Saturday, October 31, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५५

'सहबइया'

मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा उत्तर प्रदेश के इस आखिरी गाँव का नाम हो न हो भैसों के रहने के ठिकाने के कारण भैंसोड़ पड़ा होगा। इसके पूरब और पश्चिम में पठारी सिरों के गहरे किनारों तक टहलते आगे के दूर तक फैले समतल फैलाव देख आए। गाँव के दक्खिन लेखहिया पहाड़, पूरब मुनी बाबा, उत्तर मुख सड़क किनारे ठाढ़ी पथरी, लिखनिया, मरचाहिया, बागा, बाघाई खोर, मूड़ा, लहरिया डीह सारी पहाड़ियों की खोहों में लाल-गेरुआ चित्रण की भरमार। मोरहाना दरी और निम्बाहिया मयरा के चुअना पर बूँद बूँद भरते जल-सोत। 

पुराविदों के लिए इस मानिन्द इलाके का नाम दुनिया भर में यूं ही नहीं सरनाम हो गया। सोहागी घाट की वह खोह यहां से निकट ही हैं जहां के शैलचित्रों को १८८० के आस-पास बाहरी दुनिया में उजागर करने वाले बरतानिया ज़माने के खोजी कार्लाइल का नाम हमेशा हमेशा के लिए उजियार हो गया। उस खोह में छितरे नन्हे प्रस्तर उकरणों के साथ मिले गेरू के घिसे टुकड़ों और चित्रों में आपसी रिश्तों की बात कही। कैम्ब्रिज वाली मोहतरमा आल्चिन भी एक फेरा लगा गयीं। १९६० के दरमियान इलाहाबाद वाले ग़ाज़ीपुरी उस्ताद गोवर्धन राय शर्मा के राधाकान्त वर्मा, विद्या धर और बृज बासी मिसिर जैसे शागिर्दो के युवा काल खप गए कई कई बरस यहाँ के खोहों की खोज-खुदाई में , शहर लौटते तो उनकी कमाई बढ़ी हुई दाढ़ी से कूती जाती। फिर जब खबर मिलती कि उन्होंने खोजे लिए हैं पुरा प्रस्तर काल के बेलन के जमाओं से मानव निर्मित प्रस्तर व अस्थि-उपकरण और खोद निकाले हैं खोहों में दफ़न विंध्य प्रदेश में सात-आठ हज़ार बरस पहले से रह रहे मानवों के कंकाल और घिसे गेरू के टुकड़े तो हसरत से पढ़ते-सुनते। इलाहाबाद जिले में बेलन किनारे के देवघाट के निकट कोलडिहवा, महगड़ा और चोपनी माण्डू के पुरास्थल यहाँ से ज्यादा दूर नहीं हैं जहाँ से धान की खेती के आठ हज़ार बरस पुराने चीन्ह मिलने के दावे सत्तर के दशक के पहले खित्ते में पहली बार किए गए। इस तरह परम स्वतंत्र अहेरी वनवासी संग्राहकों में से कुछ समूहों ने अपनी परम्परा से आगे बढ़ कर अनाज उपजाना भी प्रारम्भ हुआ। पढ़ने-पढ़ाने के मामले में गुरुओं में भी सराहे गए घुमक्क्डी के गुणों में पूरमपूर बी एच यू वाले गुरुवर पूरन चन्द्र पन्त की धूनी भी इस इलाके में बरसों रमी। ड्रमंडगंज के बंगले से अलह सुबह खिचड़ी ठुंसा कर उन्होंने जिन चेलों को दिन भर यहाँ के पाथर खपाए सब के भाग खुल गए। उनके बताए बेलन-सेवती 'सेक्सन' की चर्चा आज तक चलती है। 

दिन खुलते ही निकल जाते नामचीन पुरास्थलों खोहों के दर्शन पाने। हर पहाड़ पाटिया खनने की खदानें, वनवासी मजूर। छुपे रास्तों पार होती ट्रकों लकड़ी। बालक ने बताया भैंसोर, ड्रमंडगंज और हनुमना चौकियों पर दस दस के पत्ते में पार। सूखे नंगे तपते पथरीले पहाड़ों में दो पहर तक थक कर किसी बड़े पाथल की छाया में रहते, घर तक की दौड़ लगा कर रास्ता दिखाने साथ आए बालक दाना पानी ले आते, बताते - 'खोहन कै लेखा बाघे औ हाथी कै लोहू से लिखाइल हौ।' 

एक एक खोह पर एक एक दिन। जो कुछ समेट सके डायरी में दर्ज़ करते गए। भैंसोड़ की बसावट में करीबन सभी आवास कच्ची माटी की भीत पर फूस-छप्पर से छाए। पुती दीवारों पर पंचांगुलिक छापे और फूल-पत्ती आलेखन। कुछ खाए पिए और बाकी सब धूप में तपे वनवासी। वैसे ही जैसे पूर्वी मिर्ज़ापुर के निवासी। अन्तर बस इतना कि उधर के गाँव आम तौर पर बसे हैं अंदरुनी इलाकों में और भैसोड़ से हो कर गुजरती सड़क इसे मुकम्मल तौर पर बाहरी दुनिया से जोड़ती चलती है। हांलाकि विजयशाल यहाँ भी ठनकता है रात रात भर ओझाई के साथ। साथ ही आ गए हैं कुछ रेडिओ ट्रांजिस्टर भी। नए चलन के चोटी, टिकुली, झुमकी, पैन्ट-कमीज़ भी आ गए हैं हनुमना-ड्रमंडगंज की बाज़ार से चल कर। कुछ युवा वनवासियों की चमकती श्यामल चमड़ी के नीचे मचलती पुष्ट पेशियाँ और तनी हुई काया चलती तो लचलच करती। 

एक शाम गांव में खबर आयी - 'सहबैय्या पहड़ी पर कोटार देखाइल हवें।' सुनते ही लोगों ने अहेर का इरादा बना लिया। सबके साथ चार पांच रेंगा-रेंगी गाम भर के कुकुरन के साथे उचकते दौड़ते रुकते चले। 


खरहा
पहड़ी पर पहुँचते ही कुत्ते सरपट दौड़ते कभी इधर जाते कभी उधर। उनकी नज़र उधर आराम से चर रहे खरहे पर पड़ी तो उधर लपके। खरहा देखने में छोटा भले ही लगे चारों पैर उछाल कर बेतहाशा न भागता तो चौगड़ा क्यों कहलाता। उसके लम्बे कान खड़े हो कर तने और वह पलक झपकते ये रहा वो गया। पूरी पल्टन पिल पड़ी उसकी तलाश में - वो रहा, इधर से घेरो, उधर से छेंको, यह गया, वह गया। और खरहा कुदानें भरता, सामने के पथरीले किनारे तक दौड़ता गया, वहींं किसी समरंगी सूखे खर ढोंके की आड़ में दुबक गया। रेंगा पल्टन एक-एक पत्थर टटोलने लगी। श्वान दल चारों ओर फों-फों करते सूंघते हुए मंडराने और नथुने फुला फुला कर दांत दिखाते पंजों से माटी खोदते धूल उड़ाने लगे। उधर अब तक चुपचाप दुबका सुस्ता चुका चौगड़ा चौकड़ी भरता जान कर दूसरी दिशा में भागा। श्वानों की नज़र पड़ते ही उसके पीछे लपके, उनके पीछे शोर मचाते रेंगा रेंगी और आगे पीछे बंहटी डोलाते टांगी गोजी थामे सयाने। चौगड़ा दौड़ता गया घूमा फिर पत्थरों में डॉज़ देता गुम। अहेरी लीक ही पीटते रह गए। हारे हैरान कुत्तों की लाल लाल लार चुआती जीभें बित्ता भर लटक गईं। 

हुजूम आगे चला। सब चुप्पी साधे बढे, जीभ लटकाए श्वान भी साथ चले। सहबैय्या पहड़ी आते ही कोटारों का दल दिखा, हमें देखते ही वे ठिठके और हम चटक हो गए। तब तक रेंगा रेंगी और श्वानों ने धावा बोल दिया लेकिन हिरणों की लाजवाब कुदानों के आगे उनकी क्या बिसात, पल पल फासला बढ़ता गया, देखते ही देखते निकल गए। अनुभवी अहेरियों की टोली दो हिस्सों में बंट कर मैदान के दो सिरों की ओर दौड़ गयी। हिरणों के लिए नाक की सीध भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। पीछे-पीछे भौंकते दौड़ते श्वान और दोनों बगल हुलहुलाते अहेरी। धीरे धीरे घेरा सिमटने लगा। हिरन दोनों पाट घिर गए। खुले मैदान में तो अहेरी उन्हें क्या खा कर पाते लेकिन आगे के छोटे बड़े ऊबड़-खाबड़ पथरीले ढोंकों में फंस गए। इधर भागते तो, उधर भागते तो कुत्ते और अहेरी खेदड़ कर छेंक लेते। आखिर बेदम हो कर निढाल हो गए। सयानों की दो दो दमदार गोजियों में ही हो गया काम तमाम। विजयी अहेरी जयकारा लगाते लौट चले मारे गए हरिणों की बँहगर लादे। 

अहेरियों में से एक ने बताया - बीते ज़माने में पहाड़ी पर अहेर के लिए आने वाले अँगरेज़ साहबों के नाम पर इस पहाड़ी का नाम धराया - 'सहबइया'।
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