Tuesday, July 21, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. १६

कहानी नहीं तो दुनिया

दो-तीन साइकिलों पर सवार हमारा दस्ता रफ्ता-रफ्ता बढ़ लिया चुर्क फैक्ट्री वाली पक्की सड़क पर। फैक्ट्री से पहले ही अपने लोकल गाइड के इशारे पर बाएं बगल चुरुक गाँव की ओर घूम गए।  

गाँव के अंदर एक नए बने मन्दिर के पास, नीम के पेड़ के नीचे और मुरली के घर के सामने पुराने प्रस्तर मन्दिरों के अवशेष स्थापित दिखे। सबसे पहले ध्यान गया ऊंची पूरी हनुमान जी की प्रतिमा पर।  एक पैर ज़मीन पर धरे और दूसरा घुटना मोड़ कर ऊपर उठाए। 

बतौर कुँवर - 'खड़े होवै की यूं स्टाइल कही जात है आलीढ़ मुद्रा।' 

कुंवर के आगे आगे बोलने के साथ राजेश डाॅयरी  भरने लगे - 

'औ, जान्यौ। समहे धरे पाथर पर गढ़े छ्वाट-छ्वाट मन्दिर आँय ना, कृष्ण देव जी इनका नाम धरे हैं 'तरुणालय', मतलब ऐसे देवालय जो अभी तरुण हैं - छोटे या लघु आकार के होत हैं, बड़े आकर के नहीं। लेकिन द्याखौ बड़े मन्दिर अइस प्लान मा गर्भगृह, कपिली, औ नीचे से ऊपर एलिवेशन मा बेदीबन्ध, जंघा, शिखर, आमलक सबै अभिप्राय  कइस करीने से नान्हे-नान्हे उकेरे गए हैं। इनका 'वोटिव टेम्पल' भी कहा जात है। मतलब कउनौ मनौती मानिन औ पूर् होए गई तो अइसनै याकु छ्वाट मन्दिर गढ़वाय दिहिन। जान्यौ --------'

राजेश ने इतना लिख कर पूछा - 'और, जो और अवशेष यहां रक्खे हैं इनके बारे में क्या लिखें ?' 

कुंवर फिर लिखवाने लगे - 'यू आय भूमि-आमलक, यू उद्गम, यू आय पुरान स्तम्भ, टूट-फूट मूरत, औ यू आय चन्द्रशाला। कबहूँ हिंया प्रस्तर केर कुछ बड़यौ मन्दिर रहा होई।'  

चुरुक से लौटते रास्ते सहिजन कलां गाँव में ठहर कर पुराने मन्दिर की जगह बने नए मन्दिर और उसके आस-पास स्थापित और बिखरे पुरावशेषों का जायजा लेने लगे। भांति-भांति की प्रतिमाएं - तिरशूल धारे शिव शंकर,  ऊर्ध्वलिंगी लकुटधारी शैव गुरु लकुलीश, शिव जी के पुत्र देव-सेनानी शूल-धारी तीन चुटइया वाले त्रिशिख कार्त्तिकेय, दुनहू हाथ मा कमल का फूल लिहे सूरज देवता, मनिषासुर मर्दिनी दुर्गा। मकानन मा जहां तहाँ जड़े पुराने मन्दिरन के अवशेष - ब्याल आकृति, भूमि-आमलक।  होइहैं यही कमो-बेश हजार-ग्यारह सौ बरस पुरान। 

एक मूर्ति के सामने ठहर कर उसकी पहचान बताने और लिखने का अनुरोध करने पर कुंवर ने लिखवाया - 


'यहु मूरत सबसे अलग और तकरीबन आठ सौ बरस पुरान आय। यू आँय गजासुर का मारै के बाद ओहिकी खाल ओढ़ के अंधकासुर का मारै का दृश्य। एही मारे एहिका नाम परा 'गजान्तक-अन्धकान्तक शिव'। बारह-भुजी हक्कानी म्वाछा वाले शिव के हाथन मा द्याखौ गदा, तलवार औ ढाल, डमरू, कमान औ दुइ हाथन मा गज-चर्म, नाग औ कपाल केर खप्पर, औ द्याखौ एकै असुर पर बाँवा पाँव जमाय के  अइस तिरसूल चलाइन अंधकासुर पर कि टंगा रहि गा उपरै ऊपर हवै हवाई। ऊपर द्याखौ हिंया दहिने कोने मा। एहिके पाछे बड़ी रोचक कथा आय ---- '

हमने पूरी कहानी सुनाने को कहा लेकिन तब तक सूरज ढलता देख कुंवर को कण्डाकोट तक पैदल जाने का प्लान याद आ गया। एकाएक अरबरा कर कैम्प का रुख करते हुए बड़बड़ाने लगे -  

'कहानी नहीं तो दुनिया।  फिर कबहूँ सुनाइब। अबहीं तो जंगल पहाड़ चढ़िके कण्डाकोट पहुंचेक है। तुमका तो कउनौ फरक परिहै नहीं, अंधियारे मा हमार जिउ जरूर निकास लेइहौ।'    

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. १५

अधूरा किला 


पञ्चमुखी पहाड़ के पास से दीखती हैं इस भू-भाग की दो ख़ास पहचानें, एक ओर उधर दूर दक्खिन-पूरब में ऊँचा उठा विजयगढ़ का किला और इधर पश्चिम में गोलदारा कण्डाकोट पहाड़। विजयगढ़ का किला विशाल ऊंचा पूरा और कण्डाकोट का अधबना अधूरा।  

लोगों ने बताय एक बार कभी 'वीर लोरिक' ने सोन का बहाव बाँधने की धुन ठान ली, लगा कण्डाकोट से ढोंके ढो-ढो के सोन पाटने लेकिन फिर क्या हुआ यह बताने वाला नहीं मिला।  इसके अलावा दोनों पहाड़ों पर किला बनने से जुड़ी एक रोचक कहानी भी कई लोगों से सुनने को मिली -  

'बिजयगढ और कण्डाकोट पहाड़ों पर एक साथ किले बनने लगे।  शर्त यह रही कि जो किला पहले बन जाए वहां के कारीगर उस पहाड़ पर दिया जला दें, उसे देखते ही दूसरे पहाड़ पर किला उठाने वाले अपना काम जस का तस रोक दें।

दोनों पहाड़ों पर किले बनाने वाले सैकड़ों कारीगर और मजूर जी-जान से पिल पड़े। किलों की प्राचीरें दिन दूना रात चौगना ऊंचाइयां चढ़ने लगीं।  दोनों गोल में  एक ही साध कि उनका किला पहले बन जाए।  

उधर, एक रात बिजयगढ के कारीगरों को किसी चीज की जरूरत पड़ गई। अब अंधियाले में ढूंढें तो ढूंढें ना  मिले और बिना ढूंढें उनका काम ना चले।  आखिर हार कर उजाले में तलाशने के लिए एक दिया बाल लिया। कण्डाकोट के कारीगरों ने उस पहाड़ पर  दिया जलता देखा तो समझा बिजयगढ का किला पूरा हो गया सो अपना काम ठप्प कर दिया लेकिन उधर का किला बनने का काम रात भर ताबड़तोड़ बनता रहा और सुबह तक पूरी तरह तामीर हो गया। तभी से बिजयगढ का किला सारी सरज़मीं पर सिर उठाए बुलन्द खड़ा है और कण्डाकोट का किला वैसा ही अधूरा पड़ा है। 

किला भले ही अधूरा गया, कण्डाकोट पहाड़ की प्रतिष्ठा कण्व ऋषि की तपोस्थली के रूप में दूर-दूर तक  जानी-मानी जाने के कारण यहाँ बने कण्डेश्वर महादेव-मन्दिर की घण्टियाँ टुनटुनाने और मनौतियां मानने आस-पड़ोस के कितने ही श्रद्धालु वहाँ खिंचे चले जाते हैं।'

बरसों पहले बनारस में बड़की पियरी पर रहते बाबू देवकीनन्दन खत्री की लिखी रहस्य-रोमांच भरी चन्द्रकान्ता संतति और भूतनाथ की कथाएँ विस्मय के साथ डूब डूब कर पढता तो मन करता कब मौक़ा मिले और कब उन कथानकों में बारम्बार वर्णित बिजयगढ-नौगढ़-चुनार के किलों और पूरे इलाके को देखा समझा जाए। वह मौक़ा अब जा कर हमारे हाथ आया।  खत्री जी के परिवार के राजेश खत्री के संहरिया अपने अभय गुरु भी यह जान कर कि हम इस इलाके में घूम घाम रहे हैं बनारस से आपो आप चले आए। चोपन कैम्प से दूबे जी को बुलवा लिया। हमारे निदेशक श्री राम चन्द्र सिंह ने ना जाने क्या सोच कर हमारी सोहबत में देश-दुनिया दिखाने के इरादे से अपने इकलौते रेखिया-उठान सुपुत्र को भी हमारे कैम्प में भेज दिया। पूरी मण्डली को खाने पीने, ओढ़ने-बिछाने के सरो-सामन के साथ कण्डाकोट पहाड़ पर टिकने का ठिकाना तलाश कर डेरा डालने का 'टास्क' टिका कर, अग्रिम दस्ते की माफिक, रवाना कर दिया और संझा तक वहाँ पहुँचने के इरादे से कुंवर के साथ हम सहिजन कलां और चुर्क गाँवों के पुरावशेषों के बारे में राजेश की रिपोर्टिंग की तस्दीक करने निकल गए।  

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. १४

पञ्चमुखी 


दोपहर बाद हमने पञ्चमुखी पहाड़ का रुख किया। एक बार पहले भी वहाँ का एक चक्कर लगा आने  के कारण मैं सबसे आगे-आगे चला। 

पहाड़  के बीचो बीच सबसे ऊंचे ठौर पर बिखरे प्रस्तर-खण्डों, प्रतिमाओं और ईंटों के ढेर दिखते ही कुंवर की चोटी खुल गई, लगे घूम घूम कर समझाने - 

'ईंटों की संरचना कैसि रही होई एहिका अंदाजा लगावेक तो मुश्किल आय मुला एत्ता तो दावे के साथ कहा जाय सकत है कि आज से लगभग बारह सौ से आठ सौ बरस के बीच हिंया कइयौ प्रस्तर-देवालय रहे होइहैं। 

इनमा याकु रहा होइ शिव जी का।  मन्दिर के मुहारे के ऊपर तोता केर टोंट कइस निकरी शुकनासु पर लागि रही होइ हिंया धरी आधे चन्द्रमा अस चन्द्रशाला।  एहिके निचले घेरा 
मा बना सौम्य सुंदर अधमुंदी आँख वाला अदमी केर मुखड़ा कहात है भद्र-मुख, ओहिके दाएं-बाएं और ऊपर बने आँय हाथी, बकरा औ बाघु केर मुख।  
जान्यौ, इनका कहा जात  हैं गज-मुख, छाग-मुख औ सिंह-मुख।  


औ यू आय चरहूँ लंग एक-एक औ मूड़े पर याकु मुख वाला यानी कुल पांच मुख वाला पञ्चमुखी शिवलिंग। मूल मन्दिर के  गर्भगृह मा प्रतिष्ठित-पूजित रहा होइ। एहिके पाछेयहु पहाड़ी और मन्दिर केर नामौ परा होई - 'पञ्चमुखी पहाड़' औ 'पञ्चमुखी मन्दिर'।

औ, जान्यौ ई छोट-छोट रथिका मा बनी आँय पार्वती। औ, स्तम्भन औ तमान पथलन पर बने आँय कीर्तिमुख, अर्ध-पद्म, घट-पल्लव, किंकणिका-घण्टी, तिकोनिया डिजाइन, मकर पर ठाढ़ी गंगा, ठाढ़े विष्णु भगवान, सूरज देवता, गणेश, उमा-महेश्वर। 


औ, जान्यौ यू आय शंकर-पार्वती के बिहाव केर दृश्य, एहिका कहत हैं कल्याण-सुन्दर, द्याखौ चार मुख वाले बरम्हा जी हिंया बइठे केर मन्तर पढ़ि के हवन कुण्ड मा घिव केर आहुति डारत पाणि-ग्रहण संस्कार करावै मा कइस मगन हैं, भोले नाथ औ पार्वती  जोडन के बीच मूड़ निकासे बइठे आँय नन्दी, औ ऊपर आकास से यूं दिब्य बिहाव देखि के धन्य होए रहे हैं सबै देवता। औ, पार्वती केर चोटल्ला द्याखौ कइस मोट गूंथ आय। '

कुंवर के इतना कह कर ठहरेते ही पूरी टोली पर अपने ज्ञान का ठप्पा लगाने की गरज से मैं उन्हें पहाड़ की दक्षिणी कगार पर ले जा कर वहाँ के चित्रित शैलाश्रयों को दिखाते हुए बखानाने लगा - 

'जब १८८० के आस-पास अंग्रेज सरकार के अफीम महकमे के मुलाज़िम कॉकबर्न इधर आए तो उन्होंने न केवल बनारस से इधर आने वाले रास्ते में सुकरुत के पास भल्दरिया के शैलचित्र ढूंढ निकाले  वरन पञ्चमुखी पहाड़ के ये शैलाश्रय और विजयगढ़ दुर्ग के आगे 'घोड़ा मंगर' के मशहूर चित्र भी तलाशे।  फिर ख़ास तौर पर इनमें अंकित गैंडे के आखेट के दृश्यों पर बंगाल वाली एशियाटिक सोसाइटी में सचित्र लेख भी छपवाए।' 


इतना बता कर जिज्ञासा से लबरेज पूरी टोली को गेरुए रंग से उकेरित गैंडे के आखेट दृश्य वाले शैलाश्रय के पास लिवा ले गए। सब के सब टूट पड़े उसकी एक झलक पाने और फिर भरपूर निरीक्षण-परीक्षण में - सरपट भागते एक विशाल गैंडे के पीछे से एक धनुर्धर की कमान से चला तीर उसकी पिछड़ी पर धंसा हुआ दिखा, गैंडे की गर्दन आगे झुकी और चारों पैर दौड़ने की मुद्रा में दर्शाए गए दिखे।  


दूसरे शैलाश्रयों में भी गेरुए रंग से अंकित तरह तरह के चित्रांकनों में से दो की ओर विशेष ध्यान दिलाते हुए जब यह बताया कि पहले में शामिल गाढ़े रंग से रंगे प्रतीकों को देखते ही तकरीबन ३५००-३६०० बरस पुराने आहत सिक्कों पर अंकित प्रतीकों और दूसरे में बड़ी स्टाइल से निरूपित वल्लरियों जैसे अभिप्रायों ने डाक्टर मुखर्जी द्वारा पढ़ी गयी शंख लिपि की याद आती हैं तो सभी साथी चकित रह गए।  



पहाड़ से उतरते समय ढलान पर बिखरे लघु प्रस्तर उपकरण उठा उठा कर गुरु जी से सीखे में दिखाता चला - इसे कहते हैं ब्लेडलेट, इसे फ्लेक, और इसे ब्लेड, चिप्स और ये है 'फ्लूटेड कोर' - प्रागैतिहासिक काल के हो सकते हैं।  

सड़क तक पहुँचते पहुँचते कुंवर ने पासिंग रिमार्क पास किया - 'यू पहाड़ आय कि पूरम पूर इतिहास।  एक बार शुरू होइगा हज़ारन बरस पहीले सो अब लंग चलतै चल रहा है। एहिके आगे तो बड़े बड़े म्यूज़ियमौ हो जाँय फिस्सम फिस्स। '

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. १३

'कोउ नृप होय'


अगले दिन टहल गए छपका से चार किलोमीटर दूर रॉबर्ट्सगंज की ओर वहाँ रहने वाले इलाके के लोक साहित्य के सबसे सुधी शोधक शिक्षक डाक्टर अर्जुन दास केसरी से मिल कर आस पास के पुरास्थलों की जानकारी पाने के इरादे से। उस समय केसरी जी की ख्याति दूर दराज तक लहरा मार रही थी, मिर्ज़ापुर जिले में गायी  जाने वाली 'लोरिकायन' का पाठ संकलित एवं प्रकाशित कराने और लोक कलाओं, गीतों और कथाओं के प्रकाशन के कारण। राबर्ट्सगंज के साहित्य जगत के नाहर केसरी।  बाज़ार में पता करते उनके मकान के आगे की दूकान पर पहुंचे लेकिन उनके यात्रा पर कहीं बाहर होने की खबर मिली तो मन मारे इधर उधर भटकने लगे।  

रेलवे लाइन तक पूरब में बाजार, आगे बाएं बिजयगढ़ वालों का पिक्चर हाल, उसके आस-पास घूरों के ढेर, उससे भी आगे रेलवे लाइन का फटका और रेलवे स्टेशन। दक्षिण चौराहे से आगे फारेस्ट रेस्ट हाउस तक।  पच्छिम में सड़क के इस पार तहसील का दफ्तर, बस स्टैंड और उस पार कालेज और घोरावल जाने वाली रोड। उत्तर में बाई-पास से दक्षिण में मेन रोड पर मिलने तक सड़क पर आरी-आरी सब्ज़ी और फलों की मण्डी और बाज़ार और दूकानों की कतार, बाएं बगल तनिक अंदर जा कर सर्किट हाउस, उनके पीछे रिहाइशी मकान। बस हो गयी कसबे की बसावट ख़तम। 

टहलते-घूमते बस-स्टैंड के पास वाली बंगाली मिठाई की एक दूकान खोज निकाली। हमें तनिक भी अंदाज़ा नहीं था की इस छोटे से कसबे में इतने सुस्वादु समोसे, कटलेट और रसगुल्ले की दूकान भी हो सकती है। चाय के साथ इन सबका एक-एक कर स्वाद लेते  हम वहीँ  बैठकी लगा कर ठहर गए।  

बातों ही बातों में कुंवर ने जेहन में कुलबुला रहा एक सवाल उछाल दिया - 'यू राबर्ट कौन रहा जेहिके नाम पर यहु कस्बा राबर्ट्सगंज कहावा।' 

जवाब आया दूसरी बेंच पर विराजमान चतुर्वेदी जी से - 

'बरतानिया ज़माने में अपनी बहादुरी और कामयाबियों की बदौलत मशहूर भए फौजी कमाण्डर  फ्रेडरिक रॉबर्ट्स के नाम पर धराया इसका नाम। कानपुर में आयरलैंड के एक ब्रिटिश जरनैल के घर जन्मा रोबर्ट इंग्लॅण्ड में पढ़ा-बढ़ा और ईस्ट इंडिआ कम्पनी की आर्मी में शामिल हो कर बंगाल आया । ब्रिटिश आर्मी में फील्ड मार्शल रहा। काबुल-कंधार, दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड, आदि विदेशी धरती और भारत में तैनात रहा। बहूत तमगा बटोरा जगह जगह युद्ध में भागीदारी कर के, विक्टोरिआ क्रॉस से नवाज़ा गया। अठारह सौ सत्तावन की आज़ादी की लड़ाई के समय लखनऊ और दिल्ली का घेरा तोड़ने में ख़ास रोल निभाया।'

कुंवर ठहरे आजादी के दीवाने, अठारह सौ सत्तावन के लड़वइया बिहार-भोजपुर के बीर कुंवर सिंह के साथी राणा बेनी माधव के बीर बैसवारा के रहवइया। रॉबर्ट्स की बहादुरी की दास्तान उन्हें तनिक भी रास नहीं आई तो बोल पड़े -  

'तो ले जाएं अपने हिंया कौनो गाँव-गिराव का नाम राखैं ओहिके नाम पर, हमरे हिंया एहिकी कौन ज़रूरत आय।  कौनो आपन महापुरुष नहीं मिला एहि इलाके मा ? नहीं कुछ तो कुंवर पुर ही धर देते। ' 

चतुर्वेदी जी ने सहज भाव से समझाया -

'वखत वखत की बात है भइया। जो जीता वही सिकन्दर, फिर तो उसी का सिक्का चलता है। उस वखत उन्हीं का राज रहा फिर वो चाहे जिस जगह का नाम धराए राबर्ट्सगंज या विंढमगंज उनकी मर्ज़ी।  अब अच्छा लागै चाहे बुरा, गुज़रा ज़माना लौटाया नहीं जाता, इतिहास तो इतिहास है मिटाया नहीं जा सकता। सबक इतना ही है कि हम इतने मज़बूत बनें रहे कि कभी कोई विदेशी हम पर राज ना कर पाए।'

यह सब जान कर कुंवर चुप्पी लगा गए और लौटते रस्ते भी देर तक वैसे ही रहे।  फिर जब बोले तो भड़ास निकाली 'अच्छा भवा जो हिंया के लोग रॉबर्ट्सगंज का नाम रगड़ के रापटगंज बनाए दिहिन।'

लेकिन आम आदमी कुंवर साहब या चतुर्वेदी जी की तरह नहीं सोचते, ना इतिहास-पुराण ही विचारते हैं।  उनके लिए राबर्टसगंज और रापटगंज दोनों ही नामों और 'कोउ नृप होय' में कोई खास फरक नहीं ।   

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. १२

हम इतने ज़ालिम कैसे 


चोपन से दिल ऊबा तो सोन पार कर तकरीबन बीस किलोमीटर की दूरी तय कर के उत्तर दिशा में छपका ब्लॉक के हाते में पड़े कुंवर के डेरे पर जा पहुंचे। 

बनारस से चोपन और उस से आगे ओबरा और रेनूकूट या उधर से बनारस आने जाने के सड़क के रास्ते में लब-ए-सड़क पशिचम में पड़ता है छपका ब्लाक जिसके पूरब में खड़े पंचमुखी पहाड़ और उसके ऊपर के पञ्चमुखी मन्दिर का नाम को नहि जानत है इलाके भर में।  


हम सब कैम्प बाहर पड़ी आराम कुर्सियों पर घेरा बना कर जम गए। धूप सेंकते गरम चाय की चुस्कियां लेते बतकही का मज़ा लेते रहे।  संझा के करीब पहुंचा सूरज ढलने के साथ खिसकती धूप के पीछे-पीछे कुर्सियाँ खिसकाते हुए राजेश सक्सेना से इस कैम्प की अब तक की उपलब्धियों और खोजों का हवाल जानने समझने लगे।  यदा कदा सड़क पर गुज़रती बसों और ट्रकों की तेज़ घरघराहट झटके से आ कर निकल जाती। 

पता चला पञ्चमुखी पहाड़ और उसके नीचे रौंप, सहिजन कला और चुर्क गांवों तक जिधर भी जाएं प्राचीन मन्दिरों-मूर्तियों के जखीरे बिखरे पड़े हैं। और, बहुत सी जगहों से पत्थर की कुल्हाड़ियाँ भी मिली हैं - पिछले बरस राजगढ़ सर्वेक्षण में मिली कुल्हाड़ियों जैसी। राजेश ने कैम्प के अन्दर  से ला कर सामने की मेज़ पर सजा दीं, कुछ छोटी कुछ बड़ी, खुरदुरी सतह वाले या चिकने घिसे हुए, कुछ टूटे तो कुछ पर चन्दन के चीन्ह। कुँवर चहक चहक कर बताने लगे -  कुछ मंदिरों में पूजे जाते मिले, कुछ खेतों में और कुछ जंगलों-पहाड़ों में यूं ही बिखरे हुए। हमरे हिंया तो एत्ते होइगे, दुइ दर्जन से ज्यादा, तुमहू पायौ याकौ ? बचपन में जो संतोष कंचे बटोरने में मिलता वही संतोष कुंवर के चेहरे पर चमचमाने लगा।  

तभी कुंवर की निगाह पेड़ नीचे ठंढ में गुदगुडाते एक बूढ़े पर पड़ी। बेचारा 'काम के बदले अनाज' के फेर में लंघन कर रहा था। सूखे से उबारने के ख़याल से सरकार की चलाई इस योजना के आते ही गाँव-गाँव में धूम मच गई तालाब खोदने, सड़क पाटने, बाँध बाँधने दौड़ पड़े सैकड़ों औरत-मरद, बूढ़े-बच्चे फरसा-खाँची संभाले। हफ्ते भर  हांड़ तोड़ मेहनत के बाद ब्लाक के दफ़्तर पहुंचे मेहनताना पाने तो बिना दाम पाए पड़े रहने को मज़बूर कर दिए गए। सब जहां तहाँ पेड़ के नीचे पुलिया पर, सड़क पर पसरे दीखते। बिस्तर-बिछौना नहीं, ओढ़ना नहीं, राशन नहीं और बदन पर बीसों सूराख वाले लूगे वाली कुछ जवान औरतों  की  गोद में चीखते नवजात बच्चे। 

कुंवर ने बताया ठण्ड से बचाने की नीयत से कुछ औरतों को एक टेंट में जगह दे दी तो बी. डि. ओ. साहब को उनकी नीयत पर ही संदेह हो गया। कई कई दिन के इन्तिज़ार के बाद सरकारी मुलाज़िम इन्हे देते भी हैं तो नियत अनाज से तीन-चार किलो कम। वे बेचारे जो मिल जाए कपारे पर संभाले चल देते हैं।  


यह सब जान कर मुझे बी एच यू के मशहूर पेंटर राम चन्द्र शुक्ल की बनायी एक समीक्षावादी पेंटिंग याद आने लगी जिसमें सगरा बनारस बाढ़ में डूबा दिखाया गया है और एक सूखे टीले पर सरकारी राहत कैम्प की जगह एक भारी भरकम मगरमच्छ अपना विशाल मुख खोले पसरा दिखाया गया है जो सामने से बाढ़ के पानी से किसी तरह निकल कर आए गठरी-मोठरी संभाले अधनंगे आदमी को निगलने को तत्पर दिखाया गया है।  

हैरानी हुई यह सब देख कर कि आखिर हम इतने ज़ालिम कैसे हो जाते हैं।    

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Thursday, July 9, 2015

'गुतेन ताक' *

July 7, 2015 at 10:04am

इस मुल्क में टहलते, कुछ अक्स याद आए,
लमहे बहुत पुराने, फिर लौट लौट आए।

पढ़ने लगे थे 'जर्मन', उनसे, वो याद आए,
स्कूल था वहीँ पर, 'म्यूलर' की रोड जाए ।

पाती में वो लिखाए, पढ़ने  की याद आए,
'गुतेन ताक' माने, अपनी समझ ना आए।  

'माइन नाम ईस्त' बोले, लड़के का नाम होए,
'फ्राउलिन' लगा के बोले, लड़की का काम होए।

वो तो रहे सिखाते, हम ही न सीख पाए,
वो संग-साथ ऐसे, बस याद में ही आएं।  

वादी-ए-राइन देखें, डेरे लगा के आएं,
दान्यूब के किनारे, किश्ती चलाते जाएं।  

वो 'बोर्ड्स वो '' बोज़ेन्स्की', 'ज़्वेनेर' का नाम आए,
गुरुवर ने जो पढ़ाए वो नाम याद आए।

वो शख्श गुज़रे लमहे, ज़ज़्बात अब ना आएं.
वो उड़ गए हवा से, अब फिर कहाँ से पाएं।

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 * नमस्कार 

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ११

भगवान - 'स्टैलेग्माइट' 

 

चोपन थाने के थानेदार और उनके के ताबेदारों, गाँव वालों और अपने साथ लगे  शेषमन और हनुमान से खासी सुरागकशी  के बाद भी थाने  पूरब सोन के दाएं किनारे के साथ लगे इलाके में किसी मंदिर मूरत मिलने की जानकारी नहीं मिल सकी। खुद भी दूर तक खोज आए लेकिन पुरावशेषों की कोई चीन्ह निशानी पाने में भी फेल ही रहे।  

चोपन से तेरह किलोमीटर से कुछ ऊपर की दूरी पर ओबरा के पास एक गुफा मन्दिर होने की जानकारी शेषमन की मार्फ़त मिली सोचा चल कर देख ही लिया जाय। ओबरा के दक्षिण, रेलवे लाइन के आगे जिस मन्दिर का बड़ा नाम सुन कर दौड़े आये थे वह बिलकुल नया निकला। एक बाबा जी वहीँ धूनी रमाए दिखे। गुफा के अन्दर चूना पत्थर की छत से लटकती बरगद की जड़ों जैसे 'स्टैलग्माइट' से टपकते बूँद-बूँद पानी और नीचे फर्श पर बनी अनगढ़ आकृतियों को शिव जी की पिण्डी मान कर पूज रहे बाबा जी उनकी महिमा बखानते नहीं थकते। इसके पहले उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर नामक स्थल पर ऐसी ही एक गुफा में देवताओं के रूप में पूजी जा रही प्राकृतिक आकृतियों की महिमा पहले भी देख-सुन चुका था। लोगों का मानना है कि वहां तैतीस करोड़ देवता बने और बसते हैं, इतना ही नहीं वहाँ से अंदर जी अंदर एक रास्ता बाबा केदारनाथ के धाम तक जाता है।  

प्रागैतिहास की पढाई से मिले ज्ञान के मुताबिक़ मेरा दिमाग दूर की कौड़ी जुटाने लगा।  यहां से बहुत दूर नहीं है सिंगरौली घाटी जहां से एफ. ई. ज़्वेनर द्वारा पाए गए पूर्व पाषाण काल के मानव निर्मित प्रस्तर उपकरणों के बारे में  वी. डी. कृष्णस्वामी और के. वी. सौंदरराजन ने १९५१ में 'एन्शिएंट इन्डिआ' नामक पत्रिका में एक लेख लिखा था। उसके बाद चोपन के कटाव और सिँदुरिया, जोगइल वगैरह से बाद के आदिम मानव के बनाए पत्थर के उपकरण इलाहबाद और बनारस हिन्दू विश्वादियालय के खोजियों ने ढूंढ निकाले हैं।  इन उपकरणों के मिलने से आस-पास आदिम मानव गतिविधियों का अंदाज़ लगाया जाता है लेकिन तब के आदमियों के कंकाल या अस्थि-अवशेष अब तक पुराविदों की निगाह से दूर ही रहे हैं। गुरु जी ने पढ़ाया था कि चूना-पत्थर के जमावों में ऐसे अवशेष ख़ास तौर पर संरक्षित मिलते हैं। हमने सोचा क्या पता हमें ही इस गुफा में मिल जाऐं।  

लिहाजा सधे हुए पारखी खोजियों जैसे अंदाज़ में जहाँ तक जा सके गुफा के अन्दर तक तज़बीजते रहे। फर्श की सतह का परीक्षण किया, मुहाने पर निगाह गड़ाई कि कहीं जमावों में दबे या ऊपर ही छितरे प्रस्तर-उपकरण दिख जाएं लेकिन भारी मसक्क्त के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ। 

प्राचीन जलवायु का अध्ययन करने वाले भूवैज्ञानिको के लिए ऐसे 'स्टैलग्माइट' के सैम्पल बड़े काम के होते हैं।  प्रख्यात भू वैज्ञानिक प्रोफेसर इंद्र बीर सिंह की टीम ने बस्तर की ऐसी ही वक गुफा के स्टैलेग्माइट के नमूनों  के अध्ययन के आधार पर वहाँ के जलवायु वगैरह की जानकारी प्रकाशित कराई है।  लेकिन हम में से कोई उस विधा का भू-सुंघवा तो था नहीं, सो एक नया अनुभव बटोर वापस चले। 

रास्ते में एक चाय की दूकान पर ठहरे तो एशिया के नंबर एक ओबरा थर्मल पावर स्टेशन की महिमा सुन कर अचरज के साथ अफसोस भी हुआ कि उसके इतने पास आ कर भी उसे देखा नहीं।  

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यह चित्र ओबरा का नहीं है।  इसे इंटरनेट से उतार कर मात्र स्टैलेग्माइट की बनावट समझाने के लिए चस्पा किया गया है।  

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४.१०

कुण्डार-वासिनी चक्रेश्वरी


गाँव वालों से पता चला पास में ही बहती एक छोटी धारा का कुण्ड है - कुण्डार कुण्ड।  उसी के नाम पर गाँव में बने देवी मन्दिर का नाम धराया कुण्डार- वासिनी। इसी नाम पर पास-पड़ोस में और दूर तक गाँव भी जाना गया 'कुण्डारी' या 'कुड़ारी' नाम से।   

लगभग हज़ार ग्यारह सौ बरस पुरानी, मन्दिर के बाहर जहां तहाँ धरी, कुछ देवी-प्रतिमाओं को पहचानने में देर नहीं लगी - सिंह के मुख वाली नारसिंही, एक हाथ में वज्र संभाले हाथी पर सवार इन्द्राणी, शेर पर सवार दुर्गा, पंचाग्नि तप करती पार्वती, एक पट्ट पर मथानी से माखन बिलोती जसोदा मइया और माखन खाने को अरबराते किशन कन्हैया। 

लेकिन, उल्लू पर सवार देवी को हमने एक बारगी समझने में चूक गए। हम कहा उल्लू पर सवार है तो होए ना होए लछमी माता होइहैं, पता लगा चामुण्डा हैं हम कहा हिंयौ ध्वाखा होइगा। अइस चामुण्डा हम पहले सूना नहीं रहे।  तब तक यहै सुने रहन - चण्ड-मुण्ड कै मूड़ उतारै वाली चंडी कहलाईं चामुण्डा, भयानक मुख-मुद्रा और अगिन ऐसी जलती आँख और मानव मुण्ड की माला धारे। मुला चामुण्डा एत्ती सुन्दर और युवा और उलूकवाहना भी हो सकती हैं यह तो कभी खायलौ में नहीं आवा।  

मन्दिर के अन्दर स्थापित काले पत्थर पर निरूपित, मानवाकार गरुड़ पर सवार मुख्य देवी को पहचानने में भी अकल चकरा गई।  मुकुट, कुण्डल, कण्ठ-हार, ग्रैवेयक आदि अलंकरणों से सुसज्जित। आठ भुजाओं में से आधी भग्न, तीन हाथों में चक्र। उस समय तो इतना ही लेखा लिख लिया। यहां आने से पहले हमने ऐसी प्रतिमा पहले कभी  देखी होती तब तो पहचानते। बाद में प्रतिमा विज्ञान के ज्ञाता कुंवर ने इनके लक्षण गुन कर पहचाना - ' जान्यौ ! ----- यू आय चक्रेश्वरी।--------- जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ की परिचारिका यक्षिणी देवी। तनी ध्यान से द्याखौ एहिके मूड के ऊपर प्रभामण्डल के बीचोबीच ध्यान लगाए एक छ्वाट क्यार तीर्थंकरौ बने आंय। '  

नारसिंही, इन्द्राणी, पार्वती और चामुण्डा की पहचान कर लेने के बाद बाकी की मातृकाओं - ब्राह्मणी, वैष्णवी कौमारी और  वाराही के भी वहीँ कहीं मिलने की सम्भावना को ध्यान में रख कर चारों बगल तलाशा लेकिन उनके दर्शन नहीं मिले।

गाँव के अन्दर देवी मन्दिर से कोई दो सौ बरस बाद के एक मन्दिर के भग्नावशेषों में बची रह गई एक डेढ़ मीटर ऊँची भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा और कई छोटी प्रस्तर मूर्तियों में से गज-लक्ष्मी ने ध्यान खींचा। लक्ष्मी के दोनों ऊपरी पार्श्वों में निरूपित गज उन पर जलाभिषेक करते दर्शाए गए हैं।   

इन अवशेषों को यह समझना सहज ही आसान हो गया कि यह गाँव के आज से ग्यारह से तेरह सौ बरस के बीच एक तीर्थ के रूप में विख्यात हो चुका होगा। 

यहां मन्दिर बनवाने का एक बड़ा कारण कदाचिद् सोन के इस पार और उस पार उतारने वाले घाट रहे होंगे।  उधर उत्तर में कैमूर के महादेउआ और दुअरा घाटों से हो कर आने वाले रास्ते पर चलते रहे होंगे बनारस-चुनार से चले सक्तेशगढ़ हो कर आने वाले व्यापारियों-तीर्थयात्रियों और दीगर मुसाफिरों के ऊँट-हाथी-घोड़े पर सवार या पैदल चलने वाले मुसाफिरों के काफिले। यहां से सोन उतर कर कुड़ारी गाँव में डेरा डाल कर कुण्डार वासिनी के दर्शन-पूजन के बाद बढ़ जाते होंगे दक्षिण में भरहरी हो कर, मांड़ा की गुफाओं पर ठहर कर सोनहट से आगे  जगन्नाथ पुरी या दक्कन की ओर। और ऐसे ही चलते ठहरते चलते रहे होंगे दक्खिन से आने वाले काफिले भी। इस सबकी थोड़ी बानगी अब भी दिख जाती है।      

मूर्तियों और मंदिर अवशेषों का लेखा लिखने और फोटो उतारने में घण्टों गुजरते पता ही नहीं चला। ग्रीसम ने अपनी डायरी में कुछ रेखा चित्र भी संजो लिए। 

फिर, लौटे तो बेतहासा बिना खाए, पच्चीस किलोमीटर से ऊपर का सफर। चलते चलते रुकते दाएं चतरवार और बाएं सेमिया ओ बरगवां में प्रस्तर मन्दिर मूरत का लेखा लिखते, बढ़ते, जोगइल-बिजौरा, अगोरी-गोठनी, बीजल-रिहंद सब दनादन डांक गए, फिर ठहरे तो बस साँझ घिरे चोपन कैम्प पर ही पहुँच कर।      

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