Thursday, February 26, 2015

कुस्तुंतुनिया से आगे : २१

February 26, 2015 at 9:28pm
वो, उनका हीरो: ६  मई २०१४


अगले ठिकाने तक पहुँचते रात की चादर उतर आई। एक और अनजाना शहर खुलने लगा। जिस होटल पर हमारी बसें ठहरीं वहाँ चेक इन करने वालों की लम्बी कतार और  भीड़-भाड़ की वजह से हमें तनिक इन्तिज़ार करना पड़ा। इंतिज़ामकारों ने हमारे पासपोर्ट एक साथ जमा करके काम आसान कर दिया। जब तक रजिस्टर में इंदिराज होते हम एक किनारे खड़े होकर आस पास का मुलाहिज़ा लेने लगे।निगाह ठहर गई होटल के नाम पर  - 'तैमूर इंटरनेशनल होटल'।

इंटरनेट पर मौजूद दास्तानों से जाना कि -

छह सौ बरस बीते, आमू दरया और सीर दरया के कांठे और पास-पड़ोस चल रही मौज़ू आब-ओ-हवा के दौर में, 'शहर-ए-सब्ज़' नाम से मशहूर 'केश' के पास एक मंगोल कबीले में पैदा हुए 'तैमूर' का नाम आगे चल कर तवारीख के सफों पर छा गया। वह कबीला चंगेज़ खान के लश्कर के साथ आ कर कज़ाकस्तान के उस दक्षिणी हिस्से में बस गया था जो बाद में 'मुगलिस्तान' भी कहलाया।  सोहबत में आ कर उन्होंने मुकामी तुर्कों के चाल चलन अपनाए और तुर्की जुबान बोलने लगे। फिर, इस्लाम अपनाने के बाद फ़ारसी तहज़ीब, जुबान और अदब का खासा असर भी ज़ज़्ब किया।

छोटे से अमीर का बेटा तैमूर था तो मुस्लिम और दूसरे कबीले का लेकिन अपने आप को चंगेज़ खान का वारिस मानता रहा। एक हमलावर मुग़ल दस्ता आठ-नौ साल की उमर में भाइयों और माँ सहित कैद कर के उसे समरकंद ले गया। बचपन के दिनों में वह अपने कुछ साथियों के गिरोह में तिज़ारती दस्तों के असबाब और जानवर लूटता रहता। माना जाता है कि १३६३ के दरमियान वह एक भेड़ चुराने की फिराक में गड़रियों के तीरों से जख्मी हो कर एक पैर से लंगड़ा और एक हाथ से अपाहिज हो गया। दूसरी कहानियों में उसके ज़ख्मी होने की अलग अलग दूसरी वजहें बयान की जाती हैं।



ज़मीन से उठे तैमूर ने धीरे धीरे अपनी हस्ती इस कदर बुलंद कर ली कि १३७० ईस्वी तक चंगेज़ खान के खानदानियों की हुकूमत वाले इलाके के पश्चिमी खित्ते पर उसका कब्ज़ा हो गया, जिसे धुरी बना कर, ख़ास तौर पर तुर्की फौजियों के दम पर, चलाई मुहिम की बदौलत वह पश्चिम, दक्छिन और सेंट्रल एशिया का सबसे ताकतवर हाकिम बन कर उभरा। एक के बाद एक उसने कैस्पियन समंदर से उराल और वोल्गा के किनारे तक, मिस्र, सीरिया, समूचे पूरबी ईरान, उत्तरी ईराक़, पश्चिमी टर्की और दिल्ली की हुकूमतों को नेस्तनाबूद कर दिया। उसके एक सिपहसालार ने उसकी शह पर मास्को तक को जला डाला।    

तैमूर के दस्ते जिधर भी चले उधर आग और लहू का सैलाब चला। ईरानी शहर इस्फ़हान के लोगों की बगावत का जवाब एक लाख लोगों के कत्ले आम और उनकी खोपड़ी की मीनारें उठवा कर दिया गया। मेसोपोटामिया से एशिआ माइनर और अफगानिस्तान पर कहर बरपा करने के बाद उस पर काफिरों का खात्मा कर के इस्लाम का सूरमा बनने का फितूर सवार हुआ। अपने अमीरों को कुरआन की एक आयत का हवाला दे कर उकसाया। इंटरनेट पर मौजूद उसके तज़्क़िरे 'तुजुके तैमूरी' के काफी बाद के तर्जुमे पर यकीन करें तो इस इरादे तक आ कर वह गफलत में पड़ गया - चीन के काफिरों पर हमला करे या हिन्द के देवी-देवताओं को पूजने वालों और काफिरों पर।

इस मुद्दे पर अपने एक शहज़ादे से यह सुन कर तैमूर बहुत खुश हुआ कि पूरा हिन्द सोने-जवाहरात से भरा है, सोने- चांदी, हीरे, रूबी, एमराल्ड, लोहे, ताम्बे वगैरह की सत्तरह खदानें हैं, ऎसी फसलें होती हैं जिनसे पहनने की पोशाक, खुशबूदार इतर और शकर बन जाए। वहाँ रहती है सदाबहार हरियाली से ढकी खुशगवार ज़मीन खुशगवार। ज़्यादातर बाशिंदे हैं काफ़िर और बुत-परस्त जिन्हे फतह करना हमारे लिए अल्लाह और पैगंबर का फरमान है।

मगर, कुछ अमीरों ने सुबहा जताई  -  इंशाअल्लाह, हम हिन्द-फतह करने में कामयाब होंगे। मगर अगर वहाँ मुकम्मल तौर पर बस गए तो हमारी औलादें वहाँ  के बाशिंदों जैसी हो जाएंगी जिससे हमारी अगली नस्लों की ताकत और बहादुरी जाती रहेगी। यह सुन कर फौजी कमांडर कसमसाने लगे तो तैमूर ने उन्हें कुछ इस तरह समझाया - हिन्द पर हमला करने का मकसद है काफिरों को सच्चे मज़हब में शामिल कर के उस ज़मीन को पाक बनाना। यह सुन कर सब ख़ुशी खुशी राज़ी हो गए।  और फिर आग-लहू-लोहे का दरया हिन्द की ओर अफना चला, रस्ते में आए काबुल से कश्मीर के बीच बसे कटोर, आगे और आगे बढ़ कर लोनी का किला, और फिर, दिल्ली, कत्ले आम, शमशीर खींच लेने वाले बगावती हों या मज़हब और आज़ादी पसंद निहत्थे दीवाने सब की कटी खोपड़ियों से ऊंची उठती मीनारें। वैसा ही नज़ारा जैसा पहले ईरान और बाद में जोर्जिआ, अर्मीनिआ, दमिश्क, बग़दाद या अंकारा की तरह डरावना।

आखिरी वक्त में उसने चीन को पाक बनाने का मंसूबा बांधा। चल पड़ा वहाँ कायम मिंग हुकूमत को  तबाह करने। मगर इससे पहले कि वह चीन पर हल्ला बोल पाता सीर दरया के उस पार के डेरे में उकाब की तरह झपटते 'प्लेग' ने उसी पर हमला बोल कर उसके पिंजर का पल्ला खोल दिया। १७ फरवरी १४०५ में अतरार में उसकी आखिरी सांसें चलीं। इस तरह अख्खा दुनिया सर कर लेने की ख्वाहिश रखने वाले एक और सूरमा का सपना भी ज़मींदोज़ हो गया।उस वक्त तैमूरी हुकूमत के परचम लहरा रहे थे दक्षिण टर्की, सीरिआ, इराक़, ईरान, सेंट्रल एशिआ के कज़ाखस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, अर्मेनिया, अज़रबैजान, जिओर्जिआ, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिज़तान, पाकिस्तान के खित्तों और काशगर के रास्ते तक लेकिन उसके जाने के बाद जल्दी ही वज़ूद से हट गए।



एक हिसाब के मुताबिक़ तैमूर ने उस ज़माने में दुनिया की कुल आबादी के पांच फीसदी यानी १.७ करोड़ अफ़राद क़त्ल कराए, हांलाकि इस गिनती की तस्दीक के लिए और सुबूतों की ज़रुरत होगी।    हो सकता है असललियत इससे कुछ अलग हो मगर हिन्द ही नहीं कई मग़रिबी मुस्लिम मुल्कों की रवायत में भी उसे एक वहशी, बर्बर और ज़ुल्मी हमलावर की शकल में देखने की कुछ तो वजह होगी ही।

कहीं कहीं उसकी और उसके लश्कर की बहादुरी की तारीफ कुछ उसी अंदाज़ में बढ़ा चढ़ा कर बयान की गयी लगती है जैसे हमारे चारण-भांट या जगनिक के भाई बंद लिखते रहे - "एक का मारैं, दुइ मर जावैं, तिसरा खौफ खाय मर जाय"। मिसाल के तौर पर लोनी और दिल्ली में घर-बार-परिवार फूंक, सिर पर कफ़न बाँध कर, तैमूर की फ़ौज़ से लड़ने निकले वीरों ने उसके कितने फौजी मारे उनका ज़िक्र उसके तारीखदानों ने कुछ इस तरह किया है जैसे आजकल की जंगों में अपने अपने रेडियो पर खबर दी जाती है - दुश्मन के सौ आदमी हलाक और हमारे दस शहीद। जीतने वाले जैसा चाहें अपना बखान कर लें ये समझना कोई पहेली नहीं कि सब कुछ लुटा कर लड़ने वाले दीवानों ने कितनों का ही लहू बहाने के बाद मौत को चूमा होगा।  

उधर तैमूर के हम वतन उज़बेकी उसे गाज़िआना अंदाज़ से देखते और उस पर नाज़ करते नहीं अघाते। ताशकंद में उसकी यादगार कौमी सूरमा मान कर उसी जगह तामीर करायी गई है जहां कभी कार्ल मार्क्स का कद्दावर बुत खड़ा रहता था। हमारे होटल की तरह बहुत सी इमारतों और लोगों के नाम उसके नाम पर रखे गए। यहां तक कि पाकिस्तान ने भी अपनी एक मिसाइल का नाम उसके नाम पर रख छोड़ा है मानों तैमूरी तलवारें उनके इलाके पर मौत और आग नहीं फूल बरसाती रही हों। सोचता रहा - कैसे एक खित्ते का वहशी दूसरे का हीरो (गाज़ी) बन जाता है।



तैमूर की शख्सियत के कुछ और पहलू भी काबिले गौर रहे - सब कुछ के बाद भी वह जंगी मामलों का गैर-मामूली दानिशमंद, कई ज़ुबानों (फारसी, मंगोली और तुर्की) का जानकार और बेहद चालाक शख्स माना गया है।  जैसी ज़रूरत हुई उसने इस्लाम और मंगोल रवायत का अपने सियासी हक़ में बखूबी इस्तेमाल किया। ज़ंग के वक्त वह कितना ही वहशी रहा हो, फतह के बाद अपने मज़हब के आलिमों, फनकारों, और मुमताज़ अफ़रादों को बख्श कर अपने काम में लाने में कसर नही रखी। उसके परपोते के परपोते बाबर और उसकी अगली पीढ़ियों में जन्मे अकबर, शांहजहाँ और औरंगज़ेब के नाम हिन्द में किसने नहीं सुने !



गड़े मुर्दों की तहकीकात करने वाले एक सोवियत एन्थ्रोपोलोजिस्ट ने १९४१ में कबर से निकाल कर तैमूर के जिस्म का जायजा ले कर उसे चौड़े सीने, मज़बूत जबड़े, मंगोल और काकेशियन नाक-नक्श वाला, एक पैर से लंगड़ा, लम्बे कद का शख्श बताया। कहा जाता है कि उसकी कब्र पर लिखा था - 'जब मैं मर कर उठूंगा तो दुनिया हिल उठेगी।' यह भी कहा जाता है कि उसका जिस्म कबर से निकाला गया तो कफ़न के अंदर एक और लेख मिला - 'जो भी मेरी कब्र को खोलेगा वह मुझसे भी ज़्यादा खतरनाक हमलावर को खड़ा कर देगा।' और देखिए जिस दिन उस रूसी ने १९४१ में उसकी कब्र खोली उसी दिन हिटलर ने रूस पर हमला किया और १९४२ में उसे दोबारा दफ़न करने के बाद स्टालिनग्राद की जंग में रूस की जीत हुई।

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बकिया फिर

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