Sunday, August 30, 2026

 होनी न फेर पाएगा 


हमने सोचा, ये दौर आकर के गुज़र जाएगा, 
ये नहीं सोचा कि उसी ठौर ठहर जाएगा। 

रेला है हवाओं का, उठकर के चला जाएगा, 
बहता रहा ऐसा कि अब तो कभी न जाएगा।  

हमने सोचा कि बाढ़ के मानिन्द उतर जाएगा,
वो बढ़ा, बढ़ता गया, अब साथ ही ले जाएगा।    

ललाट पर लेखा जो जैसा सामने वो आएगा,  
लाख कर लीजे जतन, होनी न फेर पाएगा।   

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