Friday, October 23, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५४

भैंसोड़ का डेरा 

विंध्य-कैमूर के जादू से उबरने से पहले ही कैम्प उठाने का दिन आ गया। इकत्तीस मार्च तक वित्तीय-वर्ष का हिसाब दफ़्तर में दाखिल करने की लक्षमण रेखा ना होती तो दोनों कैम्प अभी कुछ दिन और चले होते। डेरा डण्डा बंध गये बिस्तर बांधे गोल, मस्टर-रोल सब भर लिए, स्टॉक रजिस्टर फुल। 

चोपन से चलती रेल पर वहां के कैम्प का सामान आराम से लदा, छपका वाला रापटगंज में हड़बड़-तड़बड़। कुछ दिन और वहीँ रुक कर घूमने के इरादे से अपने उपार्जित अवकाश का आवेदन थमा कर कैम्प पार्टी को कुँवर की कमाण्ड में लखनऊ के लिए विदा कर दिया। 

आये थे तो नए-नए नरम गेंहूँ की हरियाली लहराती दीखती और अब चारों ओर दूर-दूर तक सूखी ऊंची-नीची उघार धरती का फैलाव। तब ठिठुराती शीत लहरी और अब लपलपाती लूह का लपटा। पूरा पथरीला इलाका गरम आँवे में तब्दील। तब ट्रेन की खिड़की की सरिया छूते ही बर्फीली करेण्ट सी लगती और अब कहीं अगर धोखे से खिड़की का बाहरी फ्रेम सट जाए तो लगता किसी ने तपते लोहे से दाग दिया हो। 

सरकिट हाउस में आसानी से जगह पा कर कभी केसरी जी के निवास पर तो कभी राजकुमार साहब के गाँव से जानकारियां बटोरने के लिए कई चक्कर लगाए। फिर पिट्ठू बांधे निकल पड़े भैंसोर के उस इलाके की ओर जहां के मूड़ा पहाड़, बाघाई खोर, सहबइया, लिखनिया की चर्चा बरसों से सुनते-गुनते वहाँ का एक फेरा लगा आने को जाने कब से कुलबुला रहे थे। 

चोपन से बस पकड़ कर रापटगंज-करमा-राजगढ़ हो कर पक्की सड़क पर चल पड़े। चलते चलते कहीं कहीं बचे फूले पलाश की लाली दिख जाती। रह रह कर बस का इंजन तप कर गरम हो जाता। रुकते ही सवारियों के तपे चेहरों पर पसीने के पनाले बह चलते। ऐसे ही रुकते-चलते एक सौ दो किलोमीटर का सफर पूरे चार घण्टे में नाप कर मीरजापुर बस- स्टेशन पर उतरती सवारियां पानी की तलाश में चापा-कल की तरफ दौड़ती दिखीं। 

एक घण्टे बाद हनुमना-रीवां हो कर जबलपुर जाने वाली अगली बस मिली। बीहड़ कटान, सूखे खेत, गरम बवण्डर सी लूह, चकले पठार पर, पिघलती चिपचिपी डामर वाली सड़क पर बस के पहिए कचकच करते चलते। तुलसिया हो कर लालगंज बाजार के आगे, बेलन नदी का बंधा पार करते, लौका हल्लुक होने लगा। ड्रमंडगंज से आगे मूड़ा पहाड़ की जलेबिया चढ़ाई के छोर के काले लबादे वाले पुजारियों के निकट पहुँच कर चढ़ती बस धीरे धीरे चलती छन भर को रुकी। अपनी अपनी आस्था और पॉकेट के मुताबिक़ भगवान पर सिक्कों रुपयों का नज़राना चढ़ा कर चालक-क्लीनर-सवारियां फिर से बस में आए और हम आगे बढ कर मूड़ा पहाड़ पर चलने लगे। बड़ी छोटी चट्टानें, इक्के दुक्के गाछ, झाड़। तभी कंडक्टर ने पास आ कर पूछा - 

'बैरियर पे उतरबा कि बंगला पर?' 

सोचा बंगले पर ठहरने का जुगाड़ हो सकेगा वहीँ उतरना ठीक रहेगा सो धीमी होती बस से वहीँ उतर गए। पूछताछ कर सड़क के दाएं बगल के बंगले की ओर टहल दिए। 

कुछ ही कदम धरते बंगले पर पहुंचे तो - सामने आए ध्वस्त दीवारों के बीच छत का मलबा, दीवारों के उधड़े प्लास्टर पर कोयले से लिखे नाम और बरामदे में गोबर कूड़े के ढेर के बीच पगुराते फेंचकुर फेकते गाय-गोरू-ऊँट। बाहर कोई दिखा नहीं। सामने की बसावट के झोपड़ों के दरवाजे बन्द। सड़क की चिपचिपी डामर पर भाप का भभका सा उठता। 

'मैदान' से लौटता एक वनवासी बालक दिखा तो उसे ही पुकार लिया। टिकने रहने का ठिकाना पूछने पर कहने लगा - 

'बँगला पर अब केहू नाहीं रुका ला। चाहा तो हमरे डेरा पर ठहर जा।' 

पगुराते ऊंटों के हिलते थूथुन से झरते झाग पर नज़र डालते बालक के साथ हो लेने में ही भलाई समझी। 

उसके झोपड़े के बाहरी ओसारे में पड़ी खटिया पर पड़ते ही आँख लग गयी। साँझ ढले जागे तो भूख से बेहाल। मेजबान बालक ने पूछा - 

'अहेर खाते हैं साहब ?' 

पहले तो उसका मतलब ही नहीं समझ पाया जब समझा तो मना किया। 

पहले आने वाले साहब लोग आए थे तो रोज ही कटता रहा ओही से पुछलीं। उसने साइकिल निकालते हुए समझाया। फिर हनुमना तक लपकता हुआ यूं गया और यूं आया, सौदा सुलुफ आलू दाल मसाला ले आया। अन्धेरा घिरने तक पक कर तैयार आलू प्याज की सुस्वादु भुजिया, देशी घी में डूबी रोटी, दाल और चावल, साफ़ सुथरी फूल की थाली में पलाश के पत्ते पर खटाई के साथ, बालक की सुगढ़ भौजी ने सहज सनेह से परोस कर सामने सजाया तो देखते ही काया तृप्त हो गयी। 

झोपड़े और सड़क के बीच की खाली जगह में पड़ी चारपाई पर लेट तो गए लेकिन दिन में गहरी नींद सो लेने की वजह से आँख नहीं लगी। दूबे, अभय गुरु, गीबड़, ग्रीसम, सक्सेना, कुँवर, रामकरण कोई साथ नहीं, नये ठिकाने पर निपट अकेले। पड़े पड़े नीरव अँधेरी रात के आसमान में सजे टिमटिमाते सितारों की जुटान तकते देर तक जागते रहे। पिछले चार महीने में जिले के मध्य-पूर्वी इलाके के वन-पर्वत हलोरते अब इस जिले के पछाहीं सिरे तक आने के तजुरबे संजोते-संजोते गहरे भावों में डूबता उतराता रहा - 

डगर, कु-डगर, बे-डगर डोलने भटकने, अपने आप को तोड़ने की सीमा से आगे तक थकने, फिर चलने, फिर थकने के आशय। क्या पाने चले, किस दिशा में, क्या पाए, कहाँ पहुंचेगे, क्या चाहां, नियति कहाँ ले आयी, अब किधर ले जाएगी। हर्ष-राग-विषाद के एक गुम्फन से निकलते दूजे में उलझ जाते। 

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