Wednesday, June 28, 2017

गौरैया

गौरैया
१.
गरमी की चटक दुपहरी में
नानी के घर खेला करते। 
 आँगन में तुलसी चौरा पर,
गौरैया ताका करते।
 एक सकोरा पानी भरके
दाना छितराया करते।
गरमी से व्याकुल, खुली चोंच,
दल के दल आने लगतीं।
 पहले दूर फुदकती फिर,
ढीठ बनी नियरे आतीं।
 आँख मिचकती, चीं-चीं करतीं,
तिरछे से देखा करतीं।
२.
जब जातीं वे परच चिरइयां,
झांपी-सूपा ले आते।
 रसरी बांध छोटी सी डंडी
उनके नीचे अटका देते।
 थोड़ा सा दाना पानी भी,
नीचे से सरका देते।
 एक हाथ में रसरी थामे,
दूर तनिक बैठे रहते।
बिन बोले बिन कोई आहट,
दम साधे टोहा करते।
दाना चुगती कोई चिरैया
कब आए उनके नीचे।
३.
जैसे ही कोई आती-जाती,
फंसती चारे के चक्कर में।
रसरी खैंच उसे धर लेते,
उछल कूद कर खुश होते।
 तरह तरह के रंगों से,
उनको फिर रंगा करते।
 नानी जग कर गुस्सा करतीं,
कइसन उत्पात मचाए हो।
 'लइकन कै खिलवाड़ बुझाए,
 औ, चिड़ियन कै जिव जाए।'
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