Sunday, July 23, 2017

वजूद

Rakesh Tewari
Published by Rakesh TewariJuly 19 at 7:51pm

वजूद

यूं तो धूल-ओ-गुबार से
नाता रहा है अपना।
कहीं भी बैठे या पसरे, 
क्या बिगड़ गया अपना।
भटकते हुए अजनबियों के घर भी,
डेरा डाल रहे अपना।
अनजानों से भी मांग के खाया,
मनभाया अपना।
ऐसा ही आवारा अदना सा
वजूद है अपना।

जैसा भी है अपना वजूद,
तो अपना ही है।
ऐसा भी नहीं कि
बिना बुलाए ही,
चला जाए 'कहीं' भी।
फिर चाहे वो
ताज़ो-तख़्त,
महफ़िल-ए-सदारत,
या स्वप्निल संसार,
ही क्यों न हो।
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Sunday, July 16, 2017

अखरती

अखरती

कानों में कूजन की गूजन झनकती,
लतरन में, डालिन में, अंखियाँ अरझतीं।  

बगिया की पगिया सूनी अखरती,
चहकती चिरइया की चुप्पी अखरती।  

बारिश की बहिया में मछरी तड़पती,                          
तलइया में छप-छप छपइया अखरती।        

करिया बदरिया बिजुरिया चमकती, 
झरती छपरिया में रिमझिम अखरती। 

टोला मोहल्ला में नैय्या टहलती, 
लाली बहुटिया की टोली अखरती।  

लइकन कै खेला-लिहाड़ी अखरती, 
पुरनके सँहरियन की बतियाँ अखरती।  

नयकन की टोका-टोकनी अखरती, 
ऐ बाबू ! अमवौ पै  बन्दिश अखरती।  

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Saturday, July 15, 2017

हौले से

हौले से
कारवां बावरे बादरों का चला है,
उड़ के अटरिया पे अटका हुआ है।
रूखी हवाओं में तप कर उठा है,
दर-दर में यूं ही भटकता रहा है।
वनों प्रांतरों में खमसता रहा है
घनेरी घटाओं में घुमड़ा हुआ है।
धड़कता बहकता धुंआया हुआ ये,
रह-रह के जब-तब बरसता रहा है।
चुपके से आँगन में हेला हुआ है,
सिहरन जगा कर के खेला किया है,
सपनों की अलकों में छुपता छुपाता,
उनीदी सी आँखों में पसरा हुआ है।
कहना है क्या कुछ नहीं बोलता है,
हौले से पलकों को चूमा किया है।
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Saturday, July 1, 2017

डेराने हुए हो

डेराने हुए हो

बात छोटी सी है, ये समझते नहीं हो,
हसर सबका ऐसा, ये समझे नहीं हो। 

बात ऐसी भी क्या है, बुझाए हुए हो, 
जखम कितना गहरा, जगाए हुए हो। 

गलाने को गम, यूं ही मिटते हुए हो, 
हाथ में साकियों के, बिखरते हुए हो। 

होश मद मे डुबाए, यूं बहके हुए हो, 
अपने वमन में ही, चंहटे हुए हो। 

आप आपे से ऐसा क्या बाहर हुए हो, 
दाग दामन के अपने उघारे हुए हो। 

किनारे पे आ कर, उदासी लिए हो, 
अब तो समझ लो, क्यों बिफरे हुए हो। 

दुनिया वही है, क्यों भूले हुए हो, 
जो बोया है सिर पर, उठाए हुए हो। 

आग से खेलने खुद से शामिल हुए हो, 
कि घर अपना खुद ही जलाए हुए हो। 

लुक्का लगा कर के घूमा किये हो, 
चिता आप अपनी, सजाए हुए हो। 

बिना बात 'घट' सबका फोड़ा किए हो, 
रमा लो भसम, क्यों डेराने हुए हो। 

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Thursday, June 29, 2017

गौरैया

गौरैया
१.
गरमी की चटक दुपहरी में
नानी के घर खेला करते। 
 आँगन में तुलसी चौरा पर,
गौरैया ताका करते।
 एक सकोरा पानी भरके
दाना छितराया करते।
गरमी से व्याकुल, खुली चोंच,
दल के दल आने लगतीं।
 पहले दूर फुदकती फिर,
ढीठ बनी नियरे आतीं।
 आँख मिचकती, चीं-चीं करतीं,
तिरछे से देखा करतीं।
२.
जब जातीं वे परच चिरइयां,
झांपी-सूपा ले आते।
 रसरी बांध छोटी सी डंडी
उनके नीचे अटका देते।
 थोड़ा सा दाना पानी भी,
नीचे से सरका देते।
 एक हाथ में रसरी थामे,
दूर तनिक बैठे रहते।
बिन बोले बिन कोई आहट,
दम साधे टोहा करते।
दाना चुगती कोई चिरैया
कब आए उनके नीचे।
३.
जैसे ही कोई आती-जाती,
फंसती चारे के चक्कर में।
रसरी खैंच उसे धर लेते,
उछल कूद कर खुश होते।
 तरह तरह के रंगों से,
उनको फिर रंगा करते।
 नानी जग कर गुस्सा करतीं,
कइसन उत्पात मचाए हो।
 'लइकन कै खिलवाड़ बुझाए,
 औ, चिड़ियन कै जिव जाए।'
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Saturday, June 24, 2017

तीन तेरह का फेरा

तीन तेरह का फेरा
'तेरह' की बात आने पर बरबस ही भारत के यशश्वी प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई की याद आती है। बचपन से ही उनकी सादगी, हाज़िर जवाबी, लाजवाब भाषण-कला और लोक प्रियता की चर्चा सुनने का अवसर मिलता रहा, सीतापुर जिले में जन्म पाने और लम्बे समय तक लखनऊ निवास के संयोग से। जब कभी उनकी सभा की सूचना आती हजारों श्रोता अपने आप जुट जाते उनको देखने-सुनने।
एक बार हम लखनऊ रेलवे स्टेशन के एक नंबर प्लेटफार्म पर किसी को छोड़ने गए थे, थोड़ी देर में बाजपेई जी अपने एक सहायक के साथ दिल्ली जाने के लिए आए। ट्रेन चलने में अभी कुछ देर थी इसलिए वे अपने डिब्बे के बाहर ही खड़े अनजान लड़कों से बात करने लगे। थोड़ी ही देर में उनमें ऐसी आत्मीयता बन गयी कि जब ट्रेन चली तो वे अनायास ही नारे लगाने लगे - 'देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो।'
आगे चल कर बाजपेई जी पहली बार 'तेरह' दिन के लिए देश के प्रधान मंत्री बने। उन्हीं दिनों वे लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में आयोजित सभा में बोलने आए। हम भी सुनने गए। वे बीच-बीच में सधे हुए जुमलों से लोगों को लुभाते-हंसाते बहुत ही तार्किक तरीके से अपने निराले अंदाज़ में बोल रहे थे। उसी रौ में उन्होंने अपने 'तेरह दिन' के कार्यकाल और 'तेरह' की संख्या के अशुभ कहे जाने पर मज़ेदार तंज कसते हुए जो दो लाइनें सुनाईं हमें हमेशा के लिए याद हो गयीं - 'तीन में ना तेरह में, राज करेंगे डेरा में।'
कहते हैं लोगों के जीवन से कुछ संख्याओं का बड़ा गहरा नाता रहता है। बाजपेई जी ने दूसरी बार 'तेरह अक्टूबर' को प्रधान मंत्री पद की शपथ ली, इस बार उनकी सरकार 'तेरह' महीने चली। उन्हीं के कार्यकाल में 'तेरह दिसम्बर' २००१ को लोकसभा पर आतंकी हमला हुआ।
यूं तो अपने जीवन से 'तीन-दो-पांच' से प्रायः साबके पड़ते रहे लेकिन यह एक महज इत्तिफाक ही है कि कुछ सन्दर्भों में 'तेरह तारीख' से भी विचित्र मेल हुआ। यह लिखते हुए पढ़ने वालों से एक गुजारिश करना ज़रूरी लग रहा कि भूल से भी कहीं यह न समझ लें कि अपनी तुलना बाजपेई जी से करने की धृष्टता कर रहा हूँ। उनका ज़िक्र तो सिर्फ और सिर्फ 'तेरह' का फेर समझाने के लिए कर रहा हूँ वरना कहाँ 'राजा भोज और कहाँ ------ धूर लोटना '।
अपने महकमे के सर्वौच्च पद पर चयनित हुआ '१३ मई २०१३' को। आगे लगे 'अड़ंगों दर अड़ंगों' के चलते पूरे एक बरस तक कुछ समझ नहीं आया कि ज्वाइन भी कर सकूंगा या नही। तय किया अब वहाँ की सोचना छोड़ो कोई और ठिकाना थामो। मौक़ा भी मिल गया लेकिन अचानक जाने कहाँ से 'तेरह' का ऐसा फेरा घूमा कि '१३ मई २०१४' को आज की सरकार बनने के कुछ ही दिन पहले कार्य-भार ग्रहण करने का मौक़ा पा गया। लेकिन 'तेरह' का फेरा फिर भी ऐसा लगा रहा कि पूरे कार्यकाल में बार बार सफाई देते बीता - सरकारों के फेरे और उनसे जुड़े नदी-नाव संयोगों की। अन्त तक यह फेरा लगता ही रहा, और देखिए तकनीकी तौर पर पिछले मई महीने की तेरह तारीख को मेरे अनुबंध की अवधि पूरी हो रही थी लेकिन उस दिन शनिवार का अवकाश होने की वजह से 'बारह' तारीख को ही कार्यभार सौंपने गया, लेकिन यह बात 'तेरह' को कत्तई गवारा नहीं हुई। उसे लगा कि आखिर इस बार इस मामले में उसके दखल के बिना कैसे फैसला हो सकता है। लिहाजा, कुछ समय के लिए मेरा कार्य-काल बढ़ गया, हम समझे अब कुछ महीने तो रहेगा ही। उधर 'तेरह' चुप नहीं बैठा, अपना फेरा चलाता रहा और मेरी बेदखली का फरमान ले कर '१३ जून' को आ धमका - यहाँ कहाँ घूम रहा है बन्दे, अब सरकारी नहीं अपने डेरे में राज कर।
जय हो 'तेरह के फेरे की।'
'तेरह' के इन फेरों के तजुर्बों ने बहुत कुछ दिखाया, सिखाया और समझाया। बहुत सी गलतियां करायीं, बहुत कुछ अच्छा भी कराया, बहुत सारी असलियतों से साबका कराया, गलत-सही रिश्तों कीपहचान करायी, ढेर सारी साँसतों-असमंजस-संदेहों में झुलाया। इन फेरों से पाला नहीं पड़ता तो ज़िंदगी के बहुत से रहस्यों पर पड़ा पर्दा नहीं उठ पाता, लम्बे समय में जेहन में संजोई सच्चाइयों और रूमानी तस्वीरों का सच कभी नहीं जान पाता। इन तजुर्बों और हासिल-हिसाब पर तफ्सील से लिखने का बहुत मन कर रहा है। यह जान कर करीबी दोस्त न केवल तुरन्त ही सब लिख डालने का दबाव बना रहे हैं, बल्की ख़ास तौर पर तल्ख़ तज़ुर्बों पर ही लिखने के लिए ज्यादा कह रह हैं। उन्हें समझाने के लिए एक बार फिर से बाजपेई जी और बाबू जी (पण्डित अमृत लाल नागर) की एकसा कही गयी बात सुनानी पड़ी - 'ज़िंदगी में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें निजी ही रखना चाहिए।' हाँ, दूसरी बातों पर जरूर लिखेंगे, बहुत कुछ है लिखने बताने के लिए, लेकिन अभी नहीं। जिन्हे मेरे लिखने से वास्ता हो उन्हें मेरे 'कूलिंग ऑफ़ पीरियड' और 'तेरह के अगले फेरे' का इन्तिज़ार करना पडेगा।
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गागर ऐसी प्रीति की, भरि भरि लाएं मीत !!
जित-जित पीवैं बूड़ि कै, तित-तित बाढ़ै रीत !!