Monday, January 31, 2011

पाती आती जाती है


पातीआती जाती

राकेश तिवारी

एक

हाल-चाल लिखने को पाती, सुख-दुख में लिखते हैं पाती.
आये दिन लिखते हैं पाती, मन ऊबा तो लिख दी पाती,
नया देख कुछ लिखते पाती, दूर गए तो लिख ली पाती.
मन के भाव बताती है, पाती आती जाती है.

जिनके बलम गए परदेश, उनकी पाती आती है.
दरवाज़े पर दस्तक हो तो दौड़ के नीचे आती है.
डाक लगाने वाले की आहट पहचानी जाती है.
पाती कितनी प्यारी है, पाती आती जाती है.

पढ़ना लिखना जिसे आवे देवरा से बंचवाती है.
थोड़ा लिखना अधिक समझना सुन कर रोती जाती है
बाबू को परनाम सुनाना, मुनुवा की अम्मा को सुमिरन,
कान लगाए सुनती हैपाती आती जाती है.

 उत्तर पठ्वाने जब बैठीभीगी आँख लिखाती है.
लिख देना, अबकी आना तो ऊनी कपड़ा लाना है.
बाबू को ठंढी लगती है, बबुनी ठरती रहती है.
हमको भी है शीत सतातीपाती आती जाती है.

चाहत में डूबे जन को यह पाती राह तकाती है
पोस्ट बाक्स में मिले नहीं तो कितना ये तड़पाती है.
बिना डाक बढ़ जाए डाकिया, सांस हलक में अटती है
पाती प्यास बढ़ाती है, पाती आती जाती है.

आज गई, कल भी आये, आस बराबर रहती है.
एक लिखी डिब्बे में डाली, अगली लिखने लगती है.
काले-काले हरफों में से उनकी सूरत दिखती है.
दोपहरी में आती है, पाती आती जाती है

हास्टल में रहने वालों में जिनकी पाती आती है.
आते-जाते दरवाज़े के नीचे तक झंकवाती है.
कई दिनों तक आए ना पाती नब्ज़ का रेट बढ़ाती है.
पाती बहुत छकाती है, पाती आती जाती है.

पोस्टमैन से ज़िरह कराती, पोस्ट आफिस दौडाती है,
पोस्टमैन के बगल बिठा कर पाती वह छंटवाती  है,
पाती उन्हें हंसाती जितना उतना ही रुलवाती है,
दिल वालों की पाती है, पाती आती जाती है.

बेटा पढ़ने चला गया, बिटिया चली गई ससुराल,
माँ का हाल हुआ बेहाल, अंसुअन पाती लिखती है.
तुलसी चौरा की माटी उस पर थोड़ी  लगवाती है.
घर घर की है यही कहानी, पाती आती जाती है.

समय से सोना, समय से उठना, समय से खाना खा लेना,
ये कर लेना, वो कर लेना, थोड़ी अपनी फिकर भी रखना,
क्या बतलाऊँ मेरे अन्दर कैसी कलछी चलती है.
यह तो माँ की ममता है, पाती आती जाती है

सीमा पर रह रहे जवानों को यह बहुत सुहाती है.
घर की खुशबू में डूबी ख़बरें उन तक ले जाती है.
माँ की ममता, प्यार प्रिया की संवाहक बन आती है
पाती नेह जगाती हैपाती आती जाती है.
 पाती आती जाती है.


दो

बहुत दिनों की बात पुरानी, पाती तब भी जाती थी.
इस चौकी से उस चौकी तक, वाहक के संग जाती थी.
पाती यदि राजा की होती, घुड़सवार पहुंचाते थे.
कुसुमपुरी से तक्षशिला तक पाती आती जाती थी.

प्रेम विवाह करा कर पाती भूपों को मिलवाती थी.
कूटनीति रचवाती थीपाती युद्ध कराती थी
पाती अपनी ताकत की झंडी ऊंची फहराती थी.
पाती  की पहुँच करारी थी, पाती आती जाती थी. 

रीति काल की अलस नायिका अपने ढब से लिखती थी.
 जब तक उतरैं कागद पर आखर, सूखत स्याही जाती थी.
हाथ के ताप से झुलसी होती, नयन-नीर से गल जाती
बिना लिखी भी बांची जाती, पाती आती जाती थी.

लिखत बिहारी सतसैया में, प्रिय की पाती पाते ही:
"कर लै, चूमि, चढ़ाइ सिर, उर लगाइ, भुज भेटि.
लहि पाती पिय की लखति, बांचति, धरति समेटि."
प्रीति की रीति अनोखी थी, पाती आती जाती थी

एक समय था सधे कबूतर पाती लेकर उड़ते थे.
प्रेम पगे लोगों की धड़कन कंठ बंधा ले जाते थे.  
उनकी राह देखने वाले छत पर जोहा करते थे.
कितनी हिकमत से यारों की पाती आती जाती थी.

कुछ ही दिन बीते हरकारे जब पाती ले कर चलते थे.
घुंघुरू साजी लाठी पर पाती के झोले ढोते थे.
झुनझुनिया के बोल सुनाते दुलकी दौड़ लगाते थे.
उनके कांधों पर चढ़-चढ़ कर पाती आती जाती थी

हल्दी लगी जो आती पाती, खुशखबरी ले आती थी.
जनम, जनेऊ, मूडन का, शादी का न्योता लाती थी,
साइत, समय तिथियों का, ब्योरा भी बतलाती थी.
पाती शगुन कराती थी, पाती आती जाती थी.

डाकिया अगर दुख भरी खबर की पाती ले कर आता था.
टूटे कोने की पाती वह आस पास दे जाता था.
 पाने वाले तक वह पातीताऊ सयाने लाते थे, धीरज उसे बंधाते थे.
पाती शोक कटाती थी, पाती आती जाती थी

उस टोले के  कुछ लड़के पहुंचे हुए खिलाड़ी थे.
सुंदरियों की छत के ऊपर कनकैया उडवाते थे.
सही समय पर पेंच मार खुद ही उसको कटवाते थे
कनकैया में अटकी उनकी पाती आती जाती थी

बड़े लोग जो लिखते पाती, सनद वक्त की बनती है.
बड़े-बड़े बाज़ारों में बोली उनकी लगती है.
कभी-कभी तो गिनो हज़ारों डालर में वो बिकती है.
उनके पहलू दिखलाती है, पाती आती जाती है.

नेहरू जी ने लिखी जो पाती, आज भी बांची जाती है.
क्रांतिवीर बिस्मिल की पाती अब भी गायी जाती है.
जोर बाजुओं में था कितना हमको आज बताती है.
पाती क्रान्ति कराती है, पाती आती जाती है.

जो सहेज कर रखता पाती, बीते पल पा सकता है.
निजी समय में पलट के पाती, सुधियों में जी सकता है.
बहुत पुराने प्यारे-प्यारे लमहों में दुलराती है.
झूले के पेंगों के जैसी, पाती आती जाती है
पाती आती जाती है
तीन
पाती हर घर आती है, पाती मन बहलाती है
नए दौर में नए चलन की पाती अब भी आती है
वायुवेग से आती है, अन्तरिक्ष से जाती है.
नए किस्म की पाती है, पाती आती जाती है .

दर्शन-दूर, 'एफ एम्' पर, पाती प्रतिदिन आती है.
गाँव-शहर के लोगों के मन के गाने सुनवाती है.
'टी वी सेट' पर ट्रांजिस्टर पर आँख-कान लगवाती है.
"अब तुम लौट के मत जाना", पाती आती जाती है

'एस एम् एस' से आती पाती, 'इन्टरनेट' से जाती है.
आज की पाती 'एब्स्ट्रैकट' है, कूट लिपी में आती है.
'समरी' में समझाती है, आर को 'r' लिखाती है.
ग्रेट को '8' बनाती है, पाती आती जाती है.

'आरकूट' पर 'फेस बुकों' पर पाती अब भी आती है.
तस्वीर लगा कर औरों की यह कभी-कभी भरमाती है.
बिना मिले बिन ठीक से जाने, नाते यह बनवाती है.
दूर देश से आती है, पाती आती जाती है.

सात समनदर के आगे से फ्रेंड बना कर लाती है.
भूलों को मिलवाती है, बिसरों को याद कराती है
नए ज़माने की पाती, मधुमाल गूंथती आती है.
बड़े मज़े की पाती है, पाती आती जाती है.

पाती तो है अजर अमर, इसकी गाथा है अनत अकथ.
पाती तो है विश्वरूप, यह सारे जग में चलती है.
कलम की ज़द से बाहर है, पाती आती जाती है
पाती आती जाती है

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11-17 January 2011