दो पल,
नेह-मेल भर के,
सुध-बुध खोए,
उब्ब-डुब्ब,
दिन रात गए,
बेसुध निद्रित,
क्या कही-सुनी !!
तब बहुरि सकी,
क्या कहा-सुना!!
क्या निहित रहा !!
गुन-गुनते, मरम
भार-भर आँखों,
थोड़ा पाया, पर
थाह कहाँ पाया !!
फिर, चाह रहा,
फिर मिल पाया,
तो पूछेंगे,
जो समय रहा,
जो, चेत सका !!,
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