Wednesday, March 25, 2015

कुस्तुंतुनिया ३०

चला चली :  ९-१० मई २०१४

Dennis Jarvis from Halifax, Canada - Turkey-3019 - Hagia

सात दिनों के डायलॉग का सब से जज़्बाती दौर आ पहुंचा।

अब तक लोग एक दूसरे से ज़्यादा-कम पहचान बना कर अलग-अलग या ग्रुप में बोलने, हंसने और खुल कर चुहल करने लगे थे। तभी करीब आ कर दूर दूर चले जाने का वक्त आ गया।

शाम को हम सब जुटे उसी बहचेशीर यूनिवर्सिटी (BAHCESEHIR UNIVERSITY) के जाने पहचाने रेस्टोरेंट में जहां पहले एक दूसरे से तकल्लुफ जताते मिले थे। गोल मेज़ों के गोलदारे में जिधर नज़र उठती करीबी मुस्कान जवाब हाज़िर मिलती।  बाहर समंदर की ओर कुछ दूर तक झिलमिलाती रोशनी आगे स्याह फैलाव में गुम होती दिखती।

एक के बाद एक बड़े बड़े मेहमानों ने, फिर मेज़बानों ने और उसके बाद हमारे बीच से कुछ ख़ास नामचीनों ने डायलॉग के दौरान के अपने तज़ुर्बे या नज़रियों का इज़हार किया।  फिर, बाकिर करिंगा और उनके साथी मेज़बान एक-एक कर हर मेज़ पर हममे से हर एक से मिले, अपने अपने मुल्कों से तकलीफ उठा कर उनके वतन तक आने और डायलॉग में भागीदारी के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हुए कभी भी अपने लायक कुछ हो तो बेझिझक याद करने की दिली इल्तिज़ा की। पूरी गरमजोशी से हाथ मिलाते हुए हमने उनकी मेज़बानी की तारीफ़ के साथ एहसास-ए-शुक्रिया ज़ाहिर किया ।

अगले दिन सुबह अपने काँधे पर लैपटॉप बैग लटकाए, गरारियों वाले सूटकेस घिर्राते, होटल की लॉबी में जुटे तो आज यहां कल वहाँ उड़ते रहने वाले कुछ फ़ाक़ामस्त नुमाइंदे बड़े इत्मीनान से विदा हो लिए लेकिन जगह जगह दिल बहाने वालों की आँखों की कोर बरबस नम नज़र आयी।

हमारा जहाज दूसरे पहर उड़ना था इसलिए अभी भी हमारे पास आधे दिन से ज़्यादा का वक्त कुछ और देख लेने के लिए बचा हुआ था। लेकिन मुझे यह सुबहा सताने लगी कि यहां के रास्तों और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से नावाकिफ होने की वजह से कहीं इस चक्कर में मेरी फ्लाइट ही ना छूट जाए।  इस पशोपेश से निजात दिलाई ली क्विन ने, कुस्तुंतुनिया में पहले भी खासा वक्त गुज़ार कर यहां से अच्छी वाकफियत रखने के बारे में मुतमइन नज़र आयी।  रेनी और ऑगस्टा ने भी उसके साथ पुराने शहर का एक और चक्कर लगा आने का मंसूबा बनाया तो मैं भी साथ लग लिया।  हमारी बातें सुन रहे रिचर्ड ने मुस्कुराते हुए फिकरा फेंका  - "विध थ्री लेडीज़ ---- "।



होटल से हवालीमानी पहुँचते ही अपने अपने बैगेज असबाब घर के हवाले किए और 'ली' की लीडरी में मेट्रो पकड़ कर निकल पड़े सोफिया और नीली मस्जिद देख लेने के इरादे से ।

सोफीआ की बड़ी शोहरत सुनी थी, असल में चर्च फिर मस्जिद और अब अजायबघर के तौर पर इस्तेमाल हो रही यह नायाब इमारत तामीर कराई गयी थी एम्परर जस्टिनिअन के वक्त में तकरीबन १४०० बरस पहले (५३७ ईस्वी), १४५३ में ऑटोमन सुल्तान मेहमेत ने इसे मस्ज़िब में तब्दील किया लेकिन आज ना तो इसमें क्रिस्तानी या मुस्लिम किसी तरह की इबादत की मनाही है। इसकी टक्कर में कोई तीन सौ बरस पहले सुल्तान अहमेत (अहमद) ने पास में ही एक बहुत ही खूबसूरत मस्जिद बनवाई जो अपनी २० ००० नीली टाइल्स की बदौलत नीली मस्जिद के नाम से मशहूर हुई।  इन लाजवाब इमारतों को देखने बेशुमार सैलानियों का तांता लगा रहता है।


  • By Caroline Shearing
ली क्विन तो चली गई मसाज के फेर में और जब हम सोफिया के सामने पहुंचे तो इसे अंदर से देखने वालों की इतनी लम्बी कतार नज़र आयी कि अगर उसमें लग जाते तो घंटों लग जाते अपनी बारी आने तक।  लिहाज़ा साथ बची दोनों मोह्तरमाओं के साथ हमने बाहर से ही सोफीआ की मीनारों पर हसरत भरी निगाह डाली और पास की मशहूर पुरानी बाज़ार में चक्कर लगा लेना बेहतर समझा।











मोह्तरमाएं बाज़ार की दूकानों में मोल-भाव में उलझ गयीं। अपनी बिटिया रानी की फरमाइश याद कर मैं भी कुछ खरीदने की फ़िकर में कभी इस तो कभी उस दूकान में ताज़बीजने लगा लेकिन थोड़ी ही देर में रेनी ने मेरा अनाड़ीपन भांप कर खुद ही एक रंग बिरंगा स्कार्फ खरीदवाया ।

फिर, क्या करते देखते रहे - बाज़ार की रौशनी, चमचमाती तश्तरियां, रूमाल, रंगीन डिज़ाइनों वाली मेहराबें, जूतियां,-चप्पल, बक्लावा और दूसरी तमाम तरह की जगमगाती दूकानें। बाहर लबे सड़क मेट्रो स्टेशन के खुले धुले नज़ारे के पीछे नीली मस्जिद का गुंबद।  इतना सुनता रहा था इस बाज़ार के बारे में कि ना देख पाता तो कसक रह जाती और देख कर महसूस हुआ यह शोहरत यूं ही नहीं।  



लौट कर हवालिमानी के अहाते में ली ने चहकते हुए सबके बोर्डिंग पास कियोस्क से चट-पट निकाल हमें थमाए और फिर सब अपना अपना असबाब सँभालते, हाथ हिलाते, फिर मिलने की आस जताते, अपनी अपनी एयर लाइंस की सिक्योरिटी की और चल दिए।

एक बेंच पर अकेले बैठ दिल्ली से ढो रहे डब्बे में बची रह गई दो तीन मठरियां पेट के हवाले कर खाली डब्बा डस्ट-बिन में फेंका। फिर, एयरपोर्ट की रौनक और चहल-पहल देखता रहा, सबसे मज़ेदार लगे सामने की दूकान में सजी ऊंची कुर्सी पर बैठे बूट पोलिश करा रहे गोल मटोल, सफाचट गोल खोपड़ी, गोल मुख और गोल-गोल आँखों वाले रोबदार जनाबे आली।



बहुत कुछ देखने-सुनने-गुनने को मिला कुस्तुंतुनिया और टर्की में नेशनल जिओग्राफिआ की बदौलत। बहुत बहुत शुक्रिया 'क्रिस' !!

जहां जा कर फिर जाने और जिसे देख कर फिर-फिर देखने की  मीठी-मीठी कशिश रह जाए वह जगह, वैसी ही शक्लो-सूरत है तेरी, परवरदिगार की मर्ज़ी हुई तो फिर मिलेंगे कुस्तुंतुनिया !!!!!! 

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कुस्तुंतुनिया २९

हासिल हिसाब - सुपर पावर से दीगर : ९ मई २०१४



बस स्टैंड पर तेज़ हवा के झोंकों में उड़ते बाल संभालते बस आने की इन्तिज़ार में साथियों से गपियाते रहे। फिर, बस की खिड़कियों से अंकारा के कुछ और नज़ारे आँखों में बसा लेने में लगे-लगे हवालीमानी पहुंचे। तीन-तीन बार की जामा तलाशी वाली सिक्योरिटी से पार हो कर लॉबी में ठहरे। सुबह दस बजे अंकारा से उड़ कर वापस इस्तांबुल के उसी पुराने प्यारे ठिकाने 'आर्टक्वॉय प्रिंसेस होटल' में। फिर उसी जाने-पहचाने यिल्दिज़ पार्क में चहल कदमी, गुफ्तुगू और खूबसूरत 'माल्टा कोसकू (किओस्क)' में लंच।



दोपहर बाद, टर्की में चले तहज़ीबी डायलॉग में अब तक टिके रह गए भागीदार इस दौर का हासिल-हिसाब करने होटल के तहखाने वाले कमिटी रूम में जुटे। हमेशा की माफिक क्रिस सुनने में और ऐन्ड्रू स्मार्ट फोन पर अंगुलियां खटकने में लगे रहे।  चिंचिला, ताकेशी, फाबिओ, लिंग क्विन एक-एक कर थोड़ा कहना ज़्यादा समझना अंदाज़ में बोले/बोलीं। अपन को मौका मिला तो इतने दिन से अंदर ही अंदर कुलबुलाते जज़्बात अल्फ़ाज़ों में उभर आए -

'जब आप पांच पुरानी तहज़ीबों की बात करते हैं, मतलब ख़ास तौर पर माया-मिस्र, मेसोपोटामिया, इंडस और चीन की तो मेरे ज़ेहन में उस ज़माने के पांच सुपर पावर तहज़ीबों का अक्स उभरने लगता है। जबकी इस जहां में बहुत कुछ इनसे दीगर भी रहा होगा। कोई तहजीब किसी एक ज़मीनी मुताले में एकदम अलहदा तो बनती बढ़ती नहीं है, उसके दूर-पास की सभ्यताओं का भी उसमें अहम रोल होता है, इसीलिए इस दौर में अपनी तक़रीर में मैंने इंडस (सिंध नदी) नहीं, गंगा के पहलू मे पनपी तहज़ीब पर रोशनी डाली है। मिसाल के तौर पर अगर इंडस या सिंध की ही बात की जाए तो पश्चिमी हिन्द के अलावा बाकी के हिन्द में उसी दौरान की तहज़ीबों को तो डायलॉग में जगह ही नहीं मिलेगी, यही बात दुनिया के दूसरे इलाकों पर भी लागू होती है। ऐसे में ऐसे बहुत से देश और इलाके इस डायलॉग में शामिल ही नहीं हो पाएंगे, फिर तो इस नयी पहल का मकसद ही अधूरा रह जाएगा। इसलिए, मेरी मानिए तो इस डायलॉग का कैनवास उसी हिसाब से फैला दीजिए।'

सभी हाज़िरान ने मेरी बात बहुत गौर से सुनी, उसकी तस्दीक की और अगले दौर में इस मुताबिक़ तब्दीलियां करने की बात भी की।



इतने दिन की भागम भाग डायलॉग के बाद और लोगों की दिलचस्पी और ज़्यादा लम्बे डायलॉग में नहीं दिखी। क्रिस ने सब को शुक्रिया अदा करते हुए जब यह ऐलान किया इंशा अल्लाह अगले दौर के डायलॉग के लिए २०१५ में बीजिंग में मिलेंगे तो लिंग क्विन एक बार फिर चिड़िया की माफिक चहकी।

और फिर, उठते उठते, जब गैर-रस्मी तौर पर मेरी मेज़बानी में २०१६ में इंडिआ में जमावड़े की उम्मीद भी जताई गयी तो ली लिउ, रेनी, चिंचिला, वगैरह वगैरह ने मेरी ओर गर्मजोशी भरी मुस्कानें फेंकी, पलट कर तकल्लुफ़ी जवाब बटोरते हुए सोचने लगा मुझ जैसे रिटायर्ड बन्दे से भला यह जिम्मेदारी निभ भी सकेगी क्या ?

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आगे बची है बस एक क़िस्त और   

कुस्तुनतुनिया से आगे: २८

कोई रिश्ता है क्या: ८ मई २०१४

इतना कुछ है अंकारा में कि ठीक से देखने-सुनने-समझने में महीनों लग जाएं लेकिन हमारे पास था कुल आधा दिन और उतने में ही जितना देख पाते देखना था। इसी लिए हमारे मेज़बानों ने वक्त का ख्याल रखते हुए  हमें दिखाने के लिए तीन ही मुकाम चुने।



सबसे पहले हमारा जत्था चला ऊंची पहाड़ी पर तामीर कोट पर लहराते लाल परचम की ओर। इसके बनने की सही सही तारीख का पता नहीं।  रोमन और बाद के राजाओं हुक्मरानों के बाद  ११०१ में इस पर काबिज़ हुए सेल्जुक तुर्क। ऑटोमन ज़माने में १८३२ में इब्राहिम पाशा ने बड़े पैमाने पर इसकी मरम्मत करायी। पुराना अंकारा बाहरी किलेबंदी के अंदर बसा है। अंदरुनी किला ४३ वर्ग  किलोमीटर में फैला है ।







हमने किले के आस-पास की एक झलक पाने का मौक़ा पाया। नयी बनी कालोनी, पीली टैक्सियों और सफ़ेद कारों की कतार, पार्किंग, दूकानों की खपरैली छत वाली दुकानों के सामने तक सजे बिक्री वाले सामान, गाहकों की इन्तिज़ार में इत्मीनान से बैठे  दूकानदार, किले  दीवार में लगी पुरानी इमारतों के खंड ठीक उसी तरह जैसे हमने हिन्द के किलों में अक्सर देखे हैं।  किले के दरवाज़े के ऊपर से दूर दूर तक फैले नए पुराने शहर का फैलाव देखा, नयी-पुरानी इमारतें, नीले गुंबदों वाली शानदार चार मिनारी मस्जिद, और लाल परचम लहराता देखा, किले के अंदर की कुछ गलियां देखीं। फिर चल पड़े आगस्टस/ रोमन मंदिर की ओर।





पहाड़ी ढलान की सड़क पर रुक कर नीचे बस अड्डे की रौनक देखते देखते ऊपर से एक के पीछे सरपट भागती आयी कारें हमारे पास ही सड़क रगड़ती रुक गईं।  अगली कार से उतरे एक-एक  पिस्तौल वालों ने पिछली कार से दो घबराई हुई सवारियों को  खींच कर निकाला, उनकी कनपटी पर पिस्तौल सटाई और उनके हाथ पीठ के पीछे बंधवा दिए। आस-पास के माहौल में सनसनी उतर आई।  पता चला सादी वर्दी में आए पुलिस वालों ने भाग रहे मुल्ज़िम पकडे हैं।

आज से २०२५ बरस पहले रोमन राजा आगस्तस की फतह के बाद रोमन राज के गलाटिआ नाम के सूबे की कैपिटल के तौर पर अंकारा शहर लम्बे वक्त तक एक बड़ा कामर्शियल सेंटर बना रहा। उसी ज़माने में यहां बना आगस्टस और रोम के मंदिर में लगे प्रस्तर-पट्टों पर कुरेदे गए लेख आगस्टस के कारनामों का ज़िक्र करते हैं।







आगस्टस और रोम मंदिर से सटा कर चार सौ बरस से कुछ पहले लाल ईंटों से तामीर करायी गयी खूबसूरत मीनार वाली हाजी बैरम मस्जिद पर इबादत करने वालों से ज़्यादा सैलानियों का रेला लगा रहता है। एक मशहूर तुर्की कवि, सूफी और बैरामी सूफी फ़िरक़े की बुनियाद डालने वाले हाजी बैरम वली की कबर भी मस्जिद के बगल में ही बनी है।

एक चक्कर 'म्यूजियम ऑफ़ अनातोलियन सिविलाइज़ेशन का भी लगवाया गया, चक्कर भी क्या बस यूं समझिए ज़रा सा परदा उठाया और जब तक नज़र उठे फिर से पर्दानशीं। पत्थर युग से शुरू हुई संगतराशी के एक से बढ़ कर एक नमूने, अक्खा पत्थर युग के औज़ार-हथियार, फिर सधे हाथों गढ़े गए बुत - बाएं हाथ पर बाज़ बिठाए राजा, रथ पर सवार योद्धा, शेर, पंख वाले अनोखे जीव, धातु के सामान, जाने क्या क्या, पूरी तवारीख की नुमाइंदगी करते बेहतरीन नमूने। कहाँ तक सराहते और जज़्ब करते।

बाहर टहलते हुए बगीचे में बेतरतीब धरे दो प्रदर्शों को देखा तो बस देखता ही रह गया, पहले पर निगाह पड़ते ही अपने यहां मिलने वाले कीर्त्ति-स्तम्भ या वीर-स्तम्भ और दूसरे को देख कर अनायास ही शिवलिंग याद आये, देर तक गुनता रहा कि इनका अपने यहां की ऐसी कृतियों से कोई रिश्ता हो सकता है क्या।





रात के खाने का इंतिज़ाम हुआ अंकारा पैलेस में - महामहिम उमर सेलिक, वज़ीर ए तहज़ीब और सैर-व-सयाहट की ओर से। उनीस सौ अट्ठाइस में बन कर तैयार हुई इस इमारत को आज की शक्ल मिली १९८३ में। हमारे रिसेप्शन और खान पान के लिए चुने गए शानदार हाल की सजावट के क्या कहने, लकड़ी की फर्श पर फूल पत्तियों से सजे मोटे कालीन, वैसी ही डिज़ाइनों से सजी मेहराबें और सीलिंग के फानूस, सफेद मेज़पोश वाली गोल टेबल के चारों ओर लाल कुर्सियां।







हमारे साथ आ जमे बाल्कन इलाके के एक खोजी स्टूडेंट, जापानी और मेक्सिकन प्रोफेसर, और फिर आए लम्बे छरहरे मुराद अपनी शरमाती मुस्कुराती माशूका के साथ। आखिर खुल ही गया इश्क का यह पन्ना भी।



डिनर का दस्तूर बड़ी नफासत से नपे तुले अंदाज़ और तहज़ीब से चला। शुरू में ख़ास लोगों ने तोहफों की रस्मी अदला बदला की और बारी बारी मोहब्बत के ज़ज़्बात भरे पैगाम ढाले, फिर लज़ीज़ खाने की तश्तरियां आती गईं. सब कुछ बड़ी खामोशी और तरतीब से चला।  
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बकिया आगे

कुस्तुनतुनिया से आगे: २७

अनातोलिया: ८ मई २०१४


सुबह गेस्ट हाउस से बाहर निकले तो  सामने की सड़क पर आती-जाती शानदार बसों की दबी-दुबी आवाज़ के अलावा सब ओर सन्नाटा।  बस स्टैंड पर आए इक्का-दुक्का लोगों से पता चला ऊपर की ओर जाने वाली बस यूनिवर्सिटी कैम्पस तक ले जाती है, वो भी बिना दाम। एक बार तो झिझका कहीं गलत जगह ना पहुँच जाऊं लेकिन फिर लगा चक्कर लगा आने में हर्ज़ ही क्या।

यूरोपियन चलन के मॉडर्न युनिवर्सटी कैम्पस और इमारत, आते-जाते या या घास पर बैठे जवां तालीमगारों की बातचीत से गुलज़ार, पहली ही नज़र में पसंद आ गया।



इधर-उधर पता करते जिधर जाते दूसरे डाइरेक्शन में घुमा दिए जाते, वहाँ कई सेमीनार एक साथ चल रहे थे, उनमें से कौन सा अपना है समझना आसान नहीं रहा। भटकते हुए जहां से चले थे वहीं नीचे की लॉबी में आ लगे। इतना ज़रूर हासिल रहा कि इसी बहाने करीने से बने इमारत के कुछ और हिस्से भी देखने को मिल गए। सब जगह साफ़ सफाई और नफासत से सजे क्लास रूम और गलियारे।
 
थोड़ी देर में सामने से आते मेहमेत कलपाकली दिखे तो उनके साथ लगे-लगे कांफेरेंस रूम तक पहुँच गए। हल्के पीले-भूरे रंग की दीवारें, सफ़ेद वितान, हलकी नारंगी कुर्सियां, सलीके की लाइटिंग, अध गोल-आयत जैसा स्टेज, सब कुछ चमाचम्म।





यहां चले दोनों सेशन 'अनातोलिअन तहज़ीब' की नज़र रहे। कुल आठ प्रेजेंटेशन देने वालों में एक एक विलायत और ईराक़ और बाक़ी के तुर्की से जुड़े आलिमों की तक़रीर सुनने को मिली।

अनातोलिया - ग्रीक अनातोलिए, पूरब, या जहाँ से सूरज उगता है।  उत्तर में ब्लैक सी से दख्खिन में मेडिटरेनीयन सी (भू मध्य सागर), पश्चिम में 'एजियन सी' से घिरा यह ख़ित्ता 'एशिया माइनर' या छोटे एशिआ, एशियन टर्की (टर्की का एशिआ में आने वाला हिस्सा), जैसे नामों से भी जाना गया। मरमारा समुद्र को ब्लैक सी और 'एजियन सी' को जोड़ने वाले संकरे रास्ते इसे दुनिया के और बड़े इलाके से जोड़ते और यूरोप से एशिआ की सरहद बनाते हैं। मोटे तौर पर अर्मेनिआ के पहाड़ और फ्रात दरया इसकी पूरबी सरहद बनाते हैं । अनातोलिआ नाम की सबसे पुरानी तस्दीक हुई है किसी ज़माने के मशहूर अक्कादिअन राज के वक्त (आज से ४३५०-४१५० बरस) की मेसोपोटामिआ की एक टेबलेट पर कीलाक्षरों में लिखे लेख से।



अनातोलिआ की तवारीख शुरू होती है पत्थर के हथियारों का इस्तेमाल करने वाले आदिम वक्त से। आखेटकों-संग्राहकों की बनाई दुनिया की सबसे पुरानी यादगार इमारत गोबलेक टेपे इसी इलाके में है। अनाज उपजाने की जानकारी सबसे पहले हासिल करने वाले यहां के लोगों की बसावटों की नुमाइंदगी करते हैं चटल होयूक, चायोनू, नवेली कोरी और हासिलार। हत्ती और हर्री यहां के सबसे पुराने बाशिंदे माने जाते हैं। ४०५० बरस के आस पास अक्काद हुकूमत के गिरने के बाद उनके असीरियायी खानदानियों  ने कोई तीन सौ बरस यहां अपना राज कायम रखा। फिर, ग़ालिब हुई हिट्टाइट लोगों की हुकूमत जो अगले चार सौ साल में अपनी बुलंदी की ऊंचाइयों तक पहुँच गई । इनकी दारुल हुक़ूमत हत्तूसा के शेर दरवाजे की एक झलक ही इनकी शान-ओ-शौकत का अंदाज़ लगाने के लिए काफी है। ३७०० बरस बीते इसी इलाके के एक हिस्से में राज कर रहे मित्तनी इंडो-आर्यन भाषा से ताल्लुक रखने वाली ऎसी ज़ुबान  बोलते रहे जिसकी पहचान संस्कृत से की जाती है।  हिट्टाइट राज टूटने के बाद, आज से २१८० बरस के आस पास, छोटे छोटे टुकड़ों में बंट कर कुछ सदी और चला।  उसके बाद के तफ़्सीली तवारीख के लिए क्लिक कर सकते हैं  http://en.wikipedia.org/wiki/Anatolia .



तवारीख पढ़ा कर कैसे अलहदा तहज़ीबों के बीच पुल बांधे जा सकते हैं; तहज़ीबों के बीच से फ्रात पार करते हुए; सेन्ट्रल एशिआ से अनातोलिया तक फैली एक मध्यकालीन तहज़ीब; अनातोलिआ और ऑटोमन इमारती रिवायत का बालकन इलाकों तक पहुंचना वगैरह में से सबसे दिलचस्प रहा - 'आज की तहज़ीब में १००१ इस्लामी ईज़ादों का कांट्रीब्यूशन।



इस मज़मून पर बोलने वाले प्रोफेसर सलीम अल हस्सानी बचपन में पले बढे इराक़ी शहर बग़दाद में, फिर १९६० तक यूनाइटेड किंगडम के मैनचेस्टर में पढ़ते पढ़ाते रहे। इसके बाद फॉउन्डेशन ऑफ़ साइंस, टेकजनोलॉजी एंड सिविलाइज़ेशन के सदर के तौर पर दुनिया भर में इस्लामी ईज़ादों की डुग्गी पीट कर बड़ा नाम कमाया, इसी मज़मून पर २०० सफों की किताब लिखी। इन ईज़ादों में से एलीफैंट क्लॉक की कारीगरी की बहुत तारीफ़ मिली। लेकिन कुछ लोगों ने 'मुस्लिम साइंस' और 'इस्लामिक साइंस' जैसी इबारतों पर सवाल भी उठाते हुए इस बिना पर इन्हे खारिज कर दिया कि साइंस बस साइंस होती है इसे किसी ख़ास मज़हब या तहज़ीब से जोड़ कर देखने की बात में कोई दम नहीं।  



झक्क सफ़ेद दाढ़ी-मोंछ वाले प्रोफेसर हस्सानी से उनके प्रेज़ेन्टेशन के बारे में बातें करते उनके लॉजिक बहुत गौर से सुने, जो भी हो अपने काम में उनका ज़ज़्बा ज़ुनीनी और मुकम्मल दिखा।  

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बकिया आगे

कुस्तुंतुनिया से आगे : २६

'अंगोरा' - बिल्केंट : ७ मई २०१४

हमारा जहाज जगमग करते अंकारा-हवालिमानी पर उतरा तो थकान और नींद से ऊंघती सवारियों में जान पड़ी।


बाहर अंधियारा और रनवे पर कतार में सजे बिजली के लट्टुओं की रौशन और सामने रोशन इमारत - ए - आमद (एराइवल बिल्डिंग)। जितनी जल्दी मुमकिन हुआ उतनी जल्दी असबाब बटोर कर बस में सवार हो कर सुदर्शन नायब प्रोफेसर मेहमेत कलपाकली (MEHMET KALPAKLI) की अगुआई में बिल्केंट यूनिवर्सिटी की ओर रवाना हुए।

हिन्द में शायद ही कोई ऐसी घरैतिन होगी जिसने 'अंगोरा ऊन' का नाम ना सुना हो लेकिन उनमें से किसी किसी को ही पता होगा कि इसकी जड़ें इतनी दूर बसे अंकारा शहर की ज़मीन में धंसी हैं।

बीते चार हज़ार बरसों में तवारखी सफों के पलटते जाने के साथ इस शहर ने बारी बारी कई नाम पाए, पहले हिट्टाइट ज़माने में 'अंकुवास' (Ankuwas), उसके बाद ग्रीक लोगों का 'अंकोर' या 'अयकुपा' (Aykupa, Ankya änchor"), लैटिन में 'अंक्यारा' (Ancyara), फिर 'अंगोरा' (angoraa) और आखिर में १९३० में सरकारी तौर पर 'अंकारा'।  इन नामों में से 'अंगोरा' सब से ज़्यादा जाना गया।

एक दायरे में रह कर हम कितने ही ग्यानी बनने का भ्रम पाल लें रहते कुँए के मेढक ही हैं।  हम समझते रहे अंकारा का नाम अंगार से बना होगा, टर्की न गए होते तो कभी सोच भी नहीं पाते कि अंगोरा ऊन का भी इससे कोई नाता हो सकता है।

समंदर से करीबन तीन हज़ार फ़ीट (९३८ मीटर ) की ऊंचाई पर, पहाड़ियों से घिरा, पैतालीस लाख  के आस-पास की आबादी वाले, टर्की का दूसरा सबसे बड़ा शहर और मुल्क की दारुल हुकूमत अंकारा कामर्शियल और इंडस्ट्रियल सरगर्मी की धुरी रहा है। रेल, सड़क और हवाई रास्तों से जुड़े इस शहर की पहचान यहां की प्यारी-प्यारी अंगोरा बकरियों, बिल्लियों और खरगोशों के नाम से रही है।  तीनों बहुत ही खूबसूरत और सफ़ेद ऊन के चलते बड़े प्यारे दीखते हैं लेकिन जिस ऊन के लिए 'अंगोरा ऊन' मशहूर हुआ उसका क्रेडिट जाता है गोल गप्पे खरहे के मुलायम ऊन को। यहां की नाशपातियां, शहद और अंगूर भी दूर-दूर तक जाने जाते हैं।

तीन ओर पसरे घास के मैदान और दक्षिण में जंगलों से लगे सकरया नदी की सहायिका अंकारा धारा के बाएं किनारे, एक चट्टानी पहाड़ी पर बसे अंकारा का तवारीखी इलाका हिट्टाइट, फ्रीजियन, ग्रीक, रोमन, बैज़न्टाईन और ओटोमन ज़माने की सनद देता है।  

'बिलकेंट यूनिवर्सिटी' के रास्ते में सिर्फ शहर की रोशनी ही देख पाए। हलकी पहाड़ी पर चढ़ते एक बे-आबाद सुनसान इलाके में बने युनिवर्सटी के गेस्ट हाउस का कमरा किसी मुआमले में किसी फाइव स्टार होटल के कमरे से कम नहीं नज़र आया। लम्बे वक्त तक आराम से रहने के सारे सामन यहाँ जुटाए गए हैं - किचन, गैस, बर्तन, फ्रिज, सारे इंतज़ाम ।

ऊंची तालीम और रीसर्च में बढोतरी हासिल करने के बुनियादी इरादे से प्रोफेसर एहसान ने १९८४ में टर्की की इस पहली बे-मुनाफ़ा यूनिवर्सिटी की नींव रखी। "बिलिम केन्टी" से बना 'बिलकेंट' मतलब 'सीखने और साइंस का शहर' - अंकारा के पच्छिम में मरकज़ी राह से १२ किलोमीटर दूर ५०० हेक्टेयर से ज़्यादा पहाड़ी इलाके में फैला हुआ है ।  

दिन भर के थके बिस्तर पर गिरते ही कब सो गए पता ही नहीं चला।     

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बकिया आगे

Monday, March 16, 2015

कुस्तुंतुनिया से आगे: २५

March 17, 2015 at 8:14am
सूरमाओं का शहर - गाज़िआन टेप : ७ मई २०१४



लंच की टेबल पर दस्तरख्वान सजा तो लोग भूखे बाम्हन जैसे पिल पड़े लेकिन मेरे लिए उन्हें देखते रहने के अलावा कोई चारा नहीं दिखा। इशारतन मांग कर दो-दो गिलास आरियान चढ़ाया और खाना ख़त्म होने का इन्तिज़ार करते रहे, हैरत हुई जब एक खानसामा किसी से मेरे शाक-भाजी होने का सुराग जान कर मिक्स वेजिटेबल की गरमा गरम मसालेदार चटपटी तश्तरी पेश कर गया।



लंच के बाद ज़ेग्यूमा म्यूज़ियम के ऑडिटोरियम में चले अगले एकेडेमिक सेशन में। अगली सीटों पर मुअज़ज़ अफसार अपने खास अंदाज़ में नशिस्त नज़र आए। पीछे की कतारों और गलियारों में शहर के तालिब-ए-इल्म की ठसम-ठस के साथ जवान चेहरों की चमक, चहक और रौनक। एक जगह टिक कर खामोश रहे वो जवानी ही क्या, अभी इस सीट तो झट दूसरी पर लपकते, अपनी बोली में जाने क्या बोलते समझ नहीं पाया लेकिन उफनाता जोश साफ़ नज़र आया। हिज़ाब को मात देती जींस की तादाद यहां भी मगरिबी चलन के असर की तस्दीक देती दिखी।

सुबह से ही यहां वहाँ दौड़ रहे क्रिस को फ्लोर पर आने से पहले कपड़े बदलने तक का मौक़ा नहीं मिला। खुश आमदीद के लिए बोलने खड़े हुए तो सबसे पहले अपने गैर रस्मी लिबास में होने की माफी मांगी।

उसके बाद, प्रोफे. राल्फ सलमी की सदारत में पूरब-पश्चिम की तहज़ीबों के मेल पर चिंचिला, रेनी,  ली लिउ और प्रोफे. बुरहान के प्रेजेंटेशन और लेक्चर का सिलसिला चला।



चिंचिला ने समझाया - माया कल्चर की जितनी ज्यादा जानकारी पुराने मॉन्यूमेंटस से मिलती है, उससे कहीं ज़्यादा दर्ज हुई थी किताबों में लेकिन १५०० ईस्वी में सपैनिश फतह के दौरान और उसके बाद तकरीबन सब की सब जला कर तबाह कर दी गईं। बची खुची का सबसे बढ़िया कलेक्शन जर्मनी में ड्रेसडेन कोडेक्स नाम से सिरजा गया है।

ली लियू  ने कछुए की हड्डियों पर कुरेद कर लिखी लिखावट के बारे में बताते हुए बताया कि कांसे के बर्तनों पर चिन्हित ३००० बरस पुराने रस्मी चिन्हों (सिंबलस) को चीनी लिखावट पढ़ लेने वाले आज भी पहचान लेते हैं, दुनिया में और कोई ऐसा मुल्क नहीं जहां इतनी  पुरानी लिखावट जस की तस चलती चल रही हो। इनके अलावा कछुए की हड्डी पर लिखी लिखावट से मिलते जुलते ४५०० - २००० बरस और उनसे अलग ३९०० - ३८०० बरस पुराने ऐसे चिन्ह भी मिले हैं जो आज तक पढ़े नहीं जा सके हैं।

रेनी ने दुनिया की सबसे खूबसूरत लिखावटों में से एक मिस्री (इजिप्शियन) चित्रलिपि से रूबरू कराया जिसमें सैकड़ों तरह की चिड़ियों वाले चिन्ह इस्तेमाल किये गए हैं। और इनका सिलसिला इसी इलाके में अपनी तरह से तकरीबन ५२०० बरस पहले शुरू हुआ।  



लेक्चर के दौर से निकले तो हमारे मेज़बान शहर का चक्कर लगवाने लिवा ले गए। शहर के नाम के पहले ही लफ्ज़ की पैदाइश जानने के लिए भी कई कई परतें पलटनी पड़ीं - मध्य एशिआ में फिलिस्तीन में समंदर से सटी गाज़ा पट्टी में बसा है एक शहर गाज़ा। अरबी लफ्ज़ गाज़ा का मतलब हुआ जंगी हमला, आम तौर पर पैगम्बर मुहम्मद की रहनुमाई में लड़ा गया ज़ंग।  गाज़ा से बने ग़ाज़ी के मायने हुए जंगी हमले में शामिल होने वाला, इस्लाम के उभरने के बाद इसका मतलब हुआ मज़हबी ज़ंग में हिस्सा लेने वाला। करीबन छह सौ बरस पहले तक अल्लाह के मज़हब के औज़ार - अल्लाह-ए-कार - ग़ाज़ी कहलाने लगे। फिर, ज़ंग जीतने वाले, बड़े फौजी हुक्मरान, गैर मुस्लिम दुश्मनों को हराने  वाले और इज़्ज़तदार लोग भी गाज़ी कहे जाने लगे।

इलाके की तवारीख पत्थर के औज़ार बनाने का हुनर जानने वाले लोगों की बहुत पुरानी तहज़ीब से शुरू हो कर बरास्ते अनाज उपजाने, जानवर पालने के हुनर सीखने और मुकम्मल गांवों में रहने के बाद बाकायदा शहर बसाने तक, मना जाता है पांच हज़ार बरस से भी ज़्यादा बीते इसके बसे हुए। इसका नाम पहले 'दोलिचे' और बाद में 'आयिनताब' पड़ा। इनमें से बाद वाला नाम दर्ज़ मिला है करीब तीन हज़ार बरस पहले के रिकार्ड्स में। इसके नाम के पीछे भी जुड़े हैं कई किस्से, एक के हिसाब से इसका शार्ट फॉर्म हुआ 'हनताब' मतलब हान (खान) लोगों की ज़मीन (ताब)। दूसरी रवायत पर यकीन करें तो यह नाम पड़ा वहाँ की जलीय खूबसूरती पर क्योंकि आइन के मायने हुए जल-स्रोत या चश्मा इसलिए 'आयिनताब' के मतलब हुआ खूबसूरत सोता। इस बिना पर इसका एक और अर्थ हुआ वो जगह जहाँ बेशुमारपानी पानी हो। ताब का एक और मायने है ताकतवर।

तीन सौ पचास बरस पहले यहां आये एक सैलानी ने हैरत से लिखा - 'बोल कर या लिख कर इस शहर का बयान नहीं किया जा सकता। दुनिया की आँख का सेब है यह, जिसकी आसमान छूती इमारतें निगाहें  बांध लेती हैं, जहां बहुत से खेत, कभी ख़त्म ना होने वाले खाने के सामान, नदियों और पीने के स्रोतों की कोई कमी नहीं।



अपने शहरों की सड़कों की ठसम ठस भीड़ भाड़ और चिल्ल-पों के आदी होने के बाद यहां के खामोश माहौल और थोड़े से लोगों की आवा जाही बहुत भली लगी। अगल बगल का जायजा लेते मेरा ध्यान टूटा जब हमारी बस आहिस्ते से चौराहे पर पहुँच कर ठहर गयीं।  नीचे उतरते ही छोटे छोटे बच्चे भीख मांगने लपके, प्रोफेसर ली लियू पर्स खोल कर खुदरा तलाशने लगीं और मुराद बच्चों को भगाने में लग गया। अपने शहर के चौराहों के ऐसे आम नज़ारे याद करते हुए मैं सामने के करीने से खड़े किए गए खम्भे पर लगी रंग-बिरंगी दिशा-सूचक तख्तियां देखने लगा।





सामने की पहाड़ी पर दीखते किले के बाज़ू से हलके से उठती सड़क पर बढ़ती हमारी टोली के साथी कुछ ही कदम चलते, रुक रुक कर दूकान और उसमें सजे सामान तज़बीजते, दाएं दिखती ऊंची मीनार की ऊंचाई तक गरदन उठाते, किले के अहाते में खड़े हथियारबंद फ्रांसीसियों और गाज़ियों के बुत पर निगाह डालते ठहर गए।    

समंदर की औसत सतह से ८५० मीटर ऊंचाई पर, कुदरत नाम की चट्टान पर तामीर किला और उस पर फड़फड़ाता लाल परचम दिखता। इस किले के बनने से पहले यहां कांस्य युग की बसावट रहे होने का अंदाज़ा लगाया जाता है।  इसके एक हिस्से से साढ़े सात हज़ार से छब्बीस सौ पचास बरस पहले तक के सुबूत हासिल होने की बात भी कही जाती है। पहलम पहल रोमन राज में आज से करीबन १७००-१८०० बरस पहले आस पास के इलाके की निगहबानी के लिए यहां एक टावर बनाया गया। इसके बाद इसका दायरा आगे आगे बढ़ता गया । बारह मीनारों और बुर्ज़ियों वाले इस किले की परिधि १२०० मीटर और व्यास परिधि वाले इस किले ने आज से तकरीबन चौदह सौ बरस पहले इसने आज की शक्ल पायी। इसके चारों ओर खींची गई ३० मीटर चौड़ी और दस मीटर गहरी खाई पार करने को बनाया गया अंदर की ओर उठने वाला इकलौता पुल। जिसे इस किले की कहानी ज़्यादा तफ्सील से जाननी हो इंटरनेट पर उड़ सकता है।



पहले वर्ल्ड वार की शुरुआत के वक्त १९१४ में तिरासी हज़ार आबादी वाले, ओटोमन हुकूमत के इस इंतिज़ामिया ठिकाने ने अपना अलहदा किरदार अदा किया। १९१९ में फ्रांसीसी फौजों ने यहाँ के बाशिंदों पर ज़ुल्म ढाने का सिलसिला चलाया तो औरतों, बच्चों और मर्दों सब ने गाज़ियाना तेवर अख्तियार कर उनके खिलाफ मुकाबले में उठ खड़े हुए। फ्रांसीसियों ने उनका ठिकाना घेर कर उनकी सप्लाई लाइन काट दी फिर भी १० माह से ज़्यादा अरसे तक लड़ते हुए ६३१७ गाज़िओं ने शहादत दे कर मोर्चा संभाले रखा लेकिन आखिरकार फरवरी १९२१ में मज़बूरन सरेंडर करना पड़ा, ज़ंग के डर से नहीं भूख से हार कर। यहां के लोगों की शहादत को इज़्ज़त फरमाते हुए टर्की की नेशनल एसेंबली ने इनके शहर के पुराने नाम ऐंटेप को बदल कर आठ फरवरी १९२१ को नये नाम गाज़िआन टेप (सूरमाओं का शहर) से नवाज़ा।  मार्च १९२१ में ही एक टर्किश वज़ीर ने लन्दन में फ्रेंच नुमाइंदों से मिल कर सुलह की पेशकश की, जो आगे चल कर अंकारा सुलहनामे के नाम से जाना गया, नतीज़तन दिसम्बर १९२१ में इन्हे फिर से आज़ादी मिली। तुर्कियों के सालार-ए-जंग कमाल अतातुर्क ने बड़े नाज़ से बयान दिया - 'हर एक तुर्की शहर, हर एक कस्बे, यहां तक कि छोटे से छोटे तुर्की गाँव को यहां के लोगों को अपना गाज़ी (हीरो) कुबूल करना चाहिए'। तुर्की जम्हूरियत कायम करने के बाद जब वे २६ जनवरी १९३३ में यहां आए और २७ जनवरी को गाज़िआन टेप की सिटी काउन्सिल ने उन्हें बाकायदा रजिस्टर्ड गाज़िआनी शहरी बनाने का एलान कर दिया।













किले की कहानी के पहलू ज़ज़्ब करते शहर की गलियों के बीच से बढ़ कर पाशा हमाम का दरवाज़ा देखा, ज़ियारत देखी, करीने से सजी दूकानों पर इक्का दुक्का गाहक, बेंच पर बैठे शहरी, जगमग बाज़ार, यहूदियों का 'सिनेगाग' देखा।

शोर मचाते तेज़ रफ़्तार से भागते बाइकर्स की सड़क पर निकली टोली, रौशनी से सराबोर चांदी - ताम्बे के बर्तनों और दूसरे सामनों से भरे ख़ास टर्की अंदाज़ का बाज़ार देखा। बाज़ार का नाम - ALMACI PAZARI पढ़ कर एक बार फिर मुस्कुराया, एक और लफ्ज़ हाथ आया, Pazari का मतलब होना चाहिए पज़ारी या बाज़ार !!!!





आसमान में चक्कर लगाते कबूतरों के झुण्ड, छज्जे पर कतार में बैठे कबूतर, अपने शहर के छज्जे और कबूतर और बचपन के दिन खूब याद आए, हमने भी तब पाले थे  - लक्का, शिराज़ी, सिलेटी, टिकोलिया, लोटन, तरह तरह के कबूतर।

शाम ढलते एक सरायनुमा रेस्तौरेंट में खाने के दौर के साथ लम्बी लम्बी तकरीरों का सिलसिला चला। शहर के मेयर, प्रोफेसर बकीर और बाक़ी के ख़ास शख़्शों ने कोल्ड ड्रिंक के घूँट भरते अपनी तहज़ीब और भाई चारे के कसीदे पढ़े। बाकी के लोग बाग़ टूट कर खाने पर टूटे। खाने का हुनर और तलब कोई तुर्कों से सीखे। हैरत हुई कि अभी तो अपना दो पहर का खाया हज़म नहीं हुआ, आखिर, इन्हे इतनी भूख कहाँ से लग गई।





अंकारा की उड़ान का वक्त हो गया, लगाने लगा अब वक्त पर जहाज़ मिलेगा भी या नहीं लेकिन खाने और तक़रीर देने वाले फिर भी नहीं अघाए। धकेले गए तब कहीं बस में सवार हो कर हवाई अड्डे पहुंचे।  भला हो चेम और मसूद का जिनके चलते चटपट बोर्डिंग की ज़रूरते पूरी हुईं।

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बकिया आगे