मुंदती खुलती आँखों ने अमावसी पट पर पढ़ लिया !
आपकी सही जगह समझाने
वाले वाकये,
सरे आम कह दो, तो सह भी जाए कोई,
चलते हैं,
चलना ही है ।
न नेह जगाओ,न मोह लगाओ,न साथ गहो !
अब बहुत हुआ, अब बहुत हुआ !
अब चलना है, चलना ही है।
रस्मी तौर पर मिलना कोई जरूरी तो नहीं !
सुबह सुबह सोचते रहे,
ये एहसास भी कितना तसल्ली-बख्श होता है,