Saturday, October 31, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५७



'खोहों में खोया अतीत' (इस अध्याय की अन्तिम कड़ी)


खड़खड़ाती हुई चलती-रूकती बस के सफर में सहबइया से मीरजापुर-इलाहबाद हो कर लखनऊ पहुँचते जोड़-जोड़ हिल गए। बस से उतरे तो दुनिया अपनी ही रफ़्तार में भागती अपने आप में मगन नज़र आयी। बड़े नगरों में किसी के आने-जाने से किसी को कुछ ख़ास फरक नहीं पड़ता। मिलने वाले अभियान के अनुभव, नयी नयी खोजों के विवरण, स्याह गात और छींण काया का हाल जानते बूझते रहे मगर मेरा अंतस अपने निजी अहसासों से घुमसता रहा।


इस बीच बिधना बिधि ऐसी बनी कि कुछ बहुत करीबी हमराह डगर से सहसा छूट-छटक कर बहुत दूर चले गए और हमारे लिए पीछे छोड़ गए रह-रह उभरते लोर। जब तक सब के साथ रहे, दिन-दिन भर खटते चलते, किसी को आभास भी नहीं होता - कब आँखों के ओदे कोर स्वेद पोंछते सूख गए। अपने कमरे में आराम मिलते ही अपनी दुनिया की सुध-बुध घेर घेर मानस में घिरने लगी। कुछ करने, देखने-सुनने, किसी से मिलने तक का मन नहीं करता, सब खाली खाली सा लगता। बस अपने एकांत अपने आप में चुपचाप अवसन्न। जिस आशय से आजीविका के फेर में पड़ा वह भी बेमानी लगने लगा। कुछ पाने की इच्छा नहीं रही। मन करता सब छोड़ कहीं दूर चला जाऊं, जहां कोई जानता पहचानता ना हो। लेकिन इस जीवन में कोई भी भाव कैसा भी क्यों न हो बीतते वक्त के साथ समभाव कहाँ रहता है।


दफ़्तर जाने पर कुँवर ने मिलते ही ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर चस्पा 'उत्खनन एवं सर्वेक्षण अधिकारी' और 'क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी' के पदों पर 'ऐडहॉक नियुक्तियों' की नोटिस दिखा कर सुझाया - 'तुमहू अप्लाई कै द्यौ, तुरन्तै सेलेक्ट होए जइहौ।' लेकिन उस समय की मनोदशा के चलते उनकी सुनी-अनसुनी कर गया। ऑफिस बन्द होने पर मेरे साथ साथ पैदल चलते हुए भी उन्होंने और गिरीश जी ने बहुतेरा समझाया फिर भी मन नहीं बना।


पिछली बार कैम्प के काम से लखनऊ आने पर लगे हाथ बाबू जी (पण्डित अमृत लाल नागर जी) का आशीष पाने का अवसर भी जुटा लिया था। चौक मोहल्ले में स्थित कोठी साव जी के बड़े से आँगन के पार, किताबों भरी अपनी बैठक में, अपने बाल-सखा ज्ञान चन्द्र जैन जी के साथ, चौड़े तखत पर विराजमान, पान रचाए बाबू जी चर्चा में मगन मिले। देखते ही अपने सुपरिचित अंदाज़ में सवाल किया - 'कब लौटे कैम्प से, क्या माल खोज कर लाए हो इस बार ?' कउवा खोह और वहाँ चित्रित लोरिक के चित्र के बारे में सुनाया तो कान लगाए सुनते रहे फिर उसे लिख लाने का मनुहार किया। लिख कर ले गया तो चुपचाप रख लिया यह कह कर कि आराम से पढ़ेंगे।







बाबू जी


वापस कैम्प जाने के बाद बीच-बीच में सोचता रहता - कैसा लगा होगा उन्हें वह लेख। उसी जिज्ञासा के चलते ऑफिस से लौट कर उनसे मिलने गया। उन्होंने बड़े नेह से अपने पास ही बिठा कर बताया - वह लेख तो उसी समय धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती को भेज दिया था। भारती जी ने उसे धर्मयुग के वन-विहार में छापने की स्वीकृति देते हुए यह भी जानना चाहा है कि - यह लड़का है कौन ? उससे और लेख लिखाने हैं। इतना बता कर बाबू जी ने भारती जी का पत्र दिखलाते हुए क्षेपक लगाया - 'अब तुम जानो और भारती। तुम दोनों के बीच अब मैं नहीं।'


'खोहों में खोया अतीत' शीर्षक वाला वह लेख बाबू जी को सौंपते समय यह नहीं सोचा था की उसे इस तरह 'धर्मयुग' में जगह मिल जाएगी और 'गुनाहों के देवता' वाले भारती जी से सीधा संपर्क हो जाएगा। एकबारगी प्रसन्नता और नये उत्साह से भर गया।


दूसरे दिन आफिस जाने पर कुँवर और गिरीश ने फिर आवेदन करने पर जोर दिया तो निरपेक्ष भाव से मान गया। उसी दिन दोपहर बाद 'साक्षात्कार' के लिए बुलाया गया। इंटरव्यू बोर्ड में विराजमान पाया इलाहाबद विश्वविद्यालय के नामी गिरामी प्रोफेसर गोवर्धन राय शर्मा, लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रोफेसर बी. एन. श्रीवास्तव और संस्कृति विभाग की सदर श्रीमती मंजूलिका गौतम के साथ पुरातत्व संगठन के निदेशक श्री राम चन्द्र सिंह को। तकरीबन सारे सवाल शर्मा जी ने दागे -


'कहाँ पढ़े हो ? क्या क्या पढ़े हो ? कौन कौन से टीचर रहे तुम्हारे ---------- '


जब तक एक सवाल का जवाब देते दूसरा रौबीली आवाज़ में सामने होता। उसी सिलसिले में पंत जी, प्री-हिस्ट्री और मिर्ज़ापुर में फील्ड-वर्क के ज़िक्र आए तो और अधिक सजग हो गए -


'हूँ, पन्त ने तो बहुत अच्छा काम किया है। तुमने मीरजापर के कौन कौन से इलाके में सर्वेक्षण किया है ?'


राबर्ट्सगंज का नाम लिया तो पूछ लिया - 'अच्छा यह बताओ लिखनिया या लेखहिआ कहाँ है ?'


मैंने पलट कर सवाल कर दिया - 'कौन सा लिखनिया ? मीरजापुर में तो कई-कई लिखनिया हैं ?'


अब तक हौंक रहे शर्मा जी यह सुन कर चकरा गए - 'कौन से कई-कई लिखनिया ?'


चार महीने से उसी इलाके में भटक कर टटका लौटने का पूरा फायदा मेरे पलड़े में रहा - 'एक लिखनिया है अहरौरा के आगे, दूसरा निम्बाहिया मयरा, तीसरा भैंसोर, चौथा राजापुर, पांचवा राजा का बैठका -------- '


आँखों में सराहना के भाव भरे शर्मा जी ने नरम लफ़्ज़ों में सूत्र बताया - 'अरे वही जहाँ अगोरी के राजा साहब रहते रहे, उसके पास वाली।'


राजपुर के राजा साहब का नाम ले कर 'राजा का बैठका' की स्थिति बतायी तो प्रसन्न हो गए - 'लड़का अच्छा काम कर रहा है। अपना विषय जानता है। '


श्रीमती गौतम ने इतनी ही जिज्ञासा दिखाई - 'मैरिड हो या बैचलर ?' अकेला होने की जानकारी पा कर यह कहने में सबर नहीं किया कि - 'पहाड़ में ऐसे ही लड़के की ज़रुरत है।'


श्रीवास्तव साहब ने मूंछों मूंछों में क्या मुनमुनाया सुन नहीं सका और सिॅह साहब ने मौन ही रखा।


एक घण्टे में इंटरव्यू का रिज़ल्ट आया, मुझे पहाड़ों पर काम करने का रुक्का मिल गया। ऑफिस बंद होने से पहले ही काँधे पर टांक दी गयी उत्तराखंड के 'क्षेत्रीय पुरात्तत्व अधिकारी' की फीती। कुंवर, गिरीश और श्याम जी की बांछें खिल गयीं। इधर लम्बे थकाऊ सर्वेक्षण से लौटे और उधर प्रमोशन हाथ में। कर्मणेवा धिकारस्ते का फल इतनी जल्दी मिलता देख किसी ने कहा - इसे कहते हैं इस हाथ दे उस हाथ ले।


कहाँ तो घनी उदासी और नौकरी छोड़ने की बढ़ती चाह और कहाँ अगले ही दिन 'अतीत को खोहों में खोने' की उमंग भरी चाहत लिए देहरादून एक्सप्रेस से रवाना हो गए श्रीनगर (गढ़वाल) की ओर, रात का सन्नाटा चीरती ट्रेन की झका-झक, झका-झक आवाज के बीच खुली आँखों नए सपने लखते।


कभी कभी तो अपना सोचा ज़रूर पूरा होता है और कभी-कभी नियति कुछ का कुछ करा देती। हमें लगता है अरे यह क्या हो गया, सहज ही स्वीकार नहीं कर पाते लेकिन आगे चल कर समय की गर्त में झाँकने पर वही पुरानी उक्ति दोहराने का मन करता है - 'जो होता है अच्छा ही होता है।


--------


सफर चलता रहा, अगले अध्याय की प्रतीक्षा करें।

2 comments:

  1. देशज भाषा में आपका लेखन पढने का आनंद ही कुछ और है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद। आज आपके सारे कमैंट्स पढ़े। पहले उत्तर न दे पाने के लिए छमा करें।

      Delete