनिवेर्सिटी (ढाका) से एक पीएच डी की मौखिक परीक्षा का परीक्षक बनने का आमंत्रण भिजवा कर। और, उसी सिलसिले में वीसा के लिए आवेदन कर सोचने लगा - लोग सही ही कहते हैं कि सच्चे दिल से मांगी मुराद पूरी जरूर होती है लेकिन कब और कैसे यह तो वही जानता है; वाह रे परवरदिगार !लगता है अब नील नदी के दर्शन के दिन भी करीब ही हैं। फिर ललचाया और पछताया भी - काश जो अगर यह ज्ञान पहले ही हाथ लग गया होता तो इतना सा ही क्यों चाहा होता। दिल से और दिल खोल कर और भी बहुत कुछ चाह लेता।
तब तक ट्रेवल एजेंट से वीसा मिलने की खबर मिली और गुरुग्राम में बैठे बैठे ही आवारा मन पल भर में उड़ चला - 'पद्मा-जमुना तीर'*।
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* बांग्लादेश में गंगा को पद्मा और ब्रह्मपुत्र को जमुना कहा जाता है।
फोटो १. रिवर डाइरीज़ (साभार)
फोटो २. Padma River and boats (1860)
फोटो ३. joiseyshowaa (साभार)

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