Wednesday, July 23, 2014

एक दिन सजै मसाना है


एक दिन सजै  मसाना है

ना कोई बाम्हन ना कोई ठाकुर, ना बनिया ना लाला है,
स्वारथ बस बस एक गुट बैठें, यहै जगत की माया है।  

ना कोई रिश्ता ना कोई नाता, ना बबुआ बबुआना है,
राह कटे पर कूकुर बन अस, झपटै हलक निवाला है।    


ना कोई देवता ना कोई देवी, ना काशी ना करवट है, 
कैसेउ लछमी जगैं पलन में, एक्कै चाहत आला है।  

ना कोई ओझा, ना कोई सोखा, ना जोगी ना घोरी है, 
ना कोई दानी, ना कोई ग्यानी, ऐसै गड़बड़झाला है।   


ना कोई तापस, ना बलवाना, ना कोई सजग सुजाना है,
गावै केतनौ भजन कबीरी, रग रग रंग रस भीना है।    



ना कोई राजा, ना कोई रानी, ना परजा, ना चाकर है,
ना कोई प्रहरी, ना कोई पिंजरा, बखत परै उड़ जाना है।

ना कोई सुलझा, ना कोई उरझा, उरझत सुरझत जाना है, 
केतनौ जोड़ौ, केतनौ सिरजौ, एक दिन सजै  मसाना है। 

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Monday, June 16, 2014

यारी यार


यारी यार


घिरे घने अंधियार में, दीपक जले हज़ार,
गहरे में जब जा गिरें, राह दिखाएं यार।


ऎसी यारी कुछ करें, धक्का देंय गिराय,
उलटी वारी बह चलें, करने लगें प्रहार।


यारी करता है नही, होती है इक बार, 
बनी बावली घूमती, रहे पहेली यार।


चुन यारी चलती चली, रही आर या पार, 
चुनते ही वो कट गई. मिली ना यारी यार।


यारी की उनको मिली, तीखी बस तासीर, 
हमको मीठी सी मिली, जैसी पूनो खीर।


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Sunday, June 8, 2014

न पावैं सार


पढ़ा सुना गुनतै रहैं, समझ न पावैं सार,

नियत घड़ी आए तबै, आखर हों साकार।


हम समझैँ हम कर रहे, करता सब करतार,

डाँड़ गहैं हम हाथ में, साधै खेवनहार।

कभी कभी ऐसा घटै, अकल न पावै पार, 

सब कुछ लागै तयशुदा, मानै बारमबार।


Saturday, June 7, 2014

आए ना आए

आए ना आए, ज़िक्र तेरा आ ही जाए, 
जिस तरफ जाएं, उसी रस्ते पे आए।   

आए वो आए, हर कदम साए सा आए, 
सपने में आए, जागते लम्हों में आए।  

आए वो आए, इस तरह हौले से आए, 
फाख्ता उड़ते हुए, छज्जे पे आए।  

आए वो आए, आस का दीपक जलाए,
आए वो आए, फिर वही दीदार पाएं।  

आए वो आए, फिर वही कूचा दिखाए,
आए वो आए, याद वो कैसा सताए।  

आए ना आए, अक्स तेरा आ ही जाए,
जाए न जाए, नक्श वो आ कर ना जाए ।  

आए वो आए, किस कदर रह रह के आए, 
आए वो आए, आए वो लब से न जाए ।   

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Tuesday, June 3, 2014

चल कर देखें

चल कर देखें



वक्त ने एक मौक़ा दिया है 'भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग' के साथियों के साथ विभाग को सौंपी गयी ज़िम्मेदारियों को निभाने का, पूरी कोशिश रहेगी पूरा करने की।

नए दौर में नई उम्मीदें, नए सपने, लाज़िमी हैं। इन्हे असल ज़मीन पर आंकना और लाना सब की ईमानदार कशिश पर टिकता है। इस काम में साझीदारी ज़रूरी है सरकारी और गैर सरकारी सभी सरोकारों की।  

एक लय में तय न होगा, ये मुकामी फैसला,
कुछ कदम हम भी चले, इतना रहेगा हौंसला।

छोटे-छोटे कदम रखते बढ़ते जाने का काम हमारा है, ठिकाना कब मिलेगा बिना यह सोचे। चलिए चल कर देखें।

बुज़ुर्ग कहते हैं - चलने वालों को निगाह मिल ही जाती है।



Monday, April 7, 2014

यकीन


यकीन 

यकीन अब यकीनन हो गया,
किसी पर यकीन ही नहीं रहा। 

हुआ यूं कि कुछ बनवाने चला,
यकायक एक सबक पा लिया। 

बालू सीमेंट से बाज़ार में पाला पड़ा,
कहीं कम कहीं ज़्यादा घोटाला मिला। 

ठेकेदार ने ठसक से कान में फूँका,
दूकान पर ज़रा संभल कर रहना । 

उसने बताया जो ऊंची दूकान वाला,
सावधान बड़े बनिया का नाम बिकाता। 

दूकान वाले ने चुपके से कान में फूँका, 
भरोसे पे नहीं सब सम्भाल कर रखना। 

ठेकेदार हो या प्लम्बर, भरोसा मत करना, 
पेंच हो पाइप या टोंटी, ताले में रखना। 

मिस्त्री ने राज ठेकेदार का खोला,
मजूरों ने सुराग-ए-राज़ सुनाया। 

हर रद्दे पे नया पाठ रोज़ ही रहा पढता ,
छोटा, बड़ा, कोई किसी से कम नही होता। 

'बाबा भारती' का वह दिलकश घोड़ा, 
'शाह' तक वापस नहीं किया करता। 

वक्त है आखिर वहीँ कैसे टिकता, 
कोई किसी पे यकीन ही नहीं करता। 

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Wednesday, March 26, 2014

खरहा




दुबका हुआ है आस का खरहा वहीं, चाँद गलता जा रहा,   
रात होती जा रही कितनी घनी, दीपक टपकता जा रहा । 

अंटी में छुपी कौन सी वो थी जड़ी, सब खुलासा हो रहा,   
हो गए भैया बड़े, जीजी बड़ी, उनका तमाशा चल रहा ।  

आवाक सी है देखती जनता खडी, कैसे जमूरा छल रहा,  
रास्ता दिखता नही मंज़िल कोई, बस एक नटवर दिख रहा।  

तुमसे जो दावा किया था काज़ी, कागज़ कहीं वो उड़ गया,   
काबिले बात रह गई किताबी, नावां ही सबकुछ हो गया।     

भूल से भी आ गया मन्दिर कभी, बन देवता पुजवा रहा,  
ले नाम जन-जन सब कही, बाज़ार में बेचा किया। 

शक या सुबहा, रहा नहीं कोई, बदतर ज़मना हो गया,     
नकाब में रहता नही है अब कोई, सब सरासर हो रहा ।  


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