Thursday, June 18, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय २:३

३. जगदीश गुप्त 


बातों ही बातों में कब बरकछा निकला, कब जलेबिया मोड़ घूमे, कब विंढम कलां गाँव का मोड़ पार किया और कब हमारी सवारी विंढम फाल के डाक-बंगले पर रुकी, पता ही नहीं चला।  
सामने बरसाती धारा और झरने के आर पार पास-पड़ोस के गांवों से साइकिल-मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर-ट्राली या पैदल ही आ जुटे सैकड़ों देशी सैलानियों का जुटान देखते ही बनता।  

आने वाले अपने साथ लाए थे माटी की हांड़ी, दाल और बाटी और गोबर का गोइंठा (कंडा)। पहुँचते ही बरसात में उफनाती धारा या झरने के किनारे घने गाझ-झाड़ की हरियाली छाया में किसी पाखल- खोह का ठिकाना संभाल कर जमते जाते।  जवान और बच्चे अरबरा कर कपडे फेंक कर धारा और झरने में उछलने नहाने एक दूसरे पर पानी उछालते कूदे पड़ते। एक ओर धारा और झरने का उफान दूसरी ओर उछाह, कौतूहल, आनन्द और जवानी का उद्दाम।  

औरतें और उमरदार लोग तीन पत्थर का चूल्हा बना कर उस पर दाल की हांडी चढाने और  गोइंठे में आलू-भंटा और बाटी ठूंसने लगे। फिर, कुछ लोग एक चाक्ल पाथल धो-पोंछ कर उस पर लोढ़ा जैसे गोल छोटे पथ्थर से विजया भवानी पीसने घोंटने में मगन हो गए । 

चूल्हों से उठता धुँआ गोल या तिरछा हिलता डोलता ऊपर उठता, करीब से गुज़रने पर  हांडी की बुदबुदाहट सुन पड़ती, धारा की और सैलानियों की रोर और पत्थर पर धारा के थपेड़ों के शोर में कुछ और ना सुन पड़ता।  


सैलानियों की एक टोली धारा के ओ पार के बड़े बड़े पाखलो की ओट में कुछ तलाशती दिखी। हम भी उत्सुकता वश उनके पीछे लग लिए।  थोड़ी ही देर में वे जो खोज रहे थे पा गए, खोह की अंदरुनी सतह पर गेरू से चित्रित आदमी-औरत, पशु और आखेट के कुछ दृश्य सामने थे। पहली बार इन्हे दुनिया की नज़र में लाने वाले  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाने वाले कवि और चित्रकार डाक्टर जगदीश गुप्त। 

इकसठ बरस बीते डाक्टर गुप्त १९५४ में यहां पिकनिक मनाने आये तो उनकी निगाह यहाँ निरूपित इन आखेट और दीगर दृश्यों पर पड़ी।  पहली ही नज़र में वे इन पर ऐसा मुग्ध हुए कि तब की लोकप्रिय पत्रिका आज कल के जून महीने के अंक में 'भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रकला एक अध्ययन' नामंक लेख में विंढम फाल के इन चित्रों का सचित्र विवरण दे कर ही अघाए नहीं, वरन अक्खा इंडिया में जहां कहीं भी ऐसे चित्र तब तक प्रकाशित हुए थे सबका अध्ययन मनन किया, दुनिया भर में ज्ञात ऐसे दृश्यों को पढ़-समझ कर, १९६६ में भारत में इस विषय पर अपनी तरह का पहला विस्तृत ग्रन्थ प्रागैतिहासिक भारतीय चित्र कला प्रकाशित कराने का कीर्तिमान भी कायम कर के एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रतिभा विषयों के बाड़ों को कैसे लांघती चलती है।

हिंदी के कवि और तूलिका के धनी डाक्टर गुप्त की कलम से निकला यह ग्रन्थ भारतीय प्रागैतिहासिक कला के अध्ययन के छेत्र  अनोखी देन है। डॉक्टर के. एस. शुक्ल द्वारा हिंदी से अनूदित इस ग्रन्थ का अंग्रेजी पाठ, 'नार्थ जोन कल्चरल सेंटर', इलाहाबाद द्वारा, १९९६ में प्रकाशित कराया गया है।      

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कल की कल 

Monday, May 11, 2015

पवन ऐसा डोलै : छह

टोना है, टोम्मार है

संझा ढले गुदरी हमें पास की कोल-बस्ती में ले गया, झाड़-फूंक दिखाने। 
लपट फेंकती आग में रह-रह कर फेंके जा रहे लोबान से ढेरों धुंआ उठ रहा था। 
ओझा आग के पास उकडू बैठ गया। उसकी मुंदी- मुंदी आँखे आत्मलीन हो गईं। 

इस इलाके में अस्पताल तक कम ही लोग जाते हैं। कैसा भी दरद हो सलाई का लासा राम बाण। गरम पानी के साथ एक टुकडा निगलते ही दरद कटने लगता है। और कोई बीमारी आई तो समझ लिया देवता उतरे, बरम बाबा चढ़े या चुड़ैल की सवारी है, फिर, बुलाए जाते हैं ओझा, भूत-परेत उतारने के लिए। 

ओझा बुदबुदाने लगा - 
                   'टोना है, टोम्मार है ?
                   लाए हैं, लगाए हैं ?
                   पेचे है, पचाए है ? ---'
ओझा की मूडी ख़ास अंदाज़ में डोलने लगी। 
बीमार की सूरत और ज़र्द पद गई। 
ओझा की आवाज़ अचानक एक ठनक के साथ चढ़ चली -
                  'गली है, धार है ?        
                  नजर-दीठ, मूठ -मसान ?
                  अजियौरे के है, कि ननिऔरे के है ??
ओझा ठंढे सवाल उछालने लगा, भूत-परेत, देवी-देवता जो भी हो कहाँ से आया ? रास्ते से लग लिया या कि गलियारे से, मसान से आया या किसी ने मूठ चलाया ? आजी के घर से आया या ननिहाल से?

लोबान का धुआं घनेरा हो उठा। ढोल की धमक ऊंची होने लगी। बीमार एकदम मौन हो गया। 
ओझा अचानक बमक पड़ा, ढोल की थाप हलकी हो गई -
                   'जात है ? या परजात है ?
                   जनाना है कि मरदाना ?
                   कवन रूप? कवन बदन ?
                   गौरा-पार्वती क दुहाई -इ- इ-----------

ओझा धरती पर लोटने लगा। 
हवा के साथ आग की लपटें लपलपा गईं। भूत-परेत जवाब नहीं दे रहे थे। 
फिर, जब बोले तो बीमार के मुंह से - वो अभुआने लगा। 
ओझा ने अपने ढब से पूछा - कैसे पिंड छोड़ोगे ? बीमार नाक से मिमियाया - 
                   'घेंटा लेब, ---- मुर्गा लेब, ----- शराब लेब, ------ सीनुर लेब, -
                   ---- चूड़ी लेब, ----- चुनरी लेब ------'

महुआ का सुआद लेते गिरते-पड़ते ओझा ने सब चढ़वाया  - घेंटा, मुर्गा, शराब, सिन्दूर, चूड़ी-चुनरी ---- । 
बीमार का अभुआना धीरे धीरे मंद और फिर बंद हो गया। 
मान लिया गया कि अब जो भी चढ़ा रहा, भूत-परेत, अलाय-बलाय, सबसे मुक्ति मिली। 
बीमारी हलकी भई तो आप ही चली जाएगी, भारी पड़ी तो मरीज़ गया।  

दुसरे दिन इस उड़ान की डोरी चुक गई। चोपन से चली एक बस में सवार हो कर बनारस के लिए रवाना हो गए, दोबारा इसी इलाके में लौटने और गुदरी से सुने  राजा का बैठका, दुआरा घाट, शिव दुआर, सीता का कोहबर जैसी बहुत सी जगहों को देख पाने की हसरत मन में बसाए।   

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पहला अध्याय समाप्त हुआ 

पवन ऐसा डोलै: चार

रानी एही चौतरा पर ---

अगले दिन सोन पार उतर कर अगोरी की ओर डोल गए। ऊंचे सिंहद्वार पर सिंहवाहिनी दुर्गा। भीतर, जहां-तहां बढ़ चले झाड-गाछ-लतरें, ढही दीवारें, छितरी ईंटें, आगारों की ध्वस्त छतें और तिलिस्मी खजाने की खोज में पास-पड़ोसियों द्वारा फर्श पर खने गए गढे। इनके बीच रास्ता बनाते पश्चिमी सिरे की अधगिरी दीवार के सहारे बची रह गई छत पर जा बैठे। 

पीछे किले की दीवार से सोन तट तक को छूती चापाकार पर्वत श्रेंणी, अगले सिरे से सटे सोन के सुनहरे पाट पर सजी चमकीली धारा, ओ पार गहरी हरियाली के बीच फूली पीली सरसों। 

कुछ गयार-भैंसवार टहलते हुए किले के भीतर आए। एक काली बड़ी नाव से सवारियां उतरती रहीं। उतराई का पैसा ना चुका पाने वाले और सिर पर जलावन धरे औरतें पंजिया हेल कर नदी पार करते दिखे। एक बगल ऊंटों की कतार।  



बगल से गुजरे लम्बे, खासे कढ़े, मजबूत, पतली मूंछ वाले गयार ने बरबस हमारा ध्यान खींचा। लम्बी खुली कमीज़ और घुटनों तक चढी धोती में बड़ा जंच रहा था। टूटे कंगूरों पर चढ़ा, ढही प्राचीरों से उतरा, गिरते-गिरते लडखड़ा कर संभला। फिर, बीच के बड़े चौतरे पर पसर कर मुक्त भाव से अलापने लगा - "रानी एही चौतरा पै बैठल रहलीं ना -आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-आ-----।"  

थोड़ी ही देर में एक और फक्कड़ जवान 'रूदन खरवार' भी वहाँ आ जुटा। चुटकी भर तमाखू ओंठों में दबा कर पूरब दिशा में खेतों में बिखरे प्रस्तर-पट्टों  की ओर अंगुली उठा कर बताने लगा-

"सामने के खंड़हर की जगह कभी 'महरा' की बखरी रही। एतना धनी, बली ओ  समरथ कि अकेले अगोरी-राज बरब्बर।
एक बारी राजा अगोरी अपने राज में टहरै बदे निकरलन। 
'महरा' अपनी बखरी में सोना की चौकी पर जमल रहल, राजा के ओरी देखबौ न कईलस। 
राजा दू-एक बार खंखारलस तब्बौ नाहीं।
राजा ने महल में लौट कर सिपाही भेज कर 'महरा' के बुलाय कै कौड़ी खेलै के दांव फेंकलस - हम दुन्नो हई बरब्बर बकी राजा 
तो एक्के रही दुन्नो में से, जे जीतै, ओही रहै।

'महरा' मान गइल। राजा बिराजै राजगद्दी पै, ओ 'महरा' कथरी पर। 
कौड़ी फेंकावै लागल खड़ाभड़। 
घोड़ा-घुड्शाल, हाथी-हथिसार, घटिहटा गाँव, अगोरी पाल, किला-दरबार, राजा की गद्दी।
एक पै एक, महरा कुल जीततै गईल। 
राजा कान पकरि के निच्चे ओ 'महरा' चढ़ल सिंहासन उप्पर।

राजा मुंह लटकाए बन में चलल। राह में भेष रखवले बरह्मा मिल गइलन। राजा के लिलारे पै लिखल तुरतै बांच के बतउलें - वापिस अगोरी जाओ, साहोकार से धन उधारी जुटा के फिर से कौड़ी खेल़ौ, राज-पाट वापिस पाय जउब्या।  

अबकी 'महरा' सिंहासन पर ओ राजा कुश की कथरी पर। फिन फेकावै लागल कौड़ी - घोड़ा-घुड्शाल, हाथी-हथिसार, घटिहटा गाँव, अगोरी पाल,  किला-दरबार, राजा की गद्दी। एक पै एक, राजा जिततै चलल। 
सब जीत कै आखिरी दांव में 'महरिन' कै कोखवौ ओकर हो गइल - लइका भया तो घुडसाल में सईस, ओ लइकी भई तो रनिवास में दासी। 

महरिन के कोख से एक-एक कर छह कन्या जनमतै राजा के रनिवास गईं। 
सतवीं कै जनमले दिग-दिगंत में परकास फैल गया, पहरन सोना बरसा। 
महरिन के कहे उसका भाई 'सोबाचन'  नेग देवै बदे सेर भर सोना गंठियाय कै, नाल-छेदन बदे, नोना चमाइन के ली-आवै दौड़ल। 
बकी मौक़ा लउक कै नोनवौ तमक गइल - सतवंती कन्या जनमल हौ पालकी-कहार ली आवा तब्बै चलब। वो भी आया तो सोलह नाहीं बत्तीस सिंगार किए, चार चार अंगुल पै सोना कै तार जड़ल चटकत दखिनिही साड़ी पहरि कै चलल।   
सतवंती कन्या जनमल रहल, सोना के कटारी से नाल कटल। 
राजा सुनलस तो इहौ कन्या के महल में ली आवै लपकल। 
महरिन ने बड़ा दुःख पाया था, अब तक जनमते ही छह कन्याएं छिन चुकी थीं। इस बार चातुरी बानी बोली - 'इसे ले कर आप क्या करेंगे महाराज! माता का दूध पिलाया तो बहिन, बहिन का पिलाया तो भएनी, और, रानी का पिलाया तो पुत्री। फिर, आप इसका भोग कैसे करेंगे, महाराज ? मेरा दूध पिएगी तो जल्दी युवती होगी। किसी अहीर से ब्याह देंगे, हमारा धरम रह जाएगा। फिर, आप बल पूर्वक उसे अपने रनिवास में रख लीजिएगा।'
ई बात राजा के जंच गइल। 

कन्या के नाम धराइल 'मंजरी।' दिन दूना, रात चौगुना बढी। अनिन्न सुन्नरी निकरी। उसकी सुन्दरता की खबर पंख लगाए चौतरफा उड़ चली। अगोरी के राजा 'मुलागत' ने सुना तो उसे पाने को अकुलाया।

'मंजरी', जनम कै बिलक्षण। राजा को वारने को राजी नहीं और राजा से लड़ कर उससे ब्याह करे तो कौन? राजा से ठान कर धरती-आकाश-ओ-पाताल में रहत तो कहाँ ? 

ओहर 'गौरा गाँव' में रहा ए गो अहीर, नाम धराइल रहल 'लोरिक'। बेहिसाब साहस ओ ताकत कै धनी। जे ओसे टकराए, ढहि जाए। एक बारी 'सोन' ओ लोरिक में ठन गइल। कन्डाकोट पहाड़ से पाथल लाए कै लोरिका सोन कै धारा पाट देहेलस। आवाज़ लगाए तो बादर थर्राए, कदम धरे धरती धमके, एककै परग में सोन छलांग जाए। 

लोरिका कै करतब मंजरी लै पहुंचल तो मनै मन नेह जागल। साध उठल कि ओही से बियाह करब। लोरिका के पता चला तो बारात लै के अगोरी आ  
धमकल, ओ तलवार कै दम पर डोला लेवाए गइल। केकर बल जो लोहा ले ओसे। 
बकी, मारकुंडी घाटी पार करते-करते मंजरी ने लोरिका की परीछा लेने की गरज से लोरिका को ललकारा कि सामने की चट्टान तलवार के एककै वार में काटा त जानी तोके ? लोरिका की तलवार वज्र सी चली, चट्टान का एक हिस्सा गिर गया, दूसरा जस का तस रहा, दूर तक चिंगारी चटक गई।  

अब मंजरी ने दूसरी चुनौती रख दी - ऐसन कटे कि जस के तस खडी रहे।
लोरिका उहौ कै के देखाय देहलस। 
दो फांक कटल ऊ चट्टान आजऊ खडी बा उहाँ, लोरिका पाथल के नाम से पूजल जा ली। सीनुर फूटा ला ओसे। शादी के बाद सब दुलहिन ऊ सीनुर माथे धरैं ली, लम्मा सुहाग बदे ।'


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कल की कल

Sunday, April 26, 2015

हिसाब

हिसाब

April 26, 2015 at 8:28am
१. हम खो गए हैं खुद से, खुद की खबर नहीं है
चलते तो चल रहे है, मंज़िल पता  नहीं है।

२. यह ज़िदगी का रेला, बढ़ता ही जा रहा है,
यूं ही जो चल पड़ा था, चलता ही जा रहा है।

३. जिनको गले लगाया, पटरी पे चल रहा है,
पहचानता हुआ भी, गैरों सा रह रहा है।  

४. वो दोस्त जैसे साया, दुनिया से चल दिया है,
सुधियाँ संजोए उनकी, बेबस सा जी रहा है।

५. खित्ते बहुत से खाली, खाली ही रह गए है,
रीते हुए जो पल में, रीते ही रह गए हैं।

६. ऐसा ही हस्र सबका, उसने ही लिख दिया है, 
परवर्दिगार का सब, हिसाब चल रहा है।

७. दूर से जो दिखता, हिम से ढका हुआ है,
अंतर में उसके कितना, धधका उमड़ रहा है।   

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Wednesday, March 25, 2015

कुस्तुनतुनिया से आगे: २८

कोई रिश्ता है क्या: ८ मई २०१४

इतना कुछ है अंकारा में कि ठीक से देखने-सुनने-समझने में महीनों लग जाएं लेकिन हमारे पास था कुल आधा दिन और उतने में ही जितना देख पाते देखना था। इसी लिए हमारे मेज़बानों ने वक्त का ख्याल रखते हुए  हमें दिखाने के लिए तीन ही मुकाम चुने।



सबसे पहले हमारा जत्था चला ऊंची पहाड़ी पर तामीर कोट पर लहराते लाल परचम की ओर। इसके बनने की सही सही तारीख का पता नहीं।  रोमन और बाद के राजाओं हुक्मरानों के बाद  ११०१ में इस पर काबिज़ हुए सेल्जुक तुर्क। ऑटोमन ज़माने में १८३२ में इब्राहिम पाशा ने बड़े पैमाने पर इसकी मरम्मत करायी। पुराना अंकारा बाहरी किलेबंदी के अंदर बसा है। अंदरुनी किला ४३ वर्ग  किलोमीटर में फैला है ।







हमने किले के आस-पास की एक झलक पाने का मौक़ा पाया। नयी बनी कालोनी, पीली टैक्सियों और सफ़ेद कारों की कतार, पार्किंग, दूकानों की खपरैली छत वाली दुकानों के सामने तक सजे बिक्री वाले सामान, गाहकों की इन्तिज़ार में इत्मीनान से बैठे  दूकानदार, किले  दीवार में लगी पुरानी इमारतों के खंड ठीक उसी तरह जैसे हमने हिन्द के किलों में अक्सर देखे हैं।  किले के दरवाज़े के ऊपर से दूर दूर तक फैले नए पुराने शहर का फैलाव देखा, नयी-पुरानी इमारतें, नीले गुंबदों वाली शानदार चार मिनारी मस्जिद, और लाल परचम लहराता देखा, किले के अंदर की कुछ गलियां देखीं। फिर चल पड़े आगस्टस/ रोमन मंदिर की ओर।





पहाड़ी ढलान की सड़क पर रुक कर नीचे बस अड्डे की रौनक देखते देखते ऊपर से एक के पीछे सरपट भागती आयी कारें हमारे पास ही सड़क रगड़ती रुक गईं।  अगली कार से उतरे एक-एक  पिस्तौल वालों ने पिछली कार से दो घबराई हुई सवारियों को  खींच कर निकाला, उनकी कनपटी पर पिस्तौल सटाई और उनके हाथ पीठ के पीछे बंधवा दिए। आस-पास के माहौल में सनसनी उतर आई।  पता चला सादी वर्दी में आए पुलिस वालों ने भाग रहे मुल्ज़िम पकडे हैं।

आज से २०२५ बरस पहले रोमन राजा आगस्तस की फतह के बाद रोमन राज के गलाटिआ नाम के सूबे की कैपिटल के तौर पर अंकारा शहर लम्बे वक्त तक एक बड़ा कामर्शियल सेंटर बना रहा। उसी ज़माने में यहां बना आगस्टस और रोम के मंदिर में लगे प्रस्तर-पट्टों पर कुरेदे गए लेख आगस्टस के कारनामों का ज़िक्र करते हैं।







आगस्टस और रोम मंदिर से सटा कर चार सौ बरस से कुछ पहले लाल ईंटों से तामीर करायी गयी खूबसूरत मीनार वाली हाजी बैरम मस्जिद पर इबादत करने वालों से ज़्यादा सैलानियों का रेला लगा रहता है। एक मशहूर तुर्की कवि, सूफी और बैरामी सूफी फ़िरक़े की बुनियाद डालने वाले हाजी बैरम वली की कबर भी मस्जिद के बगल में ही बनी है।

एक चक्कर 'म्यूजियम ऑफ़ अनातोलियन सिविलाइज़ेशन का भी लगवाया गया, चक्कर भी क्या बस यूं समझिए ज़रा सा परदा उठाया और जब तक नज़र उठे फिर से पर्दानशीं। पत्थर युग से शुरू हुई संगतराशी के एक से बढ़ कर एक नमूने, अक्खा पत्थर युग के औज़ार-हथियार, फिर सधे हाथों गढ़े गए बुत - बाएं हाथ पर बाज़ बिठाए राजा, रथ पर सवार योद्धा, शेर, पंख वाले अनोखे जीव, धातु के सामान, जाने क्या क्या, पूरी तवारीख की नुमाइंदगी करते बेहतरीन नमूने। कहाँ तक सराहते और जज़्ब करते।

बाहर टहलते हुए बगीचे में बेतरतीब धरे दो प्रदर्शों को देखा तो बस देखता ही रह गया, पहले पर निगाह पड़ते ही अपने यहां मिलने वाले कीर्त्ति-स्तम्भ या वीर-स्तम्भ और दूसरे को देख कर अनायास ही शिवलिंग याद आये, देर तक गुनता रहा कि इनका अपने यहां की ऐसी कृतियों से कोई रिश्ता हो सकता है क्या।





रात के खाने का इंतिज़ाम हुआ अंकारा पैलेस में - महामहिम उमर सेलिक, वज़ीर ए तहज़ीब और सैर-व-सयाहट की ओर से। उनीस सौ अट्ठाइस में बन कर तैयार हुई इस इमारत को आज की शक्ल मिली १९८३ में। हमारे रिसेप्शन और खान पान के लिए चुने गए शानदार हाल की सजावट के क्या कहने, लकड़ी की फर्श पर फूल पत्तियों से सजे मोटे कालीन, वैसी ही डिज़ाइनों से सजी मेहराबें और सीलिंग के फानूस, सफेद मेज़पोश वाली गोल टेबल के चारों ओर लाल कुर्सियां।







हमारे साथ आ जमे बाल्कन इलाके के एक खोजी स्टूडेंट, जापानी और मेक्सिकन प्रोफेसर, और फिर आए लम्बे छरहरे मुराद अपनी शरमाती मुस्कुराती माशूका के साथ। आखिर खुल ही गया इश्क का यह पन्ना भी।



डिनर का दस्तूर बड़ी नफासत से नपे तुले अंदाज़ और तहज़ीब से चला। शुरू में ख़ास लोगों ने तोहफों की रस्मी अदला बदला की और बारी बारी मोहब्बत के ज़ज़्बात भरे पैगाम ढाले, फिर लज़ीज़ खाने की तश्तरियां आती गईं. सब कुछ बड़ी खामोशी और तरतीब से चला।  
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बकिया आगे

Friday, January 23, 2015

कुस्तुनतुनिया

January 14, 2015 at 9:59pm
पिछले मई महीने में कुस्तुनतुनिया (टर्की) जाने का मौक़ा मिलने पर दो चार लाइनें  लिखी - दूर देश की उस सरहद पर पूरब का दर खुलता है,
जादू वाला एक शहर भी, उस मुकाम पर बसता है।

दादा-दादी, नाना-नानी के किस्सों में रमता है, 
कुस्तुनतुनिया नाम निराला कब से रहा लुभाता है।

किस्मत ने फिर अपनी सुन ली, न्योता दे बुलवाया है,
इस बखरी की खटपट छोड़ो, वहाँ नज़ारा न्यारा है।



तब सोचा था कि देखा-सुना दोस्तों से साझा करूंगा लेकिन लौट कर नए झमेलों में उलझ कर अटक-अटक कर ही कुछ लिख पाया। 
अगर बसियौटा ना लगे तो थोड़ा थोड़ा कर के अब बयां कर दूँ।  

Saturday, January 3, 2015

सुनी कही बस यही कहानी

सुनी कही बस यही कहानी 

घर के भीतर ही, कितनी दीवारें होती हैं, 
रोज़ रोज़ ही, बड़ी बड़ी सी उठती जाती हैं। 

इक चूल्हे पर चढ़ती बटुली साझा पकती है, 
चूल्हे चूल्हे चढ़ती बटुली बुदबुद करती हैं। 
   
मेड़ी मेड़ी खेतों की पैमाइश होती है,
बढतीं जितनी उतनी कम पैदाइश होती है। 
   
बचपन में जो पढ़ी कहानी भूली जाती है,
एक एक कर लकड़ी कैसे तोड़ी जाती है।  

जाल लिए उड़ती चिड़ियों की टोली जाती है, 
एक एक कर चिड़िया यूं ही पकड़ी जाती है।    

सुनी कही बस यही कहानी हमने जानी है, 
बड़ी लड़ाई साथ साथ ही जीती जाती है।  
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