Sunday, January 17, 2016

पवन ऐसा डोलै: अध्याय पाँच - ५

'रापटगंज कै मसा'
१९८३ में उत्तराखण्ड की तैनाती पूरी करके उतर आए लखनऊ 'उत्खनन एवं सर्वेक्षण अधिकारी' बन कर। एक बार फिर मिर्ज़ापुर की राह धरी इस बार स्वयं नहीं अपने साथियों के अभियान के तहत। इस बार छाना गया दक्षिणी मिर्ज़ापुर के दुद्धी के इलाके को। तीन महीने की मशक्कत की बदौलत एक फेहरिस्त तैयार हुई लघु प्रस्तर और नव पाषाण युगीन उपकरण वाले स्थलों और एक मध्यकालीन स्थल 'शिव पहाड़ी' की। उस इलाके की हलकी पहाड़ियों में शैलाश्रयों, प्राचीन आवासीय स्थलों, मंदिरों आदि के चीन्ह हाथ नहीं आए।


पी एच डी के शोध-प्रबंध के सिलसिले में फोटोग्राफी के इरादे से छोटे पण्डित राम गोपाल के साथ मोटर साईकिल से निकल पड़े एक बार फिर से मिर्ज़ापुर की ओर। पहला मुकाम इलाहाबाद और दूजा सीधे रापटगंज के आगे चुरुक के फारेस्ट विभाग के बंगले में। अगले दिन निकले मऊ रमना के शैलचित्रों के चित्रण के लिए। मऊ पहुँचने पर मऊ कलां गाँव में कुछ ऐसी पुरा प्रस्तर-प्रतिमाओं का सुराग मिला तो उनके अभिलेखीकरण का इरादा बना लिया। उमा-महेश, अर्द्ध-नारीश्वर, तीर्थंकर ---- एक एक कर पण्डित जी ने सबको अपने तस्वीरी डब्बे में समेट लिया।

एक जैन-प्रतिमा की पाद-पीठ पर अंकित लेख देख कर पढ़ कर समझने की जिज्ञासा जागी कि - पढ़ कर देखा जाए कि उस पर लिखा क्या है लेकिन अभ्यास की कमी से मार खा गए। सोचा इसकी फोटो से बाद में पढ़ने का जतन कर लिया जाएगा लेकिन उतने भर से मन नहीं भरा। उसका छापा उतारने का भी मन गया ताकि पढ़ते समय कोई कसर नहीं रह जाए। अब समस्या यह आयी कि हमारे पास ना कागज़ ना स्याही, छापा उतारें तो कैसे। रापटगंज लौट कर बाज़ार से कागज़ स्याही जुटा कर अगला दिन इसी काम में लगाया। 

उसके अगले दिन घेर-घेर घिरे बादल ऐसा झमाझम बरसे कि बस बरसते ही रहे। धारा-धार उतरती चली आ रही झड़ी को देख देख पस्त होते रहे। ऐसे में हमारी मोटर साईकिल के पहिए लसलसी माटी में लपट कर चिरुई-मरकुंड़ी गाँव तक पहुंचा नहीं पाते। तभी बगल के कमरे में टिके जंगलात विभाग के अफसरों से मिल कर लौटे पण्डित जी ने खबर सुनाई - 

'उधर कहीं किसी ने फारेस्ट बंगले में ठहरे किसी अफसर का गोली मार कर मर्डर कर दिया है। ये लोग उसी सिलसिले में कल जीप से चिरुई मरकुडी के दौरे पर जा रहे हैं। उनसे बात कर के देखा जाए शायद ले चलने को तैयार हो जाएं।' उनसे बात की तो उनके साहब राय साहब तुरत राज़ी हो गए - 'चार छह जन, बबुरा वाले बाबू साहब (फारेस्ट रेंजर) और एक जवान दुनाल बंदूक के साथ। आप लोग भी चलो, जितने ज़्यादा लोग चलें उतना अच्छा रहेगा।'

इस तरह हम भी उनकी जीप में सवार हो कर पहुँच गए चिरुई चौकी पर। रहने खाने का सब इंतिज़ाम चौंचक। निकल ही पड़े तो कुछ ना कुछ नया मिलना ही था। जंगलात वाले निकल गए अपने काम से और हमने गाँव वालों के साथ रुख किया केरवा घाट का। वहाँ के चित्रों की छवि उतारते बोनस में खबर मिली गांव के पूरब में कुछ ही दूर पर स्थित भांवा/उटहिया की खोहों के बारे में, हमें इनकी जानकारी पहले नहीं मिल सकी थी। केरवा का काम निपटा कर वहां पहुंच कर खोह की सतह पर अंकित चित्रों को निरखते परखते दो लम्बी गरदन वाली बड़ी बड़ी चिड़ियों के अंकन पर आँखें अटक गयीं -




'इतनी लम्बी गरदन वाले मोर तो होते नहीं। ये कौन से पक्षी हैं ?' पण्डित जी बोले - 

'शुतुरमुर्ग या एमू हो सकते हैं, उन्ही के जैसे लगते हैं।

यह कहने पर कि - 'ये पक्षी इस इलाके में नहीं, अफ्रीका अरब तक ही पाए जाते हैं।

पण्डित जी ने अंदाज़ा लगाया - 'क्या पता उस ज़माने में रहे हों यहाँ भी।

उन्हें समझाया - 'पण्डित जी ! इतना आसान नहीं है यह मान लेना भी। बड़े लोगों की मानें तो भारत में भी कभी ये पक्षी रहते तो थे लेकिन कम से कम पंद्रह-बीस हज़ार साल पहले, उसके बाद यहाँ से लुप्त हो गए। और अगर यह बात मान लें तो ये चित्र भी उतने पुराने होने चाहिए जबकि शैलचित्र इतने पुराने माने नहीं जाते।' 'तब तो दो ही बातें हो सकती हैं - एक तो यह कि ये पक्षी बाद में भी यहाँ पाए जाते रहे हों। दूसरी यह कि ये कोई और ही पक्षी हों या फिर चित्र बनाने वालों ने गलती से गरदन लम्बी बना दी होगी।' इतना कह कर पण्डित जी अपने काम में लग गए। और मेरा मन इनकी पहचान की संभावनाओं के खटके पर अटका रहा। रात घिरते प्रसन्न मन बंगले पर लौट कर दिन भर की नयी अनोखी खोजों के लिए राय साहब, बबुरा वाले बाबू साहब और पण्डित जी को लाख-लाख साधुवाद देते नहीं थका। रात भर मच्छरों ने जी भर कर चोभा, सुबह उठते माथा चढ़ते ज्वर से ठनकने लगा और वर्षा रुकने का नाम ना ले। लेकिन, युवा तन-मन की लगन इस सब की फिकर ही कहाँ करती है । बरसते बादलों की छाँव में ही निकल दिए चुर्क से, भल्दरिया की फोटोग्राफी निपटा कर, बनारस पहुँचने के लिए। रास्ते में भल्दरिया के इस पार मोटर साईकिल टिकाते सामने भलभलाती खलभालती धारा का उफान देख एकबारगी सहम गए - इसे पार कर कैसे पहुंचेंगे उस पार की खोह तक। हम देखें पण्डित जी को और वो देखें मेरी ओर। कुछ देर उफनती धारा ताकते बढ़ लिए चट्टानों के बीच से पग साधते धरते, काई में फिसलते, काँटों में बिंधते और झाड़ों की डालियाँ थामते। और, आखिर में जो चाहा तिन पा कर ही माने।

पण्डित जी ने मेरे माथे पर हाथ धरते चिन्ता जताई - 'भाई साहब। आप का बुखार तो एक सौ तीन से कम नहीं होगा। ऐसे में आगे कैसे चलेंगे।'  

सोचा हुआ काम पूरा कर लेने की प्रसन्नता से अघाये मन की ऊर्जा के सहारे बुखार-वुखार की परवाह किये बिना उसी हालत में मोटर-साईकिल लहराते बनारस पहुँच कर डेरा डाला अभय गुरु के साथ, डाक्टर भानू शंकर मेहता के डेरे पर। 

हफ्ता बीतते भी ताप का वहै हाल देख अभय, अजय, मम्मी सब हलकान होने लगे। पण्डित जी के लखनऊ रवाना कर के वहीं रुक कर इलाज कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। एक शाम अभय ने 'लहुरा बीर' की बैठकी में मेरे ताप की चर्चा चलाई - 'डाक्टर साहब तो बहुतै कोशिश कर लेँ, कइयौ दवा अजमइलैं, लाख जतन करै बादौ बुखार उतरै के नामै ना लेत हौ। जब एक सौ चार के पार होवै लगे तो माथे पर बरफ की पट्टी अलट-पलट के धरल जा ली, हाथ-पाँव पर बरफ का फेरा लगावै लें फिरहू नहीं उतरत आ।

उनके एक के डाक्टर भाई ने मेरा यह हाल सुनते ही पहला सवाल किया - 'चन्दौली रापटगंज की ओर तो नहीं गए रहे ?'

अभय के बताने पर एक ख़ास दवा देते हुए पूरे भरोसा दिलाया - 'चिंता जिन करा। दुइऐ खोराकी में बुखार उतर जाई। ओहर के मच्छरन से जउन मलेरिया हो ला ना ऊ इहै दवा से उतरा ला।'

अभय गुरु ने सीधे डेरा पर आ कर दवा खिलाई और दूसरे ही दिन बुखार उतरते देख अपने आप में आ गए - 'अब लौं तो जानत रहली कइसन हो लें मनई तनई, खोह कनरा, भाल-तेनुआ ओह इलाके कै, बकी और सब तो जौन हौ ऊ तौ हइऎ हौ रापटगंज कै मसौ (मच्छर) अलगै हो लैं, ई तो अजवै बुझाइल।'
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