'एक बहती धार'
पहाड़ से उतरते,
थक कर बैठने से पहले,
मुग्ध मन, ठिठक गया।
एक अल्हड़ धारा, ढलान पर
इठलाती, मुस्कुराती,
देखते ही, सम्मोहित हो गया।
साथ साथ, चलने लगा,
बढ़ती धारा का वेग
स्थिर होता गया।
भूमि से रिसते आते,
जल-स्राव से पूरित
नव-सौष्ठव भरता गया।
मंथर गति गहराती,
रूखड़ रसमय करती,
नव-रूप धर लिया।
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