Thursday, February 26, 2015

कुस्तुंतुनिया से आगे : १९

February 26, 2015 at 9:26pm
'मुसिफिरी': ६ मई २०१४



दोपहर के खाने के लिए सालिनऊर्फ़ा लौटा कर जिस रेस्टोरेंट में ले जाया गया उस के नाम 'कवाहेरी कोनुक एवी' ने  ध्यान खींचा। क्या मतलब हुआ इसका ? वहाँ तो बताने वाला कोई मिला नहीं लेकिन 'गूगल बाबा' ने झट बताया - 'मुसिफिरी', मतलब गेस्ट हाउस। आगे समझते 'देर ना लगी, अहा तो यह लफ्ज बना है मुसाफिर से, जहां ठहरते हैं मुसाफिर वो हुआ 'मुसिफिरी' जो अपने मुल्क तक मुसाफिरी करते पहुंचा तो 'मुसाफिर खाना' बन गया।

दरवाजा लांघते दिखता है हरियाली भरा सहन। अंदर हैं नीचे-ऊपर रेस्टोरेंट के खाने के कमरे।  बीचोबीच एक फव्वारे के चारों और चौकोर अकार में सटी मेज़ों पर करीने से सजी प्लेटे। इनके साथ लगीं कुर्सियों पर जा जमे। कुछ लोग बगल के कमरे में ज़मीन पर बिछी कालीन पर लगे साझा दस्तरख्वान पर खाते-पीते दिखे। 'हलील उर रहमान दरया' के करीब उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे पहलू में बनी 'हाजी मुस्तफा विला' की इस इमारत को मुसाफ़िरख़ाने और रेस्टोरेंट में बदल कर इस्तेमाल करने का यह एक बेहतरीन नमूना है।










तरह तरह की खाने की तश्तरियां लेकिन अपने जैसे घास पात वाले के जीने का सहारा तो नसीब से जौ का दलिया और दो गिलास 'आरियान' (छाछ) ही रहे।

खाने के बाद चलने को हुए तो हमारी बसों के सारे ड्राइवर पता नहीं कहाँ दफा मिले, मुझे अपने वतन के ऐसे वाकये याद आने लगे। कबूतर तो कबूतर ही ठहरे दुनिया के किसी भी कोने के हों उड़ते एकसा ही हैं। ड्राइवरों के इंतज़ार में सहन में बैठे, सड़क पर टहलते नज़ारे लिए, गुफ्तुगू करते, घूम घूम कर थोड़ी ही दूर दीखती बुलंद इमारत, उस पर लहराते लाल कौमी परचम और सामने ही सड़क से लगी 'वली फुअत बे स्ट्रीट' (Büyükyol) की  मस्जिद पर नज़र डालते रहे। मस्जिद की जगह पर उससे पहले ४५७ ईस्वी में बना एक चर्च था, इसका इस्तेमाल  सलादीन ने कुछ वक्त के लिए मस्जिद की तरह भी किया, आगे वह इमारत खंडहर की सूरत में वीरान रही जिस पर तामीर मस्जिद १९९३ में सजदे के लिए खोली गई और 'सलादीन मस्जिद' कहलाई।

ड्राइवर वक्त पर मिल जाते तो शायद आस-पास की मशहूर जगहें और इमारतें भी हमें तफ्सील से दिखलाई जातीं जैसे पैगम्बर इब्राहिम के जनम की जगह, उर्फ़ा कैसल और 'अनजिलाह लेक' की मछलियाँ।

मुस्लिम रिवायत की मानें तो पैगम्बर इब्राहिम बुत-परस्ती के इतने खिलाफ थे कि अपने बाप के बुत-पूजा नहीं छोड़ने पर उन्हें ही छोड़ दिया। बस्ती वालों की सारी मूर्तियां तोड़ डालीं। नतीज़तन मंदिर के पुजारी और बेबीलोन के वक्त-ए-बादशाह निमरोद के हुकुम से उन्हें ज़ंजीरों में जकड कर जलती आग में फेंक दिया गया लेकिन खुदा के फज़ल से बाल भी बांका नहीं हुआ, आग की जगह गुलाब के बगीचे में बदल गयी। लोग बाग़ यह चमत्कार देख दंग रह गए और मान लिया कि उसे उनके अल्लाह ने ही बचाया, उनमें से ज़्यादातर ने अल्लाह को मान लिया और इब्राहिम को माना उनका पैगंबर।

नेमरूद की बेटी ने भी इब्राहिम का मज़हब अपना लिया तो नेमरूद ने उसे भी आग में फेंकवा दिया जिसमें उसकी काया तो भसम हो गई लेकिन जहां वो अल्लाह को प्यारी हुई वहीं से एक झील का पानी फूटा जो 'अनजिलाह लेक' कहलाई जो इतनी पाक मानी गई कि आज भी इसमें पलने वाली मछलियां मारने, पकड़ने और खाने-पकाने की बात सोची भी नहीं जाती।    




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अब्राहम ने दुनिया के एक नहीं तीन-तीन बड़े मज़हबों - जूडिज़्म, क्रिस्तान और इस्लाम में बड़ी इज़्ज़त हासिल की। तीनों ने उन्हें अपना प्रणेता माना। पहले ने 'फादर ऑफ़ कान्वेंट', दूसरे ने फादर इन फेथ और तीसरे ने अल्लाह का दोस्त कहा।  

इस इलाके में ही है मेवलीद ई हिलाल मस्जिद।  मेलविद के मायने है पाक-जनम मतलब जनम की जगह। माना जाता है कि पैगंबर इब्राहिम का जनम पास की ही एक गुफा में हुआ था।  इसी लिए मस्जिद का यह नाम पड़ा। सेल्यूकस के वक्त में यहां एक पगान मंदिर बनाया गया। यहूदियों ने अपनी एक इबादत गाह (सिनेगॉग) बनाई  १५० ईस्वी  में।  फिर, सोलहवी शताब्दी में यह मस्जिद बनी।    

उर्फ़ा कैसल के इलाके में ही मिले १२००० बरस पहले तक की आदम विरासत बताए जाने वाले निशानों में शामिल चूना-पत्थर पर तराशी गई आदमकद आदमी की मूर्ती सबसे प्राचीन बुतों में गिनी गई।  आज वो ऊर्फ़ा म्यूजियम में 'बालिकीगोल स्टेचू' के नाम से प्रदर्शित है। इसी इलाके में बाद में ६०० से ११०० ईस्वी के बीच कासल बनाया गया। यहां खड़े २४०-२४२ ईस्वी में खड़े किए गए दो मॉन्यूमेंटल खम्भों में से एक पर लिखा है कि मैं हूँ सूरज का बेटा अफतुहा, राजा मनू की बेटी शालमेथ के नाम पर मैंने बनवाया है यह खम्भा और बुत।    



आधे पौन घंटे बाद अगले मुकाम के लिए निकले तो बस की खिड़कियों से मिले दीदार से ही तसल्ली करनी पड़ी - किसी पुरानी इमारत की चाहरदीवारी के आस पास खासे सैलानी, साफ़ सुथरी सड़क, पुराने शहर की ऊपर उठती बसावट और इमारतों के बीच से सर उठाए मस्जिद की मीनारें, पुराने सलिन ऊर्फ़ा की एक झलक, लबे सड़क बाज़ू वाले पहाड़ी कटान में में कटी पुरानी गुफाओं की तसवीरें उतारते बढ़ते गए, चाह कर भी नहीं जान पाए गुफाओं की कहानी और तवारीख।









एक और रेस्टोरेंट दिखा, इसका नाम पढ़ा - 'गुलीज़ार कोयुक एवी', अब तक अपन 'कोयुक एवी' के मायने जान कर चटक हो चुके थे, तुरत समझ गए -गुलीज़ार यानी  गुलज़ार (चहल पहल वाला) मुसाफिरखाना। आबादी छूटी, पेड़ छूटे, वीराने विस्तार के साथ चलते हुए सुना किसी बाँध के किनारे निकली २००० बरस से भी ज़्यादा पुरानी बसावट के निशाँ और शीशे की खूबसूरत मोज़ैक देखने जा रहे हैं।

चलते-चलते जा पहुंचे एक पहाड़ के आगे दूर तक कांटेदार बाड़ से घिरे कैम्पों के किनारे।  सभी तरफ से बंद घेरे में सैकड़ों चंद-रोज़ा टेंट, उन पर सूखते कपडे, और बीच-बीच की खाली जगह में खेलते बच्चे।  किसी ने बताया ये सीरिआ में चल रहे सिविल वार की वजह से भागे महाजिरों (रिफ्यूजियों) के डेरे हैं। सीरिया की खाना जंगी आग का पहला-पहल भभका और उस मुल्क की सरहद नज़दीक होने का अहसास हुआ।



पता चला भटक कर गलत रास्ते आ गए हैं, असल में तो हमें एक मोड़ पहले ही बाएं बाज़ू वाला रास्ता पकड़ना था।  सवारियों का कारवां यू -टर्न ले कर उधर ही चल पड़ा।

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बकिया आगे

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