पौध सुगढ़ सुंदर हरियाय,
बरस बरस बाढ़ै चिकनाय।
बरस बरस बाढ़ै चिकनाय।
शाख-प्रशाख पात दर पात,
रिमझिम रिमझिम बरसै बरसात।
लहरा मारै सावनी बयार,
झूल झलर झूलै बगियान।
रूप सबै मोहन बरवार,
रीझै तन-मन बूड़ै भवताल।।
अपनी राहें जुदा हैं, ये कब कहा !
पुनि बैतलवा डाल पे बैठे ---।
19 July 2014