Saturday, August 29, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३५

लोरिका देहलस हंथा कबार  


जैसे जैसे खोह में बढ़ते गए हमारा अचरज बढ़ता ही गया। खोह की भीतरी सतह पर सूखे खून जैसे लाल, गेरुए, काले और सफ़ेद रंग के चित्रों की भरमार दिखने लगी।  छोटे-बड़े, गाढ़े-हलके, धुंधले एक के ऊपर एक कई परतों में बने चित्र ही चित्र। साम्भर, गज, महिष, मत्स्य, मगरमच्छ, हरिण, वराह, गैंडे, कांवरधारी मानवों की पाँति, दोनों ओर कांटे वाले भालों और तीर कमान से आखेट के दृश्य, बाहों में बाहें डाले उल्लास भरे नर्तक। घोड़े-हाथी-ऊँट पर सवार कुण्डल शोभित योद्धा, कटमजुझ्झ में लीन, लम्बी तलवारें-भाले, ढाल, धनुष-तीर लिए। इस निर्जन वन्य खोह में किसने निरुपे। वनवासियों ने, जंगलात वालों ने, और उन्होंने नहीं तो किसने ? 

निरखते चलते एक लम्बे युद्ध-दृश्य के सामने ठहर कर इस गुत्थी में उलझ गए कि पांच मीटर से भी ज्यादा लम्बे उस दृश्य संयोजन के बीच लगभग एक मीटर की ऊंचाई में दर्शाया गया दीर्घ काय योद्धा कौन ? चौड़ा कन्धा और वक्ष, छींण कटि, भरी-भरी पिण्डलियाँ, लम्बी बाँहें, झालरदार अंगरखा, कुहनी से लटकते बड़े बड़े झूलर, कमरबन्द में बंधी तलवार और विशाल भाला।  मुंह अजीबो-गरीब। पूरी सेना पर अकेला भारी। दोनों हाथों में एक एक हाथी उठाए, दोनों पांवों नीचे एक-एक हाथी दबाए। कौन है यह अनूठा वीरवर ? विकट रौद्र-रूप में साक्षात काल स्वरुप भीम सा पराक्रमी यह अदभुद बलशाली कौन ?


शेषमन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पहचाना - 

'दुन्नो हाथ से हन्था उछारै औ गोड़े से हन्था कचरै।  अइसन बियर लोरिका के अलावा और केहू नहिनी हो सका ला।' 

इतना सुन कर हमारा ध्यान भी लोरिक की कथाओं पर गया। एक ही छलांग में सोन पार कर अगोरी-राज का मान मर्दन करै वाला, कण्डाकोट पहाड़ से ढोंके ढो ढो कर सोन बाँधने वाला, कुदान भरे तो चट्टान पर चरण-चीन्ह खूंद उठैं, तलवार चलाए तो बड़ी-बड़ी शिलाएं माखन की परत जैसी कट जाएं। हाथी पर हाथी फेंके घोड़े पर घोड़े, ऐसी अनहोनी कोई कर सके तो केवल अहीर वीर लोरिक।  इस इलाके के कोने अंतरे में रची बसी लोक गाथा लोरिकायन का लोक नायक लोरिका।  

राजा महुअर का मतवाल हाथी मस्ती में डोलता धोखे से तालाब में ढुक गया।  राजा के कइयौ पहलवान उसे निकालने में जुटे, बड़ा जांगर लगाए लेकिन निकाल नहीं पाए। लेकिन लोरिका अकेल्ले ही तालाब में है गइल औ हथिया कै पोंछा पकरि के बाहर निकाल देहलस। शेषमन एक हाथ कान पर धर कर लोरिकायन के बोल अलापने लगा - 

'जेकर दुलर लोरिका बाय नाम, आपन पहिनना सब उतारत,
एकदम हलल पोखरा में जाय, दाहिना ना हाथ धरे पोंछ ,
लोरिका देहलस हन्था कबार ------------'

छप्पन छूरी से सज्जित, अजगर के चमड़े  से बने कमरबन्ध में धारदार तलवार बांधे, नौ मन भारी लोहे का जिरह पहिने बीरवर लोरिका युद्धभूमि में उतरते हुए ऐसा झूमता हुआ चलता मानो गजराज और ऐसी हुंकार भरता मानो वनराज गरजे। 

'चलतारे लोरिक जैसे चले हो मतवाल।  
छप्पन छुरी गहेला, पैनी गहे कटार,
बाएं दाबे आदणी सुरुमा, दहिनवे हथियार।'

'खींचत ना पेटी गंजडे का, 
अब बीर अनव पहिरत बाये अनरखी।  
गोड़वा गुलबदन तमान अब फेर बान्हत
पेटी अजगर का, जामे गोली चिपटवा हो जाये। 
देहियाँ कसत जिरही  वाला 
जेमे नौ मन लोहा अमान।' 

लोरिक की सहायता के लिए माँ शारदा विघिन व कंकारिका के साथ स्वयं उसके ध्वज पर सवार हो कर अपने आँचल की छाँह में उसकी रक्षा करतीं , चौसठ जोड़ी योगिनियाँ दाएं बाएं मंडराती चलतीं, फिर उससे कौन जीत पाता भला -

'बाएं बोले बिघिन दहिनवे बोले ले हो कंकार।  
मइया पुजेली धजा पर हो गइली तैय्यार।  
चौसठ जोड़ा जोगिन जे कर संग में मेड़राय। 
लोरिक के कइले बा देवी अंचरवा का अपना छाँव।' 

कुछ देर की चर्चा के बाद, लोरिक और युद्ध-दृश्य में शामिल योद्धाओं के पहनावे पोशाक, हरबा-हथियार, सवारियों और ऊपरी सतह पर चित्रण  को ध्यान में रखते हुए मोटे तौर पर इस दृश्य के निरूपण का काल १०००० बरस के आस-पास का  माना गया।  

---------     

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३४

कउवा खोह 


चोपन कैम्प में रौनक आ गयी हम सब के लौट आने से। बदायूं वाले दूबे जी लौट आए थे खोड़वा पहाड़ पर बघमा, लखमा, चेरूई-मरकुंडी के जंगल-पहाड़ खंगाल कर, बहुत सी नयी नयी खोजों की जानकारी ले कर। बी एच यू वाले गीबड़ के साथ सुनील दूबे भी आये थे उनकी थीसिस के लिए फील्ड-वर्क कराने। अभय गुरु भोजन बनवाने में मस्त मिले। 

बदायूं वाले दूबे जी ने मूछों पर हाथ फेरते लखमा, हथबनवा, भांवां और कउआ खोह के शैल चित्रों का ऐसा बयान किया कि अगले ही दिन वहाँ चक्कर लगा आने का इरादा बना लिया।  

सोन पार करने को बड़ी नाव पर सवार होते ही जब नाव डगमगाई तो गीबड़ एकाएक अदबदा कर बैठ गए - 
'हम तो एहीं बिच्चै में बैठब।' 

अभय ने छेड़ा - 'तू काहे बैठबा इहां। तू तो हुआ हल्लुक किनारे पर बैठा। गरूअर  मनई बैठिहन बिच्चे में।'  

गीबड़ वहीँ जमे रहे - 'नाहीं हम इहाँ से ना हटब। जे कर मति मारि गइल होय ऊ करै तोहन पर भरोसा। का जाने कब ढकेल द्या नद्दी में।  गुरु जी अगोरतै रहि जाएं, सोचतै सोचत कि बचवा रेसर्च कइ के लौटत होइहन, एहर बचवा बहि के पहुँच जइहन सोनपुर। ' 

नाव चली तो दूबे उनके पास सरक लिए। गीबड़ ने नाव का पटरा जोर से भींच कर आँखें तरेरते हुए ललकारा - ' अभय गुण्डा अकेल्लै कम एक्कै कम रहलैं का जो तोहूँ पराने परि गइला।' 

यह सुनते ही अभय उधर लपके, नाव जोर से डगमगाई, गीबड़ जोर से चिचियाए तो सब अपनी अपनी जगह संभल कर बैठ गए और पार लगने तक वैसे रहे।  

किनारे उत्तर कर हम सब घूम गए जंगल और ऊंची नीची ज़मीन के बीच से सामने दिख रहे ऊंचे पहाड़ के बीच में दिख रही फांक से लगे अमला घाट तक. वहाँ से दूबे ने दिखाया ऊपर सीधी चढ़ाई पर चढ़ता पैंड़ा। उछलते उमगते और सब लोग तो कदम पर कदम धरते एक सांस में चढ़ने लगे लेकिन गीबड़ महराज चार कदम चलते फिर नीचे का नज़ारा देखने के बहाने चश्में में से आँखें चमकाते ठहर जाते। नीचे से अभय या दूबे ठेलते तो फिर चलते हुए बमकते - 

'इहै बदे भेजले रहलैं गुरु जी। अइसनै होई हमार रेसर्च। तोहन सब मनई नहीं भूत हौआ भूत।  अइसन जनले होतीं तो कब्बौ ना अवतीं।'    

चढ़ाई पूरी हुई तो पहुँच गए बाहरी दुनिया के लिए अजाने मनोरम वन में।  हरी-भरी बँसवारी, लतरों, घास के बीच चकले चौरस गेरुए, सिलेटी, काले हरी काई से ढके  पाखलों पर बलखाती, उलझती, लोटती धारा। खैर, पलाश, सेमल, गलगला, विजयशाल के गाछ। मकोइया, अइलाइन, बनैले करौंदों के घनेरे कुञ्ज। लाल-पीली माटी, पथरीली धरती।  

आगे फूस में सुरसुराहट सुन पडते ही सबके कदम थम गए। 

सामने निकल कर आए प्यारे कोटारों का जोड़ा ठिठक कर कौतुक भरी बड़ी बड़ी पनीली आँखों से हमें निहारता रहा, फिर कान घुमाए, पूँछ हिलाईं, और चौकड़ी भरते छलाँगें मारते निकल गए।  

थोड़ी ही दूर आगे चले होंगे। एक जानवर निकल कर भागा। शेषमन बोला - हड़हा (भेड़िया)। 
मुड़ कर देखे बिना बस बदहवास भागता ही चला गया। हम क्या डरते उससे वही हमसे बुरी तरह आक्रान्त दिखा। 

गीबड़ दुबक गए सबके बीच। सुनील दूबे उन्हें भरोसा दिलाने लगे - 

'भागै क राह मिलै, औ, वन्य जीव हमला करैं, अइसन कम्मै देखल सुनन गइल हौ। जे बिना बात चढ़ दौड़े अइसन तो बस मनंइऐ हो ला।'

तब तक फिर खड़खड़ाहट की आवाज़ पड़ी। धुकधुकी लग गई। कोई फुसका - तेंदुआ तो दूसरे को लगा - भालू। 

एक झलक भर मिली। सरसराती हुई खड़बड़ाहट आगे जा कर गुम हो गई। ज्यादा समझने सम्भलने का अवसर नहीं मिला।  मन में समाए रोमांच का असल से मतलब नहीं।  

चलते चलते थक गए, पिंडलियों-रानों में टूटन भर गयी। हम एक ऊंचे पहाड़ की समतल सतह पर दम लेने ठहरे। मानो धरती की छत पर पहुँच गए हों। नीचे सोन का लचकीला सुनहला पाट, सुदूर पश्चिम से आता दूर पूरब में परिधि तक दीखता। सोन से पहाड़ तक सोपान वत उठता वन और सामने सोन पार दूर तक भूरी काली पहाड़ियों का सिलसिला। आस पास प्रपात धारा और हरियाली से सजा मनोहारी वन्य प्रदेश।  

उतरते जाड़े का बरसाती मौसम, गीला गीला। हलकी हलकी बूंदों की सुखद फुहार।  आस पास झीने पनीले परदे तन गए। ओदी ओदी ठंढी हवा, भीगे भीगे पेड़-पौधे झाड़, पत्तियां बूँदों से लदी, झकोरों के साथ लचकती झूमती टहनियाँ। भटकते हुए काले भूरे धुंआरे बादल बगूलों जैसे इधर-उधर तिरते, पहाड़ों से टकराते, नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे आते जाते, हमें घेर लेते, छूते सिहराते निकल जाते, भापीले घेरे जैसे। बँसवारी में अटक लटक जाते। कपड़े, मुंह, सिर के केश नन्ही नन्ही ठंढी बूंदों से भर गए।    

इसी बीच हम रास्ता भूल कर इधर उधर, आगे पीछे, दाएं बाएं भटकने लगे। कोई आता-जाता भी नहीं दिखा, जिससे पूछ समझ पाते। 

आगे चल कर कुछ आदमी दिखे भी तो हमें देखते ही भाग खड़े हुए। हमारे अचरज का ठिकाना ना रहा, जमीन पर बिखरे लकड़ी के गठ्ठर देख कर। हमें जंगलात विभाग वाला समझ कर भागे होंगे, वरना टांगी कौन छिनवाता। 


वनवासी तो भाग गए लेकिन हमें आगे का रास्ता दिखा गए। चिकने गीले पत्थरों और लिसलिसी माटी में सम्भल सम्भल कर कदम रखते बढ़ते गए। बाएं घूम कर उतरे तो सामने एक विशाल खोह देख कर हैरान रह गए, यही कोई सौ मीटर लम्बा, पांच-सात मीटर चौड़ा और ऊंचाई तीन पुरसा, जैसे राजा साहब के महल का लम्बा ओसारा। कुदरत का बेमिसाल करिश्मा। सौ-पचास मनइन की बरात आराम से अमाय जाय। पूरे कंठा पहाड़ और कैमूर में ऐसा दूसरा नहीं दिखा।  

सामने ढलावदार हरियाली सतह, अगल-बगल बँसवारियाँ, कंटीली लतरें, सफ़ेद चिकने तने वाला ऊंचा सनई का पेड़। देखते ही रह गए। 

दूबे ने घोषित किया - 'यही आय 'कउआ खोह'। आज का डेरा यहीं पड़ेगा।'   

----------  

Wednesday, August 26, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३३

किला आय केहिका : २. ८


http://bhardersnt.blogspot.in/search/label/Sonbhadra?view=classic: bharat darshan umesh gupta

मज़ार से उत्तरी प्रवेश द्वार की ओर बढ़ते बाएं दिखे भग्न  प्रस्तर-खण्डों के ढेर में कभी प्राचीन मन्दिर में लगे रहे स्तम्भ। बाराहदरी के बड़े स्तम्भ,  मज़ार की दीवार में लगा जालक, खिड़की के मुहारे, सोपानों में और जगह जगह लगे प्रस्तर-खण्डों से किले में कोई नौ सौ साल पहले भी कोई प्रस्तर- देवालय रहा होने का अनुमान लगा। वहीँ पास में पड़ा दिखा एक अभिलिखित कीर्त्तिपटट। बाहर ओर दाएं खोह में, चढ़ाई पर और सामने बारादरी के दरवाज़े के बाएं अभिलिखित प्रस्तर-पट्ट। किले  की प्राचीरों पर छत्तीस छोटी बड़ी तोपों के ठिकाने।


http://bhardersnt.blogspot.in/search/label/Sonbhadra?view=classic: bharat darshan umesh gupta

दाएँ एक महल के खण्डहर। आगे एक और पीछे दो महल के पूरे तीन हिस्से। समूचा किला छान आए।  जेहन में बाबू देवकीनन्दन की चन्द्रकान्ता चकराती रही -------- यहीं कहीं रहे होंगे उसमें वर्णित सुरंगों और भूमिगत महलों तक ले जाने वाले रास्तों के कल-पेंच। ---- चोरी या धोखे से किले में घुसे ऐय्यार ने दीवार में लगा एक कल घुमाया ---- दीवार अपनी जगह से खिसक गयी, सामने सुरंग में उतरती सीढ़ियां सामने आ गयीं, ऐय्यार वहीं से उतर कर नीचे के राज महल में पहुँच गया ------------ दूसरी कल घुमाते ही जहाँ खड़ा था  वहाँ की फर्श कंपकंपाने लगी, बिजली के चरचराने जैसी आवाज़ आयी और थर्राती हुई फर्श, आज की लिफ्ट की तरह, अजानी गहराइयों में उतरती चली गई ---- .

लेकिन किले के किसी भी कोने में ऐसा कुछ सुराग मिला नहीं और कुँवर की लाइव कमेंट्री बार बार उस लोक से किले के धरातल पर उतार लाती -

'अगला रनिवास,  पीछे कचहरी औ पुरबै रंग महल रहे होइहैं।'

छतें ध्वस्त, दीवारें ढहती हुईं। बची रह गईं मेहराबों की डिज़ाइनें बीते समय के वैभव की गवाही देतीं । कुँवर वहीँ ठहर गए -

'यहु द्याखौ, तोड़ेदार मेहराबें, वइसने जैसी अगोरी मा बनी रहैं। ---------- औ दीवारें ऐसी सूनी सादी थ्वारौ रही होइहैं। रंगीन परदा खिचे होइहैं इन पर। छत से भारी फानूस लटकत होइहैं। एक-एक मा सैकड़न मोमबत्ती जलत होइहैं  ----- शीशन से छनी रोशनी गजब कै देत होइ, औ खम्भन मा लगे नगीना तारा अस चमकत होइहैं।  गज़ब माहौल होइ।  ---- लोग बाग़ बैठत होइहैं हिंया।  वैसी बीच मा सरंगी-तबला औ नाच-रंग, ----- औ, जान्यौ, हिंया नाचत होइहैं पुतरियाँ।'

धोबिया तालाब के उत्तर रही होगी बरतानिया ज़माने की कोई इमारत।  कुँवर ने बताया - 'अनाज राखै वाले गोदाम रहे होइहैं।'

आखिर वो दिन भी आया जब किले का सर्वे पूरा कर के कैम्प में लौटने का जतन होने लगा। राम करन बिस्तर बासन बटोरने में लग गए और हम किले की प्राचीनता आंकने में।

'कब बना यहु किला औ को बनवाइस एहिका, सूधा-सूधा हिसाब तो बैठावा नहीं जाय सकत। आदिवासी कोल किला बनवाइन या असुर या कोऊ और यू पता लगावैक का कौनौ प्रमाण हिंया देखात नहीं आय, औ संस्कृत नाम वाले उनसे हथियाइन या आदिवासी उनसे कुछ कहा नहीं जाय सकत।

अलबत्ता एत्ता तो पक्का आय कि तेरह सौ बरस से पहिले तो बनिन गा होई। ओहिके बाद या साथै साथ बने होइहैं मन्दिर।

राज चाहे जेहिका रहा होय, बारादरी वाले लेख ते एत्ता तो मलुमै है कि सतवीं-अठवीं शताब्दी में, आज से तेरह-चौदह हज़ार बरस पहिले हिंया क्यार राजा रहे 'नरवर्म्मा', औ किलेदार कि तौ कोटटपाल रहे 'दामोदर भट्ट'। फिर लगभग सात सौ बरस बीते हिंया आए चन्देल, लेकिन वै किला कीसे छीनिन कुछ साफ़ नहीं आय। कुछ दिन शेरशाह सूरी की सरपरस्ती मा रहा। फिर, बरतानिया जमाने मा काशीराज चेत सिंह बनारस से आय के हिंया रहे।

समय समय की बात आय, कल के आबाद किले मा अब कोऊ नहीं रहत। रजवाड़े रहै लाग हैं रामगढ़ मा, औ हिंया राज करत है सन्नाटा, कबौ कभार आय जात हैं वनराज, नहीं तो तेनुआ मेनुआ।'

----- 

Monday, August 24, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३२

क्रोध किहे शिव नाहिं : २. ७  


कुंवर अपनी ही रौ में बोलते रहे - 

'द्याखौ ! चक्रवाक क्यार पूँछ कैसि कलात्मक वानस्पतिक डिज़ाइन से सजी। गरदन घुमाए च्वान्च खोले पक्षी क्यार अंकन कैसि आकर्षक। बहुतै सधा शिल्पी रहा होई जौन एहिका गढ़ा होई।  बड़ी महीन पकड़ और गहरी लगन वाला रहा होइ। व्याल द्याखौ, यहौ केत्ते जतन से निरुपा गवा आय। औ सब ते बढ़ि के तो आँय कीर्त्तिमुख।' 

कीर्त्तिमुख को ध्यान से देखते हुए राम करन से रहा नहीं गया - 

'कैसि भयंकर मुखमुद्रा आय।  कैसि डरावनी आँखें, भयंकर क्रोध से भरी, मनौ बहिरै निकसि आइहैं। औ दूनों हाथ की अंगुरी काहे चबाये मा लागि है ?'

इस सवाल पर कुँवर गम्भीर हो गए -

'पौराणिक आख्यानन मा एहिकी कथा मिलत है।  

एक बार की बात आय, जालन्धर नाम का राक्षस तीनों लोक जीत कै सीधे भोले बाबा से जा भिड़ा। उसके दूत राहु ने बाबा को सन्देश सुनाया - मैं तीनों लोकों को  स्वामी तुम्हें आदेश देता हूँ कि पारवती हमारे हवाले कर दो।  

भोले बाबा भला कहाँ बरदाश्त करै वाले रहे। क्रोधवश माथे बल पड़ गयी, उनकी तिसरी आँख खुली औ ओहिसे उपजा शेर के मुंह वाला भयंकर गण। मुख के अलावा ओहिका सारा सरीर बहुतै दुबला पतला। औ आँखैं मनौ लाल अंगार।  वौ बहुत दिन ते भूखा रहा।  वह अपार शक्तिशाली गण दहाड़ा तो जानु पड़ा बादल गरगराऐं।  

ओहिका देखतै छन दूत बने राहू तो जिउ जहान छोड़ कै भोले बाबा के चरनन मा दुबक गवा। अब भला वो शिव जी का गण उनही की शरन मा आए दूत का कैसे खाय और खाय बिना भूख ते ओहिकी अपनी जान निकसी जाय। तब ऊ निरीह आँखिन ते शिव जो की ओर बारम्बार द्याखै लाग। भोल्यौ बाबा परिगे धरम संकट मा, का करैं का ना करैं। जब कुछौ न सूझा तो कहि दिहिन जब तक और कुछ खाय का ना मिलै तब तक अपनै हाथ पाँव खाय डारौ।  

शिव जी कहि के भूल गए मगर उनका आज्ञाकारी गण उन का कहा आदेश मान जुटिगा अपने ही अंग प्रत्यंग चबावै। दुनहू पाँव, जंघा समेत, पेट औ वक्ष, कन्धा सब चबाय लिहिस, बचिगे बस दुनहू हाथ तो उनहुन का मुँह डार कै खावै लाग। 

तब लै शिव जी का ध्यान गवा ओहिके ऊपर तो अपने गण की ऐसि भक्ती औ आज्ञाकारिता देख परसन्न होइगे। तुरतै ओहिका आगे खाए से रोकिन औ अमरता का वरदान दिया - तू सदा मेरे निवास के द्वार पर स्थापित रहेगा। तुम्हारी उपासना के बिना भक्तों को मेरी आराधना का फल नहीं मिलेगा। तुम्हारा नाम समस्त जग में कीर्त्तिमुख के नाम से विख्यात होगा। '

इतनी कथा सुना कर कुँवर ने थोड़ा विराम लिया।  फिर बताने लगे - 

'दुसरी कथा के अनुसार तीनों लोकों को जीत कर जालन्धर नामक राक्षस ऋषियों और देवताओं पर बड़ा अत्याचार करै लाग।  यहु खबर शिव जी तक पहुँची तो जालंधर का बध करै क्यार प्रतिज्ञा ठान लिहिन। एहिकी खबर लाग गयी नारद जी का। उई ठहरे नम्बरी चुगलखोर। पहुँच गए सूधे जालंधर के पास औ लगाय दिहिन सब ओहिका। 

जालन्धर नारद से पूछिन - शिव जी की कमजोरी का आय।  

नारद उवाचे - उनके गणन मा बड़ा विरोध आय। नाग राज आँय तो उनका प्रिय आहार आय गणेश जी का वाहन चूहा और उनका दुश्मन कुमार कार्तिकेय क्यार वाहन मयूर, शिव जी का वाहन आय नन्दी बैल तो उनका दुश्मन बाघौ हुंऐ विराजमान आँय। 

तब जालन्धर ने अपना दूत बना कर राहू को शिव जी के पास अपना सन्देश दे कर भेजा। सन्देश मिलतै भोले बाबा गे गुस्साय। उनका शरीर गनगानान तौ वासुकी नाग जमीन पर गिर पड़े औ अरबराए के गणेश जी के वाहन की पूंछ मुंह मा थाम्ह लीन्ह, ऊ लाग चिचियाए। उधर कार्त्तिकेय क्यार  किकियाए के टूट परा नागराज के ऊपर। वासुकी मूसक की पूँछ छोड़ के शिव जी के मस्तक पर चढ़ के लगे फुफुवाए, उनकी सांस के ताप से उपजी आग ते वहीं विराजे चन्द्रमा से अमृत-धारा पिघल कै बहै लाग औ बूँद बूँद कै के शिव जी के गले मा परी मुंड-माला के मुखन मा परी तो सब जीवित होइ गे औ लगे आपस मा जोर जोर बहसै। चरहूँ लंग अब्यवस्था फ़ैल गयी।  

तब शिव जी के क्रोध ते उनकी जटाओं ते याकु भयंकर गण परकट भवा, ओहिके रहे तीन मुंह, तीन पाँव, तीन पूंछ औ सात हाथ, रंग पिंगल, जटाएं बड़ी बड़ी उरझी, आँखैं बड़ी बड़ी हलब्बी। देखतै भर सब सन्न रहि गे। सबै मुण्ड जहां के तहाँ सहम गये। नाग, मूसा औ मयूर सब अपनी जगह शान्त। 

तब उस गण ने शिव जी को प्रणाम कर के कहा - मैं बहुत भूखा हूँ।   

शिव जी ने कहा - युद्ध में मारे गए लोगों को खाओ। 

सारे मारे गए लोगों को खा कर घडी भरै मा लौटि आवा। भूख अबहियूं नहीं भरी, धरती पर और कहूँ युद्ध होता नहीं दीख तो छन भर विचार कै के बरम्हा जी का खावै दौड़ा।  शिव जी ने ऐसा करने से मना किया तो अपना शरीर ही खा गया। यह देख शिव जी प्रसन्न हो गए और उसे अमरता का वरदान दे कर अपने द्वार पर स्थान दिया और कहा तुम्हारी कीर्त्ति दूर दूर तक व्याप्त होगी और जो तुम्हारा सामान नहीं करेगा उसका नाश हो जाएगा।  

तभी से शिवालयों और दुसरे देवालयों के प्रवेश द्वार और अन्य अंगों उपांगों पर कीर्त्तिमुख के अंकन का प्रचलन हुआ। 

यार गुरु ! अब मानौ तो मानौ सब किस्सै कहानी आय। नहीं तो बड़ी गहरी सीख कही गयी आय इनके बहाने।  

द्याखौ शिव जी गुस्साने तो ऐस गण उपजा कि और तो और अपनै शरीर चबाय खाय गा। मतलबु क्रोध से उपजी आग दोस्त-दुश्मन औ हिंया तक की अपन्यौ का नहीं छ्वाड़त, सब का खाय जात है। क्रोध काबू मा न रहै तो क्रोध करै वालन का खाय जात है। मतलब क्रोध की उपासना किये बिना शिव की पूजा या कल्याणकारी-मंगलकारी कार्य नहीं हो सकता। इसलिए सबको चाहिए कि कोई भी शिवकारी काज करते समय सबसे पहले क्रोध की पूजा कर लिया करें, अन्यथा शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती।  

जान्यौ - क्रोध किहे शिव नाहिं।     

------

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३१

राम सागर : २. ६  


कालिख की कोठरी में टिक कर रहने और रोज-रोज किले की चढ़ाई चढ़ कर जाने आने का चक्कर कौन पालता। राशन-पानी डेरा-डंडा उठा कर किले के उत्तरी द्वार की बारादरी में डेरा जमा लिया। 

फिर निकले किले के अन्दर फेरा लगाने। सीधे गए बीच वाले तालाब के किनारे। इस तालाब का पानी कभी नहीं सूखता और सालो साल ताज़ा बना रहता है। भोले ग्रामीणों ने अपने अनुभव से यह समझा तो इससे उपजी आस्था ने इसे अलौकिक बना दिया। फिर क्या था हो गया अतल गहराई वाला - सात माचा की डोरी औ सात बरातीं पगहा ओ थाह नाहीं बा। राम जी की इस माया से जुड़ कर तालाब का नाम रखा गया 'राम सागर'। 

वहाँ आए एक साधू ने सुनाया - 

'पहले इसकी बड़ी महिमा रही भगत। सतजुग में यहां का राजा बड़ा ही सुहृदय, दानी, पुण्यकारी और भगत रहा।  उसके पुण्य प्रभाव के चलते जब भी कोई भगत मुसाफिर तालाब पर रुकता तो सागर से आपो आप उसके लिए राशन और बरतन प्रकट हो जाते।  बना खा कर मुसाफिर बरतन धो मांज कर फिर सागर में प्रवाहित कर देते। फिर जब कोई दूसरा मुसाफिर यहां रुकता तो फिर ऐसा ही होता। 

कलयुग की माया ऐसी बाढ़ी कि बाद के राजाओं और यहाँ आने वालों की पुण्य और भक्ती दोनों का ह्रास होता गया।  फिर एक बार यहां एक ऐसा मुसाफिर आया जो भोजन बनाने खाने के बाद बरतन भी बटोर बाँध ले गया। बस तभी से सागर से बरतन निकलने की शक्ती का लोप हो गया।' 

हमने तो बस इसे बस मिथकीय कहानी तक ही समझा होता अगर कुँवर उसका निहितार्थ नहीं समझाते - 

'यार गुरु ! यहु कहानी भर ना आय।  एहिका यहौ मतलब होय सकत है कि सुहृदय राजा हिया आवै वाले भगतन क्यार आदर सत्कार करत होई। सबै मुसाफिरन के खाए पिए रहै टिकै का सब इंतिज़ाम करत होई। लेकिन जब ओहिमौ चोरी चकारी होवै लाग तो नाराज होइ के सब व्यवस्था बन्द कराय दिहिस।'

साधू ने यह भी बताया कि - 

'किले के दक्खिन खिड़की दरवाज़े से सटा है धोबिया तालाब और उत्तर में मज़ार से लगा एक और तालाब धोबिया तालाब पर धोवात रहा राजा का लिबास। मज़ार से लगल तालाब कहात रहा मीरा सागर लेकिन अब मज़ार के नाम पर कहल जा ला 'मीरान सागर तालाब'। 

कुँवर किले में बिखरे प्राचीन मन्दिरों के अवशेषों का हासिल हिसाब बैठाने में जुट गए - 

'यू आय कबौ हिंया खड़े कउनौ बड़े प्रस्तर-मन्दिर के शिखर पर लगे आमलसारिका का एक चौथाई खण्ड। 


मीरान सागर की मज़ार के कोने मा जड़े स्तम्भ पर अंकित कीर्तिमुख, व्याल, चक्रवाक, किंकणिका, द्याखौ। इनका देख के आसानी से अंदाज़ा लगावा जाय सकत है कि मन्दिर केत्ता सुन्दर औ बुलन्द रहा होई। बारादरी मा लागि स्तंभौ में से कइयौ मूल रूप मा वहै मंदिरै मा लाग रहे होइहैं। लागत है मन्दिर के गिरै के बाद हिंया लगाए दीन्ह गए। किले की प्राचीर और तमाम जगहों में जहाँ तहँ लगे दीखते अलंकृत प्रस्तर और प्रतिमा खण्ड भी किले में तेरह सौ बरस और ओहिके बाद के मन्दिरन के हिंया रहे होवै क प्रमाण हैं।  

बस एकै बात समझ मा नहीं आवा कि इन मन्दिरन के धराशाई होवै का कारण का रहा। अब तक केत्तौ पढ़ा यहु सवाल सुलझा नहीं। अपनै गिरे या भूकम्प आवा या कउनौ जान बूझ के ध्वस्त करवाए दिहिस। एहिके बारे मा किस्सौ कहानी सब चुप आँय। '  

--------  

Tuesday, August 18, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ३०

रमना पहाड़ 


वन-चौकी के पूरब वाले रमना पहाड़ की खोहों में लेखों और चित्रों की भरमार की जानकारी पा कर किले की बाक़ी की पड़ताल के लिए उधर जाने पहले रमना पहाड़ का रुख किया। 

आगे आगे चलते, पहाड़ जंगल लांघते दो पहाड़ों के बीच से गुजरते उस पहाड़ी रास्ते पर जा पहुंचे जिसके अगल बगल के ढोंके काट काट कर समतल किया जा रहा था।  वही एक बड़े पत्थर पर अंकित दिखा शिकारियों का एक समूह। काँधे पर धनुष धारे, सींग-पत्ते-पंखों से सजी सिरोभूषा से सज्जित मुख्य आखेटक, सफ़ेद किनारी के बीच गेरुए रंग से चित्रित, साथ में दूसरे सहायक धनुर्धर। समय की मार खाए कुछ चित्रों के धुंधलाये रंग।  

उसी पत्थर के बाएं किनारे पर सड़क बनाने ने वालों का लिखा नम्बर - 

BKR  
R-5.6

देखते-परखते कुँवर अटक गए - 

'यार गुरु ! सब कोई ऐसे चित्र देखतै कहै लागत हैं प्रीहिस्टारिक आँय। लेकिन कैसे पता लागै कि असल मा ई केत्ते पुरान  आँय। याकु शिकारी तो जनौ काँधे पर कुछ बन्दूक अस धरे जान परत है।'

हमने भी गौर से परखा। एक शिकारी के काँधे पर धरा धरा हथियार सचमुच बन्दूक जैसा लगा।  इस बारे में चर्चा करते लौटते हुए पहाड़ की उत्तरी कगार की खोहों में शंख लिपि और देवनागरी में लिखे लेख देखते वापस मऊ गाँव के मन्दिर पर सहताने लगे। 


लौटते समय रमना पहाड़ पर जहां से चढ़े थे वहीँ 'कुँवर देव' के नाम से पूजी जा रही आसन लगाए ध्यान मग्न देवता की महिमा सुन कर कुंवर साहब सबसे उसके दर्शन करने बढ़ गए। लगभग सवा मीटर ऊंची और आधे मीटर से ज़्यादा चौड़ी इस प्रस्तर प्रतिमा की चरण-चौकी पर बीचो बीच चक्र के दोनों ओर सिंह के अंकन देख कर कुँवर साहब ने इसे जैन तीर्थंकर महावीर के रूप में पहचाना तो साथ चल रहे एक गाँव वाले ने बताया - 

'कुछ लोग तो इनका महात्मा बुद्ध की मूरत मान के पूजै लगे हैं।' 

यह सुन कर हम भी चकरा गए - 'हाँ, घुंघराले बाल, लम्बे कान, अधमूंदे नेत्र, मुख पर सौम्य भाव, योग मुद्रा तो ऐसी ही हैं।'

लेकिन कुँवर साहब टस से मस नहीं हुए - 'ऊपर क्यार छत्र, यक्ष औ दिगम्बरौ तो द्याखौ। आय यू मूरत तीर्थँकरै क्यार।'  

उतर कर मन्दिर तक पहुंचे तो कुंवर की निगाह नन्दी बैल की एक भग्न प्रस्तर-प्रतिमा पर टिक गयी।  लगे उसकी परिकरमा लगाने। हम भी उठ कर उनके पास चले गए यह सोच कर कि जरूर कुछ नोखा पाय गए होइहैं।  


चारों पैर मोड़ कर बैठे नन्दी की पीठ पर सवार आकृतियों के भग्न मुख के बाद भी यह समझते देर ना लगी कि भोले बाबा और पार्वती के अलावा भला नन्दी बाबा पर और कौन सवार होय सकत है। लेकिन, एकबारगी जो नहीं पहचान पाए वो रहीं दूनों बगल से हाथ उठा के ऊपर चढ़ने को तत्पर नान्ही नान्ही बाल आकृतियाँ। और ध्यान से देखा तो शिव-पारवती के दोनों पुत्रों को पहचानने में भी ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई। एक रहे गज-मुख सूंढ़ धारी गणेश और दुसरे तीन शिखाओं वाले कार्त्तिकेय।  

मुस्कुराते हुए कुँवर हमारी तस्दीक करते हुए मगन हो गए - 

'एक बार की बात आय।  शिव-पार्वती अपने वाहन पर सैर को निकले तो उनके दोनों पुत्र भी घूमने  के लिए बाल हठ पकड़ कर मचलने लगे।  शिव-पार्वती ने उनकी बात मान कर हाथ बढ़ा बढ़ा कर शिव जी  ने एक ओर गणेश और दूसरी ओर से पारवती ने कार्तिकेय की अंगुली पकड़ कर ऊपर चढ़ावै लगीं।कौनौ कुशल शिल्पकार वही कथा का अंकन हिंया कइस सुन्दर किहिस आय।'

रमना पहाड़ की प्रतिमाओं और खोहों की परिकरमा करते इतना समय लग गया कि उस दिन किले पर जाने का इरादा छोड़ दिया।  

--------      

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. २९

आपन हक़ मँगिहैं : २. ४ 

बैरियर पर एक जीप और वन विभाग की चौकी के सामने तीन चार बन्दूक-राइफल वालों की चहल-पहल दिखी। 

गार्ड से पता चला  वन विभाग के बड़े साहब का दौरा होने की वजह से हमारा सामान पीछे की खाली रसोईघर में धर दिया गया है। आठ वर्ग फ़ीट की रसोई की दीवारों से झरती कालिख, कोनों में मकड़ी के जाले, एक ओर चूल्हा-चिमनी और बकिया में नीचे फर्श पर पुआल का बिछावन।  हमारे पास वहीँ ओलर जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहा।

साहब और उनके मातहतों की सवारी आते ही वन-चौकी पर सरगर्मी बढ़ गयी। साहब से दुआ-सलामी के बाद जीप वाले बन्दूकधारी आगे जंगल में हेल गए। चौकी वालों में भाग-दौड़ मच गई। जंगल में साहब के मंगल के लिए मुर्गों की गरदन मरोड़ कर पकाने की तैयारी होने लगी। चौकी वालों की कटोरियाँ कम पड़ गईं तो हमसे मांगने आए। राम करन ने बरतन निकालते हुए तहकीकात की -

'अभी लो भाई। आजु तौ बड़ी तयारी है ?'     

वो भरे घड़े जैसा फूट पड़ा - 

'अब का बतावैं, आ जाते हैं हराम की खाने।  इनको नहीं मालूम क्या कि मुर्गवा कहाँ से आएगा। दे जाएंगे चार पांच सौ की चपेट।'

राम करन ने छेड़ा - 'एहिका कउनौ मद-हिसाब होत है तुम्हरे बिभाग मा का ?'

वो तो जल्दी में चला गया।  जवाब आया कुँवर की ओर से -  'हिसाब नहीं तो दुनिया। काल्ह कहूँ जंगल मा उसिलिहैं।'

गार्ड ने कुँवर की बात की तस्दीक करते हुए बताया कि खाने का खर्चा जंगल से जलावन लाने वाले वन वासियों की टांगियाँ छीन कर या ट्रक वालों से वसूला जाएगा। यह सुन कर चौकी में धरी टांगियों के ढेर का रहस्य समझ में आया।

राम करन बाहर उन्ही लोगों में जा बैठे। लौट कर आए तो नयी नयी बातें बटोर लाए - 

'कुछ पूछौ मत भइया ! शिकार की मनाही तो बस कहै भर की बात आय। बाबू साहब लोग जब मन चाहै साम्भर सुअर मार लै जांय। जंगलात वाले सब जानत हैं मुला सब गरीबै-गुरबा के लिए। ठेकेदार कै ट्रक लकड़ी काट लै जांय कोऊ पूछै वाला नहीं, ऊपर-नीचे मिली-भगत आय। ऐसे मा बचे खुचे बिरवा-बिरिच्छ जंगल मा बचि जांय वहौ मुश्किलै आय।औ जो बनबासी, एक गठ्ठर जलावन अपने घर जलावै या बेचै भर की जुटाय लावैं तो उनकी टांगी छिनाय के जंगलात वाले रुपया-बीस आना वसुलै ते मानत नहीं हैं।'

अब तक भूख से कुड़बुड़ा रहे कुँवर ने राम करन को हड़का लिया - 

'बातन ते तो पेट भरी ना। जौन कुछ कच्चा-पक्का पका होय तौन लै आओ।'

राम करन खाना निकालने की जुगत में लग गए लेकिन कुँवर ने पूरी गंभीरता से बात आगे बढ़ाई - 

'रही ठेकेदारन औ जंगलात वालन की बात तो लिखाय के रखि ल्यौ, एक दिन यहै बनवासी बन्दूक ना उठावैं तो जौन कहौ तौन हार जाई। कबौ ई सबै रहे जंगल के राजा, खेती-किसानी से दूर, जहां मन करै मारैं खाएं, जंगल की उपज सब उनहिन क्यार। औ कहाँ अब वहू सब उनसे छिनाय लिहिन जंगलात वाले औ जंगल के ठेकेदार। इनमा ज्यादातर ऊँच जाति वाले दिखात हैं। सबते पहिल मुचहटा इन्हिन के खिलाफ लगिहै तब यहै लोग इनके आगे-पाछे भागत नजर अइहैं। 

वनवासिनौ के लरिकौ अब पढ़ै लिखै लाग हैं, पढ़-लिख के यहु अन्याय ना सहिहैं, पलट के आपन हक़ मँगिहैं जरूर, औ वो दिन बहुत दूरौ नहीं दिखात।'    

------   

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. २८

होइगा किला फतह: २.३ 

httpupecotourism.inVijaygarh.html - Copy

मान मून गुफाओं के बगल में ऊपर से रिस-रिस कर आते जल का स्रोत खोजने में ज़्यादा देर नहीं लगी। 

सामने के राम सागर तालाब का चक्कर लगाते और गाँव वालों से बातें करते सारा मामला साफ़ हो गया। तालाब के बीचोबीच फूटती कुदरती जल-स्रोत की धारा कभी ढलाव के साथ पश्चिम की ओर बढ़ती रही, बिना किसी रोक-टोक के, आगे, कगार के नीचे प्रपात बनाती, अविराम झरती रही होगी, नीचे की गुफाओं के निकट। चौमासे में बरसात के साथ यह धारा कहीं अधिक बढ़ जाती होगी। आस-पास के वासी साफ़ पेय-जल के इस स्रोत को दैवीय मान कर पूजने लगे होंगे।  

Nandanupadhyay 800px-Vijay_Garh_Fort_on_the_Hill_top - Copy

इतना सुनते ही कुँवर ने किलेबन्दी का सूत्र संभाल लिया -   

'यार गुरु ! यू अंदाज़ा तो तुम्हार सोरहौ आना सही आय। हिंया कोऊ किला नहीं बनवावत जो यू सोत हिंया ना रहा होत। बहुत सोच समझ कै किला बनवावै वाले घने जंगल मा एत्ती दूर यू पहाड़ी चुनिन। आस-पास की जमीन से मतलब भर ऊँच औ चरिहूँ लंग ऊंची सूध कगार। सबते पहिले सोता सेने निकसी धारा के आर-पार और अगल-बगल बंधा बाँध के यहु तालाब बनाइन। सौ पचास मजूर औ शिल्पिन के पिऐ भर का पानी जुटिगा तब शुरू किहिन कगार के किनारे-किनारे पाषाण-खंड सटा-सटा कर पूरे घेरा मा आधार बनावै का काम, फिर ओहिके ऊपर तर-उप्पर प्रस्तर-खण्ड जमाय के प्राचीर उठाइन, तब  ओहिके ऊपर कंगूरा। औ, तैयार होइगा यहै कोई अढ़ाई से चार सौ मीटर चौड़ा और हज़ार मीटर लंबा किला। 

जानत हौ कौटिल्य के अर्थशास्त्र औ 'दुर्ग विधानम्' में ऐसे दुर्ग का कहे गए हैं ?' 

हमारा जवाब सुनने का इन्तिज़ार किये बिना कुँवर ने अपनी ही रौ में खुद ही जवाब भी दिया - 'पार्वत्य दुर्ग'।' 

हमसे रहा नहीं गया तो बीच में बात काटने की हिमाकत करने से बाज़ नहीं आया - 

'लेकिन इतना पत्थर कहाँ से आया, इतनी लम्बी प्राचीर उठाने के लिए?'

'यहौ सवाल तुम ठीकै उठायौ। चलौ तुमका वहौ दिखाय देई।' 

कुँवर ने सामने के तालाब और किले के अन्दर के दो और तालाबों और चार कुंडों तक बारी-बारी ले जा कर दिखलाया - 

'जहाँ आज ई तालाब दीख परत हैं ना, हिंया क्यार चट्टान पहले समतल सपाट जहां हम सबै खड़े हन हूँवा तक उंच रहै। प्राचीर बनावै के लिए पाषाण-खण्ड निकासै खातिर हिऐं खदान लगाइन। खदान से निकसे पत्थर लगाइन किला बनावै मा औ खदान से बने गड़हा बनिगे तालाब।  एहिका कहत हैं आम के आम गुठरियन के दाम।'

फिर वे किले की खासियत बखानने लग गए -  

'दुश्मन की कौन अवकात कि किले की ओर रुख करै। पश्चिम से तो दुश्मन हमला हो ही नहीं सकता। किसी माई के लाल में एत्ता दम न रहा होई कि उधर की गहरी घाटी कगार चढ़ि आवै। एही मारे पश्चिमी प्राचीर पर याकौ तोप धरै का हिसाब नहींं बाँधिन। धंधरौल पुल और गढ़ी तक पहुँचते न पहुँचते वहॉं की सुरक्षा चौकी से खबर मिलते ही बीच के घने जंगल के एक एक झाड़-झुरमुट के पीछे से चले बीसों बीस तीर दुश्मनन केरे हलक मा जा धंसते। किले तक पहुँचै से पहले ही सबका सफाया। औ जो कोउ ज्यादा जबर दुश्मन हिंया तक आय के किला घेरौ लेत तबहूँ निराशै हाथ लागत। तिनहू लंग ऐसि तोप धरिन कि दुश्मन देखतै किला आग उगलै लागै। औ दुर्ग के गोदामन मा एत्ता नाजु औ तालाब मा एत्ता पानी कि सालों साल ना चुकै।'

सबते मज़बूत बना आय उत्तरी द्वार। तोप-तमंचा, तीर-कमान का पूरा इंतज़ाम। खड़ी चढ़ाई पर आगे बढ़ते दुश्मन पर रस्ते मेहियाँ खेत। कउनौ तरह पहिल दरवज्जा टूटियू गवा तौ दूसर बन्द। बुर्ज़, दरवज्जे के ऊपर, चरिहुँ लग चाक चौबन्द। ऊपर, नीचे, आगे पीछे ते गोली-भाला-तीर, गरम तेल औ पथरन कै झ्वाकम झवांक। हिंयौ से पार होइगे तो याकु मोर्चा और दूसरे औ तीसरे दरवाज़ा के बीच वाली बारादरी के आगे बिकट मार। ऐसनै हाथ नहीं आवत किला, कफ़न बांधे बीरन से लोहू-लोथ, मारा मारी, कटा जुझ्झ। ओहिके बाद जो यहौ द्वार तूर लइगे तब तौ बस जयकारा पर जयकारा - हर हर महादेव। होइगा किला फतह।  

सूरज ढलने के साथ साँझ ने किले पर रहस्य की चादर डाल दी। किला अँधेरे में डूबने लगा। मऊ गाँव तक पहुँचते झोपड़ों के चूल्हों का धुंवा ऊपर उठता दिखा।  

-------         

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. २७

मऊ-विजयगढ़: २.२ 'मान-मून' 

Umesh Gupta द्वारा 8th June 2014 पोस्ट किया गया फोटो.


पिछले द्वार के ऊंचे कँगूरों के आगे धोबिया तालाब के पेड़ों पर नज़र डालते कुंवर बोलने लगे - 

'किला समझेक होय या कुछ और मन्दिर मा भगवान के दर्शन करै के समान होत है। पहिले मन्दिर क्यार बाहर सेने परिकरमा, बाहर वाले देवतन क्यार दरशन-पूजन, फिर गर्भगृह मा विराजमान भगवान क्यार साक्षात्कार।'

कुँवर के साथ हम किले की प्राचीर के साथ साथ चल पड़े। पीछे दूर तक फैले पठारी भू भाग के बीच से गुज़रता जंगल का रास्ता। पूरब के चौरस खुले फैलाव के बीच से चमकते लोटते एक-दूसरे को काटते रास्ते - जिनमें से एक से हम इधर आए थे और जीप का चौड़ा वन मार्ग। किले की प्राचीर के साथ गझिन हरियाली। मऊ गाँव के दक्खिन से आ कर पच्चिम बढ़ कर आगे घोड़-मंगर घाटी से गुज़र कर चिरुई गाँव की ओर ले जाने वाले रास्ते से कट कर किले के उत्तरी द्वार की ओर खड़ी चढ़ाई पर चढ़ता पैदल रास्ता। अन्दर एक और ऊंचा दोनों ओर ऊंचे बुर्ज़ों वाला द्वार, उसके आगे दोनों ओर खम्भों पर टिके बरामदों वाली बारहदरी के बीच से गुज़र कर तीसरे द्वार के आगे किले के अंदरूनी खुला हिस्सा। अन्दर से द्वार के ऊपरी बाएं भाग में लगे शीला-पट्ट पर अंकित प्राचीन लेख।  पच्छिम में किले की प्राचीर के साथ सपाट खड़ी ऊँची वक्राकार कगार, उसके आगे थोड़ा आगे बढ़ कर एक और कगार और उसके आगे एक और खड़ी कगार के नीचे घने हरियाले वन से ढकी गहरी घाटी।


यूनीवर्सिटी में पढ़ते समय से ही सुनते रहे कि १९३१ में ही जब यहां बहुत घने जंगल और जंगली जानवरों का वास था राय साहिब मनोरंजन घोष ने दल-बल साथ आ कर किले की पश्चिमी कगार के नीचे मान-मून नामक गुहाओं में अंकित प्राचीन लेखों का लेखा जुटाया रहा।  उनका ठिकाना समझ कर वहाँ तक पहुँचने के जोगाड़ में हम उस किनारे की प्राचीर से नीचे की झाँक-झूंक करने लगे। एक गाँव वाले ने सामने दिख रहे बरगद के पुराने गाछ के पास से सीधे नीचे उतर कर उन तक पहुँचने का रास्ता दिखाया तो उधर से उतरने आगे बढे, लेकिन उस खतरनाक उतराई को देखते ही कुँवर छटक कर दूर जा खड़े हुए और मीरान शाह बाबा की मज़ार से लौट कर आए मौलवी साहब लगे कानों को हाथ लगा कर अल्ला ताला की याद फरमाने - 

' ----- आशिकाने मोहम्मद ------ या अल्ला ताला ------ या मौला ---- खुदा खैर कर ---- मरने वाले को कौन रोक सकता है ------ खुदा खैर कर ----अक्ल दे ---- आशिकाने मोहम्मद ----- खुदा हाफिज़। ' 

कुँवर उस रास्ते उतरने को तैयार नहीं हुए। हार कर हम उत्तरी दरवाज़े से निकल कर किले की दीवार के नीचे-नीचे घनी बँसवारी के बीच से रास्ता बनाते अंदाज़े से बढ़ लिए। जगह जगह किले की दीवारों के ढहे हुए प्रस्तरखंड और लुढ़की हुई मूर्तियां और सन्नाटा। उठते-बैठते-सरकते किसी तरह बरगद के पेड़ के नीचे की मान नाम से मशहूर खोह तक पहुँच ही गए। 

बड़ी खोह के सामने बरगद की जड़ के आस पास किले की प्राचीर से रिस-रिस कर नीचे गिरता पानी, सीलन और एक ख़ास तरह की गंध। शेषमन ने फर्श पर पड़े पंजों के ताज़ा निशान दिखाते हुए चेताया - 

'लागत बा इहाँ भालन (भालुओं) कै डेरा रहा, हम्मन के टोह सूंघ-पा के घिसुक गइलन।'   

सहज हो कर खोह का निरीक्षण करने लगे, दीवार पर फूल-पत्तियों, अल्पना और कोहबर के ऊपर काले-लाल रंग से हिंदी-अंग्रेजी में लिखे नाम पर नाम। चूने-सुर्खी से बनी फर्श पर टूटे बर्तन। पानी और आश्रय दोनों का सहज संयोग उस बीहड़ में भी लोगों के टिकने के लिए हर तरह से मुफीद। एक लेख से सनद मिली आज से लगभग छह सौ बरस पहले आए किसी मुनि के वहाँ रह कर जप करने की - 

'सं. १४०४ वैशाष मासे। जोतिषी पुली (?) न्ना जोतिषी मुनि। आगत जप।'   


बड़ी खोह के ऊपर दिखी एक और छोटी खोह लेकिन सपाट सीधी चट्टान पर वहां तक चढ़ा कैसे जाय। शेषमन ने दो मोटे बांस काट बाँध कर टिका दिया, उसी के खांचों में पाँव फंसा कर एक लतर हाथ में थाम कर फिसलते सम्भलते ऊपर चढ़ कर एक चट्टान की कटान में बाँध कर लतर को नीचे रस्सी की तरह लटका दिया।  बाकी लोग उसी के सहारे ऊपर आए। खोह इतनी संकरी और छोटी कि नान्हे नान्हे बच्चों की तरह बकइयां-बकइयां घिसटना पड़ा। अन्दर झांकते ही वहाँ लिखे बहुत से प्राचीन लेख देख समझते देर नहीं लागू कि - ये है दुसरकी खोह, छोटी होने की वजह से कहलायी होगी - 'मून'। 


लेखों से सुराग मिला लगभग पंद्रह सौ बरस पहले और उसके बाद वहाँ आने वालों के नामों का। इनकी लिपि और इनमें शामिल इन्द्रदत्तह, गुहिदत्तह, गिरिह प्रकाश, रणवर्म चन्द्र, सवथ जैसे नामों से साफ हो गया कि वे संस्कृत भाषा और तत्कालीन लिपि से सुविज्ञ रहे होंगे। हो सकता है जल-स्रोत और खोहों को उसी समय से पावन तीर्थ की महत्ता मिली रही हो और ये लोग यहाँ तीर्थाटन के लिए आते रहे हों या फिर बीहड़ विंध्य के इस सुरम्य रमणीय इलाके की सैर पर निकले यायावर या फिर सैलानी रहे हों। 

'मान-मून' से निकल कर वापस उसी रास्ते लौटने का मन नहीं किया। कुँवर की लाख ना-नुकुर को नकार कर किले पर चढ़ने के लिए ऊपर से देखा शार्ट- कट आज़माने से नहीं माने। हामरे पीछे आने के अलावा कुँवर के पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं रहा। खोह के आगे बढ़ कर उन्हें ऊपर चढ़ने को ललकारने चढाने पर पाँव बढ़ाते और फिर उतर आते। फिर हमने उन्हें उनके नाम और बैसवारे की आन चढ़ा कर चढ़ा ही दिया। लेकिन कुछ कदम चढ़ कर मुड़ कर नीचे देखते ही उनके चेहरे की रवन्नक उड़ जाती। हम उन्हें हिम्मत बंधाते नीचे से ऊपर धकेलते - 

'तनिकौ चिन्ता न करौ, ऊपर वाली जड़ थामे रहौ। हम तो नीचे हइऎ हन। गिरै न दयाब, निसा खातिर रहौ।'  

कलेजे की धुकुर-पुकुर संभालते चढ़ते, प्राचीर पर पहुंच कर, कुँवर की जान में जान आयी। 

----------        

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. २६

मऊ-विजयगढ़: १


कुंवर बैरियर के बगल वाले मन्दिर पर अटक गए।  गर्भगृह में स्थापित एकमुख-शिवलिंग और एक प्रस्तर स्तम्भ पर मकर वाहिनी गंगा का रूपांकन, मन्दिर के बाहर जहां तहँ धरे पंचायतन स्तम्भ, सहस्रलिंग और दूसरी प्रस्तर प्रतिमाएं। एक ही प्रस्तर-खंड के चारों ओर अंकित चार आकृतियाँ। इतना माल बिखरा देख कर कुंवर की चेतना-चोटी खुल गयी - 


'द्याखौ यू आंय बिष्णू, ग्वाद मा बच्चा वाली अम्बिका, दुनहू ग्वाड़ मा ऊँच ऊँच जूता-बूट औ दुनहू हाथ मा कमल थामे कवच कुण्डल धारे सूरज देवता, औ इनका को नहीं जानत है - लम्बोदर गजमुख गणेश, पंचवा उप्पर रहा होइ तउन अब टूट बहाय गवा। 

तीन शिवलिंग, याकु शुकनास वाली चन्द्रशाला, गंगा-यमुना वाले द्वार स्तम्भ, कम-अस-कम तीन चार मन्दिर तेरह चौदह सौ बरस पहिले और ओहिके बाद के तो रहे ही होइहैं। औ हिंया रहे होइहैं कइयौ छ्वाट छ्वाट मनौती मन्दिरौ।' 


कुंवर को ढकेलते नहीं तो यहीं आधा दिन लगा देते और फिर विजयगढ़ पहुँचते बहुत अबेर हो जाती। 

गाँव की साफ़ सुथरी झोपड़ियों के सामने या बगल में सूखी टहनियों की बाड़ और छप्पर पर चढ़ कर फैली सेम की हरियाली लतरों के बीच नीले-बैंगनी फूलों और छीमियों की भरमार। हमें आता देख सामने के पेड़ों पर चढ़े लंगूरों का झुण्ड कूद-कूद कर रमना पहाड़ की ओर भाग गया। आगे चल कर आए दोराहे में से दाएं घूम कर बाएं जा रही पगडण्डी पकड़ ली। 

बीच रास्ते में बड़ी तेज़ सड़ांध की गमक आयी। लगा कहीं पास में ही तेंदुआ या बाघ का मारा अहेर न पड़ा हो, तब तो वो भी कहीं आस-पास ही होगा। ठहर गए, अगल-बगल के झाड़ों पर गोजियां झमकाईं,  खांसे, खँखारे, जोर जोर से बोले लेकिन कहीं कोई हरकत ना होई तो दबे पाँव आगे बढ़ लिए। हमने कहा - रहा भी होगा तो हमारी आवाज सुन कर कहीं खिसक गया होगा।  


हलकी चढ़ाई के बाद गढ़ के बाहर का खुला मैदान सा आ गया। किले की प्राचीर का फैलाव और ऊँचे कंगूरे साफ़ दिखने लगे।  वहां बिखरे पत्थरों और टूटे फूटे बर्तन के टुकड़ों ने वहाँ कभी बस्ती रहे होने की ओर संकेत किया। जिधर से आए थे उसी ओर से एक आदमी लुंगी लपेटे दुलकी चाल से भागता आता दिखा। उसके हाथ कुछ ऐसे आगे पीछे आते-जाते जैसे किसी नाव के तेज़ी से चलते चप्पू जल्दी जल्दी पानी काट रहे हों।  पास आने पर रुका, दोनों हाथों से हाथ मिला कर अपने दोनों बाज़ू, सीना और माथा छू कर एक सांस में बोलता चला गया - 'असलाम वाले कुम आशिकाने मुहम्मद ------------'

उसकी आँखों में सुरमा, माथे पर पाँचों वक्त का नमाज़ी होने का सबूत नीला निशान, बाज़ू पर लाल कपडे में बंधा गंडा, पैरों में पनही नहीं।  किले के मीरान शाह बाबा की मज़ार पर माथा टिकाने बढ़ता चला गया इतनी तेज़ चाल कि ओलम्पिक का तेज़ चाल खिलाड़ी भी हार जाता।  

मैदान के दूसरे सिरे पर ऊँची चंट्टानों के बीच से चढ़ कर किले के पिछले भाग के नीचे पहुँचते ही गणेश जी की प्रतिमा के दर्शन हुए। सामने सीधी खड़ी सीढ़ी के ऊंचे सोपान शुरू हो गए।  कुँवर की चोटी फिर एक बारगी खुल गई, दो पौड़ी चढ़ते फिर रुक कर बताने लगते - 

'बुनियाद द्याखौ कहूँ कहूँ तौ तीस मीटर ऊँच आय। औ यू द्याखौ एहिका कहत हैं वप्र। सोपान मा लगे पत्थर पर चक्रवाक, लागत है हिंया कउनौ पुरान मन्दिर रहा होई।' 

आखिरी सोपान चढ़ते चढ़ते सबके मुंह खुल गए।  किले के पिछले द्वार से हो कर अन्दर कदम रखते ही इधर-उधर बैठ कर पंद्रह बीस मिनट के आराम के बाद सहज हो कर बगल के बुर्ज़ पर चढ़ कर नीचे की घाटियों और किले के अन्दर के विहंगम दृश्य निहारते रहे।  

-------