Wednesday, August 13, 2014

बाज़ी

बाज़ी  

१. 
इम्तिहान ऐसा, क्यों ले रहे हो भाई, 
इस सिलसिले की हमने, की है नहीं पढ़ाई।  

२. 
रहते रहे हो अव्वल, आगे की सीट पाई,
अपने हिसाब में ही, पिछली कतार आई।   

३. 
आलिम हो आप फ़ाज़िल, आली है शान पाई, 
हिस्से में अपने लेकिन, आधी अधूरी आई।  

४. 
तुम हो फनों के माहिर, करते हो रहनुमाई,  
हम हैं हुनर से खाली, रहते हैं तमाशाई।  
   
५. 
क्यों चाल ये चली है,क्यों फर्द ये बिछाई, 
हसरत से देखने की, अपनी है आशनाई।  

६. 
हम आँख मूँद खेले, वो हाथो हाथ आई, 
कंगले के हाथ जैसे, गिन्नी कहीं से आई।  

७. 
वो जीत-जीत हारी, ओ हार कर जिताई,  
है वक्त ने ही ऎसी, वो घूमरी खिलाई।      

८. 
अपनी गिरह थी खाली, क्यों दांव पर लगाई,  
वो जीत गए, फिर भी, जग में हुई हंसाई।    

९. 
ये रंगो नाज़ वाली, शाही मिज़ाज़ पाई, 
कोठी नवाब वाली, ये सब तो खूब पाई।  

१०. 
ये ज़िंदगी हमारी, है ज़र ज़मीं हमाई !!
जब चल पड़ी सवारी, मूठी भरी न पाई।   
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Sunday, August 10, 2014

कोई 'सिला' मिलेगा

कोई 'सिला' मिलेगा  

१. 
कूचा-ए-राह चिकना, है राज जन पथों का, 
बागो सपन बगीचा, फूलों सजा दरीचा।  
 
२. 
मेला सा चल रहा है, पर हर कोई अकेला,
ज़ेरे बहस बहुत है, मसरफ ना कोई जिसका।   

३. 
है दोस्ती का लहज़ा, हाथों में गुल-ए-दस्ता, 
मुस्कान मुंह पे चस्पा, लगता है जोश झरता।   

४. 
आबो हवा में बसता, अरदब निज़ाम ही का,  
चहलो-पहल में डूबा, लगता मगर है तनहा।   

५.
जो ख्वाब ले के आया, आँखों में मुल-मुलाता, 
वैसा ही इसका मंज़र, धुंधला सा नज़र आया।  

६. 
गिरता हुआ भरोसा, खुद अपने आप ही का, 
अपना ही अक्स बदला, है शुकर आईने का।     

७. 
है यह शहर अजूबा, सब सून सान डेरा, 
उजियार में भी लगता, चहुं ओर घुप अन्धेरा।  

८. 
मंजूर-ए-रब को होगा, जो यह मुकाम अाया,  
है ये नसीब अपना, लौटा यहीं पे लाया।  

९. 
ना तब पता था रस्ता, ना अब कोई 'सुरागां',* 
है बस पता तो इतना, कुछ तो 'सिला' मिलेगा।**  

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* सुराग (clue) 
** फसल कट चुकने के बाद खेत में गिरे अनाज के दाने;  पारिश्रमिक या इनाम 

Wednesday, July 23, 2014

एक दिन सजै मसाना है


एक दिन सजै  मसाना है

ना कोई बाम्हन ना कोई ठाकुर, ना बनिया ना लाला है,
स्वारथ बस बस एक गुट बैठें, यहै जगत की माया है।  

ना कोई रिश्ता ना कोई नाता, ना बबुआ बबुआना है,
राह कटे पर कूकुर बन अस, झपटै हलक निवाला है।    


ना कोई देवता ना कोई देवी, ना काशी ना करवट है, 
कैसेउ लछमी जगैं पलन में, एक्कै चाहत आला है।  

ना कोई ओझा, ना कोई सोखा, ना जोगी ना घोरी है, 
ना कोई दानी, ना कोई ग्यानी, ऐसै गड़बड़झाला है।   


ना कोई तापस, ना बलवाना, ना कोई सजग सुजाना है,
गावै केतनौ भजन कबीरी, रग रग रंग रस भीना है।    



ना कोई राजा, ना कोई रानी, ना परजा, ना चाकर है,
ना कोई प्रहरी, ना कोई पिंजरा, बखत परै उड़ जाना है।

ना कोई सुलझा, ना कोई उरझा, उरझत सुरझत जाना है, 
केतनौ जोड़ौ, केतनौ सिरजौ, एक दिन सजै  मसाना है। 

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Monday, June 16, 2014

यारी यार


यारी यार


घिरे घने अंधियार में, दीपक जले हज़ार,
गहरे में जब जा गिरें, राह दिखाएं यार।


ऎसी यारी कुछ करें, धक्का देंय गिराय,
उलटी वारी बह चलें, करने लगें प्रहार।


यारी करता है नही, होती है इक बार, 
बनी बावली घूमती, रहे पहेली यार।


चुन यारी चलती चली, रही आर या पार, 
चुनते ही वो कट गई. मिली ना यारी यार।


यारी की उनको मिली, तीखी बस तासीर, 
हमको मीठी सी मिली, जैसी पूनो खीर।


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Sunday, June 8, 2014

न पावैं सार


पढ़ा सुना गुनतै रहैं, समझ पावैं सार,

नियत घड़ी आए तबै, आखर हों साकार।


हम समझैँ हम कर रहे, करता सब करतार,

डाँड़ गहैं हम हाथ में, साधै खेवनहार।

कभी कभी ऐसा घटै, अकल पावै पार, 

सब कुछ लागै तयशुदा, मानै बारमबार।


Saturday, June 7, 2014

आए ना आए

आए ना आए, ज़िक्र तेरा आ ही जाए, 
जिस तरफ जाएं, उसी रस्ते पे आए।   

आए वो आए, हर कदम साए सा आए, 
सपने में आए, जागते लम्हों में आए।  

आए वो आए, इस तरह हौले से आए, 
फाख्ता उड़ते हुए, छज्जे पे आए।  

आए वो आए, आस का दीपक जलाए,
आए वो आए, फिर वही दीदार पाएं।  

आए वो आए, फिर वही कूचा दिखाए,
आए वो आए, याद वो कैसा सताए।  

आए ना आए, अक्स तेरा आ ही जाए,
जाए न जाए, नक्श वो आ कर ना जाए ।  

आए वो आए, किस कदर रह रह के आए, 
आए वो आए, आए वो लब से न जाए ।   

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Tuesday, June 3, 2014

चल कर देखें

चल कर देखें



वक्त ने एक मौक़ा दिया है 'भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग' के साथियों के साथ विभाग को सौंपी गयी ज़िम्मेदारियों को निभाने का, पूरी कोशिश रहेगी पूरा करने की।

नए दौर में नई उम्मीदें, नए सपने, लाज़िमी हैं। इन्हे असल ज़मीन पर आंकना और लाना सब की ईमानदार कशिश पर टिकता है। इस काम में साझीदारी ज़रूरी है सरकारी और गैर सरकारी सभी सरोकारों की।  

एक लय में तय न होगा, ये मुकामी फैसला,
कुछ कदम हम भी चले, इतना रहेगा हौंसला।

छोटे-छोटे कदम रखते बढ़ते जाने का काम हमारा है, ठिकाना कब मिलेगा बिना यह सोचे। चलिए चल कर देखें।

बुज़ुर्ग कहते हैं - चलने वालों को निगाह मिल ही जाती है।