Thursday, February 26, 2015

कुस्तुंतुनिया से आगे १८

गोबेक्ली टेपे (Göbekli Tepe)

 
 

ऊर्फ़ा से तकरीबन १८ किलोमीटर उत्तर-पूरब, अनातोलिया के  मशरिकी सिरे पर, पोटबेल्ली पहाड़ की धार पे टिके मशहूर पुराने टेपे (टिब्बा या टीला या डीह या खेड़ा) तक पहुँचते देर ना लगी।

वहाँ दिखा पहले से ही कई गाड़ियों और सैलानियों का जुटाव। एक डाक्यूमेंट्री की शूटिंग के लिए उड़ाए जा रहे ड्रोन को देखने के कौतूहल में मशगूल भीड़। बड़े मकौड़े जैसा ड्रोन ज़मीन से कुछ ही ऊंचाई पर भनभनाता हुआ मंडराता रहा, फिल्म बनाने वाले नीचे से रिमोट के सहारे फोटोग्राफी में लगे रहे।

 
   
 

औसत कद, भारी काया, अधपकी दाढ़ी और दीर्घोदर वाले लेकिन असरदार शख्शियत के मालिक एक यूरोपियन बुज़ुर्ग माथे पर फेल्ट कैप चढ़ाए, गले में झक सफ़ेद गमछा लपेटे, दोनों हाथ डैनों की तरह लहरा उठा कर टेपे की खासियत बयान करते जिधर बढ़ते लोग उनके करीब जुट कर उधर ही चल पड़ते।

 
 

उन्होंने बताया कि यहां से मिले निशान घुमन्तू अहेरियों के किसी कबीले के एक ठिकाने पर जम कर बसने और जंगली कुत्ते, भेड़-बकरी के साथ गन्दुम और यव को काबू कर के बनाने की कोशिश के तनिक पहले यानी आज से १२००० हज़ार बरस पहले की दुनिया की सबसे पुरानी इबादतगाह के हैं। वक्त बीतने के साथ, वो बसावट भी उजड़ गयी।

फिर, समन्दर के पानी से ७६० मीटर की ऊंचाई पर ३०० मीटर के दायरे में फैले, इस टिब्बे पर जमा माटी ने इसकी ऊंचाई १५ मीटर तक और ऊपर उठा कर इसे पहाड़ी धार का हिस्सा बना दिया।

यूं तो नौ बरस में घूरे के दिन भी फिरने की बात कही जाती है लेकिन  यहां के दिन लौटने में हज़ारों बरस लग गए।  इस्तांबूल और शिकागो के जामिया मिलिया के आसारे कदीमा के माहिरों की मिली-जुली टीम ने १९६३ में पहली बार यहां की खोज-खबर लेकर इसे पहले पहल खेतिहरों से जुड़े होने का अंदाज़ा लगाया।  फिर, १९९६ में ज़मीन देख कर मज़मून भांप लेने वाले जर्मन नजूमी क्लॉउस स्किमिड (Klaus Schmidt) ने यहाँ दबे दफीने को सूँघ निकाला।



आगे, २०१४ तक चली खनन खोदाई  और खोज से निकले अंग्रेज़ी के टी अक्षर के अकार के (T-shaped) ६-६ मीटर ऊँचे और २०-५०  टन  तक  भारी भरकम २०० पत्थर के खम्भे और  इन्हे फंसा कर खड़ा करने के लिए चट्टानी सतह में खोद कर बनाए गए खांचे। इनकी निशानदेही से सुराग लगा कभी वहाँ वज़ूद में रही २० गोलाकार संरचनाएँ।  खम्भों  पर  तराशी  गई  आदमियों , जानवरों , सांप , बिच्छू , घड़ियाल  और  दूसरे  जीवों की  १२००० बरस पहले तराशी गई शक्लें। यकीन नहीं हुआ कि इतने वक्त पहले भी लोग संग तराशी में इतनी महारत हासिल कर चुके थे।



इन संरचनाओं को उस वक्त के मंदिरों के रूप में पहचाना गया है जिन्हे आस-पास के १०० मील के दायरे के अहेरियों-संग्राहकों ने बनाया था।  वे इस पाक जगह पर जुटते और शायद ढेर सा चढ़ावा चढ़ाते, ढोल नगाड़ा बजाते, मशालों की रोशनी में नाचते गाते, जश्न मनाते और दावतें उड़ाते रहे होंगे।

गोल मंदिरों के ऊपर कोई छाजन रहा होगा या नहीं और रहा होगा तो कैसा ? इस बारे में तो बस अंदाज़े ही लगाए जा सकते हैं लेकिन अंदर बैठने के लिए पत्थर की बेंच बनाने की गवाही पक्की है।  इनके बाद दूसरे दौर में १००००-८०००० बरस के बीच बने  खम्भे उनके मुकाबले छोटे कद के बने।  इसके बाद इस जगह की अहमियत ख़त्म हो जाने पर यहां बचे रह गए निशानात चकमक पत्थर, पत्थर के औज़ारों और जानवरों की हड्डियों के ढेर में दबा दिए गए।
       
इस विज़िट का आखिरी शगल रहा हमारे गाइड का फ़र्ज़ निभा रहे बुज़ुर्ग का परिचय, हममें से ज्यादातर अचरज में पड़ गए यह  जान कर कि वे ही हैं यहां की ज़मीन की परतें खोल कर वहाँ दबी कहानी के सफे पढ़ कर सुनाने वाले 'क्लॉउस स्किमिड'।



लौटते सफर में 'वेस्ट एशियन निओलिथिक कल्चर्स' पढ़ाने वाले बांसगांव वाले गुरू जी बहुत याद आए।  पढ़ाते पढ़ाते मगन हो बताते नक़्शे पर गौर से देखिए खेती की शुरुआत हुई 'फर्टाइल क्रेसेंट' से।  यह क्रेसेंट या ईद के चाँद जैसा अर्ध चंद्राकार इलाका कहाँ था ? जिसका एक सिरा मध्य एशिआ में इज़राइल, फिलिस्तीन की गाज़ा पट्टी से उठता चला जाता है लेबनान, जॉर्डन और पश्चिमी सीरिआ से होता हुआ दखिनी टर्की तक, और फिर घूम कर चला जाता है उत्तरी ईराक़ में दरिया दज़ला और फ्रात के मेल तक। जौ और गेंहू की खेती यहीं से चल कर साड़ी दुनिया में फैली।  १२००० बरस पहले मिनी आइस एज की सूखी आब-ओ-हवा ने इस इलाके के जंगली अनाज के खित्ते और जानवर कम होते गए। लोग अनाज जुटाने दूर पास टटोलने लगे। इस टोह ने जंगली अनाज के खित्तों की साफ़ सफाई और हिफाज़त के बाद धीरे धीरे उन्हें उपजाने की हिकमत सीखी। घुमक्कड़ अहेरियों के कबीले घुमक्कड़ी छोड़ कर एक जगह बसे तो धरम-करम, खेती-बारी, बड़े समाज, कला और क्राफ्ट वगैरह का विकास हुआ।



गुरु जी का ज़ोर रहता यहां शुरू हुई खेती की धुरी रहे नतूफ़िआ, अबू हिरेयरा, म्युरेबिट, टेल कार्मेल, चतल होयूक और चायून्यू जैसे पुराने गाँव  नक़्शे पर मार्क कराने पर। कहते नक्शा नहीं देखिएगा तो सब हवा में ही टंगा रहेगा, भीतर तक उतरेगा नहीं।  तब कभी सोचा भी नहीं था कि यह इलाका इस तरह दूर-दूर तक घूम-टहल कर अपनी आँखों देख सकूँगा। मन ही मन 'नेशनल जिओग्राफिआ वालों को' लाख-लाख दुआऐं दीं ।

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बकिया आगे

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