Wednesday, January 29, 2014

रास्ता चलते हुए: सत्र दो - 3

 

January 28, 2014 at 10:14am
तिलंगे जुटे बनारस में  

छह घंटे के बस के सफ़र के खचर-खच्च में भी पढ़ाई में डूबा रहा। अगल बगल की सीटों की सवारियां ऊंघती, जागती, बतियाती रहीं। लेकिन 'अरदली बाज़ार' आते आते सब के सब हरकत में आ कर अपना अपना सामान सिरजने उतारने में लग गए।  दरवाज़े पर जा सटी सवारियों की आवाज़ पर जहां तहां रुक कर उन्हें बस से उतारा जाने लगा।

कैंट बस अड्डे पर उतरते ही अगवानी में डंटे 'उस्ताद' के मार्फ़त रथयात्रा इलाके के एक होटल में जा कर ठहर गए। कैम्ब्रिज से आए खलीफा दिल्ली-कलकत्ता छू कर पहले ही वहाँ जीमते मिले।

उस्ताद की अगुआई में हम तीन तिलंगों का दस्ता निकल पडा इन पडावों के पास की पुरानी तवारीखी बसावटों पर बचे रह गए चीन्हों की निशानदेही करने।

'अगिआबीर' के रास्ते पर चलते पंचकोशी मार्ग के किनारे 'कर्दमेश्वर महादेव मंदिर' पर ठहरे।





उस्ताद बताने लगे - कभी कारदमि रिसी यहाँ शिव जी के धियान में रमल रहलैं, ओनही के नाम पै कर्दमेस्वर ओ कंदवा नाम धराइल ई मंदिल कै।

खलीफा ने सवालों के रेले लगा दिए और आगे आगे चल रहे उस्ताद ने बढ़-बढ़ कर जवाब फेंके -

"ऐसे तो बनारस में मंदिर हउवें अनगिनत।
मगर साबुत मंदिरन में सबसे पुराना इहै हौ।
सात-आठ सौ बरस पुरान तो होबै करी।
काव कहै ले ओके - उहै 'नागर शैली' का अइसन   
नमूना दुस्सर नहिनी।  
बेदीबंध, जंघा में जड़ाइल कुछ पाखल अइसनौ बा जेकरे बुनियाद पे कहल जा सका ला कि एहीं कहीं कब्बौ एहू से पुरान मंदिल रहल होई, इहै कोई पंदरह सौ बरस पहले क।"

उस्ताद के इस परम ज्ञान पर हम चकरा गए। इस ज्ञान का स्रोत जानने को जब तक कुछ पूछते, गाल में पान दबा चुके उस्ताद जी मुंह दाबे पीक घुलाते, काली-सफ़ेद दाढ़ी पर लाली छिटकाते, बमुश्किल बोले -

"अरे ई कुल हमरे बिभाग के 'दुर्वासा' बतवले हवैं, कुच्छो गलत होए तो ओही जानैं । "

जब हमने 'दुर्वासा' का खुलासा करने को कहा तो खीजियाय गए -

"ई हम ना बताए सकतीं, जो कहीं गुरु जी जान गइलन तो बड़ी लात खाए के पड़ी । "

खलीफा खोपड़ी खजुआते रहे। 'दुर्वासा' की शिनाख्त करते तो कैसे ?

और छुटभैया ने सब जान कर भी चुप साधे रहने में ही भलाई समझी।

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क्रमशः  

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