३४.
हरियाली हो गईं करीलें, कदम फरैं फल-फूल,
बिरज बावरी मीरा नाची, देखै रूप अमोल,
बिरवन चढ़ें, धमाल मचावैं, गोपालन के टोल,
जय-जय राधे, कान्हा-राधे, ब्रजबासी जपते मन ड़ूब, चौमासे में घूम.
३५.
धाय-धाय अब धावा मारैं, शहरी बाल टपोर
गली-गली में मटकी लटकी, लगी टकटकी पूर,
कंध जोड़ सब घेर बनावैं, एक के ऊपर एक,
पारी पारा कोशिश करते, खिसके आते भूम, चौमासे में घूम.
३६. सब जन मिल उकसाय रहे अब, ना मटकी अति दूर,
अबकी बेरिया पाओ आओ, उचकौ अब भरपूर,
यहु देखौ फिर चढ़ें कन्हाई, बांधे पटिया माथ,
अब पायी, अब पायी, पायी, मटकी फोरी कूद, चौमासे में घूम.
३७.
घर-घर अन्दर मंदर सज गए, भज मन राधा बोल,
कैसी मोहक जसुदा माता, मोह रहे दधि-चोर,
उलटी धारा आजु चली बह, सज गए कारागार,
बंदी-रछक धन्य हो रहे, 'बंदीजन को पूज,' चौमासे में घूम.
३८.
कारी घटा घिरी घनघोर, जमुना मारै फाहैं जोर,
तापे बिजुरी तडकै तड-तड, बरसै भद्रा झोर,
चरिह्यूं लंग जब घिरा अन्धेरा, लीन्ह कृष्ण अवतार,
कष्ट काट फिर करैं उजाला, उतरैं फिर से भूम, चौमासे में घूम.*
(* विशेष रूप से डॉ. अश्वनी अग्रवाल जी के लिए)
३९.
सूगा-पांखी धान अब, बगुला-पांखी कांस,
मकई मीठी अब फरै, छिटपुट बादर आस.
निकसौ छांहहि-छांह अब, सांझ-सबेरे घूम,
तीखी, तिरछी, बींधती, धुली खुली अब धूप, चौमासे में घूम.
४०.
करिया पाख औ कारे मेघा, हाथ न सूझै हाथ,
पता न लागा तुमहू अइहौ, वैसन अन्हरी राह,
भूले से तनिकै टकराए, काहे ऐसन तूल,
फ़िरहू फिर बरखा रितु आई, लिह्यौ वसूल ब्याज मय सूद, चौमासे में घूम.
४१.
बरखा मा व्यवधान कछु, कृषक गए अकुलाय,
हरे धान जब ख्यात मा, लगे तनुक कुम्हलाय,
कस ब्वावैं सरसों अबै, पुरवौ सूख पटान,
उठै आंखि बदरा तकैं, बरसौ हथिया झूल, चौमासे में घूम.
४२.
मनभावन अति रामगिरि, पठवै यछ सन्देश,
विदिशा विन्ध्य गुहा लखौ, मालव दशपुर देश .
कुरुछेत्र कनखल रमौ, क्रौंच रंध्र कै पार,
अलकापुरी सुहावनी, उड़ो मेघ सम दूत, चौमासे में घूम.
४३.
कालिदास बरनी छटा, छक चौमासा साम,
लहलह वन महमह करैं, वेत्रवती तट आन,
मद आलस गज डोलते, बगुला बांधें पांत,
उलटि अलक ऊपर तकैं, काढि नयन उठि कूट, चौमासे में घूम.*
44.
तल-अवतल पुरखा तिरैं, पितर पाख भुइं ओर,
बरखा प्यास बुझै नहीं, तरपौ अंजुरी रोज़.
गया चलौ, नैमिष चलौ, पूजौ पिंडा पूर,
इक दिन पंछी उडि चलै, गंग तरैं सब फूल, चौमासे में घूम.
४५.
बाढें दिन चौमास कै, बाढ़े हिय अनुराग,
जैसे बाढें लतर वन, तिन्नी बाढ़े ताल,
बिरही सुमिरै दिन गिनै, पाले मन में आस,
लपकौ अरबर मेघ अब, वै बैठे हैं रूठ, चौमासे में घूम.
४६.
खिलै कुमुदुनी खाल मा, विहसन लागें चन्द्र,
घाम चुभै घमसाए कै, भूख परै अब मन्द,
नरिया बाँध बझावैं मछरी तडकैं जालहि ताल,
गाँवन मा अब दिखै नज़ारा, लरिकन कै करतूत, चौमासे में घूम.
४७.
हरसिंगार फूलैं संझा भर, भोर बिछें भू पाट,
झिलमिल झलकै घास पर, किरण परे उडि जात,
ठुनक धरे पछुआ चलै, घट-घर देवी आन,
गुड़-घिव समिधा में परैं, गमक उडै जग धूम्र, चौमासे में घूम.
४८.
चौमासे मा जनम भा, फिर कैसे रहि जाय,
दस्तक देवै मेघ जब, पाँवन शनि चढ़ जांय,
गठरी लादे पीठ पर, बह्कैं नदिया कूल,
खेमा डारैं रात में, दुसरै दिन फिर कूच, चौमासे में घूम.
४९.
दुर्गा पूजा सज गई, लीला राम अपार,
नौ रातैं, दशमी चलै, महिष दशानन मार,
उड़न खटोला सम उडै, शीतल मन्द बयार,
महकै धान बिहान में, महकै माटी मूल, चौमासे में घूम.
५० .
औघर दानी अस जियैं, जस चौमासे मेह,
तपैं जरैं बादर बनें, बरसु लुटावैं आपु,
उमडि घुमडि सब उलटि कै, भरैं खेत खलिहान,
प्रान भरैं सब जीव में, बाढें सब धन पूत, चौमासे में घूम.
५१.
चौमासे भरि कंठ पिया, अबौ अपूरित प्यास,रस पीवन जो हम चले, भरी नहीं वहु आस,अगली बिरिया फिर चलब, बह्कब देश जवार,शायद तबकी छक सकैं, वहै अपूरब घूँट, चौमासे में घूम.क्रमशः
५२. (अंतिम कड़ी)
चौमासा चौपर्ति गा, चन्दा चितवत आय,
चन्द्र-किरन अब चूमि कै, पायस अमरित पाय,
थोरै दिन की कसरू है, देव उठेंगे सूत,
चरन छुऐं सब मीत कै. अब धारैं हम चूप,
------------ नमस्कार ----------