Wednesday, March 28, 2012

आज मसला गरम है


आज मसला गरम है
राकेश तिवारी

आज मसला गरम है, सड़कों पे है, संसद में है,
घर-गली, दफ्तर में है, गाँव में, आँगन में है.

मुल्क में है हर मरज़, हर आदमी लाचार है,
डाक्टर-ओझा है, नुस्खा है, मगर बेकार है.

कोई कहता है, व्यवस्था है नहीं, व्यापार है,
कोई कहता है, ये कहना भी, बड़ा अपराध है.

कोई कहता है कि दामन साफ़ है, शफ्फाफ़ है,
शालीन है, देवात्म है, धूनी में साधूराम है.

कोई  करता ‘भूल’ है, तो हर तरफ से घात है,
कोई करता 'राज' है, सम्मान है, अभिमान है.


आज का मसला बड़ा संगीन है, 
सड़ता हुआ थिर, 
कीच है.
किस कदर फैला हुआ,
मंदिर में है, मंदर में है.
सब कहीं, सब ओर है,

नहीं अब सबर दिखता है, नहीं कुछ सुन ही पड़ता है,
अन्धेरा ऐसा छाया है, नहीं कुछ दिख ही पड़ता है.

हमें अब कुछ तो करना है, सभी को साथ रखना है,
कहीं कुछ हो भी सकता है, यही संवाद रखना है.

अरे, ईमान से कोशिश में क्या सामान लगता है,
ज़मी पर, बस यही इक रास्ता, आसान लगता है.

करो कोशिश कि, जितना हो सके, इंसान बनना है,
न बनना है हमें ऊंचा, नहीं हैवान बनना है.

न चादर साफ़ रखना है, न  दाग-ए-दार करना है.
यही है हाथ में अपने, इरादा पाक रखना है.

दिवस्  होता नहीं पूरा, न पूरी रात होती है,
मिला कर साथ दोनों को, ये पूरी आप होती है.

बराती हमको बनना है, हमारा दूल्हा जोगी है,
धतूरा है, ये भृंगी है, मसानी शिव की टोली है.

निषेधों से न नन्दी-नाग सधता है, न नचता है,
इन्हें साधो, जरा समझो, यहाँ शिव नाद करता है.
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28.03.12

Tuesday, March 27, 2012

कहाँ बाज़ी बिछाई है


कहाँ बाज़ी बिछाई है

राकेश तिवारी 

बहुत गहरे थमा था जल, ये फिर से थरथराया है,
मगन था मौन में डूबा हुआ, मन तमतमाया है. 

जमे उस रेत के टीले ने, फिर अंधड़ उठाया है,
परिंदा पर पटकता फिर, बवंडर में भटकता है. 

बहुत अरसे से कोशिश की, यहाँ हमने लिहाजन है. 
मगर अब ये सबर हमसे, यहाँ आ कर फिसलता है.  

ये लहरा बाँध पर आ कर, किनारे सिर पटकता है 
कि जैसे, तोड़ कर तट, बाढ़ में दरया निकलता है.

बखूबी मुझको मालुम  है,  बहुत गहरी ये वादी है,
मगर इसमें उतरने की, हमारी अबकी बारी है. 

सिमट कर एक कोने में, बचाया अपना दामन है,
मगर इस बार ज़ालिम ने, बड़ा खेदा लगाया है.   

करें क्या हम मगर ऎसी, हमारी भी विवशता है,
अड़ी दीवार पीछे अब, कहाँ तक अब सिमटना है.

चढी धारा में अपनी नाव, अब हमने उतारी है,
चढ़ेगी या-कि डूबेगी, ख़ुदा की जो भी मरज़ी है. 

चलो देखें ये रब ने अब, कहाँ बाज़ी बिछाई है,
नियति ने अब कहाँ, कैसी मेरी कीली घुमाई है. 
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२७.०३.२०१२ 

Wednesday, March 14, 2012

तन्त्र जन



तन्त्र जन


धनबल भुजबल जातिबल, और धरम धर नेंय,

ता पर धारौ और सब, यहै तन्त्र जन होय.



साम्य-समाज-जन वाद, सब छूटे बहु दूर,

पइसा-पावर-वँश ही, रहे सकल फल फूल.



शक्ति-केंद्र बहुरूप हैं, इन्है साध ले जोइ,

सत्ता साधै हाथ में, राज कर सकै सोइ.



शक्ति रचै शिव-भावमय, त्याग तपस्या जोग,

जनहित-देश अराध हों, 'राजनीति' तब होय, 



बम-बम भोले बोल कै, करौ ध्यान अब भंग,

तिनहू लोक समेट कै, भसम रचाओ अंग.


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Thursday, February 23, 2012

फागुन फिन बगराय


फागुन फिन बगराय 
राकेश तिवारी 

१. 
फागुन फिन बगराय गा, सेमल उडि मड़राय,
महुआ गमकै गाम मा, तन उमगन न समाय.  

२. 
सरसों फूली ख्यात मा, पियरी अस लहराय,
फ्योंली पीली पाखियां, चुनि-चुनि द्वार सजाय. 
३.
धार-खाल पर्वत चलें, चटके चटक बुरांस,
पीले-लाल लिबास से, सज गए हाट-बज़ार. 
 ४. 
बेला मा  फूटे कल्ला अब, बौरन लागे आम,
भली हो गई भोर अब. लगै सुहानी सांझ.   
५. 
घाम गुलाबी अब लगै, सेंकत देंह जुड़ाय,
अलस तोड़ काया जगै, मनवा यवैं  उड़ाय.

६.
पीपर पाती भूम पर, झन-मन झन-मन होय,

पत्ता चरमर पाँव तर, मरमर अन्तर मोय. 


७.

पाकड़ कोपल सज गई, नीम गई पियराय,

राह तकत पौ फट अई, जोहत हिय हलकाय. 

८.

टेसू टहकै आंच अस, बहकन लागे पाँव,

चित चिनगारी फूटती, टिकै नहीं इक ठांव. 


९.

होलाष्टक अब लागि गै, मगन रमौ आनन्द,

आठहु सिद्धि सहजै मिलैं, रस छलकै मकरन्द. 

१०.

वात ठुनकही डोलि गै, गै होरी नियराय,

भोर धीर रुनझुन बहै, घाम चढ़े दुलराय.


११.
रेला उमड़ा टूट कर, यहु होली की ठेल,

'तत्कालौ' मिलता नहीं, और चलाओ रेल. 


१२.
बिट्टो भी नौकरी करै, दूर शहर में बैठ,
नेकहि अब आवहि घरै, प्रान अटे अन्देश.

१३.
गुझिया परै कराह में, बबुआ ऐहैं फेर,
पाग पकैं घिव-दूध में, जियरा बदकै नेह.

१४.
चौमुहान रेंड़ी गड़ी, लक्कड़ धरैं जुटाय,

चूक्यौ जो याकौ घड़ी, पलकौ डरिहैं लाय.

१५.
हरिनाकश्यपु पसरु गा, सारे जगु मा आज,
कौने बिधि मारैं मिटे, मन कै सब सन्ताप.

१६.
जात-धरम का नाम लै, चलै आजु दूकान,
फगुआ खेलौ साथु मिल, फिर द्याखौ आगाज़.

१७.
ऊ - -लाला छाँड़ो अबै, बारौ अब अल्लाय,
पाप काटि होरी जरै, मेटे सबै बलाय. 


१८.
बहै फगुनहट मदिर मन, थिर जल लागै ज्वार,
दूर बजै जब ढोल-ढफ, हियरा मारै घात.


१९.
पुरहर चन्दा ऊँच भै, सागर उठै तरंग,
करिया, हरियर रंगि गै, रंगे सफेदा झक्क.

२०.
झूमत डोलत जग चलै, मारै फगुआ घोल,
लाल पियर रंग रचि रहैं, गोर-सवंर सब लोग.

२१.
गैल-गली सब डूबि गे, सतरन्गा सैलाब,
इन्द्रधनुष सुन्दर सजे, आनन् आनन् आन.


२२.
 घेरि-घेरि मुसकाय कै, रगरैं रंग गहराय,
ऊपर ते ना ना करैं, मन ही मन हरसांय.


२३.
मधुर मद-भरा परब यहु, बुड़की मारौ बूड़,
बाल-युवा खेला करैं, जशन  मनावैं बूढ़.  


२४.
गारी गावत चाव से, बुरा न मानै कोय,
चुहलि करैं, ठट्ठा करैं, मीठ खवावैं तोय.

  
२५.
एक नज़र रंग डारि कै, भरी डगर में लूट,
बिन कपाट अर्गला लगे, फिर ना पाये छूट.   


२६.
फागुन के रंग में भिने, बालापन में यार,
बरस बरस चटकैं खिलें, बहुरैं बारम्बार.


२७.
तन भीजा भा रँगमय, भीज बसन भरपूर,
इतर तरा रंग पाय कै, भीजा मगन मयूर. 


२८.
हम खेलैं इस देश में, रंग बरसै उस देश,
चौबारे होरी अटे, वै सुमिरैं यहु देश. 


२९.
अँग-अँग रँग रागि कै, अँगराग लपटाय,
अंकवरिया भरि-भरि मिलैं, होरी गले लगाय.
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Monday, February 13, 2012

नहीं जानता है.


नहीं जानता है.

कहने को जो-जो, ये जी चाहता है, 
कहे उनसे कैसे, नहीं जानता है. 

कितना लिखा मैंने, उनके लिए है, 
सुनाएं उन्हें सब, वो जी चाहता है.  

मिलें उनसे कैसे, कहाँ, कब बदा है,
मेरी आरज़ू  का, यही इक सिला है.

कैसे ये रिश्ता, गहरा गया है,
मिलेंगे तो उनसे, यही जानना है.

जो लगता है मुझको, उन्हें भी लगा है?
उनसे यही हाल-ए-दिल जानना है. 

कभी  तो मिलेंगे, अगर ज़िंदगी है,
अगर, चल दिए, तो कहानी लिखी है. 

जो मेरे ज़हन में, समाया हुआ है,
पढ़ लेंगे इसमें, वो चुन-चुन लिखा है.  

समझ लें अगर, यूं ही किसने लिखा है?
पूनो का पूरा, उजाला खिला है.  
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(एक बहुत पुरानी बात) 

Friday, July 8, 2011

चौमासे में घूम



चौमासे में घूम

राकेश तिवारी

१.

ताल तलैया उफन बहै जब,

बरखा बरसै झूम, चौमासे में घूम.

तन उमगै, पीपर सम झमकै,

अब काहे मन सून, चौमासे में घूम.

२.

गरदा बईठा, घामौ थमिगा, उमगे जियरा झूर,

झरने सोते फूट बहें सब, नाचन लागे मोर,

पत्ता-पत्ता पानी-पानी,

चप-छप धारा धूम, चौमासे में घूम.

३.

झड़ी लगा कर बरसे बादल, सारी-सारी रात,

सुबह उठे तो डूबी पाईं, सब सडकें गुडगाँव,

चारों पहिये अड़े हुए, अब कैसे हो सब काम,

रेल-पेल दफ्तर जाने की, गए राग सब भूल, चौमासे में घूम.

४.

मोटी-मोटी घास मखमली, बुग्यालों के ठौर,

भांति-भांति के फूल खिले सब, छटा बनी चंहु ओर,

चरवाहन के बोल सुन पड़ें, भेड़न की है मौज,

डेरा-डंडा पीठ चढ़ाए, पहुंचे हर की दून, चौमासे में घूम.

५.

फूटे बादल वो पहाड़ पर, धरा दरकती आय,

पगिया-पगिया धार उमड़ती, ऊपर झर-झर बरसत जाय,

छोटी जोंकें मोटी पड़ गईं, चूस चूस कर खून,

पावन ऊपर पोत नून, फिर, चौमासे में घूम.


६.

भूमि धसकि मारग पर आई, रेला दुन्हू ओर,

भीजत-भाजत रपट रहे सब, तीरथ जाते लोग,

तनिकौ हिम्मत घटै न उनकी, पाथर-पानी हिम पूर,

बाबा केदार की धूम, चौमासे में घूम.


७.

ब्रह्म-फेण-हिम कमल खिल गए, धार पार उस ताल,

हिम्मत बांधौ , चढौ चढ़ाई, छीर-गंग कै साथ,

थिर हो घूमो, फूल जुटाओ, लौटो मगर दुपहरी तक,

बादल जो अट आए ऊपर, राह जाएगी भूल, चौमासे में घूम.

८.

आंधी आये, टपका बीनैं, झबियन आम बटोर,

मलिहाबादी फरी दशहरी, चौसा है चटखोर,

रत्नागिर के हापूस खाए, अल्फांजो बम्बइया,

अनन्नास हैं बड़े रसीले, मिलै शरीफा खूब, चौमासे में घूम.


९.

सकल धरा अब लील गई, कोसी मइया तट तोड़,

परती धरती, धूसर प्रांतर, पहले सूखा, अब बूड़,

मंगलूर में मची तबाही कारें चल दीं तैर,

कोंकड़ ऊपर बादल अटके, गई मुम्बई डूब, चौमासे में घूम.


१०.

अम्बर बरसै, धरती भीजै, नागराज निकसे बिल छोड़,

दादुर उचकैं, केंचुआ रेंगैं, रेंगा खेलैं कान्दों कूद,

कारोमंडल तट पर देखो, मची हुई है धूम,

सह्याद्री के आरी आरी, चौमासे में घूम.


११.  

फूल रहे सागौन वनन में, आलस पैठै पोर,

बदरा चढ़-चढ़ आएं अटरिया,  पुरवा मारै जोर,

डरु लागै, घन गरजन लागैं, अन्धियारा घनघोर,

अन्दर बाहर भीजत जाएं, फुहरा चलै अटूट, चौमासे में घूम.


१२.

गाँव सिमट आए तरुअन तर, बगिया गमकै भोर,

डालन पर अब झूले झूलैं, भटक रहे चितचोर, 

सागर मचले, तट सर पटकै, उठै झाग झकझोर,

घाटी गहरी भरी उदासी, भीतर उठती हूक, चौमासे में घूम.



१३.




बरखा ऋतु आई, घरु मां बइठौ, वृथा बजावत गाल,


बिना चखे ही बता रहे सब, कडुआ लागै खांड,


बरखा आई बाहर निकरौ, पन्नी मा किताब लपटान,


दाबौ पैडल साइकिल ऎसी, फर-फर उछरै फर्रा मूड, चौमासे में घूम.


१४. 


चहला वाले खेत जुत रहे, बगुलन की जेवनार, 

रंग-बिरंगे लूगन वारी रोपन लागीं धान, 

ऊदे-ऊदे लत्तन से अब आवन लागी बास, 

अब निकसी, तब निकसी कैसी, सही न जाए धूप, चौमासे में घूम.



१५


छपरा ऊपर झम-झम ब्वालै, मानौ सगरा ढील,

म्याड़ कटी सब ख्यात याकु भए, मटमैले भए ज्वात,

ग्वाड़न  मां सब कीच सनै, जब पनही टँगि गै हाथ,

अर्राने सब गिरैं पनाले, बूंदन उठती धूम, चौमासे में घूम. 


१६.

गरज लरज बदरा जब आवें, सुमिरन लागै देश,
गिरिजा देवी कजरी गावें, बरसन लागैं मेघ,
राग मल्हार हवा में डोलै, गूँज उठावैं बूँद,
बाटी- दाल चढ़ी चूल्हन पै, दरियन* जुटे हुजूम, चौमासे में घूम. 
* दरी = झरना; दरियां: झरने


१७.

पीत बसन साजे सब न्यारे, तीरथ-जल काँधे पर धारे, कांवरियों की रेल,
सजे शिवालय मची हुई अब, चप-चप हेलम हेल,
गंगाधारी शिव के ऊपर चढ़ा रहे हैं नीर,  
बोल बम, बोल बम, बम-बम बोल, छान छान कर झूम, चौमासे में घूम. 



१८.


मूड़ उठाए चढ़ती लतरैं, चूमन चलीं अकाश,
भांति-भांति बन बिरवा मह्कैं, कुंजन बसी उजास,
डालन पर पंछी जब कूजैं, कोयल मारे कूक,
हाथी के हौदे पर घूमैं, पीलवान की हूल, चौमासे में घूम.


१९.

गाँव-गलिन में कीचड़ अटिगा, आवन-जावन गेडिन* पै,
हरे भरे उपवन सब हो गए, हरे भरे वन कोशल** कै,
सैलानी अब इनके अन्दर, नहीं सकेंगे गूंठ,
जंगल के दरवाज़े तक ही, अभी सकेंगे सूंघ, चौमासे में घूम..
*गेडिन (गेड़ी) = छतीसगढ़ के गांवों में बरसात में प्रयोग किया जाने वाले बांस की विशिष्ट बैसाखियाँ जिससे पैर में कीचड़ न लगे; ** कोशल (दक्षिण कोशल) आज का छत्तीसगढ़.


२०.


कान्हा-किसली, बांधवगढ़, सब बंद हुए चौमास,
काँकड़ बोल रहे हैं बनमें, रुकी हुई है सांस,
बाघ बना कर जोड़ा घूमें, मना रहे मधुमास,
लाल सुर्ख जलती आँखों से, हमें रहे हैं घूर, चौमासे में घूम.



२१.
 

आल्हा गावैं, धरती धमकैं, बुन्देलन के बोल,

खट-खट खट-खट तेगा बोलें, तलवारन के झोर,

उठि-उठि मुरदा लड़ने लागे, बाजन लागे ढोल,

मंदिर-मंदिर मची जवाबी, करतालन की जूझ, चौमासे में घूम.

 

२२.


पावस की बून्दैं परैं, पाहन शीतल होंय,

ढाक-पात 'पाठा' परे, हरियाले सब होंय,

झरने झर-झर लट रहे, अरी-अरी सब ओर,

'चरखारी' गढ़ अटि लखैं, धरा हरी जल पूर, चौमासे में घूम.


२३.

जहां तहां मन्नाय रही, चम्बिल मइया अफनान,

क्वारी, सींध, पहूंज, बेतवा, केन चढ़ीं उन्मान,
 
रूखे तन कोमल भए, मनभावन भए गान,

इतै-उतै फाहैं लड़ें, ओरछा-सागर-कूट, चौमासे में घूम.

२४.


तमसा-तल उपरै चलै, केंवटी-कूँड़ धसान,


भरी महाना लरजि गै, बिरही मचली रिसियान,

'मैहर माता' माथ धर 'विन्ध्यवासिनी' धूर,

कालिंजर-गढ़ चढ़ चलौ, नीलकंठ लो पूज, चौमासे में घूम. 



२५.


घाट घूम लो, पर्वत घूमौ, घूमौ वन मैदान.

अरझि-अरझि बहकें जब बदरा, रंग धानी बहु आन.

धारा-धार उमड़तै आवै, घूमौ भीज जहान.

जब लै दपकै त्वरा हीय मैं, घूम, मचा के धूम, चौमासे में घूम.



२६.

कूड़ा-करकट बजबजान अब, नरिया अडसी जाय,

राह फूट सब गडहा होइ गै, गोड़ धरे सनि जांय,

गुठलिन मैं अब कल्ला फूटैं, पौध उग रही घूर,

गाँव देश जब ऊब जगावें, सैर करो सब दूर, चौमासे में घूम.


२७.



नदी घाघरा घरघरान अब, धसकन लगी अरार,


गाँव-ख्यात सब काटत आवै, बाग़-बगैचा नाव,


लरिका चहक रहे बूड्यो मा, एहि लंग, ओहि लंग ऊल्ह,


हरे बसन धरती ने ओढ़े, घनी हरी भई दूब, चौमासे में घूम.


२८.




चिप-चिप उमसै, देह पसीजै, मानौ चिउंटी काटै कोय,


उप्पर वाली बखरी तप कै, गरम भभूका आंवा होय,


चौमुहान पर पीटैं गुड़िया, पायस-पूरी घुघुरी ठूंस,


पाँय लागि 'बाबा अस्तीकन', नाग पिलावैं दूध, चौमासे में घूम.



२९.




छुपम छुपाई खेलैं चन्दा, चट झांकैं, पट बदरा ओट,


छन अंधियारा, छन उजियार, छन लउकै, छन अन्हरा घोर,


खुलैं आँख, छन में मुँदै, जियौ लला भरपूर,


रस बरसै, तर ह्वै छकौ, तन जैहै ये छूट, चौमासे में घूम.


३०.

बहना बांधै रछा-बंधन और ठुंसावै मीठ, 

बंधै कलावा हाथ मैं, राजा बलि अब दीठ,

भारत मां कातर भईं, द्याखैं वीरन व्वार,

मनबढ़ सगरे मर मिटैं, अस बरसौ अब टूट, चौमासे में घूम.


३१.

सावन झूला झूलते, सीय-राम संग सँग,

सरयू तीरे सज गये, सब मेले के रंग,

सीय-राम धुन बाजती, रिमझिम परै फुहार,

अवधपुरी में रच बसौ, रचै सुहावन सूख, चौमासे में घूम. 


३२. 

निशि पूनो छिटकी खिली, कैसी भली उजास,

रजनीकर पियरे परे, काहे भला उदास,

फरहर मन फरकत फिरै, जस बदरा बरसात,

घेरि घेरि घन वै झरैं, सुधि घेरै बंधि खूंट, चौमासे में घूम.


३३.

भादौं बरसै टूटि कै, झ्वान्का मारै वात,

पक्कयौ घरु टपकन लगे, कच्चन की क्या बात,

छपरा गलि भुइं पर चुवैं, उडि नहि सकैं जहाज,

जल-जीवन एकै भए, पार उतरिहौ डूब, चौमासे में घूम.



३४.
हरियाली हो गईं करीलें, कदम फरैं फल-फूल,

बिरज बावरी मीरा नाची, देखै रूप अमोल,

बिरवन चढ़ें,
धमाल मचावैं, गोपालन के टोल,
जय-जय राधे, कान्हा-राधे, ब्रजबासी जपते मन ड़ूब, चौमासे में घूम.

३५.

धाय-धाय अब धावा मारैं, शहरी बाल टपोर

गली-गली में मटकी लटकी, लगी टकटकी पूर,

कंध जोड़ सब घेर बनावैं, एक के ऊपर एक,

पारी पारा कोशिश करते, खिसके आते भूम, चौमासे में घूम.


३६. सब जन मिल उकसाय रहे अब, ना मटकी अति दूर,

अबकी बेरिया पाओ आओ, उचकौ अब भरपूर,

यहु देखौ फिर चढ़ें कन्हाई, बांधे पटिया माथ,

अब पायी, अब पायी, पायी, मटकी फोरी कूद, चौमासे में घूम.


३७.

घर-घर अन्दर मंदर सज गए, भज मन राधा बोल,

कैसी मोहक जसुदा माता, मोह रहे दधि-चोर,

उलटी धारा आजु चली बह, सज गए कारागार,

बंदी-रछक धन्य हो रहे, 'बंदीजन को पूज,' चौमासे में घूम.



३८.
कारी घटा घिरी घनघोर, जमुना मारै फाहैं जोर,
तापे बिजुरी तडकै  तड-तड, बरसै भद्रा झोर,
चरिह्यूं लंग जब घिरा अन्धेरा, लीन्ह कृष्ण अवतार,
कष्ट काट फिर करैं उजाला, उतरैं फिर से भूम, चौमासे में घूम.*

(* विशेष रूप से डॉ. अश्वनी अग्रवाल जी के लिए) 

३९.
सूगा-पांखी धान अब, बगुला-पांखी कांस,
मकई मीठी अब फरै, छिटपुट बादर आस.
निकसौ छांहहि-छांह अब, सांझ-सबेरे घूम,
तीखी, तिरछी, बींधती, धुली खुली अब धूप, चौमासे में घूम.


४०.

करिया पाख औ कारे मेघा, हाथ न सूझै हाथ,
पता न लागा तुमहू अइहौ, वैसन अन्हरी राह,
भूले से तनिकै टकराए, काहे ऐसन तूल, 
फ़िरहू फिर बरखा रितु आई, लिह्यौ वसूल ब्याज मय सूद, चौमासे में घूम.

४१.
बरखा मा व्यवधान कछु, कृषक गए अकुलाय,
हरे धान जब ख्यात मा, लगे तनुक कुम्हलाय,
कस ब्वावैं सरसों अबै, पुरवौ सूख पटान,
उठै आंखि बदरा तकैं, बरसौ हथिया झूल, चौमासे में घूम.

४२.
मनभावन अति रामगिरि, पठवै यछ सन्देश,
विदिशा विन्ध्य गुहा लखौ, मालव दशपुर देश .
कुरुछेत्र कनखल रमौ, क्रौंच रंध्र कै पार,
अलकापुरी सुहावनी, उड़ो मेघ सम दूत, चौमासे में घूम.

४३.
कालिदास बरनी छटा, छक चौमासा साम,
लहलह वन महमह करैं, वेत्रवती तट आन,
मद आलस गज डोलते, बगुला बांधें पांत,
उलटि अलक ऊपर तकैं, काढि नयन उठि कूट, चौमासे में घूम.* 


‎44.

तल-अवतल पुरखा तिरैं, पितर पाख भुइं ओर,
बरखा प्यास बुझै नहीं, तरपौ अंजुरी रोज़.
गया चलौ, नैमिष चलौ, पूजौ पिंडा पूर,
इक दिन पंछी उडि चलै, गंग तरैं सब फूल, चौमासे में घूम.



४५.
बाढें दिन चौमास कै, बाढ़े हिय अनुराग,
जैसे बाढें लतर वन, तिन्नी बाढ़े ताल,
बिरही सुमिरै दिन गिनै, पाले मन में आस,
लपकौ अरबर मेघ अब, वै बैठे हैं रूठ, चौमासे में घूम.

४६.
खिलै कुमुदुनी खाल मा, विहसन लागें चन्द्र,
घाम चुभै घमसाए कै, भूख परै अब मन्द,
नरिया बाँध बझावैं मछरी तडकैं जालहि ताल,
गाँवन मा अब दिखै नज़ारा, लरिकन कै करतूत, चौमासे में घूम.

४७.
हरसिंगार फूलैं संझा भर, भोर बिछें भू पाट,
झिलमिल झलकै घास पर, किरण परे उडि जात,
ठुनक धरे पछुआ चलै, घट-घर देवी आन,
गुड़-घिव समिधा में परैं, गमक उडै जग धूम्र, चौमासे में घूम. 


४८.

चौमासे मा जनम भा, फिर कैसे रहि जाय,
दस्तक देवै मेघ जब, पाँवन शनि चढ़ जांय,
गठरी लादे पीठ पर, बह्कैं नदिया कूल, 
खेमा डारैं रात में, दुसरै दिन फिर कूच, चौमासे में घूम. 

४९.

दुर्गा पूजा सज गई, लीला राम अपार,
नौ रातैं, दशमी चलै, महिष दशानन मार,
उड़न खटोला सम उडै, शीतल मन्द बयार,
महकै धान बिहान में, महकै माटी मूल, चौमासे में घूम.

५० . 
औघर दानी अस जियैं, जस चौमासे मेह,
तपैं जरैं बादर बनें, बरसु लुटावैं आपु,
उमडि घुमडि सब उलटि कै, भरैं खेत खलिहान,
प्रान भरैं सब जीव में, बाढें सब धन पूत, चौमासे में घूम.

५१.

चौमासे भरि कंठ पिया, अबौ अपूरित प्यास,रस पीवन जो हम चले, भरी नहीं वहु आस,अगली बिरिया फिर चलब, बह्कब देश जवार,शायद तबकी छक सकैं, वहै अपूरब घूँट, चौमासे में घूम.क्रमशः

५२. (अंतिम कड़ी)
चौमासा चौपर्ति गा, चन्दा चितवत आय,
चन्द्र-किरन अब चूमि कै, पायस अमरित पाय,
थोरै दिन की कसरू है, देव उठेंगे सूत,
चरन छुऐं सब मीत कै. अब धारैं हम चूप,

------------   नमस्कार ----------