Monday, May 11, 2015

पवन ऐसा डोलै : छह

टोना है, टोम्मार है

संझा ढले गुदरी हमें पास की कोल-बस्ती में ले गया, झाड़-फूंक दिखाने। 
लपट फेंकती आग में रह-रह कर फेंके जा रहे लोबान से ढेरों धुंआ उठ रहा था। 
ओझा आग के पास उकडू बैठ गया। उसकी मुंदी- मुंदी आँखे आत्मलीन हो गईं। 

इस इलाके में अस्पताल तक कम ही लोग जाते हैं। कैसा भी दरद हो सलाई का लासा राम बाण। गरम पानी के साथ एक टुकडा निगलते ही दरद कटने लगता है। और कोई बीमारी आई तो समझ लिया देवता उतरे, बरम बाबा चढ़े या चुड़ैल की सवारी है, फिर, बुलाए जाते हैं ओझा, भूत-परेत उतारने के लिए। 

ओझा बुदबुदाने लगा - 
                   'टोना है, टोम्मार है ?
                   लाए हैं, लगाए हैं ?
                   पेचे है, पचाए है ? ---'
ओझा की मूडी ख़ास अंदाज़ में डोलने लगी। 
बीमार की सूरत और ज़र्द पद गई। 
ओझा की आवाज़ अचानक एक ठनक के साथ चढ़ चली -
                  'गली है, धार है ?        
                  नजर-दीठ, मूठ -मसान ?
                  अजियौरे के है, कि ननिऔरे के है ??
ओझा ठंढे सवाल उछालने लगा, भूत-परेत, देवी-देवता जो भी हो कहाँ से आया ? रास्ते से लग लिया या कि गलियारे से, मसान से आया या किसी ने मूठ चलाया ? आजी के घर से आया या ननिहाल से?

लोबान का धुआं घनेरा हो उठा। ढोल की धमक ऊंची होने लगी। बीमार एकदम मौन हो गया। 
ओझा अचानक बमक पड़ा, ढोल की थाप हलकी हो गई -
                   'जात है ? या परजात है ?
                   जनाना है कि मरदाना ?
                   कवन रूप? कवन बदन ?
                   गौरा-पार्वती क दुहाई -इ- इ-----------

ओझा धरती पर लोटने लगा। 
हवा के साथ आग की लपटें लपलपा गईं। भूत-परेत जवाब नहीं दे रहे थे। 
फिर, जब बोले तो बीमार के मुंह से - वो अभुआने लगा। 
ओझा ने अपने ढब से पूछा - कैसे पिंड छोड़ोगे ? बीमार नाक से मिमियाया - 
                   'घेंटा लेब, ---- मुर्गा लेब, ----- शराब लेब, ------ सीनुर लेब, -
                   ---- चूड़ी लेब, ----- चुनरी लेब ------'

महुआ का सुआद लेते गिरते-पड़ते ओझा ने सब चढ़वाया  - घेंटा, मुर्गा, शराब, सिन्दूर, चूड़ी-चुनरी ---- । 
बीमार का अभुआना धीरे धीरे मंद और फिर बंद हो गया। 
मान लिया गया कि अब जो भी चढ़ा रहा, भूत-परेत, अलाय-बलाय, सबसे मुक्ति मिली। 
बीमारी हलकी भई तो आप ही चली जाएगी, भारी पड़ी तो मरीज़ गया।  

दुसरे दिन इस उड़ान की डोरी चुक गई। चोपन से चली एक बस में सवार हो कर बनारस के लिए रवाना हो गए, दोबारा इसी इलाके में लौटने और गुदरी से सुने  राजा का बैठका, दुआरा घाट, शिव दुआर, सीता का कोहबर जैसी बहुत सी जगहों को देख पाने की हसरत मन में बसाए।   

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पहला अध्याय समाप्त हुआ 

पवन ऐसा डोलै : पांच

छानै फूंकै बदे 


अगोरीगोरी किले के पश्चिम में घूमती पहाड़ी के उस पार चतरवार, जोगइल, भरहरी और कोरारी के किस्से सुने।  

फिर, सामने देखते रहे उधर पूरब में गोठानी गाँव के मंदिरों के शिखर और उसके पूरब सोन के चौड़े पाट में समाती रेणु या रिहंद नदी की धारा और इधर उत्तर दिशा के उस पार फैले खेतों से सोन की छितरी हुई छोटी बड़ी धाराओं और सुनहरे सैकत विस्तार को पार कर  इस पार आने वालों की अटूट कतार - आदमी-औरत, बूढ़े और बच्चे, झोलों में या कोरे हाथों में बोतलें संभाले।  

हम सोचने लगे इतने लोगों का रेला यूं सोन की धारा पार कर इधर क्यों चला आ रहा है।  पूछा तो रूदन ने बताया - 

'यह सब एह पार की दारू ठेकी का परताप बा। नहीं तो इहां चिरइयौ पर ना मारै। 
गाँव वालों को नाज-कपड़ा और गुड़-चीनी तो ठीक से नहीं मिलती लेकिन उनसे भी ज़्यादा उन्हें ज़रुरत है दारू की।  
बड़े तो बड़े, बच्चे भी नदी हेल कर इस पार आते हैं अपने माई बाबू के लिए दारू की बोतल लेने। एही चक्कर में कब उहौ दारू की गिरफ्त में लोटै लागै लें, पतै नहिनी।   
पहिले तो इन कर बाप महतारी अगोरी राज की चाकरी में ताबेदारी किए, अब ई सब ठेका-ठेकी कै चाकरी में जियत हउवैं।'
अगोरी से लौटते हमने भी सोन पार किया, धारा में हेल कर नहीं, पहले की तरह नाव से और चल पड़े 'अगोरी ख़ास' स्टेशन के गुदरी के ठिकाने की ओर।

लौटते पैंडे पर खेतों में साग खोटती लाल-हरे लुग्गे वाली अल्हड़ बालाओं ने फोटो खिंचवाने की ज़िद के साथ घेर लिया। गोल-गोल ताम्बिया सूरत, अमोली काली आँखों, भरे अधर और भरे-भरे बदन वाली गुटकी सुन्दरियों और नन्हे-नन्हे पीले-पीले सरसों के फूल टंके हरियाले खेतों में क्या दिलकश ताल-मेल दिखा।  

ज़्यादा चलने की आदत न होने की वजह से चढ़ते-उतरते थकने लगे, जाड़े में भी गला सूख गया।  
ठहर कर गाँव वालों से पानी माँगा तो बड़ों के इशारे पर एक ठे रेंगवा (बच्चा) दौड़ कर इनरा (गाँव) से बाल्टी भर पानी भर लाया।  
गुड़ की एक-एक ढेली के साथ लोटा भर पानी पा कर तरावट पायी।  

चलने लगे तो एक बूढ़े ने  सवाल किया - 'का हो बचवा ! अगोरी गइल रहल्या छानै-फूंकै बदे ?' 

दूर दराज के सैलानी और सुधीजन भले ही अगोरी के इतिहास-पुराण, कथा-कहानी, राजा-रानी में ध्यान रमाते हों, आस -पास के गांवों में तो, लोरिका-मंजरी-चनवा की लोक-गाथा लोरिकायन के अलावा, इसकी शोहरत छानै-फूंकै बदे ही रह गई है। 

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कल की कल     

पवन ऐसा डोलै: चार

रानी एही चौतरा पर ---

अगले दिन सोन पार उतर कर अगोरी की ओर डोल गए। ऊंचे सिंहद्वार पर सिंहवाहिनी दुर्गा। भीतर, जहां-तहां बढ़ चले झाड-गाछ-लतरें, ढही दीवारें, छितरी ईंटें, आगारों की ध्वस्त छतें और तिलिस्मी खजाने की खोज में पास-पड़ोसियों द्वारा फर्श पर खने गए गढे। इनके बीच रास्ता बनाते पश्चिमी सिरे की अधगिरी दीवार के सहारे बची रह गई छत पर जा बैठे। 

पीछे किले की दीवार से सोन तट तक को छूती चापाकार पर्वत श्रेंणी, अगले सिरे से सटे सोन के सुनहरे पाट पर सजी चमकीली धारा, ओ पार गहरी हरियाली के बीच फूली पीली सरसों। 

कुछ गयार-भैंसवार टहलते हुए किले के भीतर आए। एक काली बड़ी नाव से सवारियां उतरती रहीं। उतराई का पैसा ना चुका पाने वाले और सिर पर जलावन धरे औरतें पंजिया हेल कर नदी पार करते दिखे। एक बगल ऊंटों की कतार।  



बगल से गुजरे लम्बे, खासे कढ़े, मजबूत, पतली मूंछ वाले गयार ने बरबस हमारा ध्यान खींचा। लम्बी खुली कमीज़ और घुटनों तक चढी धोती में बड़ा जंच रहा था। टूटे कंगूरों पर चढ़ा, ढही प्राचीरों से उतरा, गिरते-गिरते लडखड़ा कर संभला। फिर, बीच के बड़े चौतरे पर पसर कर मुक्त भाव से अलापने लगा - "रानी एही चौतरा पै बैठल रहलीं ना -आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-----।"  

थोड़ी ही देर में एक और फक्कड़ जवान 'रूदन खरवार' भी वहाँ आ जुटा। चुटकी भर तमाखू ओंठों में दबा कर पूरब दिशा में खेतों में बिखरे प्रस्तर-पट्टों  की ओर अंगुली उठा कर बताने लगा-

"सामने के खंड़हर की जगह कभी 'महरा' की बखरी रही। एतना धनी, बली ओ  समरथ कि अकेले अगोरी-राज बरब्बर।
एक बारी राजा अगोरी अपने राज में टहरै बदे निकरलन। 
'महरा' अपनी बखरी में सोना की चौकी पर जमल रहल, राजा के ओरी देखबौ न कईलस। 
राजा दू-एक बार खंखारलस तब्बौ नाहीं।
राजा ने महल में लौट कर सिपाही भेज कर 'महरा' के बुलाय कै कौड़ी खेलै के दांव फेंकलस - हम दुन्नो हई बरब्बर बकी राजा 
तो एक्के रही दुन्नो में से, जे जीतै, ओही रहै।

'महरा' मान गइल। राजा बिराजै राजगद्दी पै, ओ 'महरा' कथरी पर। 
कौड़ी फेंकावै लागल खड़ाभड़। 
घोड़ा-घुड्शाल, हाथी-हथिसार, घटिहटा गाँव, अगोरी पाल, किला-दरबार, राजा की गद्दी।
एक पै एक, महरा कुल जीततै गईल। 
राजा कान पकरि के निच्चे ओ 'महरा' चढ़ल सिंहासन उप्पर।

राजा मुंह लटकाए बन में चलल। राह में भेष रखवले बरह्मा मिल गइलन। राजा के लिलारे पै लिखल तुरतै बांच के बतउलें - वापिस अगोरी जाओ, साहोकार से धन उधारी जुटा के फिर से कौड़ी खेल़ौ, राज-पाट वापिस पाय जउब्या।  

अबकी 'महरा' सिंहासन पर ओ राजा कुश की कथरी पर। फिन फेकावै लागल कौड़ी - घोड़ा-घुड्शाल, हाथी-हथिसार, घटिहटा गाँव, अगोरी पाल,  किला-दरबार, राजा की गद्दी। एक पै एक, राजा जिततै चलल। 
सब जीत कै आखिरी दांव में 'महरिन' कै कोखवौ ओकर हो गइल - लइका भया तो घुडसाल में सईस, ओ लइकी भई तो रनिवास में दासी। 

महरिन के कोख से एक-एक कर छह कन्या जनमतै राजा के रनिवास गईं। 
सतवीं कै जनमले दिग-दिगंत में परकास फैल गया, पहरन सोना बरसा। 
महरिन के कहे उसका भाई 'सोबाचन'  नेग देवै बदे सेर भर सोना गंठियाय कै, नाल-छेदन बदे, नोना चमाइन के ली-आवै दौड़ल। 
बकी मौक़ा लउक कै नोनवौ तमक गइल - सतवंती कन्या जनमल हौ पालकी-कहार ली आवा तब्बै चलब। वो भी आया तो सोलह नाहीं बत्तीस सिंगार किए, चार चार अंगुल पै सोना कै तार जड़ल चटकत दखिनिही साड़ी पहरि कै चलल।   
सतवंती कन्या जनमल रहल, सोना के कटारी से नाल कटल। 
राजा सुनलस तो इहौ कन्या के महल में ली आवै लपकल। 
महरिन ने बड़ा दुःख पाया था, अब तक जनमते ही छह कन्याएं छिन चुकी थीं। इस बार चातुरी बानी बोली - 'इसे ले कर आप क्या करेंगे महाराज! माता का दूध पिलाया तो बहिन, बहिन का पिलाया तो भएनी, और, रानी का पिलाया तो पुत्री। फिर, आप इसका भोग कैसे करेंगे, महाराज ? मेरा दूध पिएगी तो जल्दी युवती होगी। किसी अहीर से ब्याह देंगे, हमारा धरम रह जाएगा। फिर, आप बल पूर्वक उसे अपने रनिवास में रख लीजिएगा।'
ई बात राजा के जंच गइल। 

कन्या के नाम धराइल 'मंजरी।' दिन दूना, रात चौगुना बढी। अनिन्न सुन्नरी निकरी। उसकी सुन्दरता की खबर पंख लगाए चौतरफा उड़ चली। अगोरी के राजा 'मुलागत' ने सुना तो उसे पाने को अकुलाया।

'मंजरी', जनम कै बिलक्षण। राजा को वारने को राजी नहीं और राजा से लड़ कर उससे ब्याह करे तो कौन? राजा से ठान कर धरती-आकाश-ओ-पाताल में रहत तो कहाँ ? 

ओहर 'गौरा गाँव' में रहा ए गो अहीर, नाम धराइल रहल 'लोरिक'। बेहिसाब साहस ओ ताकत कै धनी। जे ओसे टकराए, ढहि जाए। एक बारी 'सोन' ओ लोरिक में ठन गइल। कन्डाकोट पहाड़ से पाथल लाए कै लोरिका सोन कै धारा पाट देहेलस। आवाज़ लगाए तो बादर थर्राए, कदम धरे धरती धमके, एककै परग में सोन छलांग जाए। 

लोरिका कै करतब मंजरी लै पहुंचल तो मनै मन नेह जागल। साध उठल कि ओही से बियाह करब। लोरिका के पता चला तो बारात लै के अगोरी आ  
धमकल, ओ तलवार कै दम पर डोला लेवाए गइल। केकर बल जो लोहा ले ओसे। 
बकी, मारकुंडी घाटी पार करते-करते मंजरी ने लोरिका की परीछा लेने की गरज से लोरिका को ललकारा कि सामने की चट्टान तलवार के एककै वार में काटा त जानी तोके ? लोरिका की तलवार वज्र सी चली, चट्टान का एक हिस्सा गिर गया, दूसरा जस का तस रहा, दूर तक चिंगारी चटक गई।  

अब मंजरी ने दूसरी चुनौती रख दी - ऐसन कटे कि जस के तस खडी रहे।
लोरिका उहौ कै के देखाय देहलस। 
दो फांक कटल ऊ चट्टान आजऊ खडी बा उहाँ, लोरिका पाथल के नाम से पूजल जा ली। सीनुर फूटा ला ओसे। शादी के बाद सब दुलहिन ऊ सीनुर माथे धरैं ली, लम्मा सुहाग बदे ।'


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कल की कल

पवन ऐसा डोलै: तीन

'कोलवा' 
 
पक्की सड़क की बगल से थोड़ी दूर बढ़ कर एक पैंड़ा छिछली घाटी से हो कर 'खोड़वा या मूड़ा पहाड़' की तलहटी में उतर गया। 

थोड़े ही फासले पर बलखाती घग्घर नदी की पतली धारा मिली। पानी घुटनों से ज़्यादा नहीं, पीली रेत और मोरंग और गोल पत्थर, किनारों पर ऊंची पीली घास, पलाश और इक्के-दुक्के सलई, सेमल, बबूल के गाछ, उलटे काँटों वाली अईलाइन, मकोइया, करौंदा और बांस के झाड़। 

गुदरी धीरे-धीरे बोला - "बन कहाँ रहि गइल अब, बहूत दीन बित्तल एक ठे कोल इहाँ बाघे से लड़ल रहल।" फिर अपनी ही रौ में जैसे जैसे पूरा खिस्सा सुनाता गया हमारे मुंह खुले के खुले रह गए –

'अबहिन तो ओकर रेख उठान पर रही बकी सीना चाकल हो चलल रहा। तनिकौ न डेराय। 
टांगी धरे बन में धंसल चला जाय। लौटानी बेरा काँधे पर रहै भारी जलावन कै बंहगर, मचर मचर लचकत चलि आवै। 
दुन्नों कंधा तब्बै चढ़ल रहलन, फूलल गुम्मड़ एस। 
एक् बारी जलावन जुटावै बदे टांगी सम्हारे यही घघ्घर लै चहुँपल तौ घनी बंसवारी के ओ पार कुछौ डौनकल। 
ऊ सोंचलस - घेंटा1 हौ ??? 
एक्कड़ हौ शायद  ???? 
कोलवा घूम कै अडि  गइल, हाथे में टांगी तय्यार ।          
देखतै देखत झाड़ के पीछे से घेंटा नाहीं !!!!! झपटत बाघ निकरल। औ कोलवा जब ले संभरै एक्कै बार में ऐसन पंजा मरलस कि सगरौ सीना लहू लुहान। 
बघवा अगाडी झाड़ तक रपटि कै लौट पड़ल। 
एहर कोलवौ तमतमान रहा। 
जउने धरती-पानी-बतास पै बघवा पला रहा, ओही पर कोलवौ। 
एक्कै बन के दू गो बीरन में खूब ठनल। 
बघवा कुछ दूरी तक नज़िकाए के ठिठक गइल। 
कोलवा बाघे पर आंखी गड़ाए दुन्नो हाथे टांगी तनले रहल। 
बघवौ ओकरे ई तेवर पर हैरान, तनिकै झिझकल कि कोलवा बगली पैंतरा बदलि कै बघवा कै माथे पर बल भर टांगी हौंक देहलस। ओही के साथे बघवौ कुद्दल, झपाका खाइल कोलवा दूर फेंकाय गइल। 
टांगी कै घाव गहिरा रहा, बघवा थोडिकै दूरी पै ढहि परल। 
कोलवा उठि कै सोझै बघवा के टेंटा दबावै के फेरा में बांहे में धै लेहलस, बकी बघवा ओकर पंजा जबड़ा में भींच लेहलस। 
खींचातानी में कोलवा कै पंजा फट कै लटक गइल। 
अब तौ आव ना ताव बस दै टांगी, दै टांगी, मानो मोट विजयशाल काटत रहा। बकी इतना लोहू बहा कि उहौ ओहीं लग्गे ढेर । 
बाघ ओ कोलवा दुन्नो अस्पताल चहुंपावल गइलन।"

दो में से एक ही बाघ बन में लौटा, दो पैरों वाला ‘कालजई कोल’। 

घघ्घर से कुछ ही दूर आगे बूढ़ी काया और वजनी टांगी संभाले सूखी जलावन बटोरता मिला। इस उमर में भी उसके चौड़े सीने की खिंची त्वचा पर बघनख के गहरे निशान साफ़ दिखे और बिना अस्थियों वाली हाथ की अंगुलियाँ पोली पोली।  

खोड़वा के टॉप तक सीधी चढ़ाई पर घनी बंसवारी में उलझते किसी तरह एक-एक कदम धरते गुदरी की तेज़ी को सराहते रहे। आखिर गिरते पड़ते रास्ता टटोलते पहाड़ के सबसे ऊंचे सिरे मूड़ा की मूड़ी पर पहुँच कर मंदिर के किनारे लस्त-पस्त लुढ़क गए। थोड़ा आराम कर के जब नीचे के विहंगम दृश्य पर नज़र पड़ी तो सामने फैली दृश्यावली ने अवाक कर दिया। हरियाली के बीच बीच चमकता पानी, घाटी के पार घेरा बनाती कंडाकोट, चनें मान वाली पहड़ी। मारकुंडी और सलखन।  

खोड़वा के ऊपर बहुत कुछ है देखने परखने को।  गुदरी ने बताया - केरवा, चिरुई, घोड़-मांगर, बिजयगढ, मऊ। चाह कर भी उधर जाने की हिम्मत नहीं की, सब देखने में कई कई दिन लग जाते। एक एक कर सब देखा लेकिन अगली उड़ानों में। आगे सुनाएंगे उनके हवाल भी। 
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१. घेंटा: जंगली सुअर, २. एक्कड़: समूह के नेतृत्त्व के लिए दो वन्य सुअरों में से हार कर समूह से निकाला गया सुअर।  

कल की कल     

पवन ऐसा डोलै: दो

गुदरी 

जिससे भी पता किया - आस-पास कहाँ-कहाँ क्या-क्या देखने लायक है? 
सब से एक ही जवाब मिला - "बिजयगढ़- अगोरी, - अ-लोरिका पाथल, औ कुछौ नहिनीं।"

छिटपुट बूंदा-बांदी में पिट्ठू संभाले रेलवे-लाइन धरे विजयगढ़ की ओर चलते बढ़ते भटक कर पहुँच गए 'मारकुंडी घाटी। 
गीली हो कर रपटउआ और नरम हो चली माटी जूतों में चमटियाने से भारी जूते खींचते 'अगोरी खास' स्टेशन के सूने प्लेट फ़ार्म के शेड के नीचे टिक रहे। 


माहौल में खामोशी उतर आई और बादल घने हो चले। चारों ओर नज़र की सीमाएं बनाती पहाड़ियां। उत्तर दिशा से चक्कर लगा कर लचक कर घाटी में उतरती चमचमाती सड़क। दूर सोन के पसरे सुनहरे पाट पर धुंधली धारा, दक्खिन से उतर कर उसमें मिलती रेणू और बीजुल की धाराएं। चोपन का कस्बा। उधर सामने उठा ऊंचा 'मूड़ा पहाड़'. ठेठ पूरब में गुरमा खदान, खुली जेल, और पथर-ढोवना रोप-वे की खड़खड़ाती चढ़ती उतरती ट्रालियां। खदान से उठती ख़ामोशी तोड़ती डाइनामाईट की आवाज़। सालखन की चूना भट्टियों की धुंआ उगलती चिमनियाँ। खेत और छोटी बस्तियों के पार वनैली हरियाली।

थोड़ी ही देर में मतवाले हाथियों जैसे बादल घिरे ठंसे फिर फट पड़े। बड़ी-बड़ी बूँदें लाल पीली धरती पर टपाटप टकराने लगीं। हम अपना छोटा नाइलोन का टेंट तान उसके भीतर घुस कर बाहर का नज़ारा देखते रहे। अन्धेरा घिरते-घिरते रेल विभाग के दो तीन आदमी जुट आए। बोले - "घर रहले, एह बरसात में निरल्ले में क्यों रुकेंगे।" और, हमारा सारा असबाब अपने एक साथी 'गुदरी' की कोठरी में संजो दिया।

लम्बी दाढी, झुके बदन, गहरे काले वर्ण और मझोले कद-काठी वाले गुदरी की आवाज़ में  शहद और आग्रह में गह्रराई, कोठरी छोटी लेकिन दिल बहुतै बड़ा। फ़टाफ़ट बिछौना बिछाते तो उनकी बांहों की मछलियाँ फिसलती दिखतीं। गरम दाल, चूल्हे की आंच में फूली रोटियाँ और आलू का चोखा।   

थकान के मारे कब सो गए पता ही नहीं चला। जागे तो गुदरी कथरी ओढ़े कौड़ा तापते दिखे। बाहर सब गीला-गीला और गलन भरी ठंढक, छत के किनारों और पेड़ से टपकती बूँदें । खेत की हरी बालों के महीन रेशों और सरसों के नन्हे पीले फूलों और घास पर छितरे पारे सी बिखरी चमचमाती बूंदें। गुदरी ने सामने खड़े मूड़ा पहाड़ के खोंड़हर जैसे मुड़े खोड़वा पहाड़ के किस्से सुनाए तो वहाँ तक जाने की मौज आ गई। 
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कल की कल

पवन ऐसा डोलै

एक


रफ़्तार से भागती रेलगाड़ी खटाखट चोपन की ओर बढ़ी जा रही थी। कुंवर सामने की बर्थ पर खर्राटे भर रहे थे। किन्ही साहबान ने अचानक डिब्बे का दरवाज़ा खोल दिया, गलन भरी हवा का झोंका एकबारगी भीतर घुस आया। कम्बल रजाई में लिपटी सवारियां गुड़मुड़ा कर गठरी बन गईं। स्लीपिंग-बैग की चेन मुंह तक चढ़ा कर मैंने करवट बदली। आँखों में नींद नहीं उतर रही थी। उत्तरी विन्ध्य का यह इलाका मुझे बड़ा प्यारा मुकाम रहा है। एक बार फिर उधर बढ्ते हुए पुरानी यादें बरसाती बादलों जैसी घुमडती चली आ रही थीं। 

बीस बरस की उमर में, १९७३ की ऎसी ही एक ठिठुरन भरी आधी रात में, चलते ट्रक के डाले पर सिकुड़े हुए हम रह-रह कर कम्बल लपेटते किसी तरह सर्दी झेल रहे थे। 
थरथराती शीत-लहरी से परलोक सिधारने वालों की खबरें रोज़ ही अखबारों पर चढ़ने के बाद भी आवारा हवा सा घूमने का नशा तब भी माथे पर चढ़ कर बोल रहा था । तैयारी में लगा तो पन्दरह बरस के अजय भी साथ लग लिए। सर्दी का हवाला दे कर उन्हें बरजने की बहुत कोशिश की - 'बड़ी ठंढ है, ऐसे में तुम कहाँ चलोगे, जाओ माँ से पूछ कर आओ।" 

अजय बोले - "नहीं रोकेंगी, आप कहिएगा तो।" 

अब पूछूं भी मैं ही, जानते थे मुझे ना नहीं सुननी पड़ेगी। 
मन ही मन सोचा, एक से भले दो, लेकिन उनकी माँ के सामने बड़े होने का फ़र्ज़ झाड़ा - "अजय भी चलने को कह रहे हैं इस सर्दी में।"
उधर से, उन्होंने गज़ब बनारसी दांव मारा "क्यों ? का भया ? सर्दी जैसे उसे लगेगी वैसे ही तुम्हे भी।"

फिर क्या था, झोरा-झंडा बटोरे गंगा पार कर हम दोनों रामनगर पहुंचे और वहाँ की चुनार की तरफ वाली चुंगी-चौकी पर सवारी जोहते रहे। 

'रापटगंज' की तरफ जाती एक ट्रक बैरियर पर थमी तो ड्राइवर की मनौनी कर ट्रक के डाले में लद लिए। 
जब चले और चलती ट्रक के ऊपर बर्फीली हवा की लहरियाँ काटने लगीं तब पता चला कि कहाँ फंसे। सुन्न हो चले हाथ-पाँव रगड़ते किसी तरह रात दो बजे चुर्क सीमेंट-फैक्टरी के सामने उतरे। 

वहीँ तिकोनिया पार्क में टेंट लगा कर स्लीपिंग बैग में घुसने का जतन कर रहे थे कि तभी कारखाने से निकले एक साहब जो हमारे उतरने के बाद से ही हमारी हरकतें तज्बीज रहे थे अकस्मात् बोल पड़े - "अरे ! इस सर्दी में यहाँ कहाँ कैसे रुकेगा हमारा साथ डेरा पर चलिए।" फिर बिना कुछ कहे हमारा सामान उठवा कर चल पड़े। 
हमारे भाग का छींका फूटा, ये साहबान पुराने सैलानी निकले। उतनी रत गए भी ब्रेड-मक्खन और गरम चाय छका कर गरम बिस्तर लगाया। 

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 कल की कल