Sunday, July 19, 2020

'झिरिर झिरिर झिरियाय ===='

 'झिरिर झिरिर झिरियाय  --- '  


आय अंजुरी में कोरी, बरस गयो रे !
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!!  
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!!   

भोली सूरत पे ऐसो रिझाय गयो रे !!  
भीगी अलकन में ऐसो, भिजाय गयो रे !!
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!! 

मुंदी पलकन में ऐसो  समाय गयो रे !!
आय बुँदियन से ऐसो सजाय गयो  रे !! 
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!!  

मोती मोतियन की ऐसो गुंथाय गयो रे !            
आय सुध बुध सगरो भुलाय गयो  रे !! 
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!!

गात कोमल ओ आनन जुड़ाय गयो रे !
आय अंतर-मन माधुरी घोराय गयो रे !
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!!  

आ अटरिया पे जियरा लुभाय गयो रे !   
आय कानन में रिमझिम गवाय गयो रे !  
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!!

आय बरखा में फुहरा हनाय गयो रे !
आय दुअरा पे रहिया छेंकाय गयो रे !
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!! 

आय हरित बसन में सुहाय गयो रे !
आय झिरिर झिरिर झिरियाय गयो रे!!
आय सावन में झुलना, झुलाय गयो रे !!!   
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 इस रचना पर पसन्दगी जताने, दिल लुटाने और इसकी सराहना करने वालों को हार्दिक धन्यवाद; इसे जन्मने वाली धरित्री, ऋतू, मोहक सौंदर्य और भावों को सादर, सस्नेह प्रणाम !! 😀🙏🙏♥️♥️🙏🙏

Friday, July 10, 2020

'लहरों पे बहके से बेड़े लगे।'

@ (c) Rakesh Tewari
Published by Rakesh Tewari47 mins

'लहरों पे बहके से बेड़े लगे।'

पौध चुन-चुन के रोंपे, यूँ बढ़ने लगे,
फूल, लतरों पे, बगिया में, खिलने लगे।

बात की, बात में, कितने दिलकश लगे,
अपने-अपने से इतने यूँ लगने लगे।

महकें मह-मह महकते फ़िज़ां में बसे,
सांस भर-भर हवाओं में उड़ते रहे।

देख कर, देखा-देखीं में रीझा किए,
देर तक, बेसुधी में यूँ डूबा किए।

लगते-लगते किनारे पे यूँ आ लगे,
जैसे लहरों पे बहके से बेड़े लगे।
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Sunday, May 10, 2020

'मत कहिए'

'मत कहिए'
क्या कह दिया !
ये आप ने,
ये मत कहिए।
अब गर्म हवाएं
चलती हैं,
ये मत कहिए।
अब धरती आग
उगलती है,
ये मत कहिए।
अब, इन पर भी
भौहें तनती हैं
ये मत कहिए।
ये मत कहिए।
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Friday, April 10, 2020

'निम्बिया गइल हरियाय !'

'निम्बिया गइल हरियाय !'

फूलें नान्हे नान्हे फूलवा, निम्बिया में !
लागी कोमल कोपलिया, निम्बिया में !
मोरी निम्बिया में, मोरी निम्बिया में।
मोरी निम्बिया गइल हरियाय !!

हवा हीले हियराय मोरी निम्बिया में !
कूजै चिरई लुकान मोरी निम्बिया में !
मोरी निम्बिया में, मोरी निम्बिया में।
मोरी निम्बिया गइल हरियाय !!

निम्बौरी नयी आयी, मोरी निम्बिया में !
मोर जियरा जुड़ाय, मोरी निम्बिया में !
मोरी निम्बिया में, मोरी निम्बिया में।
मोरी निम्बिया गइल हरियाय !!

आवा तोहूँ के लोकाई, निम्बिया में !
आवा तोके दुलराइ, एही निम्बिया में !
मोरी निम्बिया में, मोरी निम्बिया में।
मोरी निम्बिया गइल हरियाय !!
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Wednesday, April 1, 2020

यूं ही, 'चला जाएगा'

"यूं ही, 'चला जाएगा' !!" 01.04. 20 

ले-दे के,
एक ही. तो है,
अपना अंतर्मन।
और वह भी,
बेलाग बहा जाता है।
कभी यहाँ, कभी वहां,
बहकता।
पगिया पर, डाँड़ों में,
वन-वादी, कंदरा,
पर्वत-प्रपातों में,
घने- घने गाछों में,
झुरमुट में।
बंजारे डेरों,
लुटेरी निगाहों,
रहजन बटमारों में।
उजली रातों,
तारों भरे,
गहरे नील-गगन
दरो दर, सरायों में,
असल और ख्यालों में,
टुकड़ा टुकड़ा बसता।
मुकाम आते,
अटकते, छूटते,
चलते जाते।
सुजनों सुकृतियों में,
मीठी खटमिट्ठी,
बतियों में
रमते बंटते, बटोरते,
थोड़ा सा ही
बचा रह गया है।
पता नहीं !!
कभी कहीं
टिक भी पाएगा,
मुकम्मल !!
या फिर,
बोरसी में ढांपी,
छुपी छुपाई झांपी,'
सझाने की, चाहत भिनाए,
यूं ही, 'चला जाएगा' !!!
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Saturday, March 21, 2020

अखबारी मुनादी : आज है कविता दिवस

अखबारी मुनादी : आज है कविता दिवस 
21 मार्च 2020 

कविता - कोई नियत 
पल-दिवस नहीं देखती।  
आती है अपने से 
भावों में बहती।  
इस बार नहीं आयी 
होली पर भी, 
भावों की झोली भी 
रह गयी कोरी कोरी। । 
क्या करती,
नए रंगों की पिचकारी !
अभी तलक है वैसी ही 
जस की तस रची रंगी,
पिछली होली की रंगोली !

Tuesday, March 3, 2020

हौले से

आपने हौले से ये क्या कह दिया !!
मूक के मुंह में रसा ये खाण्ड सा !!

आपको शायद ही यह एहसास हो !
किस कदर ज़ेहन मेरा महका दिया !!