Sunday, June 28, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४.६


परिगा बाघु ते पाला :  http://rakesh-tewari.blogspot.com/


अगोरी दुर्ग के भीतर चारों ओर बेतरतीब झाड़, ऊंचे-ऊंचे पेड़, उन पर लपटी लतरें। छतें ध्वस्त और दीवारें ढही हुई।  दाएं मुड़ते ही माधो सिंह का बनवाया माधो महल के आयताकार आँगन के किनारे ऊपर-नीचे आवासीय कक्ष। 

कुंवर सतर्क निगाहों से मुआइना करने लगे, बरामदे के स्तम्भों की सजावट निरखी, एक कक्ष में घुसे, दूसरे से निकले। उनके चेहरे पर कई कई रंग आते-जाते रहे।  अंगने में आ कर मेहराबों पर बनी फुल्लियों पर नजर लटकाए अटक गए।  फिर, मानो  हवा में से कुछ पकड़ कर धीमे धीमे बोलने लगे - 

'तोड़ेदार मेहराब नवाबी ज़माने में बनी।  ----- जान्यौ, ये हाथी एक सतर मा केत्ते सुंदर लागत आँय। --------------- कौनौ होशियार च्वार होई, समूच घुण्डी उतार लइगा, खरीदै वाला ड्राइंग रूम मा लगाइस होई। ऐसै हाथी और ऎसनै फुल्ली ग्वालियर के किल्यौ (किले) मा बनीं आंय। --------- हुंआ क्यार राजा बड़ा रहा और पैसौ ज़्यादा, बड़ा वास्तुकार लगाया। ------- हिंआ के राजा योजना तो  दुरुस्त बाँधिन मुला वास्तुकार ओत्ता बढ़िया नहीं मिला, माल मसाला भी ओत्ता बढ़िया नहीं।'



कुंवर घूम घूम कर बोलते रहे ----- 'हूँ, यहु बचिगा।  जान्यौ ! याकु बचिगै।  जान्यौ ! ----- यहु आय मोस्ट इम्पार्टेंट ।'  

माधो महल आगे, उत्तरी दीवार से सोन की ओर एक समानान्तर गैलरी जैसी मिली।  उसके सिरे पर एक बुर्ज के  बीच पानी का एक मात्र स्रोत एक बड़ा कुंआ।  गैलरी की पोख्ता दीवार - सात हाथ ऊंची, पांच हाथ मोटी। हम उस पर चढ़ कर उस पार के नज़ारे लखने लगे। पहाड़ों पर जंगल और सोन की सुनहरी चौरस रेत, चौरा-बिजौरा  झोपड़े, नदी किनारे से बढ़ता लहरियादार मटियाला पैंड़ा, खेतों में लहराते रंग-बिरंगे लूगे, चोपन  की ओर  उतरती पाल चढ़ी  बड़ी बड़ी नावें।  

हमें उतना ऊपर चढ़ा देख कुंवर घबड़ा गए - 'उतरौ हुंआ ते -------------  अरे, अरे तरे न झाँकौ।   झांकै पर झांई मार जात है। पत्ताय गयौ तो होइगा काम तमान। ------- चलो उतरौ नीचे।'

हम नीचे उतर आए तो इधर उधर टहल कर कुँअर ने निश्चिन्त भाव से फिर बोलना शुरू किया - 

'जान्यौ --------- किला के पुरबे आय नाला, खइया ख्वादै की ज़रुरत नहीं पड़ी, दहिनौ वहै नाला। उत्तर सोन औ पछूहैं जंगल पहाड़। दुश्मन आवै तो कहाँ ते ? नद्दी-नाला पर पहुंचे नहीं कि किला से चलै लाग गोली-बरूद-स्यान्ठा  मना-मन्न। -------------- सबते कमजोर हिस्सा आय कुंआ। कैसेहू जो दुश्मन  घेरा डारि के कुंआ कब्जियाए ले तो जानौ होइगै किला फतह। गोली-बरुद चलावै क जुगाड़ बाँधिन है ज़रूर मुला आय मामला फ़िस्सै  फिस्स।  ------- ऐसी कुंआ कब्जियाइन नहीं कि किला वाले आपुइ बिल्लाए जइहैं, पियासन हाथ ढील देहैं।'    

तभी झाड़ियों में कुछ खड़भड़ाया। आगे आगे चल रहे हनुमान ने चीख कर चेताया - 'बचिहा-अ-अ सा-अ-हब। '
उचक कर उधर देखा तो चार-पांच भूरे-भूरे जानवर भागते आते दिखे।  
हनुमान फिर से चीखा - 'बचिहा साहब, आवत बा-अ-अ !!!!!'
कुंवर बोल पड़े - 'बाघु, आजु असलियन आय गवा। '
भय और रोमांच एक साथ।  कुंवर ने गजब की फुर्ती से कुल्हाड़ी तान ली।  
खड़ - खड़, खड़ - खड़, खड़ - खड़, ----------------- 
छोटे-बड़े  मोटे बनैले वराह तेजी से लुढ़कते चले आए।  थूथुन के दोनों और निकली तीखी खीसें , हम सब पैंड़ा छोड़ कर अगल बगल कूद गए। उनकी सीध में आ जाते तो रानें चीर देते। 
वराह दल भरभरता हुआ नाक की सीध निकल गया।  हम सहमे खड़े रहे। एक बड़ा हादसा बगल से गुज़र गया। कुंवर बोले तो अपने में आए - 

'हम तो जानेन आजु परिगा बाघु ते पाला। -----------  हमका खबर नहीं, कब कुल्हरी ताना, कब तनि गएन।  -------- हम स्वांचा यू कुदिहै तो इत्तिर गिरिहै औ हम चिटिक के हुंआ ------ औ मारब हनक के याकु कुल्हरी।'

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Saturday, June 27, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५

पारीमल - भारीमल


चना चबैना चबाते गोठनी के शिक्षक ने जहां से खरवार कथा छोड़ी थी वहीँ से उठा ली -  

'राजा मदन शाह नामक खरवार राजा जब बुढा गए तो उनको बड़ी चिंता व्याप गई कि स्वयम तो हत-पौरुख भए और राजकुमार अभी बालक हैं, अब अरना भैंसा का बली कउन देगा।   

इसी समय द्वारपाल ने राजा को सूचना दी - कुछ बीर दुआरे पर आए हैं, कहते हैं - लोहे की तलवार तो क्या हमार रेंगवे काठे की तरवार से अरने की बली चढ़ाय दें।  

राजा ने सुना तो अचरज में पड़ गया - ऐसा चमत्कार भी कोई कर सकता है क्या ? 
उसने राजाज्ञा सुना दी - काठ की तलवार से कोई बली चढ़ाय दे तो आधो-आध राज-पाट उसके नाम औ राजकन्या दान में। औ, जो न कर पाया तो मूडी कलम।  

द्वार पर आए बीरों का जत्था आया रहा महोबा के बीर चन्देलों का। उनमें रहे दू ठे रेखिया उठान भाई परिमल ओ भारीमल, बहुतै रूपवान औ प्रतापी। इन्हीं के दम पर अनहोनी को होनी करने की ठानी गई थी।  

राजा ने बन में से एक अरना पकड़ मंगवाया।  
दूर पास के गांवों के देवी-भक्त उमड़ पड़े। कोल, गोंड,  चेरों, बैगा, धारकार, भुइंहार, आदमी-औरत का रेला लग गया। 
दोनों राजकुमार बीर बाने में महिष बध को उतावले हुए जाते।  
उधर जुटान के मन में एक्कै सवाल - काठे की तलवार से भैंसा की बली !!!!!!!!!!

बड़के कुमार ने काठ की तलवार के एक ही झटके में आशंकाओं की भारी भीत ढहा दी।  
काठ की तलवार से लोहू टपकै टप टप। अरना का मुख देवी के चरन में लोटै।  
देखै वाले देखतै रहि गए। 
रजवौ देखै हैरान।  
बनवासिन कै जयकरा से धरती असमान कंपकपाय गइल। 

पारीमल-भारीमल अगोरी-राज से आधा राज पाए और मदनशाह की कन्याएं उनसे बियाही गयीं। कुपित खरवार राजकुमारों को यह सब जमा नहीं तो बलपूर्वक उनका हीसा लेने की कोशिश की लेकिन चंदेल कुमार ओन्हनौ के मुआए देहलैं। इस तरह पूरा अगोरी राज पर चन्देल सत्ता कायम हो गइल।'


लोक परम्परा में चन्देलों के अगोरी राज पर काबिज होने की दूसरी ही कहानी साथ चल रहे पढ़े-लिखे रूदन खरवार ने सुनाई - 

'महोबा से हार कर भागे चन्देल अगोरी के राजा मदनशाह की शरन में चाकरी करने लगे। अपने साहस के बल पर ओनहन के राज दरबार में अपनी पैठ बैठाते सेना में बड़ा ओहदा पाते देर ना भई। खरवार राजकुमारियाँ पारीमल-भारीमल के रूप पर रीझ गइलीं। राजा ख़ुसी खुसी ओन कर बियाह करि देहलें। ओहर राजा बूढ़ हो के माचा धै लेहलन तो पढ़े बदे बनारस रहै वाले खरवार राज कुमारन के राज-पाट सौंपे के बोलवाए के हरकारा भेजले। 
चलाक चंदेल मौक़ा लखि के खोट कइलें। आन्हर-बहिर राजा के सामने पारीमल-भारीमल के खड़ा कै के कहि देहलें कि राजकुमार आय गइलें।  राजा अपने लइकन के धोखा में ओन कर राज तिलक कै देहलन।' 

अब तक चुप्पी लगाए ध्यान साधे सुन रहे कुंवर ने अपनी टीप लगाई - 

'हूँ ! तो ये दोनों परम्पराएं इस इलाके में सत्ता की लड़ाई में शामिल चन्देलों और खरवारों के अलग अलग पक्षों की देन हैं। असलियत दूनों के बीच कहूँ होइहै।'

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Friday, June 26, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४

बनराज खरवार

अगले दिन गोठानी से आगे बढ़ कर अगोरी  मुख्य द्वार तक पहुंचे तो किले के सामने से दिखे कंगूरों के बीच से गोलीबारी के लिए बनाए गए ऊर्ध्वाधर संकरे सूराख और द्वार के बगल में स्थापित महिषासुर मर्दिनी का थान। 

गोठानी से हमारे साथ आये एक शिक्षक ने बताया कि - 

'इस इलाके में पहले 'अघोर* सम्प्रदाय' का बड़ा प्रभाव रहा। 'अघोरों के बाद यहाँ खरवारों का राज स्थापित हुआ।'

साथी गिरीश बताते हैं - 'इस अघोर संप्रदाय के उपासको 'अघोरियों' का पिछले वक्त के कापालिक सम्प्रदाय से रहा है। मानव-मुण्डों की माला और मुकुट धारण करने वाले कापालिक पार्वती के घोर रूप चामुण्डा देवी को मानव-बलि और मदिरा अर्पित करते रहे। शिव की एक उपाधि 'अघोर' का अर्थ संस्कृत में अ + घोर अर्थात जो 'घोर'अथवा भयानक न हो। अघोर मत आज शैव उपासना का सबसे कुख्यात रूप माना जाता है, विंध्याचल के निकट स्थित अष्टभुजा पर्वत इस मत का एक बड़ा केंद्र रहा है। इधर अगोरी अगर अघोरों का केंद्र रहा तो उधर सोन के उस पार घोरावल रहा घोरों की धुरी।'

इससे पहले कि बात आगे बढ़ती ग्रीसम सिन्हा ने एक सवाल दाग दिया - 

'ये 'खरवार' क्या होते हैं ? इनका नाम और इस राजवंश के विषय में तो हमने कहीं पढ़ा-सुना नहीं ।'

शिक्षक ने समझाया - 

' यहां बन में एक ठे गाझ हो ला जेकर नाम हौ 'खैर'। पान पर लगावै वाला कत्था एही के छाल से बना ला, ओही से पान खावै वालन के ओंठ हो जा लें लाल-लाल।'

बहुत बार सुने दिलकश गीत के बोल कानों में उतर आए - 'पान खाएं सइयां हमार ----'

शिक्षक की बात आगे बढ़ी - 'खैर से कत्था निकारै वाले बनवासी कहलाए 'खरवार'। जैसे जैसे बाढा पान खाए का चलन ओतनै बाढा खैर का व्योपार। जेतना बाढा खैर का व्योपार ओतनै धनी मानी होते गए खरवार। पैसा-दौलत बाढ़ल तो नौकर-चाकर परजा-परानी भी बाढ़े, फिर, ऊ बन गइलन बनवासी से बन के राजा। अगोरी बन गइल ओन कर रजधानी। पहलम पहल ई किल्ला ओही लोग बनवइले होइहन। तब इहाँ रहल होइहन आज से जियादा सघन बन औ सोन-ओ-रिहन्द में आज से जियादा साफ़ ओ बड़हर पानी। 

किल्ला के दुवारे की देवी खरवारन कै ईष्ट देवी रहलीं। अगोरी के राजा हर बरस बन से एक ठे अरना भैंसा पकड़ मंगववतें और तलवार के एक्कै वार में ओ कर धड़ लोटता एह बल्ले औ लोहू फेंकता सिर देवी के चरणों में।

खरवारन कै राज बढ़तै चलि गइल। उत्तर सो पार, पूरब खोड़वा के ओह लग्गे बिजयगढ, दक्खिन एक ओर सिंगरौली बलियापार, ओहर पलामू जिल्ला में गढवा-नगर उटारी, औ पच्छिम में बर्दी के आगे। चहुँ ऒर रहा बनराज खरवारन ही कै राज।'

इक्का-दुक्का चरवाह या बनवासी आते, देवी के सामने हाथ जोड़ वहीँ बैठ जाते या आगे का का पैंड़ा धर आगे बढ़ जाते। 

ढलती दो पहरी में पेट कुड़बुड़ाए तो गोठानी से लाए झोले में धरे बचे-खुचे चना-चबैना-गुड की याद जगी। 

आगे का हवाल सुनने से पहले, देवी  माथ नवां कर हम लोग पेट-पूजा में लग गए।  

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Thursday, June 25, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३

ज़्यादा दिन चलै वाला नहीं 


गोठानी गाँव के पूर्वी सिरे पर चौदह मन्दिरों का एक समूह और पश्चिमी सिरे पर एक मन्दिर, लगभग सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक पुराने। कुंवर साहब ने कहीं-कहीं पड़े हजार-ग्यारह सौ बरस पुराने मंदिरों के प्रस्तर-अवशेष भी पहचाने जो या तो वहीं बने किसी पुराने मंदिर के अंग रहे होंगे या कहीं आस-पास से ला कर यहां रखे गए होंगे। 

कुंवर साहब ने मन्दिर और दुर्ग-वास्तु पर अपनी महारत के चलते कभी अवधी में बताते तो कभी खड़ी बोली पर उतर आते।  गाँव के पश्चिम में बने चण्डी-मन्दिर पर अटक कर समझाने लगे - 

'जान्यौ, यू आय ललाट-बिम्ब। एहि पर बने आँय गरुँआसीन विष्णु। ललाट माने भवा माथा, मतलब यू लाग रहा मंदिर के दरवाजे के ललाट पर। कउनो विष्णू मंदिर के दारवाज़े पर लाग रहा होइहै।  


ललाटबिम्ब के ऊपर वाले पट्ट पर बने आँय नवग्रह - सबते बाएं दूनों हाथ में कमल के फूल थामे सूरज, उनके दाएं चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शूक, शनीचर , अजदहा जैस मुंह वाला राहू, औ साँप कैस पूँछ वाले केतू । 


नीचे पड़े द्वार-स्तम्भ पर अंकित यू जो ऊपर से नीचे तक लपटे नाग बने हैं ना, एहिका कहत हैं नाग-शाखा, इनके अगल बगल ऊपर से नीचे तक फूलों से सज्जित पुष्प या फुल्ल शाखा, अदमी-औरत के जोडे वाली मिथुन-शाखा, किंकणिका शाखा और पत्तों से ढके घड़े वाली घट-पल्लव शाखा। शाखाओं के नीचे एक बगल मकर पर सवार गंगा जी और दुसरे बगल कछुआ पर सवार जमुना जी, उनके बगल शिव जी के द्वारपाल गण। कउनो शैव मन्दिर मा लगे होइहैं।  

 

शैली के आधार पर हजार-ग्यारह सौ बरस पहले बनने वाले गुर्जर-प्रतिहार काल में बनने वाले मन्दिरों में लगने वाले प्रस्तर-खण्डों पर निरूपित किये जाने वाले कला-अभिप्रायों की परम्परा से मिलते-जुलते हैं। ----------------- 

और जो सामने यू पट्ट पड़ा आय, मध्य भारतीय परम्परा में बना है।  भारत में एक युग ऐसा आवा जब वीरगति पाने वाले योद्धाओं की पत्नियां उनके शव के साथ चिता में जल जातीं। उनकी याद में एक प्रस्तर पट्ट या स्तम्भ स्थापित किया जाता जिन पर निरूपित किए जाते चाँद और सूरज के बीच ऊपर उठे हुए हाथ।  ---- मतलब यू भवा कि योद्धा और सती सिधारे स्वर्ग लोक, ऐसे पट्ट कहे गए सती-पट्ट या कीर्ति-पट्ट या कीर्ति-स्तम्भ - 'जब तक सूरज चाँद रहेगा तब तक उनका नाम रहेगा'।' 


पूर्वी मन्दिर-समूह के सामने और खेतों में अनेक सती-पट्ट लगे पड़े दिखे। इनमें से कुछ पर अंकित दिखे घुड़-सवार योद्धा और कुछ पर शिवलिंग पर जल चढ़ाते उपासक।  थोड़ी देर निरखने परखने के बाद कुंवर को लगा - 'इनके पाछे सती परम्परा नहीं जान परत। ये पट्ट सती-परम्परा के नहीं लगते।'

कुंवर साहब की सुस्त कमेंट्री रुक रुक कर चलती रही। मानो रह रह कर हवा में हाथ बढ़ा कर कुछ थाम लेते और फिर हमारी ओर बढ़ा देते। आगे-पीछे के संदर्भ हम जोड़ लेते।  

'कउनौ मन्दिर बनवाइस या पुन्य किहिस तो अइसन पट्ट बनवाए के लगवाए दिहिस। इनके लिए कउनो अलग टर्मिनोलोजी बनानी होगी।'

सोन के किनारे बढ़ते-बढ़ते महारा की बखरी तक पहुँच गए। काले मुंह और लम्बी मोती दम वाले लंगूर उछल-कूद कर भागते दिखे। अगोरी किले के पास नदी किनारे बन रही वन विभाग की नई बन रही कोठरी, इक्का-दुक्का दूकानें और शराब की बन्द ठेकी। घाट ऊपर के छायादार पेड़ के नीचे धरे एक पुण्य-पट्ट पर चढ़े फूल और सिंदूर।  

सामने से आता एक बैगा हमारे पास आते आते हमें देखते ही रुक गया। अपने जूते उत्तर कर हाथों में थाम लिए और दोनों हाथ जोड़ कर हमारे सामने दोहरा हो कर जुहार करने लगा। उसके चेहरे पर भय और दीनता दिखी, उसकी समझ से तो साक्षात लाट साहब ही सामने आ गए हों।

कुंवर भुनभुनाए - 'सामन्ती और बरतानवी दौर ने इन स्वतंत्र वन वासियों को जो ये पैन्ट-कमीज़ वालों के सामने झुकना सिखाया वह आज के भारत में ज़्यादा दिन चलै वाला नहीं।  

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४.२

चउवन गली ओ बावन बज़ार


सोन के साथ साथ, सिन्दुरिया गाँव के बीच से गुज़र कर रिहंद के तट पर पहुंचे। किनारे की बालू पर ऊपर ओबरा की सीमेंट फैक्ट्री से बह कर आयी ढेर सी सिलेटी राख की परत चिपकी दिखी। जूते उतार, पैंट के पांयचे घुटनों के ऊपर तक चढ़ा कर धारा में हेल गए।  

घुटने भर पंजिआ से पार उतरते उतरते रिहन्द का जल-स्तर चढ़ने लगा। कुछ ही कदम चलते घुटनों के ऊपर हो गया। जब तक सम्भलें कमर के ऊपर पहुँच गया।  उस पार से मल्लाह चिल्लाए - 

'जल्दी आवा -अ-अ-अ-आ, पा-अ-अ-नी-ई छुटत बा-अ-अ '

(ओबरा में रिहंद बाँध का बढ़ा हुआ पानी छोड़े जाने से नीचे नदी का जलस्तर बढ़ने लगा था।)  

और तेज़ी से बढे।  देखते ही देखते तट के बलुआ टीले पानी में डूब गए। गहराई कमर से ऊपर और फिर सीने तक चढ़ गया। कुंवर ने चिन्तित हो कर तीसरे साथी से पूछा - 'पैरेक आवत है की नहीं ?' 

उस साथी के चेहरे पर उड़ती हवाइयों ने बिना बोले ही जवाब दे दिया। कभी आगे देखते कभी पीछे। हमने उन्हें ठेल ठेल कर किसी तरह उस किनारे बढ़या। कुंवर हिम्मत बढ़ाते रहे - 'चले चलौ बस तनुकै कसरु रहि गै।' फिर भी घबराहट के मारे दो-तीन छपाका खा ही गए।  

किसी तरह पार हुए तो कुंअर बड़बड़ाए - 'यहु ससुरी कउनो नद्दी आय। छिन मा बाढ़ै, छिन मा उतरै। जो तनिकौ चूकै तो अदमी सूधे बहि जाय। तनी द्याखौ अभी कैस सूखी रही और अब कैसी उफनाय रही है।'

किनारे पर मल्लाहों से गमछे ले कर लपेटे और ठंढ में गुड़गुड़ाते देर तक कपडे सुखाते रहे, धूप ना होती तो कपडे भी मांगने ही पड़ते। 

नदी के उतरने का इंतिजार कर रहे राहगीरों से पता चला कि रिहन्द के ऊपरी प्रवाह पर ओबरा में बने बराज के कपाट पानी बढ़ने पर दिन में कई बार खोले जाते हैं जिससे नदी का जल-स्तर अचानक कई मीटर बढ़ जाता है लेकिन इसकी कोई सूचना नीचे नहीं दी जाती। एक बार पार करो तो पानी मिलेगा घुटने भर और दूसरी बार मिल सकता है हथिया बुड़ाऊ। इसके चलते कई बार अनजान मुसाफिर रिहन्द की भेंट चढ़ चुके हैं।  

आगे खेतों में उगे नए नए उगे नरम नरम गेंहू के ज्वारे सिर उठाते दिखे जो तनिक सी हवा चलते ही दूर तक लहराते भले लगते। आगे बीजुल और पीछे रिहन्द  के बीच के उपजाऊ माटी वाले इस हिस्से में बसे महलपुर गाँव के आस-पास का माहौल किसी पावन मनोरम तपस्थली जैसा।  मेरा मन डोलने लगा - 'कहौ कुंवर हिंया तो रहै लाएक है यार।  एक छप्पर छवाए लें, बस --------.' इतना ही बोल पाए कि कुंवर ने सहज ही आगे उड़ने से रोक दिया - 'बिचार तो ठीक है, लरिकन का पढ़ावै लगिहौ तो कोउ घिउ लै के आई, कोउ दहियु, तो कोऊ गुड़, खाए-पिए की कउनौ दिक्क्त न होई। मुला, पंडिताइन कहाँ रहिहैं औ का करिहैं ?'

बीजुल के इस पार है महलपुर और उस पार है गोठानी गाँव। दोनों के बीच से निकली यह छोटी नदी भी आगे सोन में समा जाती है। उस पार की ज़मीन कही लाल कहीं भूरी तो कहीं हरियाली। खेतों के बीच बीच उठे ऊंचे ढूहों पर बने झोंपड़े जहां से दीखते चारों ओर के दिलकश एरिअल परिदृश्य - आगे सोन का चौड़ा किनारा, उस पार दूर दीखता कण्डाकोट पहाड़, इधर गोठानी के मंदिर और उधर अगोरी का किला।  

वहीं मिले एक गाँव वाले ने एक सांस में बताया - 

'इहां रहे चउवन गली ओ बावन बजार। रेणु के पूरब रहा सेनुर (सिंदूर) का बजार, सेनुर बिकात रहा उहाँ, आज बसल हौ ओहीं सिन्दुरिया गाँव।  महलपर में रहा माही का बजार, उहाँ बिकात रहा मक्खन।  गोठानी में रहा गोइंठा (गोबर का कण्डा) का बजार, चौरा गाएं में चाउर बिकात रहा।  चौरा के आगे बा बिजौरा - अगोरी के तिलिस्म* का बीजक ओहीं रहा --- '   

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तिलिस्म - छिपे हुए खजाने। 

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४

1979 -  अध्याय ४.१:  बन्दूक बांधे

सोन सेतु पर चलती ट्रेन से उठी झकझोर से डिब्बे में जाग पड़ गई। मुसाफिर उठ कर अपना अपना बिस्तर-बक्सा समेटने धरने लगे।  
आहट आवाज़ सुन कर  कुँवर ने मुंह से रजाई हटा कर बोले - 'कहाँ पहुंचे ?'

सिन्हा ने बताया - 'चोपन स्टेशन आ रहा है। अब उठ जाइए।' 

जवाब सुन कर कुंवर अनमने मन से अलसाए हुए उठ बैठे। 

स्टेशन के प्लेटफार्म पर कैम्प का सामन उतार कर कुछ साथियों को उनकी निगरानी के लिए छोड़ हम दो तीन लोग मुंह अँधेरे ही कैम्पिंग के लिए मुनासिब जगह तलाशने निकले। आस पास का मुलाहिजा लेते सोन के रोड-ब्रिज पर टहलते चले गए।  

पूरब में लाली छाने लगी, सोन के चौड़े पाट पर बिखरी सोन रज और झिलमिल जल-प्रवाह पर सुनहरी चादर चढ़ गई, तब समझ में आया कि इस नाद का नाम सोन क्यों पड़ा। 

दाएं दूर मन्दिर के पीछे दीखता अगोरी का किला जाना-पहचाना लगा। सोचने लगे - घेरते पहाड़ों के परे पूरब में खड़े खोड़वा पहाड़ के ऊपर, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्खिन, देखा-अनदेखा, चप्पा-चप्पा, खोह-कनरा सब देखना तलाशना और समझना है।

धीरे धीरे सूरज उठा तो  पश्चिम में मंदिर के पास सोन में मिलती रिहन्द नदी का मुहाना दीखने लगा। धारा पर तैरते मौसमी परिन्दे, उल्टी धार पर चढ़ती बड़ी-बड़ी पालदार नावें, पुल को दमदमाते चले आ रहे ट्रकों का रेला। सोन के पश्चिमी सिरे का पार नहीं मिला, मानों  घूमते घुमते सोन के कगार और पहाड़ मिल रहे हों। पूरब में रास्ता रोके खड़े खोड़वा से  टकरा कर सोन दक्खिन दब कर निकलता दिखा। पहली बार ऐसे मनोरम  दृश्य निरख रहे कुंवर विस्मृत हुए जाते, जिधर देखते देखते ही  रह जाते। 

सूरज और चढ़ा तो चाय की दूकान पर चुस्कियां लेते  कैम्पिंग की चिंता सताने लगी। कुंवर साहब का मिज़ाज़ ही नहीं मिलता, हर जगह  कुछ ना कुछ नुक्स निकाल ही देते -

'यू तो बीच बजारे मा है। हिंया एकन्त नहीं, हिंया ज़्यादा सन्नाटा है, औ, हिंया पानी क्यार कउनौ जुगाड़ नहीं, कुंआ नहीं बम्बा नहीं।' 

कोई जगह नहीं समझ आयी तो चोपन के शानदार थानेदार जीतेन्द्र सिंह के पास जा पहुंचे। वे जितने कद्दावर और रुआबदार दिखे उससे बढ़कर दिलदार निकले। हमारी समस्या सुनते ही बोले - अरे इसमें क्या है यहीं थाने के अन्दर किनारे के पेड़ के नियरे डेरा डाल लीजिए, इससे मुफीद और सुरक्षित जगह और कहीं नहीं मिलेगी। 

सुनते ही कुंवर की बांछें और बोली खिल गयीं - 

'याकु तो थानेदार, ऊपर ते ठाकुर। हमरे बैसवारा मा याकु कहावत है - याकु तौ बाघु ऊपर ते बन्दूक बांधे। एहिसे बढ़िया ठिकाना दूसर ना मिली। फिर, थानेदार की मूंछैं द्याखौ, कोउ हमरी और द्याखै क्यार हिम्मतौ ना करिहै।'  

फिर क्या था आनन फानन में हमारा डेरा-डंडा स्टेशन के प्लेटफार्म से थाना-परिसर में और देखते ही देखते तने खड़े काबुल पाल। इतना हद्द-हिसाब बैठाते दो पहर पार हो गई। राशन-पानी और चूल्हे का हिसाब और मजूर महराज का जुगाड़ बाकी ही रहा।  बाज़ार चल कर खाने के बारे में बात-बिचार करते तब तक थानेदार साहब की घरैतिन के हाथ का बना ज़ायकेदार भोजन हाज़िर। 

भोजन देखते ही कुंवर की तबीयत तर हो गयी - 

'कहत  रहेन ना ! - ठकुरन से बढ़ि के पण्डितन क्यार आव-भगत कोउ ना करिहै। 
ठीकै कहा है कोऊ कि, घर से निकरै वालन पर रहत है ऊपर वाले का साया।'   

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ३.१२

ऐसी विदाई, कभी कहीं नहीं मिली 

राजगढ़ का सर्वेक्षण पूरा हो गया। प्रकाश में आए पुरावशेषों से साफ़ हो गया कि राजगढ़ ब्लाक में हज़ारों साल से मानव गतिविधियाँ ज़ारी रहीं आदिम आखेटकों-संग्राहकों (हंटर - गैदरर), आदिम चितेरों और खेतिहरों के बाद महाश्म (मेगालिथ) बनाने वालों के साथ या बाद में कम से कम करमा और पगिया गाँव के डीहों पर तकरीबन पच्चीस सौ बरस से काले लेपित पात्र (ब्लैक स्लिप्ड वेयर) और उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर) प्रयोग करने वाले आबाद रहे। जगह जगह मिलने वाली प्रस्तर प्रतिमाऐं, किले और मंदिर के अवशेष, पत्थर के कोल्हू, आदिवासियों और दूसरे समुदायों की बसावटें आज तक चली जा रही हैं। आम धारणा के अनुसार तीर कमान वाले आदिवासी यहाँ के मूल निवासी और बाकी सब बाहर से आकर यहां बसने वाले बहरिया* हैं।

जो नहीं मालूम हो सका वह ये कि खेती के प्रारम्भ, दूसरे इलाकों से सम्पर्क, व्यापारियों के आने-जाने की सही सही तारीखें और तवारीखें, कौन कब कहाँ से यहां आया और कब से चली आ रही हैं गुलाब जामुन की दूकानें।  

सामान बंधने लगा तब समझ में आया राजगढ़ से लगाव हो जाने का आभास, चलने का समय निकट जान मन उदास हो गया। कामगार भी भावुक हो चले। उस रात घर नहीं गए। लखनऊ जाने वाली चोपन एक्सप्रेस के आधी रात में लूसा स्टेशन पर आने तक के बकाया समय में एक ने जो खीसे और गीत सुनाए हमेशा के लिए याद हो गए - 

'बखत बखत की बात। एक ठे राजकुमार रहा, बहुतै सुन्दर औ भोला। ओकर महल बड़ा ऊंचा।  उसकी बहिन बड़ी प्यारी, बड़ी स्नेहिल।  दुन्नो हिल मिल के खेलैं।  उनके पिता सरल हृदय राजा, उनसे बड़ा प्यार करते। औ माई, तो माइयै हो ली। गाय गोरु एतने कि गिनी ना जाएं, दूध-घी एतना कि शुमार नहीं। फिन, बड़े भए तो बहिन बियाह के बिदा हो गयी दुसरे राज में।  

दिन बरस बीतत, इधर ऐसा बखत पलटा कि राज कुमार का सब राज पाट, धन-बैभव जाता रहा और बखत का मारा राजकुमार भटकता भीख माँगता कब बहिन की ससुराल में पहुँच गया उसे पता ही नहीं चला।  वह रो रो कर भीख माँगता रहा। उसकी टीस भरी आवाज़ बहिन के कान में पड़ी तो दौड़ के अपने महल की ऊंची अटारी से जा सटी। गाने वाले की आवाज़ उसे जानी पहचानी सी लगी लेकिन भीख मांगने वाला उसका भाई हो सकता है एकर तो ओके गुमानौ नहीं भया। राजकुमार गा - गा कर अपनी दुरदशा की कहानी सुनाता भीख माँगता रहा -

गइयां तो मरि गइ लीं -इ-इ ,
किदली के वन में -अ-अ-अ।  
भैसें जमुनवा के-अ-अ  
ती -अ -अ -अ र, जी -इ-इ-। 

गाएं कदली वन में और भैसें यमुना नदी के तट पर मरि गइलीं।  

घोड़वा तो मरि गइलीं - इ - इ 
कदम कै डरिया - अ -अ -अ 
हथिया लुवानिया कै -अ-अ-
डा -अ -अ -अ र, जी -इ-इ- । 

घोड़े कदम के नीचे मर गए और हाथी लुवानिया की डाल के नीचे।'  

हम सब दम साधे सुनते रहे। खीसा सुनाने वाले की वाणीं में और अधिक पीड़ा और व्यथा घुल गयी - 

'बाबू तो मरि गइलें -अ-अ 
पोखरवा भिटवा -अ-अ-अ 
माई तो मरि गइलीं - इ - इ 
महिलिया के बीच जी -इ-इ- ।

पिता पोखरा के भीटा पर मरे ओ माई महल के बीच में।  

बैला तो मरि गइलें -अ-अ
अपनी बखरिया -अ-अ-अ 
बखरी भई-इ-ई  
डहमा-अ-अ -र, जी -इ-इ- । 

बहिनी-ई-ई बियह गई,
बंसी के रजवा -अ-अ-अ 
भइया मांगत भीख-अ-अ 
दे-अ-स-अ-अ, जी -इ-इ- ।

बैल अपनी बखरी में मरि गए, बखरी सूनी हो गई। बहिन का ब्याह हो गया बंशी राजा से हो गया। और, भैया देश देश घूम घूम कर भीख मांग रहा है।'

अगली कहानी की भूमिका बनते बनते दूर से आती ट्रेन की रौशनी दिखने लगी। 

लूसा स्टेशन पर ट्रेन रुकती तो चन्द मिनट ही है लेकिन उसके रुकते ही हमारे साथी कामगारों के गाँव से आए साथियों ने हमारा सामान झटपट ट्रेन पर चढ़ा दिया। और जब तक हम ट्रेन में सवार होते उससे पहले ही उन्होंने कहीं छुपा कर रखी फूल-मालाओं से हमें लाद दिया तो हमारी आँखें बरबस भर आयीं। स्थानीय ग्रामीण कामगारों से ऐसी विदाई हमें फिर कभी कहीं नहीं मिली।

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*  इन इलाकों में अगली यात्राओं के अनुभवों के आधार पर मूल और बहरिया के मुद्दे पर अंतिम अध्याय में चर्चा होगी।   

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तीसरा अध्याय समाप्त      

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ३. ११

जोगिया दरी 

सक्तेशगढ़ से लौटते हुए एक कामगार ने जिक्र किया - 'सिद्धनाथ की दरी जइसन एक ठे दरी औरौ बा - जोगिया दरी, कोटवा के लग्गे, निरल्ले में।' 

दरियों के आस-पास चित्रित शैलाश्रय  तलाशने के चस्के के चलते अगले दिन वह इलाका मंझाने का इरादा बना लिया। 

साइकिलें खड़खड़ाते निकल पड़े राजापुर से आगे। सुबह सबेरे की ताज़ा हवा में महुए, आम और पियार की मादक गमक का आनन्द लेते। रास्ते में मड़िहान में गुलाबजामुन की दुकानों पर मुसाफिरों की  चहल-पहल देख हम भी ठहर गए। सबके साथ दूबे जी ने भी दो दो  आर्डर दे डाला लेकिन मुंह में डालते ही मुंह बनाया - 

'नाम कितना हू होय, राजगढ़ के राम चन्दर की दूकान के आगे तो फीका ही है।' 

मड़िहान के आगे बढ़ते पठार और पहाड़ियों पर जंगल के बीच जहाँ-तहाँ फूले पलाश दहकते अंगारों से लदे लगते। धूप का ताप बढ़ने लगा। दोनों ओर के पेड़ काट दिए जाने से सड़क जैसे आग उगलने लगी। दूबे जी जंगलात वालों पर उखड़ गए - 'सालों ने एकौ पेड़ नहीं छोड़ो।' 

कोटवा वन प्रभाग के आगे दीखते फूले पलाश के पेड़ों के पास से दाएं बगल के जंगल में उतरते रास्ते पर घूम गए। घनी बँसवारी के बीच से गुज़र कर आगे चले तो नील गाय का एक झुण्ड हमारी आहट पा कर पराय चला। सूखी पीली पत्तियां दूर तक खड़खड़ाती चली गयीं। आगे चल कर बूढ़े तपस्वी की जटा-जूट जैसे विशाल वट-वृक्ष की छाया में साइकिलें टिका कर उनके पहियों की हवा थोड़ी थोड़ी निकाल दीं ताकि गर्मी में बर्स्ट न कर जाएं।   

छाया से निकल कर चलते ही पथरीली ज़मीन पर लोटती जीर्ण धारा और एक बगल खण्डहरनुमा एक कमरे वाली धरमशाला के पास महुए के पेड़ के नीचे कई ठंढे चूल्हे नज़र आए। धरमशाला की दीवार पर कोयले से लिखे तर-उप्पर अनगिन नाम - सागर में चीन्ह बनाने को व्याकुल बुलबुलों की सनद। 

धारा के साथ नीचे उतरने लगे तो घनी हरियाली और नीचे के कुण्ड के शीतल जल को छू कर आती ओदी-ओदी बयार के लहरे से काया तर हो गयी। बगल की शिलाओं पर उतरती मन्द-मन्द कुण्ड में झरती निर्झरनी से उपजती अनगिनत मोतियों सी बूंदे दूसरे सिरे तक बहती चली जातीं। दुसरे सिरे पर बहाव से तराशी गयी चट्टानों के बीच से बहती लघु धाराएं। एक बारगी हम सब टकटकी बांधे देखते रह गए। 

कुण्ड तक पहुँचते ही कपड़े उतार सब झमाझम कुण्ड में  कूद कर धारा के नीचे तक तैरते चले गए। सबकी देखा देखी बाबू साहब ने भी छलांग लगा दी लेकिन कुछ देर में लगे गहरे पानी में उब्ब डुब्ब करने, गनीमत रही कि किनारे पर ही रहे, दूबे जी ने झटपट सहारा दे कर बाहर निकाला, फिर बोले - 'कछू बात नहीं लेकिन तैरना नहीं आता तो कूदे ही क्यों।' खिसियाए हुए बाबू साहब को जवाब नहीं सूझा।  

सामने की कगार में गहरी गुफा दिखी तो उसमें शिलाचित्र तलाशने के पहले गुरु जी से मिले सूत्र के मुताबिक़ पहले उसमें पत्थर फेंके जिससे अगर अन्दर कोई जंगली जानवर हो तो निकल आए, नहीं निकला तो आगे बढे। 
गुफा के मुहाने पर भीतर से तेज़ गन्ध आयी तो ठहर गए। सबके भीतर आशंका समा गयी लेकिन कोई भी अपने आप को डरपोक साबित करने को तैयार नहीं। तभी अन्दर से गुर्राहट की आवाज़ आयी। सबके सब सहम कर जहाँ के तहाँ गए।  गुफा आगे मुड़ती दिखी।  
दूबे जी ने दो कदम आगे बढ़ कर इत्मीनान से बताया - 'जल्दी उतर चलो, भीतर कछू है।' इतना सुनते ही सब एक साथ उल्टे कदम उतर चले। 
बची खुची कसर ऊपर से आ रहे चरवाहे ने पूरी कर दी - 'ओह, माने में, एक ठे तेनुआ रहा ला। पहले जोड़ा रहा, अब अकेल्लै बा। दुसरके के शिकारी मुआय देहलें।' 

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कल की कल 

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ३. १०

चैत फुलै बन टेस

अब तक के सर्वे से प्रकाश में आये पुरावशेषों से सम्बंधित डी-फॉर्म भरने और खर्चे का हिसाब लिखने में तीन-चार दिन कैम्प में ही बिताए। फिर एक ही जगह बैठे बैठे मनहूसियत घेरने लगी तो चल दिए सक्तेशगढ़ देखने। 

कच्चे पथरीले वन-मार्ग पर बढ़ते बाएं बगल सिद्ध नाथ की दरी पर ठहरे, उड़ती नज़र से वहाँ के नज़ारे देखे और आगे ढलान पर साईकिल लहराते हवा खाते उतर गए जरगो नदी के गहरे हरे जल के पूरब में बने सक्तेशगढ़ के मुख्य द्वार तक। तीन ओर कुछ दूर से पहाड़ियों से घिरा जिन पर कहीं कहीं दीखती छोटी छोटी बुर्ज़ियाँ।  दक्षिण में सिद्ध नाथ की दरी और उत्तर में सक्तेशगढ़ रेलवे स्टेशन और ऊंची लाल पानी की टंकी।  नदी पार ध्वस्त मन्दिर और उसके दक्षिण में पटिया निकालते मजूर, फसलों से भरे खेत।  

किले के किनारे नदी से सटे एकांत मंदिर की सीढ़ियां चढ़ कर बरामदे में पहुँचते ही प्रपात, किले और सामने फैले खेतों की पृष्ठभूमि से संयोजित प्राकृतिक सौंदर्य ने मन मोह लिया।  

साथ लाए मिर्ज़ापुर गजेटियर से पता चला -  आज से कोई पांच सौ बरस बीते, अकबर के ज़माने में चुनार को दख्खन से जोड़ने वाले मार्ग के इस इलाके में परम स्वतंत्र कोलों ने उत्पात मचाया तो अकबर के सामन्त सकत सिंह को उनका उपद्रव दबाने के लिए यहां किला बनवाना पड़ा।  

उस समय यहाँ घना वन था। किला बनवाने वालों ने बड़ी सूझ-बूझ से काम लिया। नदी के किनारे, घने वन में, पहाड़ों के बीच, ऐसा किला बनवाया जिसे वास्तुशास्त्र की दृष्टि से मिश्रित दुर्ग की श्रेंणी में रखा जा सकता है, जिसमें नादेय दुर्ग, पार्वत्य दुर्ग और जांगल्य दुर्ग,  तीनों की विशेषताएं एक साथ हों।  

इतने बड़े किले में बस एक ब्राह्मण दम्पति का निवास मिला।* भीतर की खाली ज़मीन पर उनकी खेती दिखी। सरसों की फसल कटने लायक हो चुकी थी। पिछले द्वार पर लगी कांटेदार बाड़ लांघ कर भीतर  जायजा लेते रहे।  गायों की देख भाल कर रही ब्राह्मणी ने अजनबियों की गंध पाते ही उठ खड़े हुए कुत्ते को पुचकार लिया। सूने कुँए के बगल से गुज़रे।  ऊपरी मंजिल से पानी भरने के लिए लगाईं गयी घिर्री बांह फैलाए निकली दिखी।  फिर सामने के विशाल मेहराबदार दरवाज़े से बाहर की राह धर ली। दोनों बगल खेतों  में टूटे-फूटे बर्तन, किलेबंदी के  खंडहर और रास्ते के किनारे पत्थर के गोल कोल्हू पर उकेरित घुड़सवार दिखे।  

बहुत ज़माने से बनारस से दक्कन और पुरी की ओर जाने वाले तीर्थ-यात्री और व्यापारी ब-रास्ते चुनार सक्तेशगढ़ होते हुए सिद्ध नाथ की दरी और राजगढ़ हो कर घोरावल और वहां से आगे सोन पार कर रिहन्द के साथ-साथ चलते जाते। बरतानिया हुकूमत के वक्त तक यह रास्ता खासा गुलजार रहा।    

लौटती बेला पलाश के फूले गाछों को देखते ही साथ चल रहे कामगारों के गीत के बोलों से फागुन-चैत और होली की आहट का आभास हुआ - 

'फागुन उड़ै गुलाल
कुमकुमा केसर डाले, 
चैत फुलै बन टेस,
सखी सब फूल उतारैं।'  

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* उन्तालीस वर्ष पहले यह किला ऐसा ही था। निरा वीरान। इसका पूरा कायाकल्प करा कर और अंदर पेड़ लगा कर एक बाबा इसमें आश्रम बना कर रहते हैं। प्रतिदिन यहाँ  उनके दर्शन और प्रसाद पाने वालों की भीड़ लगी रहती है।  

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ३. ९

नेहरू चच्चा कहि गए 

लौटती मंडली की हालत पतली नज़र आयी। गुरु जी, दूबे जी, अभय जैसे कुछ लोगों के अलावा सब घिसटते से ही दिखे। सबके झोले खाली, चेहरों पर थकान। एक छात्रा ने पांवों में छाले के चलते अपनी सैंडिल उतार कर हाथों में लटका लीं। कई और कोमल चरण भी लहू-लुहान हो चले। शायरी और गीत तो दूर कोई किसी से बोलता भी तो मुश्किल से।  मिनट मिनट पर केश संवारने वालों की पाटिया धूल-धूसरित अस्तव्यस्त। तिरछे सूरज की रौशनी में नहर का पानी लाल होने लगा। घिरती साँझ ने माहौल में उदासी घोल दी।  

चुप चुप रेंगना अखरने लगा तो गुरु जी ने गीबड़ को कुरेदा - 

'इतना चुप क्यों हैं राय साहब, कुछ गाना वाना हो जाय।'   

गीबड़ भाव खाने लगे - 'हम्मै गाना कहाँ आवा ला गुरु जी ! जब गइबौ करी ला तो फूहर-पातर।'

'कोई बात नहीं , चलिए वही सुना दीजिए।' - गुरु जी बोले।   

अब गीबड़ मूड में आने लगे - 'नहीं गुरू जी। ई दू -उ-उ- बे  गुण्डा के रहते हम नहीं सुनाय सकतीं। '

यह सुन कर दूबे जी ने आँखें तरेरीं तो पलट गए - 'तोके थोरकै कहत रहली। एह दुनिया में तोही एक दूबे ना हवा। ह्मार संहारिया हौ बेनिया  पर रहा ला। 
हाँ तो गुरु जी हम्मै तो एक्कै गाना आवा ला नेहरू चच्चा वाला।'

सब लोग ठठा कर हंसने लगे।  गुरु जी ने कहा - 'नहीं सुनाना है तो इतना बहाना क्यों बना रहे हैं।'

गुरु जी के बगल में पहुँच कर गीबाड़ ने फिर दूबे पर निशाना साधा - 'गुरु जी ! ई ऊबे दूबे से दुब्बर ना हई, ढेर बोलिहन तो मूड़ी चिचोड़त अबेर ना लागी।'

सैंडिल वाली छात्रा और उसकी सखी ने भी मनुहार की - 

'अब सुना ही दीजिए राय साहब।'
'अब सुना ही दीजिए राय साहब।'

चश्में से आँखे काढ कर उन्हे ताकते हुए गीबड़ नरम पड़ते दिखे लेकिन चेहरे पर शरारत खेलने लगी -

'अच्छा तो सुनत जा।  ------------ हमके कुच्छो ना कहिहा गुरु जी ! जवन आवा ला तउने ना सुनाइब।'

फिर, दोनों कानों में अंगुलियां ठूंस कर आलाप लिया - 

'आ-अ-अ-अ-अ 
आ-अ-अ-अ-अ 
आ-अ-अ-अ-अ -----'

हमारा सबर टूटने लगा, पता नहीं कुछ सुनाएगा भी या - आ-अ-अ-अ-अ, आ-अ-अ-अ-अ - ही करता रहेगा।  
तभी वे भरपूर आवाज़ में गाने लगे -

'ओ - अ -अ- , 
नेहरू चच्चा कहि गए 
चप्पल पे चंचलिया चलै, 
ओ -अ-अ , चप्पल पे चंचलिया-अ-अ- आ - हो '

तेज़ी से इतना सुना कर, फिर आगे मन्द स्वर में सुनाने लगे  -

'ओ सैंडिल पै चिहुंकिया-अ-अ-अ । 
ओ सैंडिल पै ------------ '

इतना सुनते ही इधर हँसी के फौहारे फूटे और उधर -  और उधर सरल नरम दिख रही मनुहार करने वाली चिहुंकिया और चंचलिया ने गीबड़ महराज पर ऐसी चप्पल और सैंडिल चलाई कि चले पराय।  


बनारस से आई मण्डली अगली सुबह वापस चली गयी।  मानो कोई ज़ोरदार तूफ़ान आ कर गुज़र गया। अभय भी उनके साथ चले गए। कैम्प में सना-मन्न सन्नाटा पसर गया। 

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कल की कल 

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ३. ८

ज़ेरे बहस 

अभय और दूबे जी ने पत्तल पर दाल-भात-भरता परोसे तो जिसे जहां जगह मिली वहीं टूट कर जीमने लगा। पहला कौर सरपोटते ही गीबड़ का चेहरा खिल गया, हलक से उतरते ही पहली बार किसी की दिल से प्रशंसा की - 

'बाह रे अभय, पिछले जनम में भीमसेन रहला का? अइसन सुआ-अ-अ-द तो कब्बौ नाहीं चखलीं।  थोरकै औरौ परोसा हो। हम्मन गेस्ट हई ना।'  

अभय ने  मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए उनका पत्तर भर दिया। लेकिन दूबे जी चेंचा दबाने लपके तो गीबड़ चिचियाए - 
'--- अ -अ- रे, अ -अ- रे, ई का-अ करत हउआ। खात कै कुकुरवौ के नाहीं मारा जा ला।  देखा -अ-अ-अ  गुरु -उ -उ  जी-अ-अ अब इहै कुलि होई।'     

भोजन पूरा हुआ तो पस्त मण्डली में फिर से जान पड़ गयी।  गीबड़ ने पानी पीते पीते माइक संभाल लिया - 

'हे भगवान एही के पढ़ाई कहै लें।  फूस-पत्ता वाला पानी पीना पड़ रहा है।  पाँव में छाला फूट रहा है।  जा गुरु जी तोके बहूत पाप लागी ------- मेरा फियान्सी का बाप कहीं ऐसी हालत में देख ले तो बियाहो नहीं होगा। जिनगी  भर कुंवारा ही रह जाएगा।'

दूसरे गोल में चल रही चर्चा यूनिवर्सिटी के घेरे में चली - 

'सब जगह तो पॉलिटिक्स आ गई है, अब तो रामै मालिक हवें। दू बरस का कोर्स तीन बरस में पूरा हो ला।  ओ सब निबट जा ला तो छ-छह महीना प्रैक्टिकलवै नाहीं होत आ।  काने में तेल डाल कै सूतत जा लें जा। कुल बिगार देहलें ई परफेसरवन। हम्मन से ब्यौरा मरिहन, औ नेतवन के परचा बतावै से लगायत नम्बरौ बढइहन। '

इतना बोल कर एक लड़का सांस लेने  को ठहरा तो मौक़ा मिलते दूसरा बीच में ही बोलने लगा - 

'ढेर नेताई ना झारा, तैं देखले रहले का परचा बतावत औ नंबर बढ़वावत ? कुल परफेसरन पै दोख लगावै से पहले कुच्छ तौ सोचता।  कुलि तो अइसन नहीं होतैं। औ जो लरिकवै चाकू-पिस्तौल देखाय के दरवावै लें ऊ का हौ ?'

तब तक तीसरे ने बात उठा ली - 

'काहे ना देखावें, जब देखत हवें कि अइसन कै के केतना जन सफल हो के नौकरी पाय जा लें। उहौ जानै लें - पढ़ा-लिखा केतनौ, नम्बरवा फलाने कै लइकवै पाई। देखला नाहीं --- ओन कर लइका पच्चीस  बरस कै रेकार्ड ब्रेक कइ कै टॉप कइले बा।  हमनियौ जानी ला केतना पढ़ा-लिखा ला ऊ।'

इस  गोल की गरमा गरम चर्चा सुन कर वहीँ सरक आए गीबड़ अब अपने को रोक नहीं पाए - 

'और जी पढ़ाते ही क्या हैं ये सब गबड़ुए ? क्लास में एक सवाल पढ़ाने के लिए दस किताब लाता है और लड़का दस सवाल का जवाब देने  के लिए एक किताब या पर्ची ले जाय तो केतना हंगामा खड़ा कर देता है। केतना आइडियल बनता है।  कुल मिला एक हो के पराने परि जा लें।  नकल क्यों किया ? यहाँ साइन करो, वो फारम भरो।  ओहर गुंडन कै  बड़ा मौज हौ।  ओनसे केहू नाहीं लागत, जब्बर से सब डेराय ला, अब्बर-दुब्बर कै केहूँ गुजारा नहीं।

ऐ दूबे! तोहरे बदे नहीं कह रहा हूँ। औ, तोहू के नहीं कह रहा हूँ गुरु जी !'  

बहुत देर से सबकी बातें सुन रहे कामरेड शर्मा गम्भीर मुद्रा में बोले - 

'किया ही क्या जा सकता है। समाज ही ऐसा हो गया है। सरकारी आदमी, हुकूमत, व्यापारी सब एक सा।  गली-कूचे, गाँव - शहर सब का  माहौल एक जैसा हो गया है।  किसका जिम्मा किस पर डालें। हम सब प्रतिक्रियावादी हो गए हैं। हमें तह में जाना होगा। यह  तो पूंजीवादी व्यवस्था का स्वाभाविक दोष है।  अब इस देश की गाड़ी साम्यवाद के बिना नहीं चलने वाली।'

इतना सुनते ही गीबड़ फनफना उठे - 

'अरे गबड़ुए ! लगला इहौं नेताई झारै। ई कुल बेकार हौ। हम तो कही ला एक ठे बढ़िया डिक्टेटर आए जाए,  लागै सबके एक ओर से ठोकरै।  कुलि सोझाय जइहन। '

बर्तन भांडा बंधवा चुके दूबे जी और अभय ने धूप ढलते कैम्प में लौटने की मुनादी की तो सभा भंग हो गयी। बतरस का आनंद ले रहे गुरु जी ने पान का एक और बीड़ा मुंह में दबाया।  जिस रास्ते आए थे उसी रास्ते नहर किनारे चल पड़े।  

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जारी है