Saturday, October 31, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५७



'खोहों में खोया अतीत' (इस अध्याय की अन्तिम कड़ी)


खड़खड़ाती हुई चलती-रूकती बस के सफर में सहबइया से मीरजापुर-इलाहबाद हो कर लखनऊ पहुँचते जोड़-जोड़ हिल गए। बस से उतरे तो दुनिया अपनी ही रफ़्तार में भागती अपने आप में मगन नज़र आयी। बड़े नगरों में किसी के आने-जाने से किसी को कुछ ख़ास फरक नहीं पड़ता। मिलने वाले अभियान के अनुभव, नयी नयी खोजों के विवरण, स्याह गात और छींण काया का हाल जानते बूझते रहे मगर मेरा अंतस अपने निजी अहसासों से घुमसता रहा।


इस बीच बिधना बिधि ऐसी बनी कि कुछ बहुत करीबी हमराह डगर से सहसा छूट-छटक कर बहुत दूर चले गए और हमारे लिए पीछे छोड़ गए रह-रह उभरते लोर। जब तक सब के साथ रहे, दिन-दिन भर खटते चलते, किसी को आभास भी नहीं होता - कब आँखों के ओदे कोर स्वेद पोंछते सूख गए। अपने कमरे में आराम मिलते ही अपनी दुनिया की सुध-बुध घेर घेर मानस में घिरने लगी। कुछ करने, देखने-सुनने, किसी से मिलने तक का मन नहीं करता, सब खाली खाली सा लगता। बस अपने एकांत अपने आप में चुपचाप अवसन्न। जिस आशय से आजीविका के फेर में पड़ा वह भी बेमानी लगने लगा। कुछ पाने की इच्छा नहीं रही। मन करता सब छोड़ कहीं दूर चला जाऊं, जहां कोई जानता पहचानता ना हो। लेकिन इस जीवन में कोई भी भाव कैसा भी क्यों न हो बीतते वक्त के साथ समभाव कहाँ रहता है।


दफ़्तर जाने पर कुँवर ने मिलते ही ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर चस्पा 'उत्खनन एवं सर्वेक्षण अधिकारी' और 'क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी' के पदों पर 'ऐडहॉक नियुक्तियों' की नोटिस दिखा कर सुझाया - 'तुमहू अप्लाई कै द्यौ, तुरन्तै सेलेक्ट होए जइहौ।' लेकिन उस समय की मनोदशा के चलते उनकी सुनी-अनसुनी कर गया। ऑफिस बन्द होने पर मेरे साथ साथ पैदल चलते हुए भी उन्होंने और गिरीश जी ने बहुतेरा समझाया फिर भी मन नहीं बना।


पिछली बार कैम्प के काम से लखनऊ आने पर लगे हाथ बाबू जी (पण्डित अमृत लाल नागर जी) का आशीष पाने का अवसर भी जुटा लिया था। चौक मोहल्ले में स्थित कोठी साव जी के बड़े से आँगन के पार, किताबों भरी अपनी बैठक में, अपने बाल-सखा ज्ञान चन्द्र जैन जी के साथ, चौड़े तखत पर विराजमान, पान रचाए बाबू जी चर्चा में मगन मिले। देखते ही अपने सुपरिचित अंदाज़ में सवाल किया - 'कब लौटे कैम्प से, क्या माल खोज कर लाए हो इस बार ?' कउवा खोह और वहाँ चित्रित लोरिक के चित्र के बारे में सुनाया तो कान लगाए सुनते रहे फिर उसे लिख लाने का मनुहार किया। लिख कर ले गया तो चुपचाप रख लिया यह कह कर कि आराम से पढ़ेंगे।







बाबू जी


वापस कैम्प जाने के बाद बीच-बीच में सोचता रहता - कैसा लगा होगा उन्हें वह लेख। उसी जिज्ञासा के चलते ऑफिस से लौट कर उनसे मिलने गया। उन्होंने बड़े नेह से अपने पास ही बिठा कर बताया - वह लेख तो उसी समय धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती को भेज दिया था। भारती जी ने उसे धर्मयुग के वन-विहार में छापने की स्वीकृति देते हुए यह भी जानना चाहा है कि - यह लड़का है कौन ? उससे और लेख लिखाने हैं। इतना बता कर बाबू जी ने भारती जी का पत्र दिखलाते हुए क्षेपक लगाया - 'अब तुम जानो और भारती। तुम दोनों के बीच अब मैं नहीं।'


'खोहों में खोया अतीत' शीर्षक वाला वह लेख बाबू जी को सौंपते समय यह नहीं सोचा था की उसे इस तरह 'धर्मयुग' में जगह मिल जाएगी और 'गुनाहों के देवता' वाले भारती जी से सीधा संपर्क हो जाएगा। एकबारगी प्रसन्नता और नये उत्साह से भर गया।


दूसरे दिन आफिस जाने पर कुँवर और गिरीश ने फिर आवेदन करने पर जोर दिया तो निरपेक्ष भाव से मान गया। उसी दिन दोपहर बाद 'साक्षात्कार' के लिए बुलाया गया। इंटरव्यू बोर्ड में विराजमान पाया इलाहाबद विश्वविद्यालय के नामी गिरामी प्रोफेसर गोवर्धन राय शर्मा, लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रोफेसर बी. एन. श्रीवास्तव और संस्कृति विभाग की सदर श्रीमती मंजूलिका गौतम के साथ पुरातत्व संगठन के निदेशक श्री राम चन्द्र सिंह को। तकरीबन सारे सवाल शर्मा जी ने दागे -


'कहाँ पढ़े हो ? क्या क्या पढ़े हो ? कौन कौन से टीचर रहे तुम्हारे ---------- '


जब तक एक सवाल का जवाब देते दूसरा रौबीली आवाज़ में सामने होता। उसी सिलसिले में पंत जी, प्री-हिस्ट्री और मिर्ज़ापुर में फील्ड-वर्क के ज़िक्र आए तो और अधिक सजग हो गए -


'हूँ, पन्त ने तो बहुत अच्छा काम किया है। तुमने मीरजापर के कौन कौन से इलाके में सर्वेक्षण किया है ?'


राबर्ट्सगंज का नाम लिया तो पूछ लिया - 'अच्छा यह बताओ लिखनिया या लेखहिआ कहाँ है ?'


मैंने पलट कर सवाल कर दिया - 'कौन सा लिखनिया ? मीरजापुर में तो कई-कई लिखनिया हैं ?'


अब तक हौंक रहे शर्मा जी यह सुन कर चकरा गए - 'कौन से कई-कई लिखनिया ?'


चार महीने से उसी इलाके में भटक कर टटका लौटने का पूरा फायदा मेरे पलड़े में रहा - 'एक लिखनिया है अहरौरा के आगे, दूसरा निम्बाहिया मयरा, तीसरा भैंसोर, चौथा राजापुर, पांचवा राजा का बैठका -------- '


आँखों में सराहना के भाव भरे शर्मा जी ने नरम लफ़्ज़ों में सूत्र बताया - 'अरे वही जहाँ अगोरी के राजा साहब रहते रहे, उसके पास वाली।'


राजपुर के राजा साहब का नाम ले कर 'राजा का बैठका' की स्थिति बतायी तो प्रसन्न हो गए - 'लड़का अच्छा काम कर रहा है। अपना विषय जानता है। '


श्रीमती गौतम ने इतनी ही जिज्ञासा दिखाई - 'मैरिड हो या बैचलर ?' अकेला होने की जानकारी पा कर यह कहने में सबर नहीं किया कि - 'पहाड़ में ऐसे ही लड़के की ज़रुरत है।'


श्रीवास्तव साहब ने मूंछों मूंछों में क्या मुनमुनाया सुन नहीं सका और सिॅह साहब ने मौन ही रखा।


एक घण्टे में इंटरव्यू का रिज़ल्ट आया, मुझे पहाड़ों पर काम करने का रुक्का मिल गया। ऑफिस बंद होने से पहले ही काँधे पर टांक दी गयी उत्तराखंड के 'क्षेत्रीय पुरात्तत्व अधिकारी' की फीती। कुंवर, गिरीश और श्याम जी की बांछें खिल गयीं। इधर लम्बे थकाऊ सर्वेक्षण से लौटे और उधर प्रमोशन हाथ में। कर्मणेवा धिकारस्ते का फल इतनी जल्दी मिलता देख किसी ने कहा - इसे कहते हैं इस हाथ दे उस हाथ ले।


कहाँ तो घनी उदासी और नौकरी छोड़ने की बढ़ती चाह और कहाँ अगले ही दिन 'अतीत को खोहों में खोने' की उमंग भरी चाहत लिए देहरादून एक्सप्रेस से रवाना हो गए श्रीनगर (गढ़वाल) की ओर, रात का सन्नाटा चीरती ट्रेन की झका-झक, झका-झक आवाज के बीच खुली आँखों नए सपने लखते।


कभी कभी तो अपना सोचा ज़रूर पूरा होता है और कभी-कभी नियति कुछ का कुछ करा देती। हमें लगता है अरे यह क्या हो गया, सहज ही स्वीकार नहीं कर पाते लेकिन आगे चल कर समय की गर्त में झाँकने पर वही पुरानी उक्ति दोहराने का मन करता है - 'जो होता है अच्छा ही होता है।


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सफर चलता रहा, अगले अध्याय की प्रतीक्षा करें।

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५६



धुवना रहा जग छाय हो माय


भैंसोर अवस्थान की उस आखिरी रात मेज़बान का हिसाब किताब पूरा कर दुआरे पर पड़ी मचिया पर पड़ रहा। यहाँ बितायी पहली रात के समय के निरपेक्ष भावों की जगह संवेदना के भावों से भरा भरा मन छलकने लगा। गाँव, सूखे पहाड़, वृक्ष विहीन वन, जलस्रोत, खोह, वनवासी बालक, उसके बन्धु-बान्धव, स्वादिष्ट भोजन सब कितने अपने-अपने से लगने लगे। थोड़े ही दिनों में बंधे कैसे अदृश्य आत्मीय बन्धन। आँख नहीं लगी तो उठ कर अनायास ही आस-पास टहलने लगा।


ऊँचे-नीचे धरातल पर छोटी-बड़ी छतरियों जैसे ढाक के झुरमुट और उनकी छायाएं दूर तक फैली। गहराती रात में अधकटे चाँद की छितराती चांदनी में चप्पा चप्पा खिल उठा। देश दुनिया में विख्यात बघेलखण्ड-बुंदेलखंड के इन टप्पों की ऐसी रजतमयी अप्रतिम प्राकृतिक सुन्दरता के क्या कहने, जो अपनी आँखों निरखे वो ही गुने।


गाँव का धनवान व्यापारी मुखिया इलाके भर में दबंग। दोहरी काया पर लकदक धवल धोती-बनियाइन। उदर पर हाथ फेरता चलता। गले में पड़ी सोने की मोटी सिकड़ी का रूतबा दिखाने के लिए कमीज़ पहनता नहीं काँधे पर रखता। एक बार उसकी उधर सींधी जिले के एक गाँव के वनवासियों से किसी बात पर ठन गयी। अपने आदमी ले कर गया उनके सारे गाय-गोरु हँकवाय लाया। वनवासियों का जोर नहीं चला तो गाँव भर के भूत-परेत ही उसके पीछे पेश (लगा) दिए जिन्होंने मुखिया को तक्र कर डाला।


हार कर मुखिया ने 'कोल-टोला' से बैगा-ओझा-सोखा बुलवाए। वो आए अपने-अपने ढोल-मानर टोना-टटकार ले कर। उनमें और दूर गाँव भूत-परेत छाया-जोग में ठन गयी।


व्यापारी के लड़के को माध्यम बना कर उसकी गदेली पर धरी गयीं मन्त्र पूरित फूल-पत्ती। टोना-मन्तर के साथ गोड़सी में सुलगायी आग में घी-गुड की समिधा पड़ने लगी। ढोल और मादल की थाप के साथ उनमें से कोई उच्च स्वरों में उचरने लगा -


'गुड़ घिव हुनिया s जल s त हइन,


धुवना रहा s जग छा s य हो माय s।'


जलते हुए गुड़-घी समिधा का धुँवा सारे संसार में छाय रहा है। वे आवाहन करने लगे - हे देवी तुम्हारे वचन सुनने को हमारा हृदय लालायित हो रहा है। अपने वचन सुनाओ माँ -


'तोहरे बचनिया s क मोर जिया s ललचे s,


आ s पन बचनिया s सुना s य हो मा s य।'


ढेरों घी-गुड़ आग में पड़ गया। ढेरों धुंवा अम्बर में चढ़ गया। विजयशाल-मादल की थाप द्रुत हो गयी। वे और अधिक उच्च स्वरों में टेरने रहे। रात दो घडी चढ़ गयी। पलकें ढलने लगीं। देवी फिर भी प्रकट नहीं हुईं -


'त s ब त s ब कहै s रै s न चढ़ि जुझवै s,


अब काहे कोनवा s लुका s न हो मा s य,


------------------ ओ s मोरे s देवना s s -


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सुनते-सुनते आँख लग गयी तो सुबह ही जागे। कब तक चली ओझाई-सोखाई और क्या कुछ हुआ भूत-परेतों मुखिया का पता नहीं लगा। दिशा मैदान स्नान कलेवा से निवृत्त हो कर पहली बस मिलते ही पिटठू बांधे भरे मन से रवाना हो गए मिरज़ापुर की मार्फ़त लखनऊ के लिए। जब तक दिखा खिड़की से झाँक कर पीछे खिसकते गाँव, विदा करने आए वनवासियों के समूह और किंवाड़ थामे खड़ी अन्नपूर्णाओं को निहारते रहे।


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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५५

'सहबइया'

मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा उत्तर प्रदेश के इस आखिरी गाँव का नाम हो न हो भैसों के रहने के ठिकाने के कारण भैंसोड़ पड़ा होगा। इसके पूरब और पश्चिम में पठारी सिरों के गहरे किनारों तक टहलते आगे के दूर तक फैले समतल फैलाव देख आए। गाँव के दक्खिन लेखहिया पहाड़, पूरब मुनी बाबा, उत्तर मुख सड़क किनारे ठाढ़ी पथरी, लिखनिया, मरचाहिया, बागा, बाघाई खोर, मूड़ा, लहरिया डीह सारी पहाड़ियों की खोहों में लाल-गेरुआ चित्रण की भरमार। मोरहाना दरी और निम्बाहिया मयरा के चुअना पर बूँद बूँद भरते जल-सोत। 

पुराविदों के लिए इस मानिन्द इलाके का नाम दुनिया भर में यूं ही नहीं सरनाम हो गया। सोहागी घाट की वह खोह यहां से निकट ही हैं जहां के शैलचित्रों को १८८० के आस-पास बाहरी दुनिया में उजागर करने वाले बरतानिया ज़माने के खोजी कार्लाइल का नाम हमेशा हमेशा के लिए उजियार हो गया। उस खोह में छितरे नन्हे प्रस्तर उकरणों के साथ मिले गेरू के घिसे टुकड़ों और चित्रों में आपसी रिश्तों की बात कही। कैम्ब्रिज वाली मोहतरमा आल्चिन भी एक फेरा लगा गयीं। १९६० के दरमियान इलाहाबाद वाले ग़ाज़ीपुरी उस्ताद गोवर्धन राय शर्मा के राधाकान्त वर्मा, विद्या धर और बृज बासी मिसिर जैसे शागिर्दो के युवा काल खप गए कई कई बरस यहाँ के खोहों की खोज-खुदाई में , शहर लौटते तो उनकी कमाई बढ़ी हुई दाढ़ी से कूती जाती। फिर जब खबर मिलती कि उन्होंने खोजे लिए हैं पुरा प्रस्तर काल के बेलन के जमाओं से मानव निर्मित प्रस्तर व अस्थि-उपकरण और खोद निकाले हैं खोहों में दफ़न विंध्य प्रदेश में सात-आठ हज़ार बरस पहले से रह रहे मानवों के कंकाल और घिसे गेरू के टुकड़े तो हसरत से पढ़ते-सुनते। इलाहाबाद जिले में बेलन किनारे के देवघाट के निकट कोलडिहवा, महगड़ा और चोपनी माण्डू के पुरास्थल यहाँ से ज्यादा दूर नहीं हैं जहाँ से धान की खेती के आठ हज़ार बरस पुराने चीन्ह मिलने के दावे सत्तर के दशक के पहले खित्ते में पहली बार किए गए। इस तरह परम स्वतंत्र अहेरी वनवासी संग्राहकों में से कुछ समूहों ने अपनी परम्परा से आगे बढ़ कर अनाज उपजाना भी प्रारम्भ हुआ। पढ़ने-पढ़ाने के मामले में गुरुओं में भी सराहे गए घुमक्क्डी के गुणों में पूरमपूर बी एच यू वाले गुरुवर पूरन चन्द्र पन्त की धूनी भी इस इलाके में बरसों रमी। ड्रमंडगंज के बंगले से अलह सुबह खिचड़ी ठुंसा कर उन्होंने जिन चेलों को दिन भर यहाँ के पाथर खपाए सब के भाग खुल गए। उनके बताए बेलन-सेवती 'सेक्सन' की चर्चा आज तक चलती है। 

दिन खुलते ही निकल जाते नामचीन पुरास्थलों खोहों के दर्शन पाने। हर पहाड़ पाटिया खनने की खदानें, वनवासी मजूर। छुपे रास्तों पार होती ट्रकों लकड़ी। बालक ने बताया भैंसोर, ड्रमंडगंज और हनुमना चौकियों पर दस दस के पत्ते में पार। सूखे नंगे तपते पथरीले पहाड़ों में दो पहर तक थक कर किसी बड़े पाथल की छाया में रहते, घर तक की दौड़ लगा कर रास्ता दिखाने साथ आए बालक दाना पानी ले आते, बताते - 'खोहन कै लेखा बाघे औ हाथी कै लोहू से लिखाइल हौ।' 

एक एक खोह पर एक एक दिन। जो कुछ समेट सके डायरी में दर्ज़ करते गए। भैंसोड़ की बसावट में करीबन सभी आवास कच्ची माटी की भीत पर फूस-छप्पर से छाए। पुती दीवारों पर पंचांगुलिक छापे और फूल-पत्ती आलेखन। कुछ खाए पिए और बाकी सब धूप में तपे वनवासी। वैसे ही जैसे पूर्वी मिर्ज़ापुर के निवासी। अन्तर बस इतना कि उधर के गाँव आम तौर पर बसे हैं अंदरुनी इलाकों में और भैसोड़ से हो कर गुजरती सड़क इसे मुकम्मल तौर पर बाहरी दुनिया से जोड़ती चलती है। हांलाकि विजयशाल यहाँ भी ठनकता है रात रात भर ओझाई के साथ। साथ ही आ गए हैं कुछ रेडिओ ट्रांजिस्टर भी। नए चलन के चोटी, टिकुली, झुमकी, पैन्ट-कमीज़ भी आ गए हैं हनुमना-ड्रमंडगंज की बाज़ार से चल कर। कुछ युवा वनवासियों की चमकती श्यामल चमड़ी के नीचे मचलती पुष्ट पेशियाँ और तनी हुई काया चलती तो लचलच करती। 

एक शाम गांव में खबर आयी - 'सहबैय्या पहड़ी पर कोटार देखाइल हवें।' सुनते ही लोगों ने अहेर का इरादा बना लिया। सबके साथ चार पांच रेंगा-रेंगी गाम भर के कुकुरन के साथे उचकते दौड़ते रुकते चले। 


खरहा
पहड़ी पर पहुँचते ही कुत्ते सरपट दौड़ते कभी इधर जाते कभी उधर। उनकी नज़र उधर आराम से चर रहे खरहे पर पड़ी तो उधर लपके। खरहा देखने में छोटा भले ही लगे चारों पैर उछाल कर बेतहाशा न भागता तो चौगड़ा क्यों कहलाता। उसके लम्बे कान खड़े हो कर तने और वह पलक झपकते ये रहा वो गया। पूरी पल्टन पिल पड़ी उसकी तलाश में - वो रहा, इधर से घेरो, उधर से छेंको, यह गया, वह गया। और खरहा कुदानें भरता, सामने के पथरीले किनारे तक दौड़ता गया, वहींं किसी समरंगी सूखे खर ढोंके की आड़ में दुबक गया। रेंगा पल्टन एक-एक पत्थर टटोलने लगी। श्वान दल चारों ओर फों-फों करते सूंघते हुए मंडराने और नथुने फुला फुला कर दांत दिखाते पंजों से माटी खोदते धूल उड़ाने लगे। उधर अब तक चुपचाप दुबका सुस्ता चुका चौगड़ा चौकड़ी भरता जान कर दूसरी दिशा में भागा। श्वानों की नज़र पड़ते ही उसके पीछे लपके, उनके पीछे शोर मचाते रेंगा रेंगी और आगे पीछे बंहटी डोलाते टांगी गोजी थामे सयाने। चौगड़ा दौड़ता गया घूमा फिर पत्थरों में डॉज़ देता गुम। अहेरी लीक ही पीटते रह गए। हारे हैरान कुत्तों की लाल लाल लार चुआती जीभें बित्ता भर लटक गईं। 

हुजूम आगे चला। सब चुप्पी साधे बढे, जीभ लटकाए श्वान भी साथ चले। सहबैय्या पहड़ी आते ही कोटारों का दल दिखा, हमें देखते ही वे ठिठके और हम चटक हो गए। तब तक रेंगा रेंगी और श्वानों ने धावा बोल दिया लेकिन हिरणों की लाजवाब कुदानों के आगे उनकी क्या बिसात, पल पल फासला बढ़ता गया, देखते ही देखते निकल गए। अनुभवी अहेरियों की टोली दो हिस्सों में बंट कर मैदान के दो सिरों की ओर दौड़ गयी। हिरणों के लिए नाक की सीध भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। पीछे-पीछे भौंकते दौड़ते श्वान और दोनों बगल हुलहुलाते अहेरी। धीरे धीरे घेरा सिमटने लगा। हिरन दोनों पाट घिर गए। खुले मैदान में तो अहेरी उन्हें क्या खा कर पाते लेकिन आगे के छोटे बड़े ऊबड़-खाबड़ पथरीले ढोंकों में फंस गए। इधर भागते तो, उधर भागते तो कुत्ते और अहेरी खेदड़ कर छेंक लेते। आखिर बेदम हो कर निढाल हो गए। सयानों की दो दो दमदार गोजियों में ही हो गया काम तमाम। विजयी अहेरी जयकारा लगाते लौट चले मारे गए हरिणों की बँहगर लादे। 

अहेरियों में से एक ने बताया - बीते ज़माने में पहाड़ी पर अहेर के लिए आने वाले अँगरेज़ साहबों के नाम पर इस पहाड़ी का नाम धराया - 'सहबइया'।
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Friday, October 23, 2015

पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५४

भैंसोड़ का डेरा 

विंध्य-कैमूर के जादू से उबरने से पहले ही कैम्प उठाने का दिन आ गया। इकत्तीस मार्च तक वित्तीय-वर्ष का हिसाब दफ़्तर में दाखिल करने की लक्षमण रेखा ना होती तो दोनों कैम्प अभी कुछ दिन और चले होते। डेरा डण्डा बंध गये बिस्तर बांधे गोल, मस्टर-रोल सब भर लिए, स्टॉक रजिस्टर फुल। 

चोपन से चलती रेल पर वहां के कैम्प का सामान आराम से लदा, छपका वाला रापटगंज में हड़बड़-तड़बड़। कुछ दिन और वहीँ रुक कर घूमने के इरादे से अपने उपार्जित अवकाश का आवेदन थमा कर कैम्प पार्टी को कुँवर की कमाण्ड में लखनऊ के लिए विदा कर दिया। 

आये थे तो नए-नए नरम गेंहूँ की हरियाली लहराती दीखती और अब चारों ओर दूर-दूर तक सूखी ऊंची-नीची उघार धरती का फैलाव। तब ठिठुराती शीत लहरी और अब लपलपाती लूह का लपटा। पूरा पथरीला इलाका गरम आँवे में तब्दील। तब ट्रेन की खिड़की की सरिया छूते ही बर्फीली करेण्ट सी लगती और अब कहीं अगर धोखे से खिड़की का बाहरी फ्रेम सट जाए तो लगता किसी ने तपते लोहे से दाग दिया हो। 

सरकिट हाउस में आसानी से जगह पा कर कभी केसरी जी के निवास पर तो कभी राजकुमार साहब के गाँव से जानकारियां बटोरने के लिए कई चक्कर लगाए। फिर पिट्ठू बांधे निकल पड़े भैंसोर के उस इलाके की ओर जहां के मूड़ा पहाड़, बाघाई खोर, सहबइया, लिखनिया की चर्चा बरसों से सुनते-गुनते वहाँ का एक फेरा लगा आने को जाने कब से कुलबुला रहे थे। 

चोपन से बस पकड़ कर रापटगंज-करमा-राजगढ़ हो कर पक्की सड़क पर चल पड़े। चलते चलते कहीं कहीं बचे फूले पलाश की लाली दिख जाती। रह रह कर बस का इंजन तप कर गरम हो जाता। रुकते ही सवारियों के तपे चेहरों पर पसीने के पनाले बह चलते। ऐसे ही रुकते-चलते एक सौ दो किलोमीटर का सफर पूरे चार घण्टे में नाप कर मीरजापुर बस- स्टेशन पर उतरती सवारियां पानी की तलाश में चापा-कल की तरफ दौड़ती दिखीं। 

एक घण्टे बाद हनुमना-रीवां हो कर जबलपुर जाने वाली अगली बस मिली। बीहड़ कटान, सूखे खेत, गरम बवण्डर सी लूह, चकले पठार पर, पिघलती चिपचिपी डामर वाली सड़क पर बस के पहिए कचकच करते चलते। तुलसिया हो कर लालगंज बाजार के आगे, बेलन नदी का बंधा पार करते, लौका हल्लुक होने लगा। ड्रमंडगंज से आगे मूड़ा पहाड़ की जलेबिया चढ़ाई के छोर के काले लबादे वाले पुजारियों के निकट पहुँच कर चढ़ती बस धीरे धीरे चलती छन भर को रुकी। अपनी अपनी आस्था और पॉकेट के मुताबिक़ भगवान पर सिक्कों रुपयों का नज़राना चढ़ा कर चालक-क्लीनर-सवारियां फिर से बस में आए और हम आगे बढ कर मूड़ा पहाड़ पर चलने लगे। बड़ी छोटी चट्टानें, इक्के दुक्के गाछ, झाड़। तभी कंडक्टर ने पास आ कर पूछा - 

'बैरियर पे उतरबा कि बंगला पर?' 

सोचा बंगले पर ठहरने का जुगाड़ हो सकेगा वहीँ उतरना ठीक रहेगा सो धीमी होती बस से वहीँ उतर गए। पूछताछ कर सड़क के दाएं बगल के बंगले की ओर टहल दिए। 

कुछ ही कदम धरते बंगले पर पहुंचे तो - सामने आए ध्वस्त दीवारों के बीच छत का मलबा, दीवारों के उधड़े प्लास्टर पर कोयले से लिखे नाम और बरामदे में गोबर कूड़े के ढेर के बीच पगुराते फेंचकुर फेकते गाय-गोरू-ऊँट। बाहर कोई दिखा नहीं। सामने की बसावट के झोपड़ों के दरवाजे बन्द। सड़क की चिपचिपी डामर पर भाप का भभका सा उठता। 

'मैदान' से लौटता एक वनवासी बालक दिखा तो उसे ही पुकार लिया। टिकने रहने का ठिकाना पूछने पर कहने लगा - 

'बँगला पर अब केहू नाहीं रुका ला। चाहा तो हमरे डेरा पर ठहर जा।' 

पगुराते ऊंटों के हिलते थूथुन से झरते झाग पर नज़र डालते बालक के साथ हो लेने में ही भलाई समझी। 

उसके झोपड़े के बाहरी ओसारे में पड़ी खटिया पर पड़ते ही आँख लग गयी। साँझ ढले जागे तो भूख से बेहाल। मेजबान बालक ने पूछा - 

'अहेर खाते हैं साहब ?' 

पहले तो उसका मतलब ही नहीं समझ पाया जब समझा तो मना किया। 

पहले आने वाले साहब लोग आए थे तो रोज ही कटता रहा ओही से पुछलीं। उसने साइकिल निकालते हुए समझाया। फिर हनुमना तक लपकता हुआ यूं गया और यूं आया, सौदा सुलुफ आलू दाल मसाला ले आया। अन्धेरा घिरने तक पक कर तैयार आलू प्याज की सुस्वादु भुजिया, देशी घी में डूबी रोटी, दाल और चावल, साफ़ सुथरी फूल की थाली में पलाश के पत्ते पर खटाई के साथ, बालक की सुगढ़ भौजी ने सहज सनेह से परोस कर सामने सजाया तो देखते ही काया तृप्त हो गयी। 

झोपड़े और सड़क के बीच की खाली जगह में पड़ी चारपाई पर लेट तो गए लेकिन दिन में गहरी नींद सो लेने की वजह से आँख नहीं लगी। दूबे, अभय गुरु, गीबड़, ग्रीसम, सक्सेना, कुँवर, रामकरण कोई साथ नहीं, नये ठिकाने पर निपट अकेले। पड़े पड़े नीरव अँधेरी रात के आसमान में सजे टिमटिमाते सितारों की जुटान तकते देर तक जागते रहे। पिछले चार महीने में जिले के मध्य-पूर्वी इलाके के वन-पर्वत हलोरते अब इस जिले के पछाहीं सिरे तक आने के तजुरबे संजोते-संजोते गहरे भावों में डूबता उतराता रहा - 

डगर, कु-डगर, बे-डगर डोलने भटकने, अपने आप को तोड़ने की सीमा से आगे तक थकने, फिर चलने, फिर थकने के आशय। क्या पाने चले, किस दिशा में, क्या पाए, कहाँ पहुंचेगे, क्या चाहां, नियति कहाँ ले आयी, अब किधर ले जाएगी। हर्ष-राग-विषाद के एक गुम्फन से निकलते दूजे में उलझ जाते। 

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५३

"राजा भोज हैं मूसर चन्द" 

डेरा उठने का दिन आते आते उस भू भाग से बिछुड़ने की सोचते मन उदास और भावुक होने लगा। बिच्छी गाँव के राजकुमार साहब से मिल कर आगे बेलन पार की नई डीह से डोरी छाप वाले बर्तन के साथ एक प्रस्तर कुठार, चमकदार काले पुरवा के कुछ टुकड़े उठाते समझ आए कि वहाँ दबे होंगे काम से काम ढाई हज़ार साल पुराने वक्त से बसावट के निशान। जहां जहां सक्सेना जी ले गए घूम घूम कर गौरी शंकर, लसड़ा, अदलगंज, गौडीहा, कोलडीहा, कमौजी, करौली, कुरहुल, कुसुमहे, ओइनी मिसिर, ओरगाई, जैसे गाँवों के पुरवावषेषों का सिजरा जुटा लाए। 

फगुआ निकल जाने के बाद भी गुलाल उड़ता रहा। हम लोग अपना बोरिया-बिस्तर तम्बू-तिरपाल समेटने में लग गए। तभी थानेदार की घरैतिन ककए भेजे मोतीचूर-मोदकों का थाल ले कर आए बच्चों की चहकन सुन पड़ी - 'माई भेजलेस बाय।'

अभय स्पेशल रसोई के आयोजन में जुट गए। खीर, पुलाव, तीन तरह की तर-तरकारी, तरह तरह के पकवान उस अभियान के आखिरी भोज के लिए पकने लगे। इतने दिनों के प्रवास में सहज ही मित्र बन गए स्थानीय लोग रेनूकूट, रापटगंज, चुर्क के साथी एक एक कर मिलने आने लगे। 

कुँवर की मण्डली अलग जम गयी - 

'बहुत बरस बीते। धारा नगरी मा याकै बाजत रहे राजा भोज। उनकी बिद्वता और ज्ञान का डंका बाजै चरिहूँ लंग। कउनौ कइसहौ बिद्वान उनके दरबार मा पहुँच कै कुछौ सुनाय दे, याकु याकु गिन्नी इनाम इकराम मा पावै। 

एक गाँव मा रहै वाले चार जने यहु सुनिन तो सोचिन काहे ना हमहू लोग राजा के दरबार में अरदास लगाय के गिन्नी वसूल लाई। चल दिहे धारा नगरी वारु, कवित्त पढ़ै। मुला मुश्किल यू परिगै कि कविता बनावै क बूटा कोऊ मा रहै नहीं। तो, सलाह किन्हिन काहे ना सब कोऊ मिलि के बनावा जाए. 

राह चलत उनमा ते याकै देखिन्ह - एक आदमी चरखा कात रहा है। उई प्रसन्न होइगे - बोले - भइया हम तो अपनी कविता बनाए लीन्ह, तुम सबै अपनी फिकिर करौ। 

बाकी के तीन पूछै लाग - अरे भाई का बनायौ ?

उई कहिन मौके पर सुनाइब। मुला सब पाछे परिगे तो बड़ी मुश्किल ते उचरिन -
 
"मन्न s मन्न s चर s खा s s मन्ना s s य।" 

सब कोऊ सराहै लाग - यहु तो मार लइगा याकु अशरफ़ी। 

पाहिले वाला मगन होइगा। आगे चले। चलतै चलत देखिन्ह तेली क बैल खली भुस्कात रहा। याकै जने वहै पर रच मारिन - 

"तेली क बै s s ल खली s s भुस्का s s य।"

बाकी बचे दूनो किल्लत मा परिगे। स्वाचिन - दुइ जने तो मार लइगे। याकु याकु अशरफी कै लेइहैं। हमहे दूनो रहि गेन। अब का कीन्ह जाय। रस्तौ कमहे रहिगा। बहु अरबराए। हाथ कुछ आवा नहीं औ धारा नगरी नजीक आय गई। 

तब तक तिसरौ चिल्लान - हमहू बनाए लै गेन। बाकी साथी झट्ट तेने पूछिन - अरे भाई का बनायौ ? 

वहै राह पर कुछ आदमी कमान-तरकश बांधे चले जाते दिखे। ऊ वहै पर तुक्का मारिस - 

"च s ले जा s रहे s तर s कश s बन्ध s s।" 

अब चौथे जन टापै लाग, अब का करैं। अब तो धारा नगरियौ समहे आय गयी। थोरी देर सोचिन फिर खोपड़ी झटक के उनहू उछरे - भाई हमहू बनाय लए गेन। एसे पहले कि बाकी सब पूछैं, वै आपै उगल दीन्हिन - 

"रा s s जा s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

सब कोई सांस बांधे सुनते फिर हँसते फिर सुनते, फिर सुनने को अगोरते कि आगे क्या हुआ। अभय भी लिहाड़ी लेने के मूड में नहीं आए। कुँवर ने आगे सुनाया - 

'धारा नगरी के बाहर चरहू जन नद्दी किनारे सहतावै लगे। वहै समय धारा नगरी के राज कवी हुँवा सैर पर निकले। परदेसिन का देखिन तो पूछिन - 'कहाँ ते आयौ, कहाँ जात हौ ?' पता लाग चरहू जन कवी आँय। राजा भोज के दरबार मा कविता सुनावै जात हैं तो राजकवी का जिउ कुलबुलावै लाग। सोचिन पहुंचे कवी होइहैं। आपन कपडा लत्ता सूध कीन्हिन औ संभर के कहिन - 'कुछ अमृत वचन हमहू का सुनाय देंय बड़ी कृपा होइहै।'
हाँ तो जान्यौ ! राजकवी कान लगाए सुनै लाग। चरहूँ याकै पाँति मा ठाढ़ होइगे। पहिला पहिली लाइन सुनाइस फिर आगे आगे तिनहू ---

"मन्न s मन्न s चर s खा s s मन्ना s s य।"
"तेली क s बै s s ल खली s s भुस्का s s य।"
"च s ले जा s रहे s तर Ѕ कश s बन्ध s s।"
"रा s s जा s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

राजकवी सुनिन तो मूड़ थाम लीन्ह। आज परिगा महा मूढन ते पाला। मुला धारा नगरी के निवासी परदेसिन का आदर कैसे ना करैं। थ्वारी देर चुप्पे रहे, फिर तारीफ़ करै लाग - 'बाह का कविता आय। ऐसि रचना तो कहूँ नहीं सुना। रस ते भरी, सरल प्रवाह। ----------- बस तनुकै कसर रहि गै। 

चरहू जन याकै सुर मा बोले - 'अरे भाई कहाँ रहि गै ? अरे भाई कहाँ रहि गै ?'

राजकवी बोले - द्याखौ बताय तो दयाब मुला शर्त यू रही कि राजा के हिंया सखरयौ नहीं कि को बतावा है। 

वै एक सुर मा तुरतै बोले - अरे भाई ! तुम निशा खातिर रहौ। हम आन अवधी - 'रघुकुल रीति सदा चलि आयी, प्रान जाएं पर वचन न जाई।'

राजकवी सुझाइन - थ्वारा बदल डारौ - "रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" की जगह ब्वलौ - "रा s s जा s s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।"

चौथा आदमी रटतै-रटत चला - "रा s s जा s s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।" "रा s s जा s s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।"

राजा के दरबार मा जुटे रहे देश दुनिया क्यार गुनी-धनी। चरहूं जन आदर सहित आसन पर सिधराए गए। काव्य पाठ चलने लगे। वहै क्रम मा उनहुन का नम्बर आवा। वै झट्ट तेने अटेंशन खड़े होइगे। सब साथै मिल के याकु याकु पाँति पढ़िन - 

"मन्न s मन्न s चर s खा s s मन्ना s s य।" "तेली क s बै s s ल खली s s भुस्का s s य।" "च s ले जा s रहे s तर s कश s बन्ध s s।" "रा s s जा s भो s s ज हैं सू s s रज चन्द s ।"

राजा भोज सुनिन तो मुस्कियावै लाग। इनाम बांटै वाले ते कहिन पहिले तीन जन का याकु याकु अशरफी दीन जाय औ चौथे जान का चार चार क्वाडा (कोड़ा) मारौ हनक हनक कै। तीन जान की गदेरिन पर याकु-याकु अशरफी धरी गयी। 

चौथे के समहे आवा मोट क्यार करिया भुजंग जल्लाद तेल मा बुड़ावा कवाड़ा थामे तो ओहिका करेजा बइठै लाग। लाग अलअलाय - 'दुहाई सरकार की। यहु कउने जुरूम की सजा सुनायौ माई बाप ! बड़ा नाम सुने रहेन धारा नगरी क्यार। मुला हिंया तो सब उल्टै पलट निकरि गवा। कहाँ तो इनाम इकराम मिलै क रहा औ कहाँ यू सांप अस क्वाड़ा ?'

राजा भोज बड़ा भारी विद्वान रहा। सुनतै समझ गवा, तीन पाँति तो यहै सब मूढ़ रचिन आय। मुला चौथी कोऊ दूसर सुझाइस है। सो चौथे वाले का दरपावै के लिहे क्वाड़ा वाली सजा सुनाए दिहिन। 

अब मार के आगे तो भूतौ भागै, आखिर बेचरऊ छठे जन सखर लीन्ह - 'दुहाई सरकार की। हम तो दूसर बनाये रहेन। राह मा याकै मूढ़ मिलि गवा, ससुर सब उलट पलट कराए दीन्हिस। जौन हम बनाए रहेन वेहिका सुनौ। फिर उसने पूरे सुर में अलापा - 

"रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।"
"रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

दरबार सहम गया लेकिन राजा भोज जीउ खोल कर ठठाए। फिर, इनामी देने वाले से चौथे जान को भी एक अशर्फी दिलवाई। 

चौथे जान ब्वाले - 'हम पहलहे कहत रहेन, राह मा बहुत बड़ा मूरख टकराए गवा रहै।' 

कहानी खत्म होते ही अभय और दूबे सहित सबने कुँवर साहब की किस्सागोई का जयकारा लगाया और देर तक बात बात में चलता रहा वही जुमला - "रा s s जा s s भो s s ज हैं मू s s सर चन्द s ।" 

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५२


कुँवर साहब की क्लास 



कुँवर साहब

इधर हम जंगल पहाड़ की धूल फांकते, खोह-कंदरा-किला झांकते, सोता इनरा से प्यास बुझाते, आज यहां कल वहाँ, रापटगंज इलाके में डोलते रहे, और उधर, रॉबर्ट्सगंज वाले अर्जुन दास केसरी अपने लखनऊ प्रवास के दौरान एक दिन 'अमृत और विष', 'सबहिं नचावत राम गोसाईं' जैसे कालजयी उपन्यासों के रचयिता पण्डित अमृतलाल नागर से मिलने पहुंचे। नागर जी ने उन्हें देखते ही सूत्रवत सवाल किया - 'केसरी जी ! आपके वन में हमारा भी एक शेर घूम रहा है, आपकी मुलाक़ात हुई उससे ?' पहले तो केसरी जी कुछौ बूझे नहीं और जब नागर जी ने हमारे बारे में विस्तार से बताया तो लौटते ही उन्होंने हमारे कैम्प का रुख किया। हमारे वहाँ ना मिलने पर कुँवर से मिल कर खैर-खबर बूझते अपने विद्यालय आने का न्यौता दे गए। 

सोमा सथारी से लौटने पर कुंवर से राय बात कर के केसरी जी से कुछ नयी जानकारी पाने के इरादे से उनके विद्यालय पहुंचे लेकिन वहाँ हमारे लिए दूसरा ही अचरज सामने आया। विद्यालय के सारे दरजे मुलतवी कर के सगरे बच्चों को बटोर हमें उनके बीच बोलने के लिए खड़ा कर दिया गया। माज़रा समझते ही दाएं-बाएं झाँक अपन राम ने यह भार कुँवर के काँधे सरका दी। 

जमीन पर बैठाए गए बच्चे रह-रह कर चहकते। कोई फुसफुसा कर बोलता तो कोई मन्द मन्द मुस्कियाता। गुरुजनों के आँखें तरेरते ही सब सहम कर शान्त और नज़र हटाते ही फिर वैसी ही लहर। केसरी जी बोलने खड़े हुए तो सब उनकी बात सुनने सजग हो गए -
'बच्चों ! ये जो आज यहां हमारे बीच पधारे हैं ये महीनों से हमारे गांवों, जंगलों, पहाड़ों में घूम-घूम कर मंदिल, मूरत, किलों और खोह में लेख- लेखी जैसी जानकारियां जुटा रहे हैं। ओही के बारे में बोलिहन। तोहन सब देखले हउवा ना ऊ कुलि ?'

बच्चे उचक उझक कर बोलने लगे - 'हाँ गुरु जी। हाँ गुरु जी। बिजयगढ़, अगोरी -- कुल देखले हई हमन। गाँव के लग्गे खोहन में छापा लेखा - - हरिणा, साम्भर, मनई ----- हाथी घोड़ा। ' 

फूलों की माला पहन कुँवर फूले नहीं समाए। सबसे पहले उन्होंने संस्मरण सुनाया 'कण्डाकोट पर कण्डा होए गेन'। 

बच्चे हंस-हंस कर दोहरे हो गए। कुँवर के कहने का लहजा ही कुछ ऐसा कि हंसना रोना अपने बस में ना रह जाए। थोड़ा ठहर कर फिर बोले तो बोल- भाव एकदम गम्भीर और नपे-तुले माले में पिरोये हुए -
'आदरणीय केसरी जी ! आज मैं पुरातत्व नहीं वरन चार महीने में यहाँ के वनवासियों के जीवन के बारे में देखे सुने और समझे को अपनी समझ के हिसाब से समझाने का यत्न करूँगा। 

वनवासियों का जीवन प्रकृति से संतुलित रहा। वन-पर्वत से बाहर निकलने की ज़रुरत नहीं। भोजन के लिए वन्य फल, शहद, पशु-पक्षी-मछली, दूध सहज सुलभ। जल और जलावन की कमी नहीं। आवास बनाने के सब साधन, नदी किनारे या ताल की माटी गोबर और खर के साथ गूंथ कर तह पर तह जमाते दीवार उठायी, छत छाने को विजयशाल की मज़बूत धरन पर बांस की खपच्चियों के बीच करीने से बंधी लम्बी घास या पतावर लगा दी। या फिर बाँस-बल्ली की झोंपड़ी उठा कर बाहर से माटी से लीप ली। फर्श माटी कुटी, ऊपर से गोबर की लिपाई, साफ़ सफाई। गेरू-चूना से बाहर भीतर की दीवारों पर अल्पना या हाथ का छापा, शुभ कारक चित्रण - हाथी-घोड़ा-पालकी, पशु-पक्षी। 

खैर, बाँस, लाख, वन्य फलों के बदले नमक, अनाज, कपड़ा, तेल, धातु के बर्तन, लोहे की टांगी और अनी आदि सामान पास के बाज़ार से आते। माथा तपे, पेट ऐंठे या कोई और बीमारी सबकी एक दवा सलई का लासा पानी में उबाल कर पिला दिया, रोग-ब्याधि उल्टे पाँव भागे। बचपन में गोदना गोदवाए दिया, चेचक-पेचक जीवन भर के लिए दूर। जाने कितना ऐसा ज्ञान इनके पास छुपा होई पता नहीं। जाने कितना इनके पुरनिया जानत होइहैं, जाने कितना पिछले पुरनियों साथ चला गवा।' 

'पूरा गाँव एक परिवार और एक मुखिया। मुखिया अहेर की योजना बनाता आगे आगे रहता। अपराध वैसे तो होते नहीं और हो ही गए तो मुखिया सुलझाते, सजा देते। सारी समस्याओं का साझा मुकाबला। भीत उठाने से छप्पर छाने, अहेर और बनाने-खाने, मरने-जीने तक। 

वन-विद्यालय उनके खुले विश्व विद्यालय, प्राकृतिक विषमताएं और परिवार उनके अध्यापक। शहद उतारना, टांगी चलाना, गोरु चराना, पटेवा उठाना जैसे पाठ जनम धरते ही घूंटी के साथ मिलने लगतीं, जवान होते-होते सब बिद्या-डिग्री हासिल। धरती पर पड़ा पंजों का छापा बाघ का है या तेनुआ-भाल का, कौन सी लकड़ी जलावन और कौन सी कुंवा बाँधने के काम की, कौन सा बांस तीर-कमान-बँहगर-गोजी-चटाई-झबिया, कब फलेगा पियार, फूलेगा टेसू, चुएगा महुआ आपो-आप सीख जाते। खैर के गाछ से कैसे निकलता है कत्था खरवारों का हर एक बच्चा जान लेता। कैसे गलता है लोहा अगरियों का कुनबा सीखता- सिखाता। जवानी की देहरी लांघते-लांघते वन्य जीवन के तौर तरीके, रसम-रिवाज सीख समझ और गुन लेता। 

सजने सँवरने के लिए सर-माथे और कमर पर मयूर और दूसरे परिन्दों के रंग-बिरंगे पंख और मौसमी पुष्प, बघ-दन्त -अस्थियों-रंगीले पत्थरों की माला और बाजूबन्ध। 

तमान देवता-देवी लाखन राजा, गंवहेर माई, घाट पर, पहाड़ पर, वन में, बिरवा तरे, जगह जगह, घेंटा-मुर्गा और महुआ का प्रसाद। ऋतुओं के आने जाने पर उत्सव, धूम-धमाका, मेला। उत्साह के तरंग से भरपूर वनवासी, खच्चर पर सामान लादे साव, मिट्टी के बर्तन लिए कुम्हार, टांगी-अनी लिए अगरिया, कपड़ा लिए पनिका, सब जुटते। कोई बाँकी कोलिन सांवरे कोल से शर्त लगाती तुम बजाओ विजयशाल औ मैं नाचूँ, देखें कौन जीतता है ? कोई बांका कोल किसी कजरारी आँखों वाली कोलिन को थाम लेता - तुम नाचो मैं बजाऊंगा, देखें कौन जीतेगा ? कोल बजाता, कोलिन नाचती गाती। ढोल के बोल ऊंचे बढ़ते, कोलिन के पांवों में बिजली भर जाती। ढोल के थाप नहीं थमते - गहा-गड्ड गहा-गड्ड गहा-गड्ड, कोलिन के पांवों में खून छलक आता, नाचते नाचते ढह जाती। दुसरे जोड़ में कोलिन के पाँव नहीं थमते कोल थक जाता, हार कर रुक जाता। जो हारता दूसरे के साथ जाता। कोलिन हारी तो कोल के साथ गयी, कोल हारा तो कोलिन के गाँव चला। 


2
बड़े भाव से सुन रहे गुरुजनों में से कुछ ने एक पैर दूसरे पर रख कर आसन बदले और कुछ बच्चों ने खिसक कर जगह बदल ली। 

कुँवर कुछ छन थम कर और अधिक गंभीर गरू स्वरों में आगे बोलते गए -

‘दिन निकलते घर की सफाई-लिपाई जिसकी जैसी जरूरत हुई करते खपते। वन में उतर गए, दिन भर अमराइयों, बँसवरियों, हरियाले कुञ्जों, सघन वनों में खिलखिलाते झरते झरनों, गम्भीर गहरे जल-कूड़ों-सोतों के आस-पास मुरली के मधुर बोलों, सुरीले सुरों, भाव भरे गीतों की कड़िया लहराती रहतीं, लौटते तो सुअर-साम्भर, तीतर-बटेर-बन मुर्गी बींध कर और सूखी लकड़ियों के गट्ठर बँहगर पर ले आते। शाम ढलते विजयशाल ठनकने और मादल थमकने लगते, ढोल, ढोलक, डिगारी, ढपला, डनकहर, पैंजर, घुंघुरू, टिमकी, ठिसकी, तम्बूरा, चिकारा, बांसुरी, अलगोजा, सिंगी, ढफ जाने कैसे कैसे वाद्यों की सम पर हलक में महुआ उतारते महुए जैसे गदराए युवाओं के साथ बड़े बूढ़े सब छलकने थिरकने लगते।' 

'तनिक सोच कर देखिए, आखिर हम इस जीवन में पाना क्या चाहते हैं ? केवल और केवल मन की शान्ति। और उस कसौटी पर कसें तो हमारी सभ्यता से उसका फासला बहुत अधिक, लेकिन वनवासी सभ्यता में भरपूर दिखेगा। फिर भी बाहर के लोग उन्हें सभ्य बनाने के फेर में लगे हैं। कैसा उल्टा खेल चल रहा है, एक असंतुष्ट, असभ्य व्यवस्था परम संतुष्ट वनवासियों को सभ्य बनाने चली है।

आप लोगन से आज हमका इत्तै कहेक रहा। धन्यवाद।'

कुँवर की वाँणी पर विराम लगने के बाद कुछ देर पूरा माहौल, गुरुजन और बालक शान्त रहे, फिर, पूरा परिसर तालियों की तड़तड़ाहट से गूँज उठा।
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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५१

चिचली-पनौरा
सोमा-सथारी इलाके के वनवासियों के लिए बस अपना गाँव, अपना जंगल, खेत-चरागाह और घाट। इतनी ही है उनकी दुनिया। अगले जंगल घाट की राह बूछते ही कहते - 'ओहर गइल नहिनीं।' रापटगंज की कौन कहे रामगढ़-पन्नूगंज की बाज़ार भी किसी किसी ने ही देखने का दावा किया। स्वाभाव उनका चिरौंजी जैसा चिरमिरा और पानी जैसा आर पार दीखता धवल। गाँव की बसावट में वनवासी, अहीर, दलित और वणिक। कुछ गोरबहा मौके बेमौके कभी कभार चले जाते हैं उधर रामगढ़ की बाज़ार तक और उधर सोन पार खरौंधी तक। 

चोरी डकैती का डर हर ओर दिखा। गाय गोरु, अनाज, बर्तन भांडे, अनाज और लुग्गा-लत्ता जो भी हाथ लगा ले उड़े। खोहों और प्रपातों का पता पूछना भी मुसीबत - 'उहाँ कहाँ जाब्या साहब ! ---------- चिरौवा मान में, चौरा वाली मान में ???? कुलि मानन में डकैत डेरा डलले हउवन।'

स्कूली मास्टर साहब बताने लगे - 'इस दुर्गम इलाके में खेती लायक जमीन है ही कितनी। लोग बड़ी तादाद में पशु पालन और वन्य उपज के सहारे किसी तरह जी लेते हैं। आम, आम की गुठली के आंटे, बजड़े, सिलफर, महुआ, आंवला, बैर, कन्द मूल, साथ में दूध दही अहीरों और बनियों के लिए। बाकिया के लिए एक समय का लंघन। ऊपर से इस बरस का सूखा, महुआ भी नहीं फूला। लोग भेला, गूलर, बढ़, गैरी, सेंवार, चकवड़, जो मिले खा कर बीमार पड़ रहे हैं, बौरा (पगला) रहे हैं लेकिन पेट की आग नहीं बुझ रही। सोता-इनरा सूख चले हैं। ऐसे में चोरी-चकारी का बोलबाला तो होना ही है। पुलिस को क्या पड़ी जो इस उजाड़ में मूड़ी खपाएं। कोई सिरफिरा दरोगा आ भी गया तो अपराधी जंगल में या बिहार की सरहद के उस पार।'

रास्ता दिखाने के लिए साथ चलने को कोई तैयार नहीं होता। वे सोचते - कहीं ऐसा न हो कि पकड़ ले जा कर फिरौती मांगने लगें। कहीं पुलिस वाले तो नहीं, चोर हेरने निकले हों, मान में जाएं तो गोली चल जाए।
किसी तरह एक स्कूली लड़का और मास्टर जी चलने को राज़ी हुए। वे आगे आगे चले। चढ़ाई उतराई पार हो गयी, समतल ज़मीन वाला वन आया, धरा पर सटी पड़ी पतावर जैसी लम्बी लम्बी पीली सूखी घास मिलने लगी। वहीँ दिखे प्राचीन प्रस्तर देवालय के गिरे पड़े वास्तु खण्ड। हम सोचने लगे - ओह तो शिव भक्तों ने लगभग एक हज़ार बरस पहले यहां भी मन्दिर बनवाया। प्राचीन काल से ही कंठा पहाड़ के ऊपर ही ऊपर विजयगढ़ से रोहतास गढ़ तक कोई रास्ता जाता था क्या ? 

कई कई चित्रित और चित्रणहीं खोहों के बीच से निकल कर सूखी धारा के पाट के साथ बढ़ते सूखे प्रपात की कगार पर जा खड़े हुए। सामने सोन पार के कोन का इलाका, उसके पूरब पण्डा नदी की पतली धारा, उसके दक्षिण पूरब में खुरधन पहाड़, कइरई, खरौंधी-खोण्डहर। नीचे की घाटी में हवा के झकोरों के साथ रगड़ खाते सूखे बांस से उपजी आग से तड़क तड़क कर जलता जंगल सामने दिखा। ताप का लौका हम तक आने लगा तो दूसरी चट्टान की आड़ में सरक लिए। 

कगार पर ही पश्चिम बढ़ते एक तिकोने कटान के बीच बचे कुण्ड के पानी से हट कर पास की चट्टानों पर पंद्रह-बीस बैगा बस बंहटी लगाए पसरे मिले। उनके हिलते डुलते सुते हुए सांवले शरीर की पेशियाँ छलकी पड़तीं। सबके बगल में एक एक टांगी। 

मास्टर जी से पता चले कुण्ड के कई नाम - 'सीता कुण्ड', 'अहिर मरवा', 'बाघ मरवा'। इसका पानी और पास की खोह में बने गेरुआ रंग कभी नहीं चूकते। चित्रों में आज तक वनवासियों के हिलोरा मारते करमा नृत्य की तरह हाथ में हाथ थाम कर नाचते दर्शक। और दूसरा बहुत ही भाव भरा मृगया-दृश्य - मृग के वक्ष में गहरे धंसा सामने से एक धनुर्धारी की कमान से चला तीर, आहत मृग का पीड़ा से पीछे मुंह घुमा कर कातर आँखों से ताकना, क्या ही जीवंत चित्रण। 

वनवासियों का विश्वास है - 'सीता जी बियाहे के बाद एक रात एही माने में रहलीं। तब्बै इहां कोहबरे में ई कुलि हरना-हरनी लेखइलैं। तब्बै से एकर नाव सीता कुण्ड धराइल।'

एक समय एक बलवान अहीर यहीं टांगी से एक ठे बाघ मरलस एही से एके कहल गइल 'अहिर मरवा'। ओकरे बाद एक ठे बाघ कइयौ अहिरन के भख लेहलस तो 'बघ मरवा' नाम चला।

कुण्ड नियराते ही वनवासी बालक ने नीचे की गीली माटी तजबीजते हुए आगाह किया - 'तेनुआ पानी पी के गइल हौ, अबहिनै। '

अभय ने पूछा - 'तोहके कइसे देखाइल, हमन के तो देखाइल नहिनी। '

वह बोला - 'माटी पर ओकरे पंजा के चिन्हारी देखा।'

पल भर को हमारी प्यास उड़ गयी। हम लोग उन निशानों को ध्यान से देखने लगे। 

आस-पास भालू तेंदुआ बाघ टहलने की बातें सुन कर सोचने लगे जब आज यह हाल है इन वनों का तो १९६० के दशक में जब गुरु जी इधर आए होंगे तब कैसा माहौल रहा होगा। 

लेकिन अभय मौज में आ गए - 

'कहाँ गइले रे। अरे ऐ तेनुआ - s - s - मनुआ - s - s - s '

बालक गंभीर हो गया - 'साहब गरियावैं जिन। एहीं कहीं पथला के पीछे ढुकल होई। सच्चौ चलि आई।'
अभय प्यास के मारे जंगली चौपाए की तरह कुण्ड में मुंह सटा कर सड़प सड़प पानी सुड़कने लगे। बालक हंस पड़ा -
 
'साहब तो ऐन्ड्रोक्लीज हो गईलें। '

स्कूल मास्टर 'ऐन्ड्रोक्लीज़' का नाम सुनते ही उखड़ गए - 

'ई सरवे अंग्रेज़वे बहुतै चतुर रहे। अइसन बीज बोवलैं कि आजु लैं फलत बा। रेंगा-रेंगी मालवीय जे के जानैं ना जानैं एंड्रोक्लीज़ के जरुरै जनिहन। सोचै लें सगरे अँगरेज़ मरद वइसने पंजा तोड़ होइहन। एन्हन के ई काहे नाहीं पढ़वतैं कि मालवीय जी कै एक ठे अंगरक्षक रहा 'बेचू बीर', निरल्ले हाथे बाघे से लड़ल रहा। '
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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ५०




रॉयल इन फील्ड
गिने चुने दिन ही रह गए इस अभियान के पूरा होने में लेकिन रापटगंज के पूरब पन्नूगंज के आगे सोमा सथारी के वनों और रापटगंज के पश्चिम में घोरावल के आगे के मुक्खा दरी की खोहों वाले बहुत बार सुने इलाकों के तक जाने का मौक़ा तलाशते ही रह गए। अभय ने सुना तो अपने से आगे आए - 

'हमरे रहतै एकर चिन्ता जिन करत जा, दुइऎ दिना में ना देखाय देहली तो कुल बेकार। जउन कहा तउन हार जाई।'

'बुलेट मोटर साईकिल' से बढ़ कर 'रॉयल इन फील्ड' भला दूसरी कोई सवारी क्या होगी। धुक-धुक दग-दग धुक-धुक दग-दग करती चल पड़ी पहले घोरावल की ओर आगे मड़िहान जाने वाली रोड से बाएं घूम कर नौगवां, मधका, फुलवारी होते हुए करसोता के तालाब में कमल के फूल देखते बसही के वन में होते हुए मुक्खा फाल के ए बल्ले जा सटी। 

एक पेड़ की छाया में मोटर साइकिल खड़ी कर के हम बेलन नदी के चौड़े सपाट चट्टानी पाट के बहाव के उस पार के मन्दिर के साथ नीचे उतर कर नीचे गिर रही धारा के दह तक जा पहुंचे। कुछ युवा उसमें छलांग लगाते तैरते दिखे। वहाँ से कटान के आरी आरी बाएं बाज़ू बढ़ते आगे आगे एक खोह के नीचे ठहर कर अभय ऊपर दिखलाते हुए वहीँ बैठ गए -
'ला आ गइल तोहार हाथी घोड़ा पालकी। देखत जा जियरा जुड़ाय जाई।'
वहाँ चित्रित दिखे सूंढ़ उठाए बढ़ते हाथी, अगले के पैर में धंसा तीर, दूसरे के नीचे पटकाया एक आखेटक। नर्तक, पशु, बड़ी बड़ी मछलियाँ, हिरन और अनेक अचीन्ही आकृतियाँ।



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दिव्य प्राकृतिक अंचल में एक दिलकश ख़ित्ता। जाड़ा गरमी बरसात बरहों मास लगा रहता है यहाँ सैलानियों का रेला। राबर्ट्सगंज के आस पास का यह सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। 

वहाँ से निकले तो फिर चली बुलेट उसी शान से धुक-धुक दग-दग धुक-धुक दग-दग। 

राबर्ट्सगंज से धुर पश्चिम तकरीबन सैतालिस किलोमीटर की दूरी तय कर के जैसे आए थे वैसे ही लौट गए वहाँ तक लेकिन रुके नहीं। आगे लगभग उतनी ही दूरी पर स्थित सोमा सथारी के निशाने पर पूरबमुख बढ़ते गए - धुक-धुक दग-दग धुक-धुक दग-दग । 

पन्नूगंज तक चले पक्की सड़क पर, फिर, उतर गए दक्खिन-पूरब में जंगल पहाड़ के बीच से निकलती फारेस्ट-रोड पर। यही एक रास्ता है बाहरी दुनिया जुड़ने का लेकिन वर्षा-काल में इसका भी सहारा नहीं रहता। लम्बी लम्बी घास, गझिन गाछों और रमणीय भू भाग गुजरते साँझ घिरते सोमा सथारी के जंगल के ठेकेदारों के डेरे में उतरे।
 

Soma
१९६० के प्रारम्भ में इस इलाके के जंगल पहाड़ खंगालने वाले बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के पुराविदों में शामिल गुरु जी से एम ए की पढ़ाई करते समय ही सुने यहाँ के बड़ैला-खोड़ैला की खोहों और चिचली-पनौरा और सोहदाग के वनों के किस्से मेरे जेहन में घूमने लगे। किसी खोह में हलने से पहले दूर से ही उसमें पत्थर फेंक कर यह जांच लेने का गुर की उसमें भालू तेंदुआ तो नहीं जमे हैं उन्ही गुरु जी से सुन कर उसी समय गंठिया लिया था जो इस अभियान में जगह जगह बड़ा काम आया।

गाँव वाले बताने लगे जंगल से चोरी से निकलने वाले लकड़ी के ट्रकों के बारे में। कहने लगे कई रास्ते हैं इनके, नगवां-अहिरौरा और बिहार हो कर। चालक बड़े चालाक और सधे हुए जंगल के एक एक रास्ते से बखूबी वाकिफ। रात के अँधेरे में भी ये गए वो गए। 

हमारे सामने खड़े कटे लक्कडों से ऊपर तक खचाखच लदे ट्रकों के पास खाने-पीने में लगे मुसुक-बल्ला और लम्बी-चौड़ी कद-काठी वाले मुच्छड़ चालक और फरसा भाला वाले ठेकेदार के कारिंदे कुदरत पर डाका डालने वाले डाकुओं जैसे लगे। दुबला पतला लौन्डहा फॉरेस्टर भी उन्ही की चौपाल में दुबका इन्ही का खाता इन्ही के गुन गाता दिखा। लोगों ने बताया - कभी कभार पन्नूगंज के दरोगा जी और जंगलात महकमे के अफसरानों का इधर का रौंद (राउण्ड) लगने पर इनका सीना और फ़ैल जाता है। इनके पानी-पत्ते का इन्तिजाम भी यही लोग कराते हैं। 

हम भी उन्ही से खाना पानी पाकर उनसे मिली खटिया-बिस्तर पर लम्बे हो लिए।
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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४९

भूतों का डेरा
मऊ कलां गाँव के आगे जाने-पहचाने पैंड़ा पर पग धरते रेंगते हुए विजयगढ़ किले के पीछे वाली सीधी ऊंची पैड़ियाँ चढ़ कर खिड़की वाली कोठरी में डेरा डाला।
अगले दिन पिटठू पटेवा उठा कर अगले पैदल अभियान पर निकलते देख अभय ने आराम से लेटे लेटे अनमने भाव से तंज कसा -
'का हो तोहन सब फिन चल देहला उहै चील बिलउआ हेरै। तोहनै सब जात जा, आज तो हम तान के सुत्तब।'
दूबे जी के दिशा निर्देशन में हम सब टहल लिए खिड़की के दक्खिन, सीधे सीध चलते आगे घूमे दाएं हाथ, कुछ दूर और चल कर फिर सीधे बाजू घूमे और पहुँच गए पोर्टिको जैसी मान (शैलाश्रय) में। इसकी भीतरी सतह पर निरूपित हिरनों को देख इसका नाम धराया गया हरना-हरनी। आगे चल कर यही नाम पुराविदों ने आगे छपने वाले दस्तावेज़ों में दर्ज़ करा दिया। बहुत दिनों से इसका नाम सुनते रहे, आखिर इस मिथकीय खोह के दर्शन भी पा लेने का नयन- सुख लूटते संतोष-धन बटोरते रहे।
वहीँ मिले एक वनवासी से पास ही स्थित गोहमनवा का बखान सुन कर उसके साथ साथ उधर का रुख किया। जिधर से आये थे थोड़ी दूर उसी ओर चलते हुए फिर दक्खिन की ओर उतर कर थोड़ा चढ़े और एक और खोह तक पहुँच गए। इसमें गेरुए रंग से चित्रित बड़ी सी गोह देखते ही इसके नाम का मूल सहज ही समझ में आ गया।
गोहमनवा

उसी वनवासी से पल्हारी गाँव के आगे दक्खिन-पूरब में कुछ और खोहों के होने का सुराग मिला। गोहमनवा से निकल कर गाँव की दिशा में चलते जब खेत दिखने लगे तो उनके बीच से आगे बढ़ने का पैंड़ा दिखला कर वह अपने गाँव की ओर चला गया।
खेतों के बीच से निकल कर पथरीली पहाड़ी सतह पर कदम धरते आगे बढ़ कर बाएं बाजू उतरते ही हम जिस खोह के सामने आए उसकी छतरी अपने आप में अनोखी और अकेली निकली। नाम भी अकेला और अनोखा - भुतहिया मान / मतहवा मान। भुतहिया मायने भूतों का डेरा तो तुरत समझ गए लेकिन मतहवा का मतलब पकड़ में नहीं आया।
भुतहिया मान / मतहवा मान

और सब तो जहाँ जगह मिली वहीँ पसर गए, राम करन घूम घूम कर मुआयना करते लाइव कमेंट्री देने लगे -
'यहु द्याखौ हिंयौ वहै गैंडा, हरिणा, नील गाय क्यार शिकार। घेरा बनाए हाथ उठाए नाचत लोग। मुड़े पर सींग सजाए हाथ मा लाम्बे लाम्बे भाला लिहे, कमर मा लबादा बांधे हथियारबंद। बाँधा भवा साम्भर, दुनों हाथ मा याकु याकु थैला संभाले एक अदमी। मान क्यार भीतरी छत की सतह पर जमीन तेने एत्ती ऊँचाई पर इनका बनाइन कैसे ? नीचे तेने तो हुंआ तक पहुँच नहीं सकत कोई। या तो बीच बीच मा कौनौ और पथरा रहा होइ जॉन अब गिरि गा या फिर होय ना होय कउनौ मचान बाँधिन होइहै हुँवा तक पहुँच के रंगै के लिहे।'
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रामकरन का ब्योरा सुन कर हम सब की जिज्ञासा जाग गयी। मान की ऊंचाई और उसकी भीतरी साफ़ सुथरी सपाट सतह पर अंकित चित्रों को देख उनकी बात में पूरा दम दिखा।
गैंडे के पीछे से हारपून जैसा भाला मारने को उद्धत दौड़ते उड़ते हुए से लगते आखेटक। एक बहुत लंबा हारपून। बड़े से हिरन या नील गाय की पीठ पर चढ़ कर, हवा में लहराते केशों से सज्जित, दोनों हाथ से उस पर भाले का भरपूर वार करता आखेटक। उस दृश्य के नीचे चकरिया बना कर नाचते नर्तकों के नीचे बड़े बड़े मत्स्य। गेरुए रंग से सलीके से निरूपित।
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नीचे की आसानी से पहुँच वाली सतहों पर भी अनेकानेक चित्रण, एक के ऊपर एक। एक किनारे बगुलों का समूह, उनसे अलग धवल किनारी के बीच गेरुआ रंग भर कर चित्रित किए गए हिरन, वन्य वराह, मगर, हाथ उठाए एक और बढ़ते चौड़ी काठी में दर्शाए गए मरद-औरत का जोड़ा, एक समूह में भागते महिष की पीठ में धंसा पीछे से चलाए गए तीन शिखाओं वाले आखेटक की कमान का तीर, हिरनों के एक समूह में एक हिरण की पूंछ थामे दूसरे आखेटक की परिंदों के परों से सजी सिरोभूषा देखने काबिल।
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हाथ के छापों की बनावट भी अनोखी। सतह पर हथेली धर कर उसके किनारे किनारे रंग भरी कूची फेरते गए बस हो गए छापे तैयार।
दूसरी तरह के छापे बनाने के लिए कलाई के पीछे तक का हाथ सतह पर रख कर ऊपर से रंग में डूबी कूची से स्प्रे कर दिया, नीचे हथेली सहित लंबा हाथ छप गया। इन छापों को देख कर याद आ गए लाइब्रेरी की एक किताब में देखे मुंह में रंग भर कर हाथों पर स्प्रे कर के बनाए जाने वाले अफ्रीका की 'रॉक पेंटिंग्स' के हाथ के छापे।
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इस मान की बनावट और वहाँ के चित्रों की खोज से ऐसा अघाए कि मतहवा पहाड़ के बकिया की खोहों और उनके चित्रों, और बगल की मुरैला पहाड़ी की खोहों के निरूपण देखने में मन नहीं लगा। जेहन में मंडराती रही बस और बस भूतों की डेरा वाली वह अदभुद मान। जितना डरावना नाम उतने ही सुन्दर और आकर्षक वहां के चित्र।
विजयगढ़ के डेरे पर पहुँचते तक शाम ढलने लगी। दिन भर की खोजों का सिजरा लिखते सहेजते अन्धेरा घिर आया। उसके बाद भी हमारे बीच चरचा चलने लगी भुतहिया मान की ही। आज साथ ना जाने और वह सब ना देख पाने के मलाल से अब तक अभय रह रह कर खुंसियाने लगे। हमारी बातें सुनते सुनते पक गए तो थोड़े सबर के बाद परच कर फूट ही पड़े --
'बहुत हो गइल भुतहिया मतहवा सुनत सुनत। तोहन के उहै कुलि बतियावै के होय तो जात जा ओहीं भूतन के लग्गे। आज ओही सब खाना खियहियन तोहन सब के। नाहीं तो खाना तयार बा, चला हाथ मुंह धोय के खाय लेत जा, ओकरे बाद जइसन मन करै करत जइहा। '
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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४८

मेघा नाचैं पानी दें 

छोटे सक्सेना जी के पीछे लम्बी टोली आगे चली घोड़-मंगर की ऊपर वाली खोह देखने। दोनों बगल सीधी पहाड़ी कगार के बीच बढ़ गए पूरब मुख। आरी-आरी पहुँच गए दक्षिणी कोने से सीधे चढ़ते पैंड़ा तक। ऊपर चढ़ कर मिली दूसरी उथली घाटी, बाएं घूमे, कुछ कदम चल कर फिर चढ़े, फिर बाएं हाथ घूमे, थोड़ा ही चले और पहुँच गए उत्तर मुख खोह के सामने। सक्सेना जी के ठहरते ही सब वहीं थम गए।
'ला एक और ठिकाना आ गइल तोहन के माथा पच्ची बदे।' कह कर अभय सामने के पथला पर लोट गए। 


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खोह की अंदरुनी सतह पर चित्र ही चित्र, एक के ऊपर एक, परत दर परत। तीर-कमान संभाले पांच आखेटक एक ओर एक पाँति में बढ़ते भए। भालू के नीचे ऊपर अबूझ रेखांकन फिर पहचान में न आने वाले धुंधले चित्र। दोनों हाथ काँधे से ऊपर उठाए विशालकाय महामानव, हाथी, हरिणा, साम्भर, और तरह तरह के बहुत से चित्र। और भी बहुत कुछ लेकिन नर्तक समूहों ने हमारा ध्यान अरझा लिया।
जितनी आकृतियाँ सब नृत्यलीन। सबसे दाएं तीन वयस्क नर्तकों के बीच तीन नन्हे नर्तक दोनों हाथ सिर तक उठाए, उनके हाथों कदाचिद् में तीर कमान।उनके बाएं हाथ उठाए बड़े एक दूसरे की ओर पीठ घुमाए घुटने मोड़ कर नाचते नर्तक। उनसे भी बाएं दोनों हाथ और लम्बे पैर छटक कर नाचते मेढक जैसी आकृति वाले नर्तक साथ एक मानव नर्तक। उनके नीचे हाथ में हाथ थाम कर नाचते चार मेढकों का दुर्लभ निरूपण। 


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शिलाचित्रों में नृत्य-दृश्यों का रूपांकन तो कोई अचरज की बात नहीं लगी लेकिन चर्चा चल पड़ी मेढकों को नाचते हुए दर्शाने के प्रयोजन पर। ऐसा दृश्यांकन तो कहीं और नहीं दिखा।
थोड़ी देर तक हमारी मगज मारी का मज़ा लेने के बाद पान-मसाला गुलगुला रहे अभय एक ओर पीक मार कर उठ कर हमारे पास खिसक आए। हमारी चर्चा के मुद्दे से वाकिफ हुए तो मुस्कुराते हुए आ गए बनारसी अंदाज़ में -
'तोहन सब रहि गइला शहरियै। ई सब खीसा कहानी हौ गाँव गिराव कै।
मेघ औ मेघा में बड़ा मेल हौ। मेघा (बादल) आवै पानी ले औ मेघा (मेढक) नाचैं पानी दें। 

एहर चौमासा आइल ओहर मेढकन कै टर्र-टर्र सुनाय लागल। कहल जा ला कुलि मिला अगवानी करै लें चौमासे में भरपूर वर्षा बदे। औ जो कउनौ बरस सूखा अकाल पड़ि जाय तो गाँव वाले वैसनै लगन करावैं ले मेढुकी-मेढक कै जैसे लइका लइकिन कै बियाह हो ला, पण्डित-पुजारी ओझा-सोखा के मन्तर-जन्तर बिधि-बिधान के साथे, गाँव भर जुटि आवै लें बियाहे में। बियाहे के बाद नाचै गावैं लें। औ ओकरे बाद मेढिकी-मेंढक के गाँव के पोखरा में सरकाय दिहल जा ला। मानल जा ला एकरे बाद अइसन धाराधार बरखा बरसी कि सब ताल तलइया अफनाय चलिहन।' 

रामकरन ने मेढकों के बारे में कहीं से सुनी एक दूसरी व्याख्या बतायी -
'ई के बारे मा हम एक अलग बात सुनेन है। असल मा नर मेढक टंगड़ी छटक के नाचत हैं मेढकी का रिझावै के लिहे। जो कोउ यहु चित्र बनाइस है ऊ इनका बन मा नाचत देखिस जरूर होइ। तबै तो बनाइस हिंया।'
यह सुन कर बाकी सब तो हंसने लगे लेकिन शेषमन ने रामकरन की बात की पक्की तसदीक की तो हमें मानना ही पड़ा। बातों बातों में हमारी जानकारी में दो सर्वथा नए अध्याय सहज ही जुड़ गए। पुरनियों ने सही ही कहा है - पोथी पढ़ै से जितना नहीं सीखा जाय सकत है ऊ से कहूँ ज्यादा सीखा जाय सकत है घूमै औ सुनै ते।
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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४७

घोड़-मंगर 

मऊ कलां गाँव के पश्चिम चल कर, विजयगढ़ किले के नीचे से आगे बढ़ने पर, घाटी के उतार पर आने वाली जलधार के साथ-साथ ऊपर चल कर घोड़े के मुंह जैसी पहाड़ी कटान के नीचे पहुंच गए ऊपर से गिरने वाली धारा से कटे एक दह तक। कभी इस दह और उसके आस पास लोटते तैरते मगरमच्छों की भरमार रहती। इसी बिना पर घोड़ा + मंगर जोड़ कर उस पहाड़ का नाम धराया - 'घोड़-मंगर'। पुराविदों में यह नाम जाना पहचाना गया ईस्वी सन में १८८३ में कॉकबर्न केे कलकत्ता की एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल में पहली बार प्रकाशित कराये गए गैंडे के आखेट के एक दृश्य के चलते। बरसों से सुनते पढ़ते रहे इस दृश्य पर चलती चर्चा के चलते अपनी आँखों इसका दर्शन पाने की कामना पूरने दह से आगे चेरूई गांव की डगर पर रेंग गए। 

घाटी से निकल कर चढ़ाई पर घूमे, पहले ही मोड़ पर बाँया पैंड़ा धर लिया, चलते गए उसी के साथ। पैंड़ा दो ऊंचे पत्थर के ढोंकों के बीच से गुजरते पहले ही वहां का चक्कर लगा आए सक्सेना जी ने वहीँ ठहर कर उनमें से ढाल जैसे पाथल की अंदरुनी सतह पर बने उस दृश्य की और संकेत करते हुए अंगुली उठाई तो चुपचाप देखते ही रहे। कितना संवेदनशील हो सकते हैं ऐसे पल इसका एहसास वही कर सकता है जिसने दसकों की आस कभी इतने अरसे और इतने श्रम के बाद उस उमर में पूरी हुई हो। 

हम अपने साथ लाए कॉकबर्न द्वारा तैयार और छपवाए गए इस दृश्य के रेखाचित्र और वहाँ रचित मूल चित्र से मिलान में लग गए। 

अभय ने अपने बेलौस विचार धरने में देर नहीं की - 

'एक ठे गैंडा के दस-दस मनई घेर कै मारत हउवैं। ओन्हन में से पाँच मिला भाला ओकरे ऊपर भाला तनले हउवैं। गैंडा के अगले गोड़े में, पीठ औ पिछाड़ी में कइऔ भाला पहिलवै से चोभल हैं। घायल गैंडा एतना गुस्सैल हौ कि एक मनई के अइसन सींग मरले हौ कि उप्पर हवा में फेंकाय गइल हौ। दू मिला हाथ उठवले दूरै से हू हू हल्ला मचवले हउवैं। बाह बाह ! का पेन्टिंग रचवले हउवैं एह बन-बियाबान में।'



ORIGINAL



LINE DRAWINGS

अभय के दस मनई कहते ही अपने साथ लाए रेखाचित्र से मिलान करते करते हमारा ध्यान भी उधर गया। उनकी बात की सच्चाई समझ में आते ही मेरा दिल बिल्लियों सा उछला ठीक उनके दिलों की तरह जिनका दिल दूसरों की कमियां हज़ार आँखों से देखने और हजार मुख से बयान करने के सुखरस में बल्लियों उछले। और ऐसा होता देखा गया है ख़ास तौर पर शोध करने वालों के साथ। उनकी राह और शाख प्रायः ऊंची चढ़ती है दूस्र्रे शोधकों की कमियों की नसेनी पर और अगर ऐसी खता हो जाए कॉकबर्न जैसे किसी मिथकीय दिग्गज से तब तो - 'दुनहू हाथ घिव मा, औ मूड़ कड़ाही मा '।
अभय के दस मनई कहते ही अपने साथ लाए रेखाचित्र से मिलान करते करते हमारा ध्यान भी उधर गया। उनकी बात की सच्चाई समझ में आते ही मेरा दिल बिल्लियों सा उछला ठीक उनके दिलों की तरह जिनका दिल दूसरों की कमियां हज़ार आँखों से देखने और हजार मुख से बयान करने के सुखरस में बल्लियों उछले। और ऐसा होता देखा गया है ख़ास तौर पर शोध करने वालों के साथ। उनकी राह और शाख प्रायः ऊंची चढ़ती है दूस्र्रे शोधकों की कमियों की नसेनी पर और अगर ऐसी खता हो जाए कॉकबर्न जैसे किसी मिथकीय दिग्गज से तब तो - 'दुनहू हाथ घिव मा मूड़ कड़ाही मा '।
आखेटकों के भालों के हारपून जैसे अग्रभाग की नोक और धार की सुगढ़ता को धातु से बना समझ कर कुछ पुराविदों ने इसे ताम्राश्म काल का मानते हुए कोई चार हज़ार बरस पुराना बताया और कुछ विद्वानों ने लकड़ी के हत्थों में पत्थर के फलक फंसा कर बनाया गया मान कर और अधिक पुराना आंकने का पक्ष रखा। मामला पण्डितों का हो तो 'मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना', खण्डन-मण्डन तो चलता ही रहेगा। लेकिन इतना तो निश्चित ही है कि गहरी किनारी के बीच हल्का गेरुआ रंग भर कर इस इलाके के वनवासी चित्रकारों द्वारा रचित इस कालजयी कलाकृति ने घोड़ मंगर पहाड़ की इस खोह को विश्व की प्राचीन कला-दीर्घाओं में विशिष्टतम स्थान दिला दिया है।
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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४६

भावों के नरम तंतु 

 

दो घूँट पानी हलक में उतरते-उतरते पूरब से आती रेल की रौशनी करीब आने लगी। प्लेटफॉर्म पर लगते ही झटपट सामने के डब्बे में कूद कर खिड़की के किनारे वाली आमने सामने की सीटें कब्जिया लीं। अलअला कर भीतर घुसी महिलाओं के रेले में चीख-पुकार मच गयी।  केहू क बहिनी प्लेटफॉर्म पर रह गयी तो केहू के माई  -

'ओ रे माई - s - s , एहर चलि आवा।  
ओ रे पर s सदिया s s कहवां मुआए गइले रे - s - s - s - s
नन्हकइया कहवाँ रहि गइल रे - s - s - s - s

गाड़ी चली तो धीरे धीरे डब्बे में शान्ति उतरती गई। जहाँ लोग एक भी जगह ना होने की बात कह कर लोगों को दूसरे डब्बों में जगह तलाशने की सलाह दे रहे थे वहीँ इतना रेला आसानी से समा गया।  

रह रह कर हमारी नज़रें गलियारे में खड़ी  वनवासी युवती की बड़ी बड़ी काली अमोली आँखों पर अटक जाती। नाक-नक्स गोल सुगढ़ लुनाई भरे, अधर भरे हुए पुष्ट।  सांवला रंग भी कितना सलोना हो सकता है उतना लुभावना।  

कुँवर मेरी ओर सरक कर फुसफुसाए - 'ईकी आँखैं  द्याखौ केत्ती सुन्दर आँय।'

'वहै तो हमहू  देखत रहन ' - मैंने भी वैसी ही दबी आवाज़ में जवाब दिया।    

देर तक खिड़की के बाहर अँधेरे में आँखें गड़ा कर भी कुछ नहीं देख पाया तो फिर घूम कर उसे देखने लगा।  उसके उदास चेहरे में ऐसा सम्मोहन कि नज़र हटाने का मन नहीं करता।  एक आध बार हमारी ओर निगाह फेर कर वह मानो बाहर के अँधेरे में कुछ टटोलती सी लगती।  

बाहर डब्बे की खिड़कियों से छनती रोशनी भागती सी लगती जिसमें उभरते आते जाते खम्भे, गाछ, पानी में चमकते आसमानी सितारे। 

अमिया की बीजुल जैसे उजले उसकी आँखों के कोए, काली पुतलियों पर झिलमिलाती पनीली परत। खिड़कियों से आती हवा के झकोरों में उड़ती बिखरी उलझी अलकें। मांग में ढेर सा सिन्दूर।  नम आँखों कोरों से ढुलक आए आंसू पर फिसल चले। बाहर के अँधेरे में  वह एकटक मौन ताकती रही। वह उस भरे-पूरे डब्बे में नहीं रही, अपने रेले में, हमारे सामने, इस दुनिया में, अपने आप में नहीं रही। समय मानो थम गया हो, एक हाथ से दरवाजा थामे मूर्तिवत खड़ी रही। आंसू अधर से टकरा कर टप टप टपकते रहे। उसने उन्हें पोंछा नहीं। आंसुओं से खारे हो चले मुंह के स्वाद का तो शायद एहसास तक नहीं रहा।उसके अन्तर्मन में उभर रहे बिम्ब केवल उसे ही दीखते रहे।  

कुँवर भावुक हो गए - 

'लागत हैं हमका देख के एहिका कहूँ दूर कमावै गवा अपना आदमी यादु आय गवा है।  सोचत होइहै यहू कमावै निकले हैं, वहौ इनकी ताईं कहूँ भटकत होई।'

वो क्या सोच रही होगी वही जाने लेकिन उसको देख कुँवर को निश्चय ही घरैतिन याद आने लगी।  

रेल से उतरते ही साथ छूट गया। खाली प्लेटफॉर्म पर दो-चार फुटकर सवारियां ही उतरीं। हम  कैम्प की ओर बढ़ चले।  चाँद निकल आने पर पोखरे का चमचमाता पानी, हलकी हवा के साथ  हिलती टहनियों वाले गाछ और ढाक के झाड़ साफ़ दीखने लगे।  

मुसाफिरी का सबसे दुखदायी पहलू है किसी से मिल कर जुड़ना फिर छूट कर अलग ही दिशा में बढ़ जाना।  पता नहीं वह युवती जाने कहाँ से आ कर जाने कहाँ जा रही थी, कौन कहाँ की रहने वाली, जाने क्यों रोई ? मानव मन के विचित्र विधान से हम उसके बारे में सोचने लगे।  कुछ समय पहले तक जिसकी सूरत भी न देखी हो उसके लिए इतनी संवेदना कहाँ से उपजी ? कुछ छण मानो शून्य में से प्रकट हो कर सर्वथा अपरचित जनों के प्रति भी सहसा कैसे कोमल भावों के नरम तंतुओं में पिरो देते हैं। 

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४५

बँसवारी की छाँह में 

कई दिनों से सक्तेशगढ़ देख आने को कुलबुला रहे कुँवर के साथ उस दिन हम रेल से वहाँ का एक और फेरा लगाने निकल गए। 

स्टेशन से किले तक के पैदल रास्ते ने  बढ़ते दिन के साथ बढ़ते पारे ने पसीने से तर कर दिया। किले का चक्कर लगाते सब ठीह ठिकाना दिखाते घुमाते दोपहर तक रही-सही कसर भी पूरी हो गयी। कुँवर का किला-प्रेम गरम कड़ाही में गिरे कपूर सा उड़ गया। थक कर सड़क किनारे की घनी बँसवारी की छाया में थम कर हलकी हलकी डोल रही हवा में पसीना सुखाते एक एक कर दोनों की आँख लग गयी।  

जागे तो सूरज दूसरी ओर उतरता दिखा। सुरसुराते पवन के बावरे हलोरे आते बँसवारी में अरझते बिखरते निकल जाते। उधर से गुजरता एक वनवासी युवक भी हमारे साथ आ बैठा। बातों बातों में बँसवारी की बतकही चली और वह युवक भी बातों में शामिल हुआ तब पता चली अपनी संस्कृति में उसकी गहरी पैठ। वनवासी जीवन में बाँस की महिमा के बारे में उसने जिस विस्तार और अंदाज़ में बताया उसका उसी बोली बानी लहजे में बस वही बता सकता है, लेकिन उसका सार बाद में कुछ ऐसा लिखा - 

बाँस बसा है हमरे घर घर सांस सांस में। कमान बनाना हुआ बँसवारी से छांटें बांस दो फांक में काट लिए।  किनारों पर खांचे काटे, बांस छील कर डोरी बनायी, जंगली लतरों या जड़ों से बाँध लिया, कमान तैयार। बांस की पतली डंडियां काट कर आँच में सीधी कर लीं, उसके एक सिरे पर चील के पंख बांधे, दुसरे सिरे पर पिटे लोहे की माहुर बुझी अनी खोंप कर ऊपर से लतर लपेट दी, चोखे तीर बन गए। सामान रखने को बांस का टोकरा, बांस की खाँची और झबिया-झाबा। चीन जापान कोरिया के किसानों के हैट से मिलते जुलते गोल चकरिया जैसे बांस के टोपे। बांस की छतरी। असबाब ढोने को बांस के पटेवा बहँगी। बांस की चटाई, बांस की टटिया, छप्पर, बांस की मुरली-बांसुरी। और मिर्जापुरी गोजियों (लाठियों) का दबदबा दूर-दराज तक कौन नहीं जानता।

युवक बांस पुराण सुना कर अपनी राह निकल गया। हम आपे में आए तो लौटने और ट्रेन का समय होने का ख़याल आया। दुलकी चाल स्टेशन की ओर भागे।  गाँव पार हुआ, नाला पार भया। स्टेशन की ओर भागम भाग भागती सवारियां। प्लेटफॉर्म पर कदम रखते भूख से बेहाल बढ़ गए पेड़ा बेच रहे बाबा के खोंचे की ओर। धुँआ उगलती ढिबरी की रौशनी में गाहकों के घेरे में से हाथ बढ़ा कर रूपए में दो पेड़े के हिसाब से चार पेड़े थामे और मुंह में डालते बढ़ गए चापा-कल की ओर।  

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४४

दूसर मन्दिर हिंया नहीं द्याखेन


मेरे ज़ेहन में मंडरा का अगला मुकाम मंडराने लगा लेकिन  कुंवर को बरैला के मन्दिर ने ऐसा मोहा कि हिलने का नाम ही नहीं लिए। हार कर मोटर साईकिल स्टार्ट करने लगा तब कहीं अपने में आए। 

'यार गुरु ! हम तो भूलै गए रहन कि एक और मन्दिर द्याखै क मिली।'

हमने छेड़ा - 'हम तो समझेन बुलेट पर बैठे से डेराय रहे हौ।' 

कागज़ कलम सँभालते हुए कुंवर मोटर साइकिल पर बैठने लगे - 

'डेरान नहीं तो दुनिया। चलौ हाँकौ गाड़ी।'

धुक धुक करती बुलेट गाँव के गलियारे में धचके खाती मंडरा के ठिकाने पर रुकी तो सामने आया पीपल के पुराने छायादार वृक्ष के नीचे आस-पास के धरातल से कुछ ऊंची उठी ज़मीन पर एक अधगिरा प्रस्तर मन्दिर। 

कुंवर फिर से चैतन्य हो कर समझाने-लिखाने लगे - 

'तनिकै ऊँच जगती के ऊपर बने पूरब-मुख मन्दिर की तलछन्द योजना मा चतुरस्र (वर्गाकार) गर्भगृह के सामने कपिली औ ओहिके आगे मुखमण्डप का प्राविधान राखा गवा आय।  

जगती पीठ के ऊपर वेदिबंध औ जंघा। शिखर ध्वस्त। पंचरथ जंघा विभाजित कीन्ह गयी आय तल-जंघा और उपरि-जंघा मा। ऊपर वाली भद्र भाग की रथिका मा द्याखौ मणि-अभिप्राय औ निचली जंघा की रथिकाओं में प्रदर्शित आँय देवता। इनमा सबते नीक आँय अन्धकान्तक शिव और नटराज। अन्धकासुर का तिरशूल पर टाँगे डमरू वाले बाबा औ नाचै मा मगन नटराज।  

मन्दिर के बाहरी कोने-कोने मा ठाढ़ आंय अष्ट-दिकपाल - वज्रधारी इंद्र, आग की लपलपाती लपटों से साजित प्रभामण्डल वाले अग्नि।   बाकी अपनी अपनी जगह पर मुकम्मल रहे होइहैं - वायु, वरुण, यम, निरऋति, कुबेर औ ईशान जैस वास्तु-शास्त्र मा वर्णित आँय।

तीन शाखा वाले प्रवेशद्वार के उत्तरांग के बीचोबीच ललाटबिम्ब पर आसन लगाए बिराजमान आँय चतुर्भुजी शिव जी, उनके दाएं-बाएं उत्तरंग के दोनों सिरे पर एक ऒर चतुर्मुखी ब्रह्मा औ दुसरी वारु बिश्नू जी।

गर्भगृह मा स्थापित आँय शिवलिंग। उनके अगल बगल पूजे जाय रहे विग्रह आँय - शेषशायी बिश्नू, कमलासना देवी, नर्तक गणेश, ऐरावत हाथी पर सवार इन्द्र (शक्र) - शास्त्र मा वर्णित आय -

ऐरावतगजारूढम स्वर्णवर्णं किरीटिनम। 
सहस्रनयनम् शक्रं वज्रपाणिम विभाववेत।।

ऐरावत नामक हाथी पर आरूढ़ स्वर्ण वर्ण वाले, किरीट मुकुट से शोभित, हज़ार आँखिन वाले इन्द्र, जिनके हाथ मा शोभत है दिव्यास्त्र वज्र।   

मन्दिर के आस-पास धरे हैं शिखर आमलक, उद्गम। ललाटबिम्ब पर शिव जी, प्रवेशद्वार पर शैव द्वारपाल, गर्भगृह मा शिवलिंग।  कउनौ शक सुबहा नहीं, मन्दिर समर्पित रहा होइ शिव जी का।  

यू मन्दिर देखतै भर याद आवत है बनारस के कंदवा क्यार कर्दमेश्वर मन्दिर। बी एच यू वाले एल के तिरपाठी जी ओहिका बताइन हैं जोड़-घटाय के लगभग सात सौ बरस पुरान। जो अगर ओहिसे तुलना कीन्ह जाय तौ यहु मंदिर होइहै कुछ पाहिले क्यार, मतलब होइहै यहै करीबन आठ सौ बरस पुरान।
हमरे हिसाब से तो राबर्ट्सगंज के आस-पास के इलाके मा इस पीरियड और इस शैली क्यार कउनो दूसर मन्दिर तो आय नहीं। हम तो अभी तक एहिके मुकाबले क्यार कउनौ गिरौ-पड़ा दूसर मन्दिर हिंया नहीं द्याखेन।'

लौटते रास्ते दिन भर की थकान पर कुंवर की चहकन भारी रही। मंडरा और बरैला के मन्दिर-मूर्तियों की चर्चा तारी रही। हमारी खोज की सूची में बाहर की विद्वतमण्डली के लिए एक और अजाना  मन्दिर सज गया।     

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पवन ऐसा डोलै : अध्याय ४. ४३

बरैला कस दर्शन


धुक धुक, धुक धुक करती बुलेट सोन सेतु पार कर सलखन होते हुए मारकुंडी मोड़ की चकरिया चढ़ती लोरिका पत्थल से घूमती हुई छपका कैम्प में सही सलामत पहुँच गयी तब कहीं कुंवर की धुकधुकी सहज हुई। अगले ठिकाने के लिए निकलने तक उन्हें भरोसा हो गया कि हमारे साथ भी वे बुलेट पर निशाखातिर चल सकते हैं। 

रापटगंज से घोरावल की ओर मुश्किल से डेढ़ किलोमीटर चले होंगे कि बायीं ओर लब-ए-सड़क बरैला के नए मन्दिर पर लहराती  झंडियों ने हमारा ध्यान खींचा।  उधर मुड़ते ही आस पास बिखरे पुराने प्रस्तर देवालय के वास्तु अवशेष देखते ही कुंवर चटक हो चले, मोटर साइकिल रुकने तक का सबर रखे बिना उतरने  को अरबराए तो गिरते गिरते बचे। सहज होने पर घीमे धीमे मन्दिर का फेरा लगाया। एक-एक प्रतिमा एक एक प्रस्तर पट्ट पर निरूपित अभिप्रायों को निरखते परखते गर्भगृह में हेलते ही शिवलिंग के दर्शन क्या किए उनकी चुरकी चार्ज हो गयी - 

'यार गुरु ! ऐसि सुन्दर एकमुख शिवलिंग हम कहूँ नहीं देखा। बड़े जतन ते गढ़िन आय। तिनहू आँख, कान, नाक, मुख, अधर, जटाजूट, सुघर-सुंदर, ऊपर ते आँखिन पर चढ़ी चांदी और जटाजूट पै सोहत रजत अर्द्ध-चन्द्र, कण्ठहार औ  कर्ण-कुण्डल, देखिहौ तो देखतै रहि जइहौ।'


'यहु आय कउनौ पुरान प्राचीन प्रस्तर मंदिर के प्रवेश द्वार की ऊपरी चौखट मा शोभित रहा उत्तरांग। एहि पर बने अन्य तीन तरह के लघु मंदिर, बीचो बीच वलभी, दुनहू कोनन पर पीढा देउल औ उनके बगल वालन का सही सही नाम फिर देख पढ़ के बताइब।  द्याखौ कइस सुंदर चन्द्रशाला गढ़ी आँय।'

फिर तो एक एक कर वे मंदिर अन्दर और बाहर के अवशेषों को देखते और बोलते गए - 



'नीचे धरे आँय भग्न परिकर औ प्रभामंडल के टूट हिस्सा। बाहर द्याखौ नए मन्दिर के दरवज्जा के दुनहू ओर लगाए दिहिन हैं पुरान मन्दिर मा लाग रहे द्वार स्तम्भ। एक ओर कछुआ पर सवार जमुना जी औ दुसरी वारु गंगा जी हाथन मा मंगल कलश धारे। उनके नीचे छ्वाट छ्वाट परिचारिका  उनके ऊपर छतरी ताने। छतरी के एक ओर द्याखौ चोंच मा माला थामे मांगल्य विहग औ दुनहू हाथु ज्वाड़े नागी। गंगा-जमुना के बरब्बर ठाढ़ आँय शूल लीन्हे शैव द्वारपाल। औ इन सबके उप्पर आँय पांच शाखा - पत्र शाखा, फुल्ल शाखा, रूप शाखा, स्तम्भ शाखा औ श्रीवृक्ष शाखा।

दरवाजे के ऊपर एक और उत्तरंग। नीचे टूट उदुम्बर पर द्याखौ मकर पर बइठ उदधि कुमार।  पेड़ के नीचे धरे आँय कइयौ उद्गम। कम अस कम दुइ मंदिर तो रहै होइहैं, यहै कोई ग्यारह सौ बरस पुरान।  

एकमुख शिवलिंग के ऐसि दर्शन और कहूँ अत्ते सुलभ कहूँ नहीं आँय। सड़क ते उतरौ, झट दर्शन पाओ औ चट अपनी राह धरौ। 

रापटगंज से मुक्खा दरी की सैर पर निकरै वाले सैलानियौ इनका द्याखैं तो धन्य होए जाएं।' 

कुंवर के चुप होते ही मन ही मन कुलबुला रहे उदुम्बर के मायने पूछ लिए।  

कुंवर ने तुरत फुरत समझाया -

'यार गुरु गूलर के पेड़ का संस्कृत नाम आय उदुम्बर। ओहिकी लकड़ी पानी पाला मा खराब नहीं होत।  यहै मारे पहले ज़माने मा जब मन्दिरन क्यार दरवज्जा लकड़ी केर बनत रहे तब उनकी निचली चौखट गूलर लकड़ी तेने बनावत रहे जेते कि पानी परै पर गलै सड़ै ना पावै। यहै मारे एहिका यहु नाम परिगा।'

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