Thursday, June 18, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय २:३

३. जगदीश गुप्त 


बातों ही बातों में कब बरकछा निकला, कब जलेबिया मोड़ घूमे, कब विंढम कलां गाँव का मोड़ पार किया और कब हमारी सवारी विंढम फाल के डाक-बंगले पर रुकी, पता ही नहीं चला।  
सामने बरसाती धारा और झरने के आर पार पास-पड़ोस के गांवों से साइकिल-मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर-ट्राली या पैदल ही आ जुटे सैकड़ों देशी सैलानियों का जुटान देखते ही बनता।  

आने वाले अपने साथ लाए थे माटी की हांड़ी, दाल और बाटी और गोबर का गोइंठा (कंडा)। पहुँचते ही बरसात में उफनाती धारा या झरने के किनारे घने गाझ-झाड़ की हरियाली छाया में किसी पाखल- खोह का ठिकाना संभाल कर जमते जाते।  जवान और बच्चे अरबरा कर कपडे फेंक कर धारा और झरने में उछलने नहाने एक दूसरे पर पानी उछालते कूदे पड़ते। एक ओर धारा और झरने का उफान दूसरी ओर उछाह, कौतूहल, आनन्द और जवानी का उद्दाम।  

औरतें और उमरदार लोग तीन पत्थर का चूल्हा बना कर उस पर दाल की हांडी चढाने और  गोइंठे में आलू-भंटा और बाटी ठूंसने लगे। फिर, कुछ लोग एक चाक्ल पाथल धो-पोंछ कर उस पर लोढ़ा जैसे गोल छोटे पथ्थर से विजया भवानी पीसने घोंटने में मगन हो गए । 

चूल्हों से उठता धुँआ गोल या तिरछा हिलता डोलता ऊपर उठता, करीब से गुज़रने पर  हांडी की बुदबुदाहट सुन पड़ती, धारा की और सैलानियों की रोर और पत्थर पर धारा के थपेड़ों के शोर में कुछ और ना सुन पड़ता।  


सैलानियों की एक टोली धारा के ओ पार के बड़े बड़े पाखलो की ओट में कुछ तलाशती दिखी। हम भी उत्सुकता वश उनके पीछे लग लिए।  थोड़ी ही देर में वे जो खोज रहे थे पा गए, खोह की अंदरुनी सतह पर गेरू से चित्रित आदमी-औरत, पशु और आखेट के कुछ दृश्य सामने थे। पहली बार इन्हे दुनिया की नज़र में लाने वाले  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाने वाले कवि और चित्रकार डाक्टर जगदीश गुप्त। 

इकसठ बरस बीते डाक्टर गुप्त १९५४ में यहां पिकनिक मनाने आये तो उनकी निगाह यहाँ निरूपित इन आखेट और दीगर दृश्यों पर पड़ी।  पहली ही नज़र में वे इन पर ऐसा मुग्ध हुए कि तब की लोकप्रिय पत्रिका आज कल के जून महीने के अंक में 'भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रकला एक अध्ययन' नामंक लेख में विंढम फाल के इन चित्रों का सचित्र विवरण दे कर ही अघाए नहीं, वरन अक्खा इंडिया में जहां कहीं भी ऐसे चित्र तब तक प्रकाशित हुए थे सबका अध्ययन मनन किया, दुनिया भर में ज्ञात ऐसे दृश्यों को पढ़-समझ कर, १९६६ में भारत में इस विषय पर अपनी तरह का पहला विस्तृत ग्रन्थ प्रागैतिहासिक भारतीय चित्र कला प्रकाशित कराने का कीर्तिमान भी कायम कर के एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रतिभा विषयों के बाड़ों को कैसे लांघती चलती है।

हिंदी के कवि और तूलिका के धनी डाक्टर गुप्त की कलम से निकला यह ग्रन्थ भारतीय प्रागैतिहासिक कला के अध्ययन के छेत्र  अनोखी देन है। डॉक्टर के. एस. शुक्ल द्वारा हिंदी से अनूदित इस ग्रन्थ का अंग्रेजी पाठ, 'नार्थ जोन कल्चरल सेंटर', इलाहाबाद द्वारा, १९९६ में प्रकाशित कराया गया है।      

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कल की कल 

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