Tuesday, March 29, 2016

कमरिया

कमरिया

चाकरी में लग गए, इस मोड़ पे आ कर के हम,
सोचते फिर भी रहे, क्या मंज़िले मकसद पे हम ?

था नहीं मालूम हमको, ठौर किस ठहरेंगे हम,  
था नहीं आभास यह कि, इस कदर जकड़ेंगे हम।

जो जो हुआ देखा किए, इस दौर में नत्थी हैं हम,
ये गौर से समझा किए, बे ताब की हस्ती हैं हम। 

चुपचाप जो सुनते रहे, उस राज़ के हमराज हम,
अहमक़ हमें समझा किए, उनके लिए बस खाक हम। 

फिर क्या हुआ, कैसे कहें, गुनते रहे अपने में हम,
क्या फैसला कैसे करें, दिन-रात थे उलझन में हम।

जोड़ा घटाया कर लिया, हासिल जमा हैं हम ही हम,  
है डेरा ये भी उठ गया, हैं अब नहीं गफलत में हम। 

क्या करेंगे अब भला, टूटी हुई लकुटी का हम,
अपनी कमरिया भी संभालो, चैन से पसरेंगे हम।

माने नहीं आली मगर, कहने लगे ऐसे ही चल,
करिया कमरिया’ ओढ़ कर, चलते रहो देखेंगे हम।
   
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Thursday, January 21, 2016

लरिकाईं

लरिकाईं

May 9, 2012 at 8:52pm



लरिकाईं  उर  में  अटीं, अंगनाई  के  छोर, 
इक  दिन  भोरहि  उड़  चलीं,  सँग  लिए  हिय  मोर. 

कितनउ  थिरके  गगन  में, खींचै  बांधे  डोर,   
वहि  सुवास,  सिहरन  भरी, चितवन  चारिहु  ओर.

Sunday, January 17, 2016

'हाफ ब्वाएल्ड'

'हाफ ब्वाएल्ड' 
http://www.telegraphindia.com/1141125/jsp/nation/story_19084385.jsp#.VHmmGjGUcW9

काशी से भभूत रमाए जौनपुर जाते हुए सोचता रहा इस भूषा में अटाला मस्जिद का दौरा कैसा लगेगा, लोग क्या सोचेंगे, फिर सोचा   जिसको जो सोचना है सोचे,  पहली पहली बार तो भभूत लपेटी है अब जैसे हैं वैसे ही रहेंगे, यह सोच और अगर मगर भी फ़िज़ूल में दिमाग मथे रहती है।  

मौके पर पहुंचे तो जौनपुर के किले के दरवाज़े पर  अपने महकमे के  और  लोगों  के साथ  काले मुहर्रमी  लिबास  में जमाल साहब को गुलदस्ता थामे अगवानी में  पाया तो याद आया वे भी दिल्ली से मुहर्रम मनाने घर आए हैं। मिलते ही उनकी गर्मजोशी ने दिल जीत लिया।  बढ़-बढ़ कर आगे-आगे किले के बारे में बताने  लगे।  

जमाल साहब का घर किले के ठीक सामने है। उनकी 'नार' भी वहीं कहीं गड़ी होगी। पढ़ लिख कर  बड़े  हो कर  रोज़ी - रोटी के लिए बाहर चले गए लेकिन हर साल मोहर्रम का वक्त आने पर  वहीं दबी सोई 'नार' जाग कर बरबएस उन्हें वहाँ खींच ले जाती है। फिर वे कुछ दिनों के लिए वहाँ बिताए वक्त की यादों के साए में लौट जाते हैं।  

हमारा छोटा सा हुजूम आहिस्ता - आहिस्ता  बढ़ता गया और वे अपने बचपन में खोए जज़्बाती हुए जाते  - 



"यहाँ जो भीतर का मैदान है, कभी हमारा फ़ुटबाल का ग्राउंड हुआ करता था।  एक बार देशपांडे जी आए और हमें खेलता देखा तो बुला कर पूछा - यहां क्यों खेलते हो ? हमने बताया बाक़ी के मैदान बहुत दूर हैं, यह घर के नज़दीक है।  सुन कर पीठ ठोंक कर बोले अच्छा जाओ खेलो। खेलते खेलते जमाल साहब एक दिन फ़ुटबाल टीम के कप्तान हो गए ."

हम टर्किश हम्माम की बारीकियां और खूबियां  समझते  रहे और जमाल साहब अपने बचपन में मगन -

"यहां हम छुपम - छुपाई खेलते , पानी वाले सूराख में घुस कर कभी इधर से और कभी उधार से निकल कर गुम हो जाते।  हम इसे भूल भुलइया कहा करते। "

आगे बढे , सामने से आई पैड पर तस्वीर उतारते नौजवान से तोअरोफ़  कराया  - "छोटा भाई  है - माज़िद। " उसने भी मुस्कुराते हुए गर्मजोशी से आगे बढ़ कर हाथ मिलाया।  जमाल साहब बताते रहे -

"ये जो छतरी सी बनी है ना, यहां लोग वर्ज़िश और मालिश किया करते थे , अब कम दीखते हैं वैसे लोग।  और यहां से देखिए, पूरा जौनपुर शहर दीखता है यहां से, सामने गोमती पर तना  मेहराबदार  शाही  पुल अकबर का बनवाया है।



जिस दीवार की मरम्मत  अभी की जा रही  है। एक बार यहां काम कराने के दरमियान दीवार में से गाहड़वालों के वक्त की कुछ मूर्तियां निकलीं तो स्टोर में रखवा दीं, अभी आप को दिखलाते हैं।

सिन्हा साहब के फादर यहां सी. ए. की पोस्ट पर थे तो हम उनके साथ बचपन में यहीं खेला करते।  हम तो यहां के एक एक कोने से वाकिफ हैं।  

आप देख रहे हैं वो  सामने जो ऊंची बुर्जी है वहाँ बैठ कर पढ़ने आया करता था।  चलिए आप को दिखाता  हूँ यहां घंटो बिताता।  बड़ी खुशगवार हवा बहती थी यहां जैसे आज बह रही है।"

बोलते बोलते जमाल साहब की आँखों में उनका बचपन जुग्ग जुग्ग चमक उठता।



किले के ऊंचे टीले और उसके बाहर चारों और बनी खंदक का ज़िक्र करते करते उन्हें अपने बुज़ुर्ग याद आए जिनका घोड़ा कभी उन्हें लिए दिए उसमें फांद गया था जिसके चलते उनका पैर टूटा तो आगे सीधा नहीं हुआ।

लंब-ए-सड़क अपना मकान, उससे लगी कद्दावर भतीजे की घड़ी की और उससे सटी बन्दूक की दूकान दिखाई, बड़े भाई से मिलवाया,   सड़क पर सीवर की खुदाई के दौरान मिली चमक दार पॉटरी (एन. बी. पी.) और उस बिना पर यहां की बसावट के हज़ारों बरस से वहीं बसे होने का दवा किया। इस जानकारी ने हमें उकसाया और जानने देखने को। उनसे कहा कि क्या कहीं हमें भी दिखा सकते हैं जहां यह पॉटरी मिलती हो।

वो और जोश में भर कर अपने साथ बगल की गली में लिवा ले गए।  अपने दादा का बनवाया लंबा चौड़ा मकान दिखाया।  बोले ये है मेरा 'ददिहाल'और आगे यहां रहे थे हमारे मामू, ये रहा हमारा ननिहाल। अगल बगल के घरों पर मुहर्रम के काले झंडे लहराते दीखते और मातम के बोल सुन पड़ते। ननिहाल के पास ही वे हमें अपने पुश्तैनी कब्रिस्तान में लिवा ले गए। बुज़ुर्गों की कब्रें दिखलाईं जिनके आस-पास पुराने ठीकरे देखते ही हमारे दस्ते ने फ़टाफ़ट एन बी पी और ग्रे वेयर के टुकड़े और एक टेराकोटा हेड बीन लिया।  'हाथ कंगन को आरसी क्या ? पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या ?' सब ने जमाल साहब का दावा मान लिया।

अब सब इस जुगाड़ में लग गए कि अगर कहीं खंती लग सके तो यहां की तवारीख का सही सही पता लगे।  जमाल साहब फिर आगे आए -

"अरे इसमें क्या है।  चाहें तो यहीं कब्रिस्तान के कोने में लग सकती है,  नहीं तो दादा के मकान के पास वाला खाली प्लाट तो है ही। "


अगला ठिकाना अटाला मस्जिद देखा। वहाँ भी जमाल साहब के फुटबाली ज़माने के साथियों ने तहे दिल से हाथो हाथ लिया। जमाल साहब ने इस बात पर बड़ा रंज़ जताया:

" है तो यह मस्जिद बहुत ज़माने से अपने प्रोटेक्शन में लेकिन कोई खैर खबर नहीं ली गई।  अनजाने में देख रेख करने वालों ने जगह जगह सीमेंट से मरम्मत प्लास्टर कर बदनुमा कर दिया।"

फिर अंदर के खुले हिस्से के एक और इशारा कर के तस्दीक कराई -

"इसी जगह हम सब तख्ती पर इमला लिखा करते थे।  यहीं हमने शुरुआती तालीम पाई। इसी मदरसा-ए-दीनो दुनिया में।"

फिर ले गए मस्जिद की ओर।  दूर से देख रहे मौलवी ने आवाज़ लागई - "जूते वहीं उतार दीजिए।"
हमें देर लगी तो इत्मीनान दिलाया "बेफिक्र रहिए,  कोई ले नहीं जाएगा। " 

मस्जिद के अंदर की नफीश नक्काशी दिखा कर जमाल साहब ने बताया ऎसी लाज़वाब कारीगरी देखने को नहीं मिलती।



अटाला मस्जिद से चार अंगुली मस्जिद की ओर निकले।  जमाल साहब ने कहा - "मुहर्रम तक रुकिए तो देखिए यहां की रौनक।  ज़ंजीरों और चाकू छुरियों से ऐसा मातम होता है कि समूची सडक खून से रंग जाती है, और देखने वालों की इतनी तादाद कि तिल रखने को जगह ना रहे। "

गलियों में बड़ी गाड़ियों के लिए मुश्किल से जगह बनाते लंबा रुट लिया।  रास्ते में बिक रहे गन्ने देख कार्तिक एकादशी और इक्ष्वाकु राजवंश, कुदरती गन्ने की चर्चा के बाद जौनपुरी मूली और मशहूर इमरतियों की बात हुई। कर्बले के नज़दीक से निकले तो जमाल साहब ने अपने दादा और अब्बू को हसरत से याद किया, दादा की ज़मींदारी और नेकदिली और ज़मींदारी ख़त्म होते ही लगान ना वसूलने के ईमान की बात बताई, मज़लिश में उनके बोलने का अंदाज़ बताया, उस जगह पर हज़ारों ताजियों दफनाने का ज़िक्र किया।

जमाल साहब अपनी रौ में कुछ और बोलते कि तभी ओटा जी ने शरारत से टोक दिया  -

"आप भी तो हज़ कर आए हैं, पहले के सब पाप कट गए होंगे।  अब आप भी मज़लिश में बोल सकते हैं हाजी साहब।  "

जमाल साहब हौले से मुस्कुरा कर बोले - "अमां यार क्या बात करते है आप भी।  भला मैं कहाँ ऐसा कर सकता हूँ। सरकारी नौकरी में सच बोलने का दावा भला कौन कर सकता है ? और नहीं तो इतना झूठ तो बोलना ही पड़ता है, बाज बाज, बहुत फोन आएं तो कह दो नहीं हैं। " यह सुन कर सबने उनकी साफ़दिली की तारीफ़ की।

चार अंगुल मस्जिद की एक मेहराब मशहूर है अपनी इस खासियत के लिए कि छोटा बड़ा जो नापे उसकी माप चआर अंगुल ही निकलेगी।  जमाल साहब के ज़ेहन में यहां की यह शोहरत बचपन से कब्ज़ा जमाए रही लेकिन हमें दिखाते वक्त ढूंढने के बाद भी उसकी शिनाख्त नहीं करा सके।

फिर से ताजिए पर लौटे।  असल में हिन्द से बहुत दूर ईराक में कर्बला जा कर मातम मनाना सबके बूते की बात तो है नहीं, शायद इसी लिए हिन्द के शिया लोगों ने यहां के तकरीबन हर ख़ास शहर - कसबे में अपने अपने कर्बले बना लिए।  हर बरस मुहर्रम के मौके पर कर्बला की ज़ंग की याद में, जिसमें इमाम हुसैन साहब क़त्ल किए गए थे, छोटे बड़े ताज़िए (मकबरे) उठा कर जुलूस निकाल कर ज़ंग के वाकयों को फिर से जीते हुए अभिनीत करने और आखीर में इन ताजियों को कर्बला में दफनाने लगे।    

तभी किसी साथी ने कह दिया कि हाँ हाँ उनके फलां दोस्त भी ऐसा ही बता रहे थे और जमाल साहब सुनते ही तुनक गए - "अमा यार उसे क्या आता है ? एक बार पूंछ दिया था - ताजिए में दो छोटी छोटी हरे  लाल  तुरबत क्यों बनाए जाते हैं ? बस मुंह खोल दिए, इतना भी नहीं बता पाए कि हसन - हुसैन की याद में बनते हैं।  छोड़िए उनकी बातें ठीक से नमाज़ तक तो पढ़ नहीं पाते। ' हाफ ब्वाएल्ड' समझिए उनको ' हाफ ब्वाएल्ड'।"

पहले तो समझ नहीं आया क्या कह गए।  फिर समझ में आया तो देर तक हँसता रहा -  'हाफ ब्वाएल्ड', ,मतलब अधपका अण्डा, मतलब अधकचरा।

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Wednesday, November 4, 2015

मीजोरम में 'राम-राज्य'

मीजोरम में 'राम-राज्य'


बांस- नरकुल के झाड़ों और केले के घने वनों में से झांकते शाल, कटहल और दूसरे गाछ वाली घनी हरियाली से ढके पहाड़ों की ढलान पर जहाँ-तहाँ झूम खेती के लिए साफ़ किये गए पुराने हरे हो चले और पीले ताज़े खेतों के चप्पे। मछली पालने के लिए बांधे गए पोखरों के झिलमिल जल-तल । घूमती सड़क के उतार चढ़ाव पर चलते दिखते दूर तक फैले नीले आकाश में तिरते चलते धवल धुँआरे बादल।



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चलते चलते ऐडम से चिट-चैट करते बढ़ते जगह जगह सड़क के किनारे निरल्ले में पार्क की गयी
मोटर साईकिलों के बारे में पता चला आस पास के किसानों की हैं यहां खड़ी कर के खेतों में काम करने
निकल गए हैं ऊपर या नीचे वाले खेतों में। शाम के धुंधलके में लौटेंगे तो इन पर सवार हो कर वापस
अपने घर गांव चले जाएंगे। इसी सिलसिले में ऐडम ने आगे चल कर अनोखी दूकानें दिखाने का ज़िक्र
करते हुए ड्राईवर से मीज़ों भाषा में आगे उन ठिकानों पर रुकने को कहा।

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आगे, पहाड़ से आ रही पतली जलधार आगे टीन सटा कर बनाए गए पनाले के उस किनारे पर बांस की
एक गुमटी दीखते ही हमारी गाड़ियों की कानवाई ठहर गयी। वहाँ सुनसान में ना कोई आदमी ना दूकानदार।
गुमटी में दिखे कतार में धरे बोरों की कतार और करीने से सजी सब्ज़ियों पर लिखे उनके दाम, किसी पर
रुपए २०, किसी पर १० रुपए। बीच के बांस से बाँध कर लटका दिखा प्लास्टिक का डिब्बा जिसके ढक्कन
पर लंबा कटा छेद। ऐडम ने बताया वहाँ लगी तख्ती पर लिखा है - रुकिए, कुछ ना कुछ खरीदिए और
उनकी कीमत जोड़ कर डिब्बे के अन्दर डाल दीजिए। हमारे साथ चल रहे इंटैक के कन्वेनर रोहिनथंगा,
को कन्वेनर रिन संगा, गार्ड, ड्राइवर सबने वहाँ से कोई ना कोई मनचाही फल या सब्ज़ी उठा ली उनकी
कीमत जोड़ी और उतनी रकम डब्बे के छेद में सरका दी।


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ऐडम ने बताया इन गुमटियों में लगी खुली दूकान पर कोई नहीं बैठता, ना तो दुकानदारी के लिए और
ना निगरानी के लिए। दूकान लगाने वाले खेतों में काम करने चले जाते हैं, दूकान को लोगों के ईमान के
सहारे छोड़ कर, और, खरीददाार उनके विश्वास की आस बनाए रखने में कसर नहीं रखते। संझा ढले खेतों
में काम काज निपटा कर लौटने वाले किसान अपनी दूकानों की आमदनी समेट कर आराम से अपने घर
चले जाते हैं।
मीज़ोरम में रम रहे ऐसे 'राम राज' जैसे विधि-विधान कम से कम मैंने तो इसके पहले देश-विदेश में
कहीं नहीं देखे।
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Thursday, July 9, 2015

'गुतेन ताक' *

July 7, 2015 at 10:04am

इस मुल्क में टहलते, कुछ अक्स याद आए,
लमहे बहुत पुराने, फिर लौट लौट आए।

पढ़ने लगे थे 'जर्मन', उनसे, वो याद आए,
स्कूल था वहीँ पर, 'म्यूलर' की रोड जाए ।

पाती में वो लिखाए, पढ़ने  की याद आए,
'गुतेन ताक' माने, अपनी समझ ना आए।  

'माइन नाम ईस्त' बोले, लड़के का नाम होए,
'फ्राउलिन' लगा के बोले, लड़की का काम होए।

वो तो रहे सिखाते, हम ही न सीख पाए,
वो संग-साथ ऐसे, बस याद में ही आएं।  

वादी-ए-राइन देखें, डेरे लगा के आएं,
दान्यूब के किनारे, किश्ती चलाते जाएं।  

वो 'बोर्ड्स वो '' बोज़ेन्स्की', 'ज़्वेनेर' का नाम आए,
गुरुवर ने जो पढ़ाए वो नाम याद आए।

वो शख्श गुज़रे लमहे, ज़ज़्बात अब ना आएं.
वो उड़ गए हवा से, अब फिर कहाँ से पाएं।

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 * नमस्कार 

Sunday, June 28, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५

पारीमल - भारीमल


चना चबैना चबाते गोठनी के शिक्षक ने जहां से खरवार कथा छोड़ी थी वहीँ से उठा ली -  

'राजा मदन शाह नामक खरवार राजा जब बुढा गए तो उनको बड़ी चिंता व्याप गई कि स्वयम तो हत-पौरुख भए और राजकुमार अभी बालक हैं, अब अरना भैंसा का बली कउन देगा।   

इसी समय द्वारपाल ने राजा को सूचना दी - कुछ बीर दुआरे पर आए हैं, कहते हैं - लोहे की तलवार तो क्या हमार रेंगवे काठे की तरवार से अरने की बली चढ़ाय दें।  

राजा ने सुना तो अचरज में पड़ गया - ऐसा चमत्कार भी कोई कर सकता है क्या ? 
उसने राजाज्ञा सुना दी - काठ की तलवार से कोई बली चढ़ाय दे तो आधो-आध राज-पाट उसके नाम औ राजकन्या दान में। औ, जो न कर पाया तो मूडी कलम।  

द्वार पर आए बीरों का जत्था आया रहा महोबा के बीर चन्देलों का। उनमें रहे दू ठे रेखिया उठान भाई परिमल ओ भारीमल, बहुतै रूपवान औ प्रतापी। इन्हीं के दम पर अनहोनी को होनी करने की ठानी गई थी।  

राजा ने बन में से एक अरना पकड़ मंगवाया।  
दूर पास के गांवों के देवी-भक्त उमड़ पड़े। कोल, गोंड,  चेरों, बैगा, धारकार, भुइंहार, आदमी-औरत का रेला लग गया। 
दोनों राजकुमार बीर बाने में महिष बध को उतावले हुए जाते।  
उधर जुटान के मन में एक्कै सवाल - काठे की तलवार से भैंसा की बली !!!!!!!!!!

बड़के कुमार ने काठ की तलवार के एक ही झटके में आशंकाओं की भारी भीत ढहा दी।  
काठ की तलवार से लोहू टपकै टप टप। अरना का मुख देवी के चरन में लोटै।  
देखै वाले देखतै रहि गए। 
रजवौ देखै हैरान।  
बनवासिन कै जयकरा से धरती असमान कंपकपाय गइल। 

पारीमल-भारीमल अगोरी-राज से आधा राज पाए और मदनशाह की कन्याएं उनसे बियाही गयीं। कुपित खरवार राजकुमारों को यह सब जमा नहीं तो बलपूर्वक उनका हीसा लेने की कोशिश की लेकिन चंदेल कुमार ओन्हनौ के मुआए देहलैं। इस तरह पूरा अगोरी राज पर चन्देल सत्ता कायम हो गइल।'


लोक परम्परा में चन्देलों के अगोरी राज पर काबिज होने की दूसरी ही कहानी साथ चल रहे पढ़े-लिखे रूदन खरवार ने सुनाई - 

'महोबा से हार कर भागे चन्देल अगोरी के राजा मदनशाह की शरन में चाकरी करने लगे। अपने साहस के बल पर ओनहन के राज दरबार में अपनी पैठ बैठाते सेना में बड़ा ओहदा पाते देर ना भई। खरवार राजकुमारियाँ पारीमल-भारीमल के रूप पर रीझ गइलीं। राजा ख़ुसी खुसी ओन कर बियाह करि देहलें। ओहर राजा बूढ़ हो के माचा धै लेहलन तो पढ़े बदे बनारस रहै वाले खरवार राज कुमारन के राज-पाट सौंपे के बोलवाए के हरकारा भेजले। 
चलाक चंदेल मौक़ा लखि के खोट कइलें। आन्हर-बहिर राजा के सामने पारीमल-भारीमल के खड़ा कै के कहि देहलें कि राजकुमार आय गइलें।  राजा अपने लइकन के धोखा में ओन कर राज तिलक कै देहलन।' 

अब तक चुप्पी लगाए ध्यान साधे सुन रहे कुंवर ने अपनी टीप लगाई - 

'हूँ ! तो ये दोनों परम्पराएं इस इलाके में सत्ता की लड़ाई में शामिल चन्देलों और खरवारों के अलग अलग पक्षों की देन हैं। असलियत दूनों के बीच कहूँ होइहै।'

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Saturday, June 27, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४

बनराज खरवार

अगले दिन गोठानी से आगे बढ़ कर अगोरी  मुख्य द्वार तक पहुंचे तो किले के सामने से दिखे कंगूरों के बीच से गोलीबारी के लिए बनाए गए ऊर्ध्वाधर संकरे सूराख और द्वार के बगल में स्थापित महिषासुर मर्दिनी का थान। 

गोठानी से हमारे साथ आये एक शिक्षक ने बताया कि - 

'इस इलाके में पहले 'अघोर* सम्प्रदाय' का बड़ा प्रभाव रहा। 'अघोरों के बाद यहाँ खरवारों का राज स्थापित हुआ।'

साथी गिरीश बताते हैं - 'इस अघोर संप्रदाय के उपासको 'अघोरियों' का पिछले वक्त के कापालिक सम्प्रदाय से रहा है। मानव-मुण्डों की माला और मुकुट धारण करने वाले कापालिक पार्वती के घोर रूप चामुण्डा देवी को मानव-बलि और मदिरा अर्पित करते रहे। शिव की एक उपाधि 'अघोर' का अर्थ संस्कृत में अ + घोर अर्थात जो 'घोर'अथवा भयानक न हो। अघोर मत आज शैव उपासना का सबसे कुख्यात रूप माना जाता है, विंध्याचल के निकट स्थित अष्टभुजा पर्वत इस मत का एक बड़ा केंद्र रहा है। इधर अगोरी अगर अघोरों का केंद्र रहा तो उधर सोन के उस पार घोरावल रहा घोरों की धुरी।'

इससे पहले कि बात आगे बढ़ती ग्रीसम सिन्हा ने एक सवाल दाग दिया - 

'ये 'खरवार' क्या होते हैं ? इनका नाम और इस राजवंश के विषय में तो हमने कहीं पढ़ा-सुना नहीं ।'

शिक्षक ने समझाया - 

' यहां बन में एक ठे गाझ हो ला जेकर नाम हौ 'खैर'। पान पर लगावै वाला कत्था एही के छाल से बना ला, ओही से पान खावै वालन के ओंठ हो जा लें लाल-लाल।'

बहुत बार सुने दिलकश गीत के बोल कानों में उतर आए - 'पान खाएं सइयां हमार ----'

शिक्षक की बात आगे बढ़ी - 'खैर से कत्था निकारै वाले बनवासी कहलाए 'खरवार'। जैसे जैसे बाढा पान खाए का चलन ओतनै बाढा खैर का व्योपार। जेतना बाढा खैर का व्योपार ओतनै धनी मानी होते गए खरवार। पैसा-दौलत बाढ़ल तो नौकर-चाकर परजा-परानी भी बाढ़े, फिर, ऊ बन गइलन बनवासी से बन के राजा। अगोरी बन गइल ओन कर रजधानी। पहलम पहल ई किल्ला ओही लोग बनवइले होइहन। तब इहाँ रहल होइहन आज से जियादा सघन बन औ सोन-ओ-रिहन्द में आज से जियादा साफ़ ओ बड़हर पानी। 

किल्ला के दुवारे की देवी खरवारन कै ईष्ट देवी रहलीं। अगोरी के राजा हर बरस बन से एक ठे अरना भैंसा पकड़ मंगववतें और तलवार के एक्कै वार में ओ कर धड़ लोटता एह बल्ले औ लोहू फेंकता सिर देवी के चरणों में।

खरवारन कै राज बढ़तै चलि गइल। उत्तर सो पार, पूरब खोड़वा के ओह लग्गे बिजयगढ, दक्खिन एक ओर सिंगरौली बलियापार, ओहर पलामू जिल्ला में गढवा-नगर उटारी, औ पच्छिम में बर्दी के आगे। चहुँ ऒर रहा बनराज खरवारन ही कै राज।'

इक्का-दुक्का चरवाह या बनवासी आते, देवी के सामने हाथ जोड़ वहीँ बैठ जाते या आगे का का पैंड़ा धर आगे बढ़ जाते। 

ढलती दो पहरी में पेट कुड़बुड़ाए तो गोठानी से लाए झोले में धरे बचे-खुचे चना-चबैना-गुड की याद जगी। 

आगे का हवाल सुनने से पहले, देवी  माथ नवां कर हम लोग पेट-पूजा में लग गए।  

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