Sunday, January 17, 2016

पवन ऐसा डोलै - अध्याय पाँच :४

'थिरकते शैल चित्र'

संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ ने १९८२ में ओबरा में दक्षिणांचल के वनवासी नृत्य-संगीत पर उत्सव का आयोजन कराया तो अपने लिए भी बुलउवा आया। 

शैलाश्रयों में निरूपित दृश्यों की अनुकृतियाँ उलटते-पलटते सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व दिखा नृत्य-दृश्यों का। एक दूसरे की बांह या कमर में बांह डाले नाचते नर्तक, एक पाँति में नाचते, चकरिया बना कर चकराते, इधर उधर झूलते झूमते, नर्तक युग्म, एकल नर्तक और मेघा-नृत्य। थिरकते पग, काया, अंग-उपांग, पाहन-पाहन, खोह-कन्दरा में चित्रित। मचलते भावों की चपलता से प्रतिध्वनित तत्कालीन उत्सवजीवी आनन्द धन सम्पन्न वनवासी जीवन की थिरकन ने ज़िंदगी में पहली बार नृत्य की व्युत्पत्ति पर सोचने को बाध्य कर दिया। नृत्य शास्त्र का '' भी जाने बिना जो कुछ सोच-समझ में आया लिखने लगा - 

'नृत्य मूलतः अन्तर्मन के आनन्द से उद्भूत हुआ। श्यामल मेघों का घिराव देख मयूरों का थिरकना, हरियाले वन-प्रांतर में उल्लिसित मृग छौनों की किल्लोलें, मृगया से छके सिंह शावकों की मस्त कलाबाजियां, विशिष्ट अवसरों पर चिड़ियाँ की चहकन-फुदकन की तरह किन्ही अवसरों पर अन्दर से उपजे उमंग के ज्वार ने आदिम मानव के अंग-अंग में चपलता भर कर उन्हें बाहें और पैर फैला कर, गरदन, कमर सिर लचका कर नाचने के लिए उद्यत किया होगा। आखेट खेलने चले तो सफल मृगया की कामना से नाचे, कबीले भर की भूख मिटाने लायक बड़ा पशु गिरा लिया तो सफलता की उमंग में नाचे, अहेर अलाव पर भुनने लगा तो सुस्वादु मांस की लालसा में नाचे। पवन, वर्षा, वन, नदी, गाछ, सूरज और चाँद जो भी पारलौकिक लगता या जिससे हित सधता या जिससे भय खाते उन सबकी उपासना में नाचते। कमर, कंधे और बांह में बांह डाल कर नाचते।


आनन्द से जुड़े नृत्य में नर्तक नाम का कोई कलाकार नहीं होता। उमंग से भर कर सभी नर्तक बन जाते। कालान्तर में अनेक कारणों से इस सर्व सामान्य आनन्दाभिव्यक्ति ने कला का रूप लेना प्रारम्भ किया। एक बड़े मानव समाज में नर्तकों का एक अलग वर्ग बन गया। कलाकार साधना के बल पर नृत्य का अभिनय करने लगे। धीरे धीरे आदिम नृत्य तराश कर शास्त्रीय नृत्य में ढाला गया लेकिन उसकी दुरूहता के कारण सामान्य जन उससे कटते गए। फिर भी नृत्य का सहज स्वरुप लोक नृत्यों की शैलियों में उभरा। जीवन की जटिलताओं में सहज आनन्द के स्रोत सूखते जाने के कारण लोक में भी स्वाभाविक नृत्य की प्रवृत्ति कम होती गयी और नृत्य कला में तब्दील हो गया। अपवाद स्वरुप गहन कान्तारों और गावों में कुछ अवसरों पर अभी भी सारे निवासी उफनते आनन्द के ज्वार में थिरकने लगते हैं और शादी ब्याह जैसे मौकों पर जैसा मन चाहे के अंदाज़ में थिरक लेते हैं।

मिर्ज़ापुर के शैलचित्रों की प्रतिकृतियों में ३९७ नर्तक मिले। इन्हे अपने आप में मगन बिना विभिन्न मुद्राओं में नाचते, हाथ में हाथ थाम कर नाचते, घेरे में नाचते, अनिश्चित क्रम में समूह में, एकल या युगल नृत्य के वर्गों में रख कर वर्णित किया। 

इस प्रकार कुल ६० नृत्य दृश्यों को चिन्हित कर उनका विस्तृत विवरण लिख डाला। कितना सही लिखा कितना गलत यह तो नृत्य-शास्त्री जानें। इस सबकी फिकर किए बिना जो कुछ सूझा लिख कर 'थिरकते शैल चित्र' के नाम से एक लघु-पुस्तिका का रूप दे दिया। श्याम जी की अगुवाई में साथियों के जुटाए साधनों से बनी 'युवा परिभ्रमण एवं सांस्कृतिक समिति' के सौजन्य से प्रकाशित करा कर पहुँच गया ओबरा के उस उत्सव में हाथ धोने।


शुकुल जी को पता चला तो फूले नहीं समाए, आयोजन की मुख्य अतिथि लोक कलाओं की प्रख्यात विदुषी पुपुल जयकर और नृत्य कला पर पी एच डी, प्रतिष्ठित नृत्यविद, डाक्टर सुनील कोठारी से मिलवाया। समन्दर की लहरों की तरह झकझोरते उठते-उतरते बोलों के साथ थिरकते वनवासियों की कतारों से बहकते, कुछ ज़्यादा ही महुआ छाने, मादल-वादकों के प्रदर्शन के बीच, 'थिरकते शैल चित्र' का लोकार्पण करवाया। केसरी जी ने जाना, ओबरा वाले नीरव जी ने जाना, जिसने भी जाना हाथों हाथ लिया। बरसों की मेहनत का ऐसा उपहार पा कर धन्य हो गया।
------------------------- तिवारी, राकेश १९८२ थिरकते शैल चित्र, युवा परिभ्रमण एवं सांस्कृतिक समिति, लखनऊ।

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