'ढंग से समझिए !!'
किसी से मिलने की चाह मत रखिए,
किसी से मन की बात ना कहिए!
सबके अपने ही लस्तगे हैं ज़माने में,
किसी के दर पे अब कहाँ थमिए !
अब कौन चलेगा रास्ते पर तेरे,
किसके मशरफ के अब कहाँ कहिए !
सबकी अपनी जुदा जुदा हैं तरज़ीहें,
ख्वाहिशें नज़रे इनायत की मत रखिए !!
बेहतर है तन्हाई में सिमट कर रहिए,
बेवजह किसी को तंग ना करिए !!
हवाओं के रुख की भी खबर रखिए,
अपनी सीमाओं को ढंग से समझिए !!
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