Tuesday, October 26, 2021

पारी पारा चले जा रहे, 
सबको ही तो जाना है ! 
जितना जिससे हो पाए, 
बकिया सब निपटाना है ! 
इक दिन आएगा परवाना  
फिर काहे सकुचाना है !!
प्रेम पियाला पियो कंठ भर, 
भर भर नेह लुटाना है !!

Thursday, September 30, 2021


अगले दर्जे में दाखिले का वक्त आ रहा है, 
सोच रहा हूँ किस विषय का फॉर्म भरा जाए, 
वो कहते हैं आइए हमारी पाँति में शामिल हो जाइए,  
मगर सुना है उसके लिए 'एंट्रेंस एग्जाम' पास करना पड़ेगा , 
पास भी हो पाऊंगा इस नए इम्तिहान में, डर लगता है
सोचता हूँ  ये वाला 'हर्डल' कूद पाना मुश्किल हो गया है !! 

Tuesday, September 14, 2021

किसी किसी को मिलती है किस्मत ऐसी !
पलट पलट कर जिसे देखता हो कोई !!




Sunday, August 8, 2021

बहुत निश्छल
लगता है, 
ये नेह।  
बहुत प्यारा,  
बिना किसी
दुराव-छुपाव् वाला। 
लगाव ममत्व भरा, 
भोला, एकदम सच्चा, 
बड़े भाग से 
मिलता है।  
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Saturday, July 24, 2021

चलो यहाँ से भी, कहीं दूर चलें अब, 
चुरा के वक्त ले जाने लगे हैं लोग ।   

रोज ही जश्न, मनाने लगे हैं लोग।  
पार्टियों में वक्त बिताने लगे हैं लोग।  

चलो अरण्यों में बस जाएं कहीं अब।  
चलो यहाँ से भी, कहीं दूर चलें अब !!

Monday, May 17, 2021

 सबसे बढ़िया है
ख्यालों में उड़ते रहना। 
बिन पैसे, मेहनत बिना,
दुनिया की सैर कर आना। 

Friday, April 16, 2021

 कैम्ब्रिज: 

ये कहानी एक अत्यंत संकोची स्वजन की है। गहन अपनापे और भरोसे के बिना ऐसे लोग अपनी निजता साझा नहीं करते। सोचता रहा कभी इत्मीनान से लिखूंगा उनकी कहानी, खूब सोच समझ कर। लेकिन इस दौर में, कब्रिस्तान और वैकुण्ठ धाम पर लग रही कतारों की खबर देखते-पढ़ते सोचने लगा सोचते-सोचते कहीं सोचना ही न रह जाए, और अरबराने लगा हूँ अभी ही कैसे भी लिख डालने को। 

उनसे मेरी मुलाक़ात हुई थी 'कैंब्रिज युनिवर्सिटी' की उस शानदार लाइब्रेरी में।  न दिनों 'एन्सिएंट इंडिया एंड ईरान ट्रस्ट' की फेलोशिप पा कर कैंब्रिज के 'ब्रूकलैंड एवेन्यू' वाले विक्टोरिया हाउस में बोरिया बिस्तर धरने के बाद  सबसे पहले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में ही खूंटा गाड़ कर जमे हुए सरनाम दादा दिलीप चक्रवर्ती से मिलने गया। वहां की साफ़-सफाई चमक-दमक और गोरों के सलीके देखता सूट-बूट-टाई में सज कर छतरी दबाए भकुआया हुआ उनसे वहां के तौर तरीके समझने लगा। आगाह करते हुए उन्होंने बताया अपना हिन्दुस्तानी तरीका यहां नहीं चलता, जहाँ चाहो जब चाहो किसी के पास जा कर गोप (गप्प) मारने वाला हिसाब यहाँ चोलबे ना।  शाम तक लाइब्रेरी और शाम को या छुट्टी में ही मुझसे भी मिलना हो सकेगा। उनकी ताकीद को सख्ती से मान कर निहायत नए माहौल में चुपचाप लाइब्रेरी में दिन बिताने लगा।

मेरी फेलोशिप तो बस तीन महीने की थी मगर वो एक साल से एक रिसर्च-असाइनमेंट पर आए हुए थे। हिन्दुस्तानी होने के नाते उनसे बात करने को लहकता मगर दादा की ताकीद के मुताबिक़ मन मार कर रह जाता।  

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