Saturday, August 9, 2014

कोई 'सिला' मिलेगा

कोई 'सिला' मिलेगा  

१. 
कूचा-ए-राह चिकना, है राज जन पथों का, 
बागो सपन बगीचा, फूलों सजा दरीचा।  
 
२. 
मेला सा चल रहा है, पर हर कोई अकेला,
ज़ेरे बहस बहुत है, मसरफ ना कोई जिसका।   

३. 
है दोस्ती का लहज़ा, हाथों में गुल-ए-दस्ता, 
मुस्कान मुंह पे चस्पा, लगता है जोश झरता।   

४. 
आबो हवा में बसता, अरदब निज़ाम ही का,  
चहलो-पहल में डूबा, लगता मगर है तनहा।   

५.
जो ख्वाब ले के आया, आँखों में मुल-मुलाता, 
वैसा ही इसका मंज़र, धुंधला सा नज़र आया।  

६. 
गिरता हुआ भरोसा, खुद अपने आप ही का, 
अपना ही अक्स बदला, है शुकर आईने का।     

७. 
है यह शहर अजूबा, सब सून सान डेरा, 
उजियार में भी लगता, चहुं ओर घुप अन्धेरा।  

८. 
मंजूर-ए-रब को होगा, जो यह मुकाम अाया,  
है ये नसीब अपना, लौटा यहीं पे लाया।  

९. 
ना तब पता था रस्ता, ना अब कोई 'सुरागां',* 
है बस पता तो इतना, कुछ तो 'सिला' मिलेगा।**  

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* सुराग (clue) 
** फसल कट चुकने के बाद खेत में गिरे अनाज के दाने;  पारिश्रमिक या इनाम 

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