अंग दर अंग सुन्न हो रहा
कुहासा घना दिखना धुँधला रहा
सांझ तो सांझ रात घिरने लगी
चलो अब समेट लें पतंग अपनी .
चाहत से यथार्थ कहाँ बदलता है !!
दो पल,
दिल करता है,
अब इतनी उम्र ही कहाँ रही !!