Saturday, September 12, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४१

अब ना चलबै हो


कउवा खोह से लौटानी मे गुरदह जंगल में अटक गए कोटारों और नील गायों को भागते देख कर। वहीँ एक गयार के बताने पर दिल बहक गया दख्खिनी कगार की कनछ तर की बड़की मान तक टटोल आने को। 

ठेठ कगार पर निकली उस मान के बेहद आकर्षक ठौर को देखते ही रह गए। सामने घाटी तक उतरती चली गयी क्रमशः घटती वाली हरीतिमा से ढकी पहाड़ियां। सोन की नीली धारा के अगल-बगल गुलाबी-पीली सैकत का विस्तार। उनसे आगे ग्राफ-नुमा हरे भरे खेतों के बीच खिलौने जैसी झोपड़ियां। दृष्टि बाहरी दायरे पर डाला-ओबरा की धुँआ उगलती चिमनियां , नीचे हवा में तिरती उतराती पर तौलती चीलें, घाटी में फंसे रह गए भूरे-उजले, धूम-धुंआरे बादल, मानो हवाई जाहाज के जंगले से दिखती नीचे की अचरज भरी दुनिया।  


धीरे धीरे डोलती चली आ रही स्वछन्द ताजा हवाओं का आनन्द पाते बड़की मान की फर्श पर बिखरे लघु प्रस्तर-उपकरणों का परीक्षण करते गीबड चहकने लगे - 

'इहौ एक ठिकाना रहल वन-मनइन के लिए। देखा केतना सुन्दर नील गाय। उज्जर किनारी के भित्तर गेरुआ रंग से रंगल, पहुँचल कलाकार रहल होई। एक एक पसली केस देखउले हौ। औ एहर गले पर देखा उज्जर बुंदियन की दोहरी माला।  


ओकरे बगल में  देखा कुलि जन मेहरारू-मरद रेंगा-रेंगी हाथ उठवले एक्कै ओरी भगतै चला जात हवैं, लागाला गोहरवतौ हवैं काव जाने काव। साथे में एक ठे कुकुरौ देखात बा। बाह का बात हौ।  

औरौ और देखा केतना केतना मनइ, जनावर ------------ ।' 

बड़की मान से निकल कर अमला घाट के लिए निकले तो रास्ते में हथबनवा के किनारे एक और बेहतरीन खोह की टोह लग गयी। कभी आदिम मानव की चहल कदमी रही होगी यहाँ। अब यहां गाय गोरु सहित चौमासे में डेरा डालते हैँ गयार, गोछरा के हरियाले चारागाह गाँव से यहाँ खीच लाते हैं उन्हें। और इस वन में इस खोह से बढ़िया ठिकाना रहने के लिए होगा भी तो क्या। बस खोह की फर्श पर छोटी छोटी खुंटिया खोंप कर बाँध दिए गोरु, एक किनारे लगा दी अपनी गठरी-गोजी-टांगी, सील लोढ़ा औ तुरती तैयार चूल्हा। खोह के आरी-आरी खड़ी कर दी कांटेदार बाड़, बस और का चाहिए जंगल में मंगल मनाने को।  

खोह को तजबीजने की जुगत में लगते लगते अंधड़ पानी की घुमडन के चलते गोबर की तीखी गंध के बावजूद उसी में सिर छुपाने ढुक गए। मौसम साफ हुआ तो खोह की दीवारों पर निरूपित  चित्रों का एक और ज़खीरा उभर कर सामने आया। खुरदुरी प्रस्तर सतह पर अंकित पशुओं और आखेट दृश्यों के बीच-बीच में टोलियों में नाचते नृतकों के दृश्य। एक किनारे बाहों में बाहें डाले दस-ग्यारह नर्तक।  



दूसरे सिरे पर मस्त नाचते कद्दावर नर्तकों की अदभुद टोली। ऐसे दिगम्बर नर्तकों का चित्रण फिर और कहीं नहीं दिखने को मिला। सिर से ऊपर उठ कर विशिष्ट मोहक भंगिमा में घूमती हुई अजानु बाहें, घुटनों से सिर और कन्धों से अँगुलियों के पोरों तक नरम लचक। एक की हथेली सुरुचिपूर्ण मुद्रा में मुड़ी हुई, कुछ के उठे हाथों में गोजी। चौड़े पंजे, लम्बे हाथ, प्रशस्त वक्ष, दृढ स्कन्ध वाले नर्तक सधे क़दम नृत्यरत, उल्लास भरे निःशंक नाचते हुए। दबाव से मुड़े मुलायम बेंत जैसी कमर, कूल्हे, गरदन और हाथ।  गति, लय और भावाभिव्यक्ति का अदभुद चित्रण। मानो एकात्म हो गए हों शास्त्रीय सधाव और प्राकृतिक अल्हड़पन। जाड़े, पाले, पानी और गयारों के चूल्हों की आंच-धुंआरे की मार से ये गतिमान नर्तकों का दृश्य अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें लेता दिखा। कई नर्तकों का पैर बचा रह गया तो कुछ का सिर, बाकी भी धुंधले हो चले थे।  ध्यान दिए बिना साफ़ दीखते भी नहीं।  

हथबनवा से निकल कर अमला घाट ऊपर पहुंचने पर दूबे ने लखमा की खोह भी देख लेने को रास्ता दिखाया। हमें उधर मुदते देख घिसटते चले आ रहे गीबड़ लगे चिचियाने -  

'अइसन रेसर्च तोहनै लोग करत जा। अब हमसे ना चलल जाई। ई दूबे के न जाने कउने जनम कै दुश्मनागी बा हमसे। कुलि हो गइल तो लखमा कै लूजी लगाय देहलन। '

किसी ने भी उनको भाव नहीं दिया तो बेचारे पीछे पीछे चलने के अलावा उस निरल्ले वन में करते भी तो क्या।

दूबे जी की मेहनत से हमारी खोज की फेहरिस्त में कौआ कउआ खोह, कनछ तर, और हथबनवा के साथ लखमा की मान भी जुड़ गयी। 

एक्सरे स्टाइल वाले चित्रों की भरमार, पसलियों और अंदरुनी अंगों सहित चित्रित पशु, गर्भस्थ पशु-जलचर। विचित्र अश्वमुखी कर्णधारी मछली। मेढक जैसी गर्भधारी आकृति। आखेट, अल्पना, वनस्पतियों के निरूपण से आक्षादित खोह।


लखमा से निपटे तो दूबे ने केरवा घाट की खोहों तक ले जाने वाला रास्ता भी बताया लेकिन तब तक खोहों से छक चुके हम कैम्प के रास्ते पर लौट चले। हमारे कदम से सबसे ज्यादा तेज़ कदम बढ़ाते गीबड़ मुस्किया कर गाने लगे - 

'बाय बाय बा-अ-अ-बा खोड़वा पहाड़। 
अब ना अइबे तोहरे घाटे ऐ बाबा हो।  
अब ना चलबै ऐ दूबे, अब ना चलबै हो। 
कैम्प चल के तोके देखब अभय गुरु हो-अ-अ-अ। '

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४०

लिख लोढ़ा पढ़ पाथल


अगले मसले और भी उलझाऊ रहे। वनवासी आदिम चितेरों ने इन खोहों, ढोकों में जहाँ तहाँ जगह जगह सदियों तक ये चित्र बनाए क्यों ? 

'अरे एहमन एतना का हौ माथा फोरै बदे।'  अभय ने मंच संभाल लिया। 'आखिर उहौ लोगन मनइयै ना रहलें। ओनहनौ में कुछ मिला कलाकार रहल होइहन। अगले बगले जउन कुछ देखलैं रच देहलैं।'

उनके हिसाब से ये चित्रण किए गए सहज अभिव्यक्ति की प्रवृत्ति से। लेकिन सारे साथी इस मत पर एकमत नहीं हुए। अभय ने अगला पत्ता फेंका -  

'तब मकान कोठी तो रही नहीं। अइसन खोह पाए के मनई एही में रहत होई। बरसात में पानी औ गरमी में धूप से बचै के ऐसे बढ़िया ठिकाना दूसर का रहल होई। औ शीत लागै तो तापै बदे जलावन की कमी नहीं।  जहां रहल ओके सजावै बदे इहौ कुलि बनवलस।'

बात तो अभय की पते की लगी लेकिन एक और साथी ने ओझाई सोखाई के तन्त्र मन्त्र के साथ ऐसे चित्रण की परम्परा की ओर ध्यान दिलाया। अहेर निकलने से पहले जिस वन्य जीव को मारने का इरादा हो उसके आखेट का दृश्य बना कर मन्तर टोना पढ़ा, उसके बाद निकले अहेर पर, यह मान कर कि मनोरथ अवश्य पूरा होगा। ऐसा भी होता रहा होगा कि अहेर मार कर लौटे तो सफलता की सनद के तौर पर रच डाले।  

यह चर्चा सुन रहे गीबड़ महराज ने अपने ज्ञान का छौंका लगाया - 

'तोहन लोगन कुछ पढ़बौ करौ ला कि अइसनै चला आवा ला रेसर्च करै। कब्बौ लाइबरेरियौ में दीदा लगावल करा। अइसनै जगह के कहा जा ला 'सैक्रेड प्लेस'। आस्ट्रेलिया के 'ककादू नेशनल पार्क' के आदिवासिन के लइके सयान हो जा लें तो अइसनै खोहे में लियाय जाय के ओझा औ कबीले वाले बूढ़ पुरनिया ओनकर संस्कार करै लें। जैसे अपने ओरी जनेऊ मूड़न हो ला कउनौ तीरथ में। वइसने पवित्र ई खोहौ रहल होई, ओ जमाने में। एक तरह कै मंदिलै समझ ल्या इनके। '  

हमें सचमुच अंदाजा नहीं रहा कि गीबड़ इतने गहरे होंगे। अभय भी मुंह खोले सुनते रहे। हमने सोचा अगला सवाल भी इन्ही से हल करा लिया जाय - 

'अच्छा तो जब एतना जाना ला तो इहौ बताय द्या कि ओन्हन कै रंग और कूची कइसन रहे।' 

'अरे ई कउन मुश्किल बात हौ। तोहरे सब जनबै करा ला गेरू कै टुकड़ा इहां ढेरै मिला ला।  बटोर के लियाय अईलें। औ सफ़ेद रंग चाहे तो चूना पत्थल बटोर लवतैं। पथला पे घिसतै भर सूखा रंग मिल गइल। ओके घोर देहलें तेल कितौ अण्डा के ज़र्दी में औ का जाने कउन कउन पत्ता के अरख में। बस हो गइल रंग तय्यार। ओकरे बाद साही कै काँटा, परिन्दा के पंख औ बांस टहनी कै कूचल कूची बन गइल रंगै बदे तूलिका। काँटा से बनावें किनारी ओ कूची से भरें अन्दर कै रंग।

धियान से देखत जा। सफ़ेद किनारी के भित्त गेरुआ रंग से रंगल महिष औ मछरी औ जाने कउन का।  '

गीबड़ को इतना ज्ञान बखारते देख दूबे ने बड़े ही विनीत भाव से जानना चाहा - 

'और सब तो बता दिया। फिर ये भी बता दीजिए कि इनका सुनिश्चित काल-निर्धारण करने  के लिए किया क्या जाय ?' 

'एकरे लिए खोहन कै फरस (फ्लोर) पर हेरेक परी।  जो कहूँ तब के मनइन के बनावल औजार औ बनावै खावै से बचल कोयला के साथे घिसल गेरू मिल जाए औ कोयला का डेट मिलै तो कुछ अंदाजा लाग सका ला। औ अइसनौ हो सका ला कि किस्मत से कउनौ रंगल पाथल का चिप्पड़  टूट के ओही में दबाय गइल होय, तब तो ओकरे उप्पर नीचे के कोयले का डेट से अउरौ सटीक अंदाज मिलि जाइ।  

सबसे बढ़िया तो तब होई जब कउनौ बिधी से सूधे रंग की डेटिंग हो सके। बकी ये समिस्या अशोक ओ बिक्रमादित्य बांचै वालन से ना सधी एकरे लिए तो बस साइंस वालन के माथा फोरैक परी।' 

गीबड़ की बात पूरी भी नहीं हो पायी थी कि अभय ने अगला सवाल दाग दिया - 

'औ करिया रंग कहाँ से आइल ?'

सुनते ही गीबड़ भड़क गए -

'कुलि हमही बतायी तो तोहन सब का करब्या। गुण्डई लिहाड़ी छोड़ के जा जाके पढ़त लिखत जा। नहीं तो रहि जाब्या बस लिख लोढ़ा पढ़ पाथल।'

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३९

तुक्के पर तुक्के  


कउआ खोह की कला-दीर्घाओं की देखा-देखी तो हो गयी लेकिन किस परत के चित्र कितने पुराने, क्यों और कैसे बनाए गए इन गुत्थियों का रगड़ा-झगड़ा  नहीं सुलझा। सब जन मिल कर लगे बूझने बुझाने।

बिना रंग भरे किनारी के सहारे दू ठे तिकोना ऊपर नीचे टिका कर बनाए गए मनई सबसे नए होने चाहिए, आज भी मड़ैया के बाहर वाली भीत पर, कोहबर और अल्पना में इनसे मिलते जुलते आदमी-औरत आज भी चित्रित देखे जा सकते हैं। लेकिन यहां इन्हे किसने कब बनाया इस पर कोई  राय-बात बन नहीं सकी। 

उनसे नीचे के लोरिक के युद्ध वाले चित्रों में दीखते झूलर झालर झुमके साजे लड़ाकों के पहनावे और ढाल-तलवार तकरीबन अठारह सौ बरस पुराने कुषाण-काल के पहनावों से मिलते-जुलते लगे। लेकिन बहस इस बात पर अटक गयी कि इस इलाके में अब तक तो तब की कोई मूर्ति या और कोई कलाकृति तो मिली नहीं है। इसके अलावा तब से चली ऐसे अभिप्रायों के चित्रण की परम्परा बहुत बाद तक चलती रही है इसलिए इन्हे कितना पुराना कहें ? कोई हल निकलते न देख कर तुक्के से काम चला कर ऐसे चित्रों को हज़ार बरस या उससे कुछ बाद का मान लिया। मछली के आखेट और महावराह वाले चित्र भी इनके साथ रख लिए।  

तीसरी चौथी परत वाले चित्र ऊपर वालों से पुराने लेकिन कितने यह सवाल हम सब की समझ से परे की बात हो गयी। 

उनसे भी नीचे की परत वाले कहाँ रखे जाएं इस सवाल के जवाब में और और इलाकों में मिले इनसे मिलते-जुलते उन चित्रों का ज़िक्र होने लगा जिन्हे लगभग चार-पांच हज़ार बरस या उनसे भी पुराना मानने के लिए अहेर और संग्रह के दृश्यों और अस्थि या प्रस्तर-निर्मित भाले, हारपून और दोनों ओर कांटे वाले तीरों के प्रयोग को साक्ष्य माना गया है। ये अवयव मानव सभ्यता की उस अवस्था के प्रतिनिधि माने जाते हैं जो पशु पालन, खेती और धातु के उपकरणों के प्रयोग के चलन के पहले आती है।  मामला उलझ गया इस मसले पर कि वह अवस्था तो लाखों लाख बरस से चली आ रही है, ऐसे में इन चित्रों को कहाँ और किस गड़ना के आधार पर रखा जाये। इस मामले में प्रकारान्तर से सहायक बने खोह की निचली सतह या फर्श और आस-पास बिखरे लघु पाषाण उपकरण जिनकी सहायता से दोनों ओर खांचे काट कर दांते-दार तीर बनाने की परम्परा तकरीबन आठ हज़ार बरस पहले तक तो ले ही जाती हैं। इनके साथ मिले घिसे हुए गेरू के टुकड़ों ने गेरुआ रंग निकालने के लिए उनके प्रयोग की सनद जुटा दी।  मध्य प्रदेश में भीम बेटका और मिर्ज़ापुर की लेखनिया आदि की खोहों के जमावों में मिले ऐसे ही गेरू वाले जमाओं के जले कोयले की रेडियो कार्बन तिथियाँ भी आठ हजार बरस पीछे  तक ले गयीं। 

सबसे नीचे के काले पड़ चुके चित्रों की बारी आने तक तुक्के बाज़ी भी जवाब दे गयी। हमारी गड़ना के हिसाब से वे आठ हज़ार बरस से भी ज़्यादा पुराने हो सकते हैं लेकिन कितने यह तो बस अनुमान का ही विषय होगा। कौन सा चित्र सचमुच किस काल का होगा यह जानने के लिए किसी नयी प्राविधि के ईजाद होने का इन्तिज़ार ही करना पड़ेगा, तब तक के लिए नपे-तुले तुक्के पर तुक्के ही चलेंगे।  

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३८

आदिम कला दीर्घा में युद्ध, आखेट, नाच ही नाच


खोह क्या है,, आदिम चित्रों की विशाल कुदरती कला-दीर्घा समझिए। वहाँ निरूपित चित्रों  की परम्परा पहली नज़र में ही सदियों पुरानी लगी। तर-ऊपर अंकित हलके, धुंधले, गाढ़े, गेरुए रंग से रचित पशुओं, मानव-आकृतियों और तरह तरह के संयोजन। 

सबसे नीचे की परत में काले दिख रहे धनुर्धर युद्धरत योद्धाओ की कतार की ओर दूसरी ओर से चलाए गए बढ़ते तीर, कंटिया में फंसी मछलियाँ और जानवरों के चित्र। उनके ऊपर गेरुए रंग की मानवाकृति। उनसे भी ऊपर पसलियों सहित दर्शाए गए महिष और गर्भवती हथिनी। उन पर दोहरी आउट लाइन में प्रदर्शित पशु। सफ़ेद रंग में रचे कांवर धारियों की कतार उनसे ऊपर। फिर लोरिक  के साथ वाले चित्र, और सबसे ऊपर-नीचे त्रिकोणों से चित्रित केवल रेखाकृतियाँ। छह-सात परतें तो आसानी से पहचान लीं।  इनसे भी ज्यादा चित्रों की परतों को परखना खुर्दबीन के बिना संभव नहीं।  

एक दृश्य में पसलियां और जिगर सहित 'एक्स रे स्टाइल' में सफ़ेद किनारी के बीच गेरुए रंग से दर्शाए गए महिष के आखेट के दृश्य ने ध्यान खींचा।  जगह जगह से पाषाण-पट्ट के उधड़ते जाने से इसके कई हिस्से विरूपित दिखे। कई भालाधरी और धनुर्धर महिष पर आघात करते और एक आखेटक उसकी सींगों से हवा में उछाला गया दिखा। 

एक दूसरे दृश्यांकन में एक बहुत बड़ी मछली को कंटिया में फंसा कर मारते दो धीवर। उनसे अलग प्रदर्शित तलवार-ढाल धारी एक कद्दावर योद्धा के साथ दो छोटे कद वाले योद्धा। एक महावराह के सामने खड्ग-ढाल वाला योद्धा, एक ओर एक और बड़ा महिष। दूसरी ओर एक मगरमच्छ को घेर कर मारने का दृश्य। चित्रों के ऊपर कोलतार से लिखे चिरुई गाँव के रामधनी का नाम।  


खोह में निरूपित चित्रों का जायजा ले कर हम आस पास का मुआयना करने निकले। घूमते-घामते खोह के ऊपर पहुँच कर दूसरे ही प्राकृतिक सौंदर्य में डूब गए।  वहीं एक छोटी खोह की तरह आगे निकले प्रस्तर खण्ड के भीतरी सतह पूरी तरह गेरुए के चित्रो की भरमार देख समझते देर नहीं लगी कि हमारी तरह आदिम मानव भी यहाँ के विहंगम नज़ारे का आनंद लेते हुए अपनी तूलिका का जादू बिखेरते रहे होंगे।  

वहाँ निरूपित बेल के वृक्ष पर चढ़ कर फल तोड़ते दृश्य के नीचे के संयोजन में चित्रित नर्तकों की तरह तरह की मुद्राएं और भंगिमाएं देखते ही बनतीं।


आनन्द-मगन मय थिरकन के जीवंत रूपांकन।  उद्दाम नृत्य की सटीक भावाभिव्यक्ति। मस्ती, उल्लास, गति, और लय के चरम का संतुलित चित्रण। नर्तकों के एक एक अंग में दिखता लास्य और उमंग में लचकते अंग-प्रत्यंग। मानो साक्षात नृत्य ही प्रत्यूपित हो उठा हो। बीचो बीच ओझानुमा मुख्य नर्तक, लहराते हुए एक हाथ में कमान और दुसरे में दोनों और कांटे वाला तीर थामे, परिंदों के परों वाली फ़ुल्लीदार सिरोभूषा से सज्जित, पैर घुटनों से मुड़े, कटि-प्रदेश से वक्ष तक वर्तुल लहरिया। उसके सामने आधुनिक ट्विस्ट की मुद्रा में एक और उसके पीछे मौज में डूबा एक और नर्तक, उसकी गरदन ख़ास मौजू ख़म के साथ आगे लहराती हुई।  पता नहीं तब मदिरा का प्रचलन रहा कि नहीं मगर एक एक अंग से मानो मदिर महुआ टपके। पूरे दृश्य में नाचते गाते झूमते नर्तक।  एक के मुंह में लगा कदाचित कोई वाद्य। एक विचित्र लंबा नर्तक और एक नाचता हुआ बच्चा।  मानो विजय शाल की थाप पर एक ले थिरक रहे हों - गहा गड्ड, गहा गड्ड, गहा गड्ड।     

खोह के ऊपर की पहड़ी और आस पास के कुदरती सैंदर्य ने हम पर जादू सा असर किया। तन मन तर मगन हो गए। यह जादू आदिम मानव पर भी भरपूर चलता रहा होगा।  आज के उन्नतिशील आदमी के मनो मालिन्य ने इस आनंद को भी मिलावटी बना दिया है। वैसे मनो भाव वैसा नशा अब कहाँ।  वैसे गाछ, हरियाले वन, और वन्य पशु अब कहाँ।  और फिर यह नशा आज के काठ हो चुके दिलों पर नहीं संवेदनशील लोगों पर ही तो असर करता है।  आज हम हंसने, गाने, नाचने के साधन और अवसर तलाशते हैं और तब - जब मन चाहा नाच-गा लिए, अहेर मार लिया तो नाचे-गाए, उछाह में नाचे, देवी उपासन को गाए-नाचे, मांस भूनते हुए नाचें, विपदा भगाने को नाचें, बला टली तो नाचे-गाए। नाचने गाने का निर्धारित समय या अवसर नहीं। घड़ी-घड़ी मन झूमे, जब मन झूमे तब तब नाचने गाने की तरंग उमंग, एक एक क्रिया कलाप से जुड़ा नृत्य, जीवन के हर पल में संगीत।  

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Tuesday, September 1, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३७

इलहाम

कभी कभी ऐसा घटै, अकल न पावै पार, 
सब कुछ लागै तयशुदा, मानै बारमबार। 

जीवन में जो कुछ भी घटता है सब पूर्व निर्धारित है यह कथन बचपन से ही जब तब सुनता रहा लेकिन बहुत लम्बे समय तक इस पर तनिक भी विश्वास नहीं करता। बाद के अपने ही जीवन में कभी कभी कुछ ऐसा देखने सुनने के दुर्लभ अवसर पाए कि ना मानने की गुंजाइश नहीं रही। कउवा खोह में बितायी उस रात के अनुभव ने एक बार फिर उक्त कथन की पूर्ण पुष्टि कर दी।  

अभय ने राजकुमारी की मार्मिक कथा सुनाने के बाद सोने के पहले सब को आगाह किया - 

'देखा बाबू। एह बन में कइसन जंगली जानवर रहै लें सब केहू जनतै हउवा। हम्मन के चाही कि पारी पारा एक मनई जाग के अलाव में आगी जगाए राखै। जब ले अलाव जली जानवर नजीक ना अइहन।'

अभय ने अंकवारी भर मोटा लक्कड़ अलाव के बीचो बीच जमा दिया। फिर, उनके कहे मुताबिक़ रात भर जागै वालन की पारी बंध गयी। सबसे पहले शेषमन की जाग रही। वो तम्बाकू मलते तैनाती पर डंट गए। बाकी के लोग जिसका जहाँ मन किया पड़ रहा। गीबड़ राम ने जिद्दियाय के सबके बीच में ठिकाना बनाया - 

'बघवौ आयी तो बिच्चे वाले पर नहीं, किनारे वाले लोगन, अभय-दूबे, तोहनै पर सबसे पहले कूदी।' 

अभय ने मेरे साथ अलाव के पास ही तिरपाल बिछाते हुए चुटकी ली - 'चला चला सूतत जा। खाए के मिल गइल तो बहुत बोली फूटत हौ। '

गीबड़ भी कहाँ मानने वाले -  'एतना तो मनई दुश्मनगियौ में करा ला। हम तो मेहमान हई मेहमान। कउनौ एहसान ना कइले हउआ। '

गहराती रात में अभय गुरु ज्यादा भिड़ने के मूड में नहीं दिखे। गीबड़ की सुनी अनसुनी कर के लेट गए।   

शेषमन अपनी पूरी पारी जागा, फिर, दूसरी पारी वाले को सहेज कर सो गया। अगली बारी वाले कुछ देर तो जागते रहे फिर कब सो गए उन्हें ही पता नहीं चला।  

तब तक मैं गहरी नींद में डूब कर सपन-लोक में विचरने लगा। सपने में ही देखा - 

खोह में जल रहे अलाव का सबसे मोटा कुन्दा बीच-बीच में जल कर पतला हो गया है और बाकी का समूचा सुर्ख दपदपाता शोला। थोड़ी ही देर में बहुत बड़े अंगार में तब्दील हो कर टूट कर लुढ़कने की कगार पर आ गया। सोचने लगा यह टूटा तो ढलान की ओर लुढ़कता हुआ आएगा। और ढलाव तो हमारी ओर ही है। और अगर इतना बड़ा विजयशाल का जलता हुआ कुन्दा इधर आया तो मेरे और अभय के भसम हो कर उस लोक चले जाने में पल भी नहीं लगने वाला। अलाव की लपटों की लाल-पीली आभा अभय के चेहरे पर लपलपाने लगी।

इसी समय  सहसा नींद टूट गयी। पलक खुलते वैसा ही जलता अलाव वैसा ही शुर्ख मोटा कुन्दा दिखा, बस अब लुढ़का कि तब। मानो अभी भी सपना ही चल रहा हो। झट से उठ कर खड़ा हो गया। अभय पहले की तरह सोते रहे, उनके चेहरे पर लपटों की साया लपलपाती रही। दमक बढ़ने के साथ कुन्दा टूटने लगा तो अभय को झटक कर उठाया। उनके खड़े होते -होते कुन्दा लुढ़क कर उसी तरफ आया।  हम छटक कर दूर हट गए। जहाँ हम सो रहे थे तिरपाल का उतना हिस्सा भक्क से जल कर राख हो गया। इस तरह मौत का वह परवाना हमसे कुछ ही पलों के फासले से फिसल गया। हम हकबक देखते ही रह गए। 

कुन्दे के टूटने लुढ़कने और अभय को उठाने की हड़बड़ाहट से सब साथी जाग कर जुट आए लेकिन किसी को भी एकबारगी इतने बड़े हादसे की समझ नहीं आयी, जब समझे तो निस्तब्ध रह गए। 

सबने मिल कर अलाव को ठीक किया, चारों ओर से बड़े-बड़े पत्थरों से घेर दिया जिससे अब कोई जलता हुआ लट्ठा या टहनी हमारी ओर ना आने पाए। अलाव की लपटें फिर से ऊंची उठ चलीं, खोह में परछाइयाँ खेलने लगीं। लेकिन अब हमारी आँखों में नींद कहाँ। उधर पूरब में निकले पीले अधकटे चाँद की रुपहली चादर फैलने लगी। खोह से सटे सलई की सफ़ेद शाखें और ज्यादा चमकने लगीं। 

मैं चुपचाप अपने आप में खो गया - जो अभी आगत है वह हूबहू कैसे दिख गया। क्या सब कुछ पूर्व निर्धारित है ? सब कुछ ? इस लोक में आना, संगी साथियों का मिलना, अभय, शेषमन सबका साथ, यहां इस खोह में आना रहना, सब कुछ ? --------- इस बार का सपना सच साबित हुआ। लेकिन कौन सा सपना सच होगा कौन सा नहीं, कैसे पता चले। हजारों हजार में से कोई कोई ही सच हो जाता है, वह भी कब कैसे  ?  ------

अभय ने चुप्पी तोड़ी - 'एही के कहै लें - इलहाम। सबके नसीब में ना हो ला। '

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३६

भउजी मरववलीं 

शेषमन और बाक़ी साथी खोह में एक ठिकाने पर तिरपाल बिछा कर अपनी गठरी मोठरी, बिछौना-ओढ़ना सब सामन तरतीब से सहेजने में लग गए।  उधर हम दो-तीन लोग दूबे जी की निगहबानी में अँधेरा घिरने से पहले पानी भर लाने निकले। 

खोह के पूरब का ढलान उतरते ही बायीं ओर की चट्टानों में लोटती आती धारा मिली, दाएं मुड़ कर उसके साथ-साथ चलते गए। आगे चल कर धारा पहाड़ के कगार से उतरते प्रपात तक ले गयी। डूबते सूरज की तिरछी रौशनी में नीचे सघन वन में उतरती चमकती धारा कहीं दिखती और कहीं हरियाली में गुम होती, सोन का विस्तृत पाट और चौड़ा प्रवाह, उस पार बौनी पहाड़ियों का फैलाव। प्रपात के साथ नीचे उतरने पर मिला ऊपर से गिरती जलराशि समेटता गहरा कुण्ड। उसके नीचे एक और ऊंचा प्रपात बनाती उतरती धारा। कभी कभार ही दिखने वाला प्रकृति का ऐसा अनुपम सौंदर्य देखते छक गए तो हम अपने-अपने जरी कैन और बोतलें भर कर लौट पड़े।  
इस बीच अभय गुरु ने खोह के आस-पास बिखरी टहनियाँ बटोर कर पत्थरों से बने चूल्हों में सुलगा कर भात-दाल चुरने चढ़ा दिए। 

अंधियारा गहराने के साथ झींगुर झनकने, हुड़ार हुहुआने, घुघुआ घुघुआने से सन्नाटा टूट टूट जाता। उड़ते हुए चमगादड़ खोह में आते, हम सब अपनी अपनी खोपड़ी बचाने लगते कि कहीं वहीँ चपक कर गंजी ना कर दें, लेकिन ऐसा होता नहीं, वे आते चक्कर मार कर निकल जाते। कभी कभी दूर कहीं छाया सी भागती दीखती।

थकान, अँधेरे, सूनसान के बावजूद दूबे, अभय और शेषमन टांगी-गोजी संभाले वन में निकल गए रात के अलाव के लिए लक्कड़ बटोरने।  सभी लोग थक कर निढाल पड़े नज़र आए। कोई इधर लेटा कोई उधर पड़ा। बात बात पर बोलने वाले कृशकाय गीबड़ मुंह तक चादर तान कर लेटे दिखे तो संशय हुआ कहीं बीमार तो नहीं पड़ गए, इस बियाबान से लाद-फांद कर ले जाने में भी सांसत होगी। पूछने पर वो तो हूँ हाँ भी नहीं किए लेकिन औरों से पता चला अभय से कुछ रौं चौं होने के बाद से रिसियाए पड़े हैं।  

जंगल से लक्कड़ काटने की एकरस खटा-खट्ट आवाज़ गूंजने लगी, थमी तो पहले की तरह सन्न माहौल। फिर करीब आती पद-चाप और बोल-चाल सुन पड़ी।  थोड़ी ही देर में खोह में पहुँचे अभय, दूबे और शेषमन ने काँधे पर ढो कर लाए खासे मोटे सूखे लक्कड़ ला पटकने से एकबारगी टूटी ख़ामोशी से आस-पास के पेड़ों पर जमे घुघ्घू खड़भड़ा कर और चमगादड़ चिचियाते हुए उड़ पड़े। आस-पास कोई और भी वन्य जीव रहे होंगे तो उन्होंने भी भागने में ही खैर समझी होगी।  

अभय और दूबे ने आनन-फानन में तीन लक्कड़ आड़े तिख्खे अड़ा करके अलाव जलाया। स्थिर हुए तो भोजन पानी की ओर घूमे।  दाल-भात-भर्ता सब पक कर और आंटा माड़ कर तैय्यार रहा। ऊपर से अभय गुरु की पीसी धनिया-प्याज-लहसुन और मिर्च की चटखारे दार चटनी। दूबे रोटी सेंकते और शेषमन अलाव में फुलाते जाते। ऐसी स्वादिष्ट सोंधी लाल लाल गुदगुदी मीठी रोटियां भर्ता-चटनी के जायके के साथ ना  कभी पहले चखी, ना कभी बाद में ही। सब लोग खाने में जुट गए तो अभय की निगाह चादर ताने पड़े गीबड़ पर गयी।  

'का हो उठता काहे नहीं खाना खाए के ?'

उधर से कोई सुन्न मुन्न नहीं। 

सुनील ने बताया - 'जबसे तोहसे कहा सुनी भई है, तब्बै से रिसियाए गइल हउवैं।'

'अरे हाँ रिसियाइल हउवें तो खनवौ ना खइहन। अबहियैं करी ला एन कर खातिर।'  

अभय गीबड़ की ओर लपकते हुए बोले तो वे चादर झटक कर उठ बैठे - 

'देखा अभय दूरै रहिहा हम तोहरे जस  गुण्डन से लिहाड़ी नाहीं लेती। जो जनले होतीं कि तोहनौ आवत हौवा कैम्प में तो कब्बौ ना अवतीं। कुल बताउब गुरु जी के इहै बदे भेजले रहलें। '

अभय गुरु इस सबसे कहाँ रुकने वाले थे - 'गुरु जी से जऊन ओरहन लगावै के होई लगइहा, अबहिन तो बस जउन बनल बा खात जा।'

मानो इसी मौके की तलाश कर रहे गीबड़ सीधे भात-दाल पर टूटे, ना दाएं देखें ना बाएं बस सुड़कते चले जाएं। लोगों की हंसी का ठिकाना नहीं रहा।  

खा-पी कर छक गए तो अलावा के आस-पास अधघेरा बना कर बैठ गए। सूखे लक्कडों और टहनियों के जल-जल कर चटखने, टूटने और गिरने की आवाज़ों के साथ चिंगारियां उड़ने लगीं।  लपटों के उठने बैठने लपलपाने-लहराने के साथ खोह के अंदर बाहर परछाइयों के डोलने के साथ प्रेत-नृत्य जैसा रहस्यमय दृश्य रच गया। अभय गुरु इसी इलाके में सुनी एक लोक कथा सुनाने लगे - 

'बहुत पुरानी बात हौ।  एगो रहन राजा एगो रहिन रानी । 
उनसे जन्मे दू गो राज कुमार एगो राजकुमारी। 
तीनों बड़हर सुन्नर औ खुशदिल। हिल मिल कर खूबै खेलै, राजमहल का अंगना बगइचा-बाग़ सब गुलजार किए रहैं ।  
अइसनै  खेलत कूदत बचपना बित्तल। तीनों सयान भए तो रजवा जेठे राज कुमार का बियाह रचाय के दूर राज से  कुंवरानी लियाय आये।  
तो बाबू। एहीं से सब रगड़ा शुरू हो गइल। 
दुनिया जाना ला - काठे क ननद गरियाये। 
भउजइया देखे कि ओकरा पती अपनी बहिनिया से बहुत लाड़-दुलार करै ला तो जरि के राख होय जाय। 
ओकरे बाद का भइल बाबू !
कि भउजइया झूठ साँच भरै लागल अपने पती कै कान।  
धीरे धीरे एतना कि सनेह के बदले द्वेष कै आग परचै लागल उनके हिरदय में। 
फिर का भइल बाबू।  
एक दिना राजकुमारी हेराय गइल। राजा-रानी अहलकार मनई सब ओरी हेरलें बकी  ना मिलल ओ कर नाम-ओ-निशान। 
राजमहल में ओर दुःखै दुख पसर गइल। राजा रानी परजा सब दुःख के जियतै मूरत बनि गइलन। 
संझला राज कुमार केहु से ना बोलै ना बतियाए, बस गुम्मै सुम्म रहै।  एक दिना ऊ  चुपके से निकल गइल सतुआ-गुड बाँध के राजकुमारी के हेरै।'

इतना सुना कर अभय रुके तो दम साधे सुन रहे सब का ध्यान टूटा। शेषमन अंटी से तम्बाकू की डिबिया निकालने और दूबे सिगरेट सुलगाने के उपक्रम में लग गए। गीबड़ आगे कहानी सुनने को अरबराए - 

'फिर का भया गुरु ! आगे सुनावा।'

अभय मुस्कुरा कर आगे सुनाने लगे -  

'फिर का बाबू ! छोटका राज कुमार चलतै चलत चली गइल हेरत-खोजत। कौनौ चीन्हा सुराग नहीं। 
अइसनै एक दिना एक निरल्ले बन में चलत संझा भइल तो रात बितावै बदे एक महुआ के गाछ तरे टिक गइल। 
बनाए खाए के ओहीं सूतै के पड़ गइल बकी ओकरे आँखीं में नींदियै ना अमाय। 
अब देखा राती में का भइल बाबू !'

सबकी जिज्ञासा का पारावार नहीं। अपनी जगह से कोई हिले ना डोले।   

'आधी रात बितले के बाद बरम मुहूरत में महुआ बड़े मार्मिक सुर में रोय रोय गावै लागल।  बहुतै करुना भरे बोल में, बारम्बार एक्कै पाँति दोहरावै।  

भइया मोर मरलें, भउजी मरववलीं, 
हमरे रकत से चुनरी रंगववलीं।'

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भइया मोर मरलें, भउजी मरववलीं, 
हमरे रकत से चुनरी रंगववलीं।'

राजकुमार के बड़ा अचरज भया महुआ के गाछ औ मनइन की बोली भाषा में गावै। तब ऊ पुछलस महुआ से, तैँ कइसे हमरे भाषा में गावत हए ? 

महुआ ने पूरी बात इस तरह बतायी -

भउजी के लगवले बुझौले पर भइया एतना कुपित हो गइलन कि एक दिना फुसला के बन में लियाय अवलें। निरल्ले में तलवार से काट के हम्मै मुआय देहलें। हमरे रकत से चुनरी रंगवाए के भउजी की आत्मा जुड़ाय गइल। ओकरे बाद दुन्नो जान मिल के हमारा काया एहीं गड़हा खनि के तोप देहलैं।'

यहाँ आ कर गीबड़ महराज बहुत भावुक हो गए - 'बड़ा कठकरेजी रहे दुन्नो।  अइसन भाई भउजाई भगवान केहू के ना देंय।'

अभय सुनाते रहे - 

'महुआ आगे का बतवलस सुनत जा लोगन। 
जहां राजकुमारी कै काया दबावल रहा ना वहीँ ओकर दूसर जनम भइल महुआ का गाछ के रूप में।  औ ऊ रोज राती में अइसनै गावै ई सोच कै कि कब्बौ तो ओ कर छोट भाई खोजत हेरत आयी तो ऊ ओकर सारा खीसा सुना के शांत होई।  
महुआ एतना सुनाय के फिन बिना रुके गवतै जाय --

भइया मोर मरलें, भउजी मरववलीं, 
हमरे रकत से चुनरी रंगववलीं।'

ओहर राज कुमार सुन सुन के रोवै तो रोवतै जाय। दुन्नो आँखिन के कोर से लोर बहै सो रुकै क नामै ना लेय।'

यह कहानी सुन कर देर तक कोई किसी से कुछ बोला ही नहीं। 

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