Saturday, October 31, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५६



धुवना रहा जग छाय हो माय


भैंसोर अवस्थान की उस आखिरी रात मेज़बान का हिसाब किताब पूरा कर दुआरे पर पड़ी मचिया पर पड़ रहा। यहाँ बितायी पहली रात के समय के निरपेक्ष भावों की जगह संवेदना के भावों से भरा भरा मन छलकने लगा। गाँव, सूखे पहाड़, वृक्ष विहीन वन, जलस्रोत, खोह, वनवासी बालक, उसके बन्धु-बान्धव, स्वादिष्ट भोजन सब कितने अपने-अपने से लगने लगे। थोड़े ही दिनों में बंधे कैसे अदृश्य आत्मीय बन्धन। आँख नहीं लगी तो उठ कर अनायास ही आस-पास टहलने लगा।


ऊँचे-नीचे धरातल पर छोटी-बड़ी छतरियों जैसे ढाक के झुरमुट और उनकी छायाएं दूर तक फैली। गहराती रात में अधकटे चाँद की छितराती चांदनी में चप्पा चप्पा खिल उठा। देश दुनिया में विख्यात बघेलखण्ड-बुंदेलखंड के इन टप्पों की ऐसी रजतमयी अप्रतिम प्राकृतिक सुन्दरता के क्या कहने, जो अपनी आँखों निरखे वो ही गुने।


गाँव का धनवान व्यापारी मुखिया इलाके भर में दबंग। दोहरी काया पर लकदक धवल धोती-बनियाइन। उदर पर हाथ फेरता चलता। गले में पड़ी सोने की मोटी सिकड़ी का रूतबा दिखाने के लिए कमीज़ पहनता नहीं काँधे पर रखता। एक बार उसकी उधर सींधी जिले के एक गाँव के वनवासियों से किसी बात पर ठन गयी। अपने आदमी ले कर गया उनके सारे गाय-गोरु हँकवाय लाया। वनवासियों का जोर नहीं चला तो गाँव भर के भूत-परेत ही उसके पीछे पेश (लगा) दिए जिन्होंने मुखिया को तक्र कर डाला।


हार कर मुखिया ने 'कोल-टोला' से बैगा-ओझा-सोखा बुलवाए। वो आए अपने-अपने ढोल-मानर टोना-टटकार ले कर। उनमें और दूर गाँव भूत-परेत छाया-जोग में ठन गयी।


व्यापारी के लड़के को माध्यम बना कर उसकी गदेली पर धरी गयीं मन्त्र पूरित फूल-पत्ती। टोना-मन्तर के साथ गोड़सी में सुलगायी आग में घी-गुड की समिधा पड़ने लगी। ढोल और मादल की थाप के साथ उनमें से कोई उच्च स्वरों में उचरने लगा -


'गुड़ घिव हुनिया s जल s त हइन,


धुवना रहा s जग छा s य हो माय s।'


जलते हुए गुड़-घी समिधा का धुँवा सारे संसार में छाय रहा है। वे आवाहन करने लगे - हे देवी तुम्हारे वचन सुनने को हमारा हृदय लालायित हो रहा है। अपने वचन सुनाओ माँ -


'तोहरे बचनिया s क मोर जिया s ललचे s,


आ s पन बचनिया s सुना s य हो मा s य।'


ढेरों घी-गुड़ आग में पड़ गया। ढेरों धुंवा अम्बर में चढ़ गया। विजयशाल-मादल की थाप द्रुत हो गयी। वे और अधिक उच्च स्वरों में टेरने रहे। रात दो घडी चढ़ गयी। पलकें ढलने लगीं। देवी फिर भी प्रकट नहीं हुईं -


'त s ब त s ब कहै s रै s न चढ़ि जुझवै s,


अब काहे कोनवा s लुका s न हो मा s य,


------------------ ओ s मोरे s देवना s s -


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सुनते-सुनते आँख लग गयी तो सुबह ही जागे। कब तक चली ओझाई-सोखाई और क्या कुछ हुआ भूत-परेतों मुखिया का पता नहीं लगा। दिशा मैदान स्नान कलेवा से निवृत्त हो कर पहली बस मिलते ही पिटठू बांधे भरे मन से रवाना हो गए मिरज़ापुर की मार्फ़त लखनऊ के लिए। जब तक दिखा खिड़की से झाँक कर पीछे खिसकते गाँव, विदा करने आए वनवासियों के समूह और किंवाड़ थामे खड़ी अन्नपूर्णाओं को निहारते रहे।


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