Saturday, October 18, 2014

भूल रहा हूँ

भूल रहा हूँ 

पूजा-अर्चन अगर-जलाना भूल रहा हूँ,
घाट नदी मंदिर की पौड़ी भूल रहा हूँ।  

वादी-वादी फूलों वाली भूल रहा हूँ,
छितरी धवल चांदनी चादर भूल रहा हूँ।  

नाता रिश्ता सहज सरलता भूल रहा हूँ,
परत परत धर प्रेम पुराना भूल रहा हूँ।  

नभ धुंधला या चाँद देखना भूल रहा हूँ,
कतरा कतरा रोना गाना भूल रहा हूँ।  

बड़-पीपल का थान पुराना भूल रहा हूँ,
पूजे थे जो नाम जनम भर भूल रहा हूँ।  

उनके सपने बड़े फलसफे भूल रहा हूँ,
पैमाना जो ले कर चलता भूल रहा हूँ।   

कैसे कैसे अजब नज़ारे देख रहा हूँ,
चेहरों पर वो चढ़ी नक़ाबें देख रहा हूँ।  

तज कर माया, मोह लिपटते देख रहा हूँ,
भज मन भजन डूबता कैसा देख रहा हूँ।  

बाना, संन्यासी, जामुन-डंडी देख रहा हूँ,
भर भर पीते प्यास न बुझती देख रहा हूँ।  

पढ़-पढ़ पोथी समझ न पाया समझ रहा हूँ,
अज्ञानी ही रहा जनम भर समझ रहा हूँ।  

जिस रस्ते पर चलता आया भूल रहा हूँ,
कितनी यह रूमानी दुनिया भूल रहा हूँ।  

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