Friday, October 23, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५३

"राजा भोज हैं मूसर चन्द" 

डेरा उठने का दिन आते आते उस भू भाग से बिछुड़ने की सोचते मन उदास और भावुक होने लगा। बिच्छी गाँव के राजकुमार साहब से मिल कर आगे बेलन पार की नई डीह से डोरी छाप वाले बर्तन के साथ एक प्रस्तर कुठार, चमकदार काले पुरवा के कुछ टुकड़े उठाते समझ आए कि वहाँ दबे होंगे काम से काम ढाई हज़ार साल पुराने वक्त से बसावट के निशान। जहां जहां सक्सेना जी ले गए घूम घूम कर गौरी शंकर, लसड़ा, अदलगंज, गौडीहा, कोलडीहा, कमौजी, करौली, कुरहुल, कुसुमहे, ओइनी मिसिर, ओरगाई, जैसे गाँवों के पुरवावषेषों का सिजरा जुटा लाए। 

फगुआ निकल जाने के बाद भी गुलाल उड़ता रहा। हम लोग अपना बोरिया-बिस्तर तम्बू-तिरपाल समेटने में लग गए। तभी थानेदार की घरैतिन ककए भेजे मोतीचूर-मोदकों का थाल ले कर आए बच्चों की चहकन सुन पड़ी - 'माई भेजलेस बाय।'

अभय स्पेशल रसोई के आयोजन में जुट गए। खीर, पुलाव, तीन तरह की तर-तरकारी, तरह तरह के पकवान उस अभियान के आखिरी भोज के लिए पकने लगे। इतने दिनों के प्रवास में सहज ही मित्र बन गए स्थानीय लोग रेनूकूट, रापटगंज, चुर्क के साथी एक एक कर मिलने आने लगे। 

कुँवर की मण्डली अलग जम गयी - 

'बहुत बरस बीते। धारा नगरी मा याकै बाजत रहे राजा भोज। उनकी बिद्वता और ज्ञान का डंका बाजै चरिहूँ लंग। कउनौ कइसहौ बिद्वान उनके दरबार मा पहुँच कै कुछौ सुनाय दे, याकु याकु गिन्नी इनाम इकराम मा पावै। 

एक गाँव मा रहै वाले चार जने यहु सुनिन तो सोचिन काहे ना हमहू लोग राजा के दरबार में अरदास लगाय के गिन्नी वसूल लाई। चल दिहे धारा नगरी वारु, कवित्त पढ़ै। मुला मुश्किल यू परिगै कि कविता बनावै क बूटा कोऊ मा रहै नहीं। तो, सलाह किन्हिन काहे ना सब कोऊ मिलि के बनावा जाए. 

राह चलत उनमा ते याकै देखिन्ह - एक आदमी चरखा कात रहा है। उई प्रसन्न होइगे - बोले - भइया हम तो अपनी कविता बनाए लीन्ह, तुम सबै अपनी फिकिर करौ। 

बाकी के तीन पूछै लाग - अरे भाई का बनायौ ?

उई कहिन मौके पर सुनाइब। मुला सब पाछे परिगे तो बड़ी मुश्किल ते उचरिन -
 
"मन्न s मन्न s चर s खा s s मन्ना s s य।" 

सब कोऊ सराहै लाग - यहु तो मार लइगा याकु अशरफ़ी। 

पाहिले वाला मगन होइगा। आगे चले। चलतै चलत देखिन्ह तेली क बैल खली भुस्कात रहा। याकै जने वहै पर रच मारिन - 

"तेली क बै s s ल खली s s भुस्का s s य।"

बाकी बचे दूनो किल्लत मा परिगे। स्वाचिन - दुइ जने तो मार लइगे। याकु याकु अशरफी कै लेइहैं। हमहे दूनो रहि गेन। अब का कीन्ह जाय। रस्तौ कमहे रहिगा। बहु अरबराए। हाथ कुछ आवा नहीं औ धारा नगरी नजीक आय गई। 

तब तक तिसरौ चिल्लान - हमहू बनाए लै गेन। बाकी साथी झट्ट तेने पूछिन - अरे भाई का बनायौ ? 

वहै राह पर कुछ आदमी कमान-तरकश बांधे चले जाते दिखे। ऊ वहै पर तुक्का मारिस - 

"च s ले जा s रहे s तर s कश s बन्ध s s।" 

अब चौथे जन टापै लाग, अब का करैं। अब तो धारा नगरियौ समहे आय गयी। थोरी देर सोचिन फिर खोपड़ी झटक के उनहू उछरे - भाई हमहू बनाय लए गेन। एसे पहले कि बाकी सब पूछैं, वै आपै उगल दीन्हिन - 

"रा s s जा s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

सब कोई सांस बांधे सुनते फिर हँसते फिर सुनते, फिर सुनने को अगोरते कि आगे क्या हुआ। अभय भी लिहाड़ी लेने के मूड में नहीं आए। कुँवर ने आगे सुनाया - 

'धारा नगरी के बाहर चरहू जन नद्दी किनारे सहतावै लगे। वहै समय धारा नगरी के राज कवी हुँवा सैर पर निकले। परदेसिन का देखिन तो पूछिन - 'कहाँ ते आयौ, कहाँ जात हौ ?' पता लाग चरहू जन कवी आँय। राजा भोज के दरबार मा कविता सुनावै जात हैं तो राजकवी का जिउ कुलबुलावै लाग। सोचिन पहुंचे कवी होइहैं। आपन कपडा लत्ता सूध कीन्हिन औ संभर के कहिन - 'कुछ अमृत वचन हमहू का सुनाय देंय बड़ी कृपा होइहै।'
हाँ तो जान्यौ ! राजकवी कान लगाए सुनै लाग। चरहूँ याकै पाँति मा ठाढ़ होइगे। पहिला पहिली लाइन सुनाइस फिर आगे आगे तिनहू ---

"मन्न s मन्न s चर s खा s s मन्ना s s य।"
"तेली क s बै s s ल खली s s भुस्का s s य।"
"च s ले जा s रहे s तर Ѕ कश s बन्ध s s।"
"रा s s जा s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

राजकवी सुनिन तो मूड़ थाम लीन्ह। आज परिगा महा मूढन ते पाला। मुला धारा नगरी के निवासी परदेसिन का आदर कैसे ना करैं। थ्वारी देर चुप्पे रहे, फिर तारीफ़ करै लाग - 'बाह का कविता आय। ऐसि रचना तो कहूँ नहीं सुना। रस ते भरी, सरल प्रवाह। ----------- बस तनुकै कसर रहि गै। 

चरहू जन याकै सुर मा बोले - 'अरे भाई कहाँ रहि गै ? अरे भाई कहाँ रहि गै ?'

राजकवी बोले - द्याखौ बताय तो दयाब मुला शर्त यू रही कि राजा के हिंया सखरयौ नहीं कि को बतावा है। 

वै एक सुर मा तुरतै बोले - अरे भाई ! तुम निशा खातिर रहौ। हम आन अवधी - 'रघुकुल रीति सदा चलि आयी, प्रान जाएं पर वचन न जाई।'

राजकवी सुझाइन - थ्वारा बदल डारौ - "रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" की जगह ब्वलौ - "रा s s जा s s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।"

चौथा आदमी रटतै-रटत चला - "रा s s जा s s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।" "रा s s जा s s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।"

राजा के दरबार मा जुटे रहे देश दुनिया क्यार गुनी-धनी। चरहूं जन आदर सहित आसन पर सिधराए गए। काव्य पाठ चलने लगे। वहै क्रम मा उनहुन का नम्बर आवा। वै झट्ट तेने अटेंशन खड़े होइगे। सब साथै मिल के याकु याकु पाँति पढ़िन - 

"मन्न s मन्न s चर s खा s s मन्ना s s य।" "तेली क s बै s s ल खली s s भुस्का s s य।" "च s ले जा s रहे s तर s कश s बन्ध s s।" "रा s s जा s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।"

राजा भोज सुनिन तो मुस्कियावै लाग। इनाम बांटै वाले ते कहिन पहिले तीन जन का याकु याकु अशरफी दीन जाय औ चौथे जान का चार चार क्वाडा (कोड़ा) मारौ हनक हनक कै। तीन जान की गदेरिन पर याकु-याकु अशरफी धरी गयी। 

चौथे के समहे आवा मोट क्यार करिया भुजंग जल्लाद तेल मा बुड़ावा कवाड़ा थामे तो ओहिका करेजा बइठै लाग। लाग अलअलाय - 'दुहाई सरकार की। यहु कउने जुरूम की सजा सुनायौ माई बाप ! बड़ा नाम सुने रहेन धारा नगरी क्यार। मुला हिंया तो सब उल्टै पलट निकरि गवा। कहाँ तो इनाम इकराम मिलै क रहा औ कहाँ यू सांप अस क्वाड़ा ?'

राजा भोज बड़ा भारी विद्वान रहा। सुनतै समझ गवा, तीन पाँति तो यहै सब मूढ़ रचिन आय। मुला चौथी कोऊ दूसर सुझाइस है। सो चौथे वाले का दरपावै के लिहे क्वाड़ा वाली सजा सुनाए दिहिन। 

अब मार के आगे तो भूतौ भागै, आखिर बेचरऊ छठे जन सखर लीन्ह - 'दुहाई सरकार की। हम तो दूसर बनाये रहेन। राह मा याकै मूढ़ मिलि गवा, ससुर सब उलट पलट कराए दीन्हिस। जौन हम बनाए रहेन वेहिका सुनौ। फिर उसने पूरे सुर में अलापा - 

"रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।"
"रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

दरबार सहम गया लेकिन राजा भोज जीउ खोल कर ठठाए। फिर, इनामी देने वाले से चौथे जान को भी एक अशर्फी दिलवाई। 

चौथे जान ब्वाले - 'हम पहलहे कहत रहेन, राह मा बहुत बड़ा मूरख टकराए गवा रहै।' 

कहानी खत्म होते ही अभय और दूबे सहित सबने कुँवर साहब की किस्सागोई का जयकारा लगाया और देर तक बात बात में चलता रहा वही जुमला - "रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

-----

No comments:

Post a Comment