Thursday, February 26, 2015

कुस्तुंतुनिया से आगे: २०

February 26, 2015 at 9:27pm
'जेउगमा': ६  मई २०१४


दो पहाड़ियों के बीच के संकरे रास्ते से निकलते ही दरया-ए-फ्रात का नीला पानी दूर दूर तक लहरा मारता नज़र आने लगा। हमारी सवारियों का जथ्था नीचे उतर कर थम गया। कुछ ही देर में एक शानदार कार से गाज़िआन टेप शहर की मेयर 'मोहतरमा फातमा शाहीन' का आना हुआ। औसत से कुछ कम कद की लेकिन असरदार, गोल गोरे  चेहरे पर जंचता चश्मा, कटे छितराते बाल। वो एक ठसक के साथ उतरीं।  खैर मकदम के बाद ख़ास ख़ास लोगों से बातें करतीं वे हाई हील सैंडिल खटखटाती आगे और हम सब उनके इर्द-गिर्द और पीछे-पीछे चले।







हमें थोड़ी ही ऊंचाई पर एक छाजन के नीचे रखे गए पुरानी बसावट के निशान दिखाने ले जाया गया। ऊपर लगी रेलिंग के किनारे से हम वहाँ की पुरानी बसावट और ज़मीन के नीचे से निकली मोज़ैक की हज़ारों बरस पुरानी कहानी सुनने लगे।

सन २००० में फ्रात दरया का बहाव रोक कर बनाया जा रहा बराज बन कर पूरा हुआ तो घाटी में भरते पानी की सतह हर रोज़ औसतन चार-चार इंच ऊपर उठने लगा। इस हिसाब से छह महीने में पुरानी बसावट का भी डूबना तयशुदा हो गया। डूबते को तिनके का नहीं दुनिया भर का सहारा मिला। यह खबर दूर दराज़ तक पहुँचने लगी तो यहां के बेहद खूबसूरत मोज़ैक को निकाल कर सहेजने के लिए एक साल से यहां कन्नियाँ चला रहे पुराविदों को दुनिया भर से निजी और सरकारी मदद मिलने लगी। इटली के सबसे हुनरमंद लोगों ने खुले दिल से इस काम में हाथ बंटाया।       

तकरीबन २३०० बरस बीते सिकंदर के सिपहसालार सेल्यूकस निकेटर ने फरात दरया के पश्चिमी किनारे पर सेलुकिआ या सैनिक छावनी बसाई और पूर्वी किनारे पर अपनी रानी के नाम पर बसाया एक कस्बा, और दोनों बस्तियों को एक पैंटून पुल से जोड़ दिया। सवा तीन सौ बरस बाद (ईस्वी सन  ६४) में रोम वालों ने सेलुकिआ को जीत कर उसका दूसरा नाम 'जेउगमा' रखा  मायने ग्रीक जुबान में हुए 'पुल' या 'क्रासिंग'। फौजी अहमियत के चलते यहां रोमन राजाओं के एक नहीं दो-दो लशकर मुकम्मल तौर पर मुस्तैद रहते। इसी रास्ते पूरब की और पर्सिआ-साग्दोनिआ से आगे पामीर चढ़ कर चीन जाने वाले सिल्क-रोड पर उन दिनों सौदागरों के काफिलों की धूम रहती जिनसे वसूला जाने वाला महसूल आमदनी का खासा ज़रिया बन गया। आने जाने वालों के मज़हब ने भी यहां की तहज़ीब में अपने रंग घोले। बीस से तीस हज़ार की आबादी वाले इस शहर को रोमन हुकूमत की पूर्वी सरहद के सबसे बड़े, जंगी और रईस शहर के रूप में गिना गया। लेकिन फारस के सस्सानिद हमलावरों ने सन २५३ में यहां के आरामदेह मकानों को नेस्तनाबूद कर डाला और इनके खंडहर जानवरों के पनाहगाह में तब्दील हो गए। नए बाशिंदों में गाँव वालों की तादाद ही ज़्यादा रही। फिर सत्रह सौ बरस से भी ज़्यादा वक्त तक ज़मीन की परतों में दफन रही जेउगमा की अहमियत बाँध के पानी में डूबते-डूबते फिर से उबर कर मीडिआ के सिर-माथे दुनिया-जहान में छा गई।





जो ज़मीन बाँध के बढ़ते पानी में समाने वाली थी उसके नीचे से मोज़ैक के जो पैनल निकलते गए उन्हें सिरज सहेज कर गाज़िआनटेप में बन रहे म्यूजियम में सजाने-दिखलाने के लिए ले गए। पानी से ऊपर की सतह के नीचे से निकली मोज़ैक की फर्शों पर ऊंची छाजन के नीचे जहां की तहाँ जस की तस संजो दी गईं जिन्हे देखने लोग अक्सर यहां आया करते हैं। लम्बे समय से इन पर जमी धूल से धूमिल पड़ चली फर्श पर गीला पोतारा फेरने के साथ नफीस मोज़ैक की चमकदार सतह उभर कर हैरत में डालने लगीं। हम सोचने लगे - जिन घरों की फर्श इतनी खूबसूरत है उनके बाक़ी के हिस्से कितने शानदार रहे होंगे। बताया गया यहां से निकली मोज़ैक से सजा कर बनाई गई एक लड़की की तस्वीर को जिप्सी गर्ल कहा गया, दूसरी फर्श पर बनी तस्वीरों को पहचाना गया ग्रीक माइथोलॉजी से जुड़े किरदारों से, तीसरे पर बने थे ग्रीक और रोमन समुद्र देवता। यह भी बताया गया कि इन सबको दर्शाया गया है पड़ोस के गाज़िआन टेप शहर में ३० मिलियन डॉलर की लागत से बन कर तैयार हुए अल्ट्रा मॉडर्न 'जेउगमा मोज़ैक म्यूज़ियम' में और हम सब उन्हें देखने के लिए चलेंगे अब उसी ओर।

रास्ते में एक जगह और अटके, मोहतरमा की मेमानवाज़ी में बराज की जेट्टी से बंधे क्रूज़ की सवारी का मज़ा लेने के लिए।








लाल परचम, लाल पट्टों और पीले फूलों से सजे लक्क सफ़ेद क्रूज़ के दरवाज़े पर अगवानी के लिए रंगीन लिबास में सजी, माथे पर चांदी का मुकुट सोहे, कमसिन युवती ने मुस्कराहट बिखेरते हुए हाथ में करीने से संभाली तस्तरी से हर एक को मिठाई पेश की।  हम क्रूज़ पर सवार हो गए।  मोहतरमा की ख़ास टेबल के चारों घेरे में क्रिस, प्रोफे. ज़र्रार, प्रोफे. करिंगा और दुसरे ख़ास लोग और बाकी पर हम सब। सभी खासो आम के लिए खान पान का एक और दौर चला।  नीले लहराते पानी पर हंस की तरह तेज़ी से तैरता लहरों पर झूलता क्रूज़ चला तो पीछे से एक छोटी बोट हमारी हिफाज़त में चली। इरादा तो दूर तक ले जाने का था लेकिन वक्त की कमी ने बस एक 'ज्वाय राइड' का ही मौक़ा दिया, छोटा ही सही सैर सवारी में मज़ा आ गया।  यह भी समझ आया कि टर्की के लोग अपने इस बराज को कितनी बड़ी कामयाबी मान कर अहमियत देते और उसे दिखाने में फख्र रखते हैं।     
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बकिया फिर

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