Thursday, February 26, 2015

कुस्तुंतुनिया से आगे : २१

February 26, 2015 at 9:28pm
वो, उनका हीरो: ६  मई २०१४


अगले ठिकाने तक पहुँचते रात की चादर उतर आई। एक और अनजाना शहर खुलने लगा। जिस होटल पर हमारी बसें ठहरीं वहाँ चेक इन करने वालों की लम्बी कतार और  भीड़-भाड़ की वजह से हमें तनिक इन्तिज़ार करना पड़ा। इंतिज़ामकारों ने हमारे पासपोर्ट एक साथ जमा करके काम आसान कर दिया। जब तक रजिस्टर में इंदिराज होते हम एक किनारे खड़े होकर आस पास का मुलाहिज़ा लेने लगे।निगाह ठहर गई होटल के नाम पर  - 'तैमूर इंटरनेशनल होटल'।

इंटरनेट पर मौजूद दास्तानों से जाना कि -

छह सौ बरस बीते, आमू दरया और सीर दरया के कांठे और पास-पड़ोस चल रही मौज़ू आब-ओ-हवा के दौर में, 'शहर-ए-सब्ज़' नाम से मशहूर 'केश' के पास एक मंगोल कबीले में पैदा हुए 'तैमूर' का नाम आगे चल कर तवारीख के सफों पर छा गया। वह कबीला चंगेज़ खान के लश्कर के साथ आ कर कज़ाकस्तान के उस दक्षिणी हिस्से में बस गया था जो बाद में 'मुगलिस्तान' भी कहलाया।  सोहबत में आ कर उन्होंने मुकामी तुर्कों के चाल चलन अपनाए और तुर्की जुबान बोलने लगे। फिर, इस्लाम अपनाने के बाद फ़ारसी तहज़ीब, जुबान और अदब का खासा असर भी ज़ज़्ब किया।

छोटे से अमीर का बेटा तैमूर था तो मुस्लिम और दूसरे कबीले का लेकिन अपने आप को चंगेज़ खान का वारिस मानता रहा। एक हमलावर मुग़ल दस्ता आठ-नौ साल की उमर में भाइयों और माँ सहित कैद कर के उसे समरकंद ले गया। बचपन के दिनों में वह अपने कुछ साथियों के गिरोह में तिज़ारती दस्तों के असबाब और जानवर लूटता रहता। माना जाता है कि १३६३ के दरमियान वह एक भेड़ चुराने की फिराक में गड़रियों के तीरों से जख्मी हो कर एक पैर से लंगड़ा और एक हाथ से अपाहिज हो गया। दूसरी कहानियों में उसके ज़ख्मी होने की अलग अलग दूसरी वजहें बयान की जाती हैं।



ज़मीन से उठे तैमूर ने धीरे धीरे अपनी हस्ती इस कदर बुलंद कर ली कि १३७० ईस्वी तक चंगेज़ खान के खानदानियों की हुकूमत वाले इलाके के पश्चिमी खित्ते पर उसका कब्ज़ा हो गया, जिसे धुरी बना कर, ख़ास तौर पर तुर्की फौजियों के दम पर, चलाई मुहिम की बदौलत वह पश्चिम, दक्छिन और सेंट्रल एशिया का सबसे ताकतवर हाकिम बन कर उभरा। एक के बाद एक उसने कैस्पियन समंदर से उराल और वोल्गा के किनारे तक, मिस्र, सीरिया, समूचे पूरबी ईरान, उत्तरी ईराक़, पश्चिमी टर्की और दिल्ली की हुकूमतों को नेस्तनाबूद कर दिया। उसके एक सिपहसालार ने उसकी शह पर मास्को तक को जला डाला।    

तैमूर के दस्ते जिधर भी चले उधर आग और लहू का सैलाब चला। ईरानी शहर इस्फ़हान के लोगों की बगावत का जवाब एक लाख लोगों के कत्ले आम और उनकी खोपड़ी की मीनारें उठवा कर दिया गया। मेसोपोटामिया से एशिआ माइनर और अफगानिस्तान पर कहर बरपा करने के बाद उस पर काफिरों का खात्मा कर के इस्लाम का सूरमा बनने का फितूर सवार हुआ। अपने अमीरों को कुरआन की एक आयत का हवाला दे कर उकसाया। इंटरनेट पर मौजूद उसके तज़्क़िरे 'तुजुके तैमूरी' के काफी बाद के तर्जुमे पर यकीन करें तो इस इरादे तक आ कर वह गफलत में पड़ गया - चीन के काफिरों पर हमला करे या हिन्द के देवी-देवताओं को पूजने वालों और काफिरों पर।

इस मुद्दे पर अपने एक शहज़ादे से यह सुन कर तैमूर बहुत खुश हुआ कि पूरा हिन्द सोने-जवाहरात से भरा है, सोने- चांदी, हीरे, रूबी, एमराल्ड, लोहे, ताम्बे वगैरह की सत्तरह खदानें हैं, ऎसी फसलें होती हैं जिनसे पहनने की पोशाक, खुशबूदार इतर और शकर बन जाए। वहाँ रहती है सदाबहार हरियाली से ढकी खुशगवार ज़मीन खुशगवार। ज़्यादातर बाशिंदे हैं काफ़िर और बुत-परस्त जिन्हे फतह करना हमारे लिए अल्लाह और पैगंबर का फरमान है।

मगर, कुछ अमीरों ने सुबहा जताई  -  इंशाअल्लाह, हम हिन्द-फतह करने में कामयाब होंगे। मगर अगर वहाँ मुकम्मल तौर पर बस गए तो हमारी औलादें वहाँ  के बाशिंदों जैसी हो जाएंगी जिससे हमारी अगली नस्लों की ताकत और बहादुरी जाती रहेगी। यह सुन कर फौजी कमांडर कसमसाने लगे तो तैमूर ने उन्हें कुछ इस तरह समझाया - हिन्द पर हमला करने का मकसद है काफिरों को सच्चे मज़हब में शामिल कर के उस ज़मीन को पाक बनाना। यह सुन कर सब ख़ुशी खुशी राज़ी हो गए।  और फिर आग-लहू-लोहे का दरया हिन्द की ओर अफना चला, रस्ते में आए काबुल से कश्मीर के बीच बसे कटोर, आगे और आगे बढ़ कर लोनी का किला, और फिर, दिल्ली, कत्ले आम, शमशीर खींच लेने वाले बगावती हों या मज़हब और आज़ादी पसंद निहत्थे दीवाने सब की कटी खोपड़ियों से ऊंची उठती मीनारें। वैसा ही नज़ारा जैसा पहले ईरान और बाद में जोर्जिआ, अर्मीनिआ, दमिश्क, बग़दाद या अंकारा की तरह डरावना।

आखिरी वक्त में उसने चीन को पाक बनाने का मंसूबा बांधा। चल पड़ा वहाँ कायम मिंग हुकूमत को  तबाह करने। मगर इससे पहले कि वह चीन पर हल्ला बोल पाता सीर दरया के उस पार के डेरे में उकाब की तरह झपटते 'प्लेग' ने उसी पर हमला बोल कर उसके पिंजर का पल्ला खोल दिया। १७ फरवरी १४०५ में अतरार में उसकी आखिरी सांसें चलीं। इस तरह अख्खा दुनिया सर कर लेने की ख्वाहिश रखने वाले एक और सूरमा का सपना भी ज़मींदोज़ हो गया।उस वक्त तैमूरी हुकूमत के परचम लहरा रहे थे दक्षिण टर्की, सीरिआ, इराक़, ईरान, सेंट्रल एशिआ के कज़ाखस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, अर्मेनिया, अज़रबैजान, जिओर्जिआ, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिज़तान, पाकिस्तान के खित्तों और काशगर के रास्ते तक लेकिन उसके जाने के बाद जल्दी ही वज़ूद से हट गए।



एक हिसाब के मुताबिक़ तैमूर ने उस ज़माने में दुनिया की कुल आबादी के पांच फीसदी यानी १.७ करोड़ अफ़राद क़त्ल कराए, हांलाकि इस गिनती की तस्दीक के लिए और सुबूतों की ज़रुरत होगी।    हो सकता है असललियत इससे कुछ अलग हो मगर हिन्द ही नहीं कई मग़रिबी मुस्लिम मुल्कों की रवायत में भी उसे एक वहशी, बर्बर और ज़ुल्मी हमलावर की शकल में देखने की कुछ तो वजह होगी ही।

कहीं कहीं उसकी और उसके लश्कर की बहादुरी की तारीफ कुछ उसी अंदाज़ में बढ़ा चढ़ा कर बयान की गयी लगती है जैसे हमारे चारण-भांट या जगनिक के भाई बंद लिखते रहे - "एक का मारैं, दुइ मर जावैं, तिसरा खौफ खाय मर जाय"। मिसाल के तौर पर लोनी और दिल्ली में घर-बार-परिवार फूंक, सिर पर कफ़न बाँध कर, तैमूर की फ़ौज़ से लड़ने निकले वीरों ने उसके कितने फौजी मारे उनका ज़िक्र उसके तारीखदानों ने कुछ इस तरह किया है जैसे आजकल की जंगों में अपने अपने रेडियो पर खबर दी जाती है - दुश्मन के सौ आदमी हलाक और हमारे दस शहीद। जीतने वाले जैसा चाहें अपना बखान कर लें ये समझना कोई पहेली नहीं कि सब कुछ लुटा कर लड़ने वाले दीवानों ने कितनों का ही लहू बहाने के बाद मौत को चूमा होगा।  

उधर तैमूर के हम वतन उज़बेकी उसे गाज़िआना अंदाज़ से देखते और उस पर नाज़ करते नहीं अघाते। ताशकंद में उसकी यादगार कौमी सूरमा मान कर उसी जगह तामीर करायी गई है जहां कभी कार्ल मार्क्स का कद्दावर बुत खड़ा रहता था। हमारे होटल की तरह बहुत सी इमारतों और लोगों के नाम उसके नाम पर रखे गए। यहां तक कि पाकिस्तान ने भी अपनी एक मिसाइल का नाम उसके नाम पर रख छोड़ा है मानों तैमूरी तलवारें उनके इलाके पर मौत और आग नहीं फूल बरसाती रही हों। सोचता रहा - कैसे एक खित्ते का वहशी दूसरे का हीरो (गाज़ी) बन जाता है।



तैमूर की शख्सियत के कुछ और पहलू भी काबिले गौर रहे - सब कुछ के बाद भी वह जंगी मामलों का गैर-मामूली दानिशमंद, कई ज़ुबानों (फारसी, मंगोली और तुर्की) का जानकार और बेहद चालाक शख्स माना गया है।  जैसी ज़रूरत हुई उसने इस्लाम और मंगोल रवायत का अपने सियासी हक़ में बखूबी इस्तेमाल किया। ज़ंग के वक्त वह कितना ही वहशी रहा हो, फतह के बाद अपने मज़हब के आलिमों, फनकारों, और मुमताज़ अफ़रादों को बख्श कर अपने काम में लाने में कसर नही रखी। उसके परपोते के परपोते बाबर और उसकी अगली पीढ़ियों में जन्मे अकबर, शांहजहाँ और औरंगज़ेब के नाम हिन्द में किसने नहीं सुने !



गड़े मुर्दों की तहकीकात करने वाले एक सोवियत एन्थ्रोपोलोजिस्ट ने १९४१ में कबर से निकाल कर तैमूर के जिस्म का जायजा ले कर उसे चौड़े सीने, मज़बूत जबड़े, मंगोल और काकेशियन नाक-नक्श वाला, एक पैर से लंगड़ा, लम्बे कद का शख्श बताया। कहा जाता है कि उसकी कब्र पर लिखा था - 'जब मैं मर कर उठूंगा तो दुनिया हिल उठेगी।' यह भी कहा जाता है कि उसका जिस्म कबर से निकाला गया तो कफ़न के अंदर एक और लेख मिला - 'जो भी मेरी कब्र को खोलेगा वह मुझसे भी ज़्यादा खतरनाक हमलावर को खड़ा कर देगा।' और देखिए जिस दिन उस रूसी ने १९४१ में उसकी कब्र खोली उसी दिन हिटलर ने रूस पर हमला किया और १९४२ में उसे दोबारा दफ़न करने के बाद स्टालिनग्राद की जंग में रूस की जीत हुई।

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बकिया फिर

कुस्तुंतुनिया से आगे: २०

February 26, 2015 at 9:27pm
'जेउगमा': ६  मई २०१४


दो पहाड़ियों के बीच के संकरे रास्ते से निकलते ही दरया-ए-फ्रात का नीला पानी दूर दूर तक लहरा मारता नज़र आने लगा। हमारी सवारियों का जथ्था नीचे उतर कर थम गया। कुछ ही देर में एक शानदार कार से गाज़िआन टेप शहर की मेयर 'मोहतरमा फातमा शाहीन' का आना हुआ। औसत से कुछ कम कद की लेकिन असरदार, गोल गोरे  चेहरे पर जंचता चश्मा, कटे छितराते बाल। वो एक ठसक के साथ उतरीं।  खैर मकदम के बाद ख़ास ख़ास लोगों से बातें करतीं वे हाई हील सैंडिल खटखटाती आगे और हम सब उनके इर्द-गिर्द और पीछे-पीछे चले।







हमें थोड़ी ही ऊंचाई पर एक छाजन के नीचे रखे गए पुरानी बसावट के निशान दिखाने ले जाया गया। ऊपर लगी रेलिंग के किनारे से हम वहाँ की पुरानी बसावट और ज़मीन के नीचे से निकली मोज़ैक की हज़ारों बरस पुरानी कहानी सुनने लगे।

सन २००० में फ्रात दरया का बहाव रोक कर बनाया जा रहा बराज बन कर पूरा हुआ तो घाटी में भरते पानी की सतह हर रोज़ औसतन चार-चार इंच ऊपर उठने लगा। इस हिसाब से छह महीने में पुरानी बसावट का भी डूबना तयशुदा हो गया। डूबते को तिनके का नहीं दुनिया भर का सहारा मिला। यह खबर दूर दराज़ तक पहुँचने लगी तो यहां के बेहद खूबसूरत मोज़ैक को निकाल कर सहेजने के लिए एक साल से यहां कन्नियाँ चला रहे पुराविदों को दुनिया भर से निजी और सरकारी मदद मिलने लगी। इटली के सबसे हुनरमंद लोगों ने खुले दिल से इस काम में हाथ बंटाया।       

तकरीबन २३०० बरस बीते सिकंदर के सिपहसालार सेल्यूकस निकेटर ने फरात दरया के पश्चिमी किनारे पर सेलुकिआ या सैनिक छावनी बसाई और पूर्वी किनारे पर अपनी रानी के नाम पर बसाया एक कस्बा, और दोनों बस्तियों को एक पैंटून पुल से जोड़ दिया। सवा तीन सौ बरस बाद (ईस्वी सन  ६४) में रोम वालों ने सेलुकिआ को जीत कर उसका दूसरा नाम 'जेउगमा' रखा  मायने ग्रीक जुबान में हुए 'पुल' या 'क्रासिंग'। फौजी अहमियत के चलते यहां रोमन राजाओं के एक नहीं दो-दो लशकर मुकम्मल तौर पर मुस्तैद रहते। इसी रास्ते पूरब की और पर्सिआ-साग्दोनिआ से आगे पामीर चढ़ कर चीन जाने वाले सिल्क-रोड पर उन दिनों सौदागरों के काफिलों की धूम रहती जिनसे वसूला जाने वाला महसूल आमदनी का खासा ज़रिया बन गया। आने जाने वालों के मज़हब ने भी यहां की तहज़ीब में अपने रंग घोले। बीस से तीस हज़ार की आबादी वाले इस शहर को रोमन हुकूमत की पूर्वी सरहद के सबसे बड़े, जंगी और रईस शहर के रूप में गिना गया। लेकिन फारस के सस्सानिद हमलावरों ने सन २५३ में यहां के आरामदेह मकानों को नेस्तनाबूद कर डाला और इनके खंडहर जानवरों के पनाहगाह में तब्दील हो गए। नए बाशिंदों में गाँव वालों की तादाद ही ज़्यादा रही। फिर सत्रह सौ बरस से भी ज़्यादा वक्त तक ज़मीन की परतों में दफन रही जेउगमा की अहमियत बाँध के पानी में डूबते-डूबते फिर से उबर कर मीडिआ के सिर-माथे दुनिया-जहान में छा गई।





जो ज़मीन बाँध के बढ़ते पानी में समाने वाली थी उसके नीचे से मोज़ैक के जो पैनल निकलते गए उन्हें सिरज सहेज कर गाज़िआनटेप में बन रहे म्यूजियम में सजाने-दिखलाने के लिए ले गए। पानी से ऊपर की सतह के नीचे से निकली मोज़ैक की फर्शों पर ऊंची छाजन के नीचे जहां की तहाँ जस की तस संजो दी गईं जिन्हे देखने लोग अक्सर यहां आया करते हैं। लम्बे समय से इन पर जमी धूल से धूमिल पड़ चली फर्श पर गीला पोतारा फेरने के साथ नफीस मोज़ैक की चमकदार सतह उभर कर हैरत में डालने लगीं। हम सोचने लगे - जिन घरों की फर्श इतनी खूबसूरत है उनके बाक़ी के हिस्से कितने शानदार रहे होंगे। बताया गया यहां से निकली मोज़ैक से सजा कर बनाई गई एक लड़की की तस्वीर को जिप्सी गर्ल कहा गया, दूसरी फर्श पर बनी तस्वीरों को पहचाना गया ग्रीक माइथोलॉजी से जुड़े किरदारों से, तीसरे पर बने थे ग्रीक और रोमन समुद्र देवता। यह भी बताया गया कि इन सबको दर्शाया गया है पड़ोस के गाज़िआन टेप शहर में ३० मिलियन डॉलर की लागत से बन कर तैयार हुए अल्ट्रा मॉडर्न 'जेउगमा मोज़ैक म्यूज़ियम' में और हम सब उन्हें देखने के लिए चलेंगे अब उसी ओर।

रास्ते में एक जगह और अटके, मोहतरमा की मेमानवाज़ी में बराज की जेट्टी से बंधे क्रूज़ की सवारी का मज़ा लेने के लिए।








लाल परचम, लाल पट्टों और पीले फूलों से सजे लक्क सफ़ेद क्रूज़ के दरवाज़े पर अगवानी के लिए रंगीन लिबास में सजी, माथे पर चांदी का मुकुट सोहे, कमसिन युवती ने मुस्कराहट बिखेरते हुए हाथ में करीने से संभाली तस्तरी से हर एक को मिठाई पेश की।  हम क्रूज़ पर सवार हो गए।  मोहतरमा की ख़ास टेबल के चारों घेरे में क्रिस, प्रोफे. ज़र्रार, प्रोफे. करिंगा और दुसरे ख़ास लोग और बाकी पर हम सब। सभी खासो आम के लिए खान पान का एक और दौर चला।  नीले लहराते पानी पर हंस की तरह तेज़ी से तैरता लहरों पर झूलता क्रूज़ चला तो पीछे से एक छोटी बोट हमारी हिफाज़त में चली। इरादा तो दूर तक ले जाने का था लेकिन वक्त की कमी ने बस एक 'ज्वाय राइड' का ही मौक़ा दिया, छोटा ही सही सैर सवारी में मज़ा आ गया।  यह भी समझ आया कि टर्की के लोग अपने इस बराज को कितनी बड़ी कामयाबी मान कर अहमियत देते और उसे दिखाने में फख्र रखते हैं।     
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बकिया फिर

कुस्तुंतुनिया से आगे : १९

February 26, 2015 at 9:26pm
'मुसिफिरी': ६ मई २०१४



दोपहर के खाने के लिए सालिनऊर्फ़ा लौटा कर जिस रेस्टोरेंट में ले जाया गया उस के नाम 'कवाहेरी कोनुक एवी' ने  ध्यान खींचा। क्या मतलब हुआ इसका ? वहाँ तो बताने वाला कोई मिला नहीं लेकिन 'गूगल बाबा' ने झट बताया - 'मुसिफिरी', मतलब गेस्ट हाउस। आगे समझते 'देर ना लगी, अहा तो यह लफ्ज बना है मुसाफिर से, जहां ठहरते हैं मुसाफिर वो हुआ 'मुसिफिरी' जो अपने मुल्क तक मुसाफिरी करते पहुंचा तो 'मुसाफिर खाना' बन गया।

दरवाजा लांघते दिखता है हरियाली भरा सहन। अंदर हैं नीचे-ऊपर रेस्टोरेंट के खाने के कमरे।  बीचोबीच एक फव्वारे के चारों और चौकोर अकार में सटी मेज़ों पर करीने से सजी प्लेटे। इनके साथ लगीं कुर्सियों पर जा जमे। कुछ लोग बगल के कमरे में ज़मीन पर बिछी कालीन पर लगे साझा दस्तरख्वान पर खाते-पीते दिखे। 'हलील उर रहमान दरया' के करीब उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे पहलू में बनी 'हाजी मुस्तफा विला' की इस इमारत को मुसाफ़िरख़ाने और रेस्टोरेंट में बदल कर इस्तेमाल करने का यह एक बेहतरीन नमूना है।










तरह तरह की खाने की तश्तरियां लेकिन अपने जैसे घास पात वाले के जीने का सहारा तो नसीब से जौ का दलिया और दो गिलास 'आरियान' (छाछ) ही रहे।

खाने के बाद चलने को हुए तो हमारी बसों के सारे ड्राइवर पता नहीं कहाँ दफा मिले, मुझे अपने वतन के ऐसे वाकये याद आने लगे। कबूतर तो कबूतर ही ठहरे दुनिया के किसी भी कोने के हों उड़ते एकसा ही हैं। ड्राइवरों के इंतज़ार में सहन में बैठे, सड़क पर टहलते नज़ारे लिए, गुफ्तुगू करते, घूम घूम कर थोड़ी ही दूर दीखती बुलंद इमारत, उस पर लहराते लाल कौमी परचम और सामने ही सड़क से लगी 'वली फुअत बे स्ट्रीट' (Büyükyol) की  मस्जिद पर नज़र डालते रहे। मस्जिद की जगह पर उससे पहले ४५७ ईस्वी में बना एक चर्च था, इसका इस्तेमाल  सलादीन ने कुछ वक्त के लिए मस्जिद की तरह भी किया, आगे वह इमारत खंडहर की सूरत में वीरान रही जिस पर तामीर मस्जिद १९९३ में सजदे के लिए खोली गई और 'सलादीन मस्जिद' कहलाई।

ड्राइवर वक्त पर मिल जाते तो शायद आस-पास की मशहूर जगहें और इमारतें भी हमें तफ्सील से दिखलाई जातीं जैसे पैगम्बर इब्राहिम के जनम की जगह, उर्फ़ा कैसल और 'अनजिलाह लेक' की मछलियाँ।

मुस्लिम रिवायत की मानें तो पैगम्बर इब्राहिम बुत-परस्ती के इतने खिलाफ थे कि अपने बाप के बुत-पूजा नहीं छोड़ने पर उन्हें ही छोड़ दिया। बस्ती वालों की सारी मूर्तियां तोड़ डालीं। नतीज़तन मंदिर के पुजारी और बेबीलोन के वक्त-ए-बादशाह निमरोद के हुकुम से उन्हें ज़ंजीरों में जकड कर जलती आग में फेंक दिया गया लेकिन खुदा के फज़ल से बाल भी बांका नहीं हुआ, आग की जगह गुलाब के बगीचे में बदल गयी। लोग बाग़ यह चमत्कार देख दंग रह गए और मान लिया कि उसे उनके अल्लाह ने ही बचाया, उनमें से ज़्यादातर ने अल्लाह को मान लिया और इब्राहिम को माना उनका पैगंबर।

नेमरूद की बेटी ने भी इब्राहिम का मज़हब अपना लिया तो नेमरूद ने उसे भी आग में फेंकवा दिया जिसमें उसकी काया तो भसम हो गई लेकिन जहां वो अल्लाह को प्यारी हुई वहीं से एक झील का पानी फूटा जो 'अनजिलाह लेक' कहलाई जो इतनी पाक मानी गई कि आज भी इसमें पलने वाली मछलियां मारने, पकड़ने और खाने-पकाने की बात सोची भी नहीं जाती।    




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अब्राहम ने दुनिया के एक नहीं तीन-तीन बड़े मज़हबों - जूडिज़्म, क्रिस्तान और इस्लाम में बड़ी इज़्ज़त हासिल की। तीनों ने उन्हें अपना प्रणेता माना। पहले ने 'फादर ऑफ़ कान्वेंट', दूसरे ने फादर इन फेथ और तीसरे ने अल्लाह का दोस्त कहा।  

इस इलाके में ही है मेवलीद ई हिलाल मस्जिद।  मेलविद के मायने है पाक-जनम मतलब जनम की जगह। माना जाता है कि पैगंबर इब्राहिम का जनम पास की ही एक गुफा में हुआ था।  इसी लिए मस्जिद का यह नाम पड़ा। सेल्यूकस के वक्त में यहां एक पगान मंदिर बनाया गया। यहूदियों ने अपनी एक इबादत गाह (सिनेगॉग) बनाई  १५० ईस्वी  में।  फिर, सोलहवी शताब्दी में यह मस्जिद बनी।    

उर्फ़ा कैसल के इलाके में ही मिले १२००० बरस पहले तक की आदम विरासत बताए जाने वाले निशानों में शामिल चूना-पत्थर पर तराशी गई आदमकद आदमी की मूर्ती सबसे प्राचीन बुतों में गिनी गई।  आज वो ऊर्फ़ा म्यूजियम में 'बालिकीगोल स्टेचू' के नाम से प्रदर्शित है। इसी इलाके में बाद में ६०० से ११०० ईस्वी के बीच कासल बनाया गया। यहां खड़े २४०-२४२ ईस्वी में खड़े किए गए दो मॉन्यूमेंटल खम्भों में से एक पर लिखा है कि मैं हूँ सूरज का बेटा अफतुहा, राजा मनू की बेटी शालमेथ के नाम पर मैंने बनवाया है यह खम्भा और बुत।    



आधे पौन घंटे बाद अगले मुकाम के लिए निकले तो बस की खिड़कियों से मिले दीदार से ही तसल्ली करनी पड़ी - किसी पुरानी इमारत की चाहरदीवारी के आस पास खासे सैलानी, साफ़ सुथरी सड़क, पुराने शहर की ऊपर उठती बसावट और इमारतों के बीच से सर उठाए मस्जिद की मीनारें, पुराने सलिन ऊर्फ़ा की एक झलक, लबे सड़क बाज़ू वाले पहाड़ी कटान में में कटी पुरानी गुफाओं की तसवीरें उतारते बढ़ते गए, चाह कर भी नहीं जान पाए गुफाओं की कहानी और तवारीख।









एक और रेस्टोरेंट दिखा, इसका नाम पढ़ा - 'गुलीज़ार कोयुक एवी', अब तक अपन 'कोयुक एवी' के मायने जान कर चटक हो चुके थे, तुरत समझ गए -गुलीज़ार यानी  गुलज़ार (चहल पहल वाला) मुसाफिरखाना। आबादी छूटी, पेड़ छूटे, वीराने विस्तार के साथ चलते हुए सुना किसी बाँध के किनारे निकली २००० बरस से भी ज़्यादा पुरानी बसावट के निशाँ और शीशे की खूबसूरत मोज़ैक देखने जा रहे हैं।

चलते-चलते जा पहुंचे एक पहाड़ के आगे दूर तक कांटेदार बाड़ से घिरे कैम्पों के किनारे।  सभी तरफ से बंद घेरे में सैकड़ों चंद-रोज़ा टेंट, उन पर सूखते कपडे, और बीच-बीच की खाली जगह में खेलते बच्चे।  किसी ने बताया ये सीरिआ में चल रहे सिविल वार की वजह से भागे महाजिरों (रिफ्यूजियों) के डेरे हैं। सीरिया की खाना जंगी आग का पहला-पहल भभका और उस मुल्क की सरहद नज़दीक होने का अहसास हुआ।



पता चला भटक कर गलत रास्ते आ गए हैं, असल में तो हमें एक मोड़ पहले ही बाएं बाज़ू वाला रास्ता पकड़ना था।  सवारियों का कारवां यू -टर्न ले कर उधर ही चल पड़ा।

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बकिया आगे

कुस्तुंतुनिया से आगे १८

गोबेक्ली टेपे (Göbekli Tepe)

 
 

ऊर्फ़ा से तकरीबन १८ किलोमीटर उत्तर-पूरब, अनातोलिया के  मशरिकी सिरे पर, पोटबेल्ली पहाड़ की धार पे टिके मशहूर पुराने टेपे (टिब्बा या टीला या डीह या खेड़ा) तक पहुँचते देर ना लगी।

वहाँ दिखा पहले से ही कई गाड़ियों और सैलानियों का जुटाव। एक डाक्यूमेंट्री की शूटिंग के लिए उड़ाए जा रहे ड्रोन को देखने के कौतूहल में मशगूल भीड़। बड़े मकौड़े जैसा ड्रोन ज़मीन से कुछ ही ऊंचाई पर भनभनाता हुआ मंडराता रहा, फिल्म बनाने वाले नीचे से रिमोट के सहारे फोटोग्राफी में लगे रहे।

 
   
 

औसत कद, भारी काया, अधपकी दाढ़ी और दीर्घोदर वाले लेकिन असरदार शख्शियत के मालिक एक यूरोपियन बुज़ुर्ग माथे पर फेल्ट कैप चढ़ाए, गले में झक सफ़ेद गमछा लपेटे, दोनों हाथ डैनों की तरह लहरा उठा कर टेपे की खासियत बयान करते जिधर बढ़ते लोग उनके करीब जुट कर उधर ही चल पड़ते।

 
 

उन्होंने बताया कि यहां से मिले निशान घुमन्तू अहेरियों के किसी कबीले के एक ठिकाने पर जम कर बसने और जंगली कुत्ते, भेड़-बकरी के साथ गन्दुम और यव को काबू कर के बनाने की कोशिश के तनिक पहले यानी आज से १२००० हज़ार बरस पहले की दुनिया की सबसे पुरानी इबादतगाह के हैं। वक्त बीतने के साथ, वो बसावट भी उजड़ गयी।

फिर, समन्दर के पानी से ७६० मीटर की ऊंचाई पर ३०० मीटर के दायरे में फैले, इस टिब्बे पर जमा माटी ने इसकी ऊंचाई १५ मीटर तक और ऊपर उठा कर इसे पहाड़ी धार का हिस्सा बना दिया।

यूं तो नौ बरस में घूरे के दिन भी फिरने की बात कही जाती है लेकिन  यहां के दिन लौटने में हज़ारों बरस लग गए।  इस्तांबूल और शिकागो के जामिया मिलिया के आसारे कदीमा के माहिरों की मिली-जुली टीम ने १९६३ में पहली बार यहां की खोज-खबर लेकर इसे पहले पहल खेतिहरों से जुड़े होने का अंदाज़ा लगाया।  फिर, १९९६ में ज़मीन देख कर मज़मून भांप लेने वाले जर्मन नजूमी क्लॉउस स्किमिड (Klaus Schmidt) ने यहाँ दबे दफीने को सूँघ निकाला।



आगे, २०१४ तक चली खनन खोदाई  और खोज से निकले अंग्रेज़ी के टी अक्षर के अकार के (T-shaped) ६-६ मीटर ऊँचे और २०-५०  टन  तक  भारी भरकम २०० पत्थर के खम्भे और  इन्हे फंसा कर खड़ा करने के लिए चट्टानी सतह में खोद कर बनाए गए खांचे। इनकी निशानदेही से सुराग लगा कभी वहाँ वज़ूद में रही २० गोलाकार संरचनाएँ।  खम्भों  पर  तराशी  गई  आदमियों , जानवरों , सांप , बिच्छू , घड़ियाल  और  दूसरे  जीवों की  १२००० बरस पहले तराशी गई शक्लें। यकीन नहीं हुआ कि इतने वक्त पहले भी लोग संग तराशी में इतनी महारत हासिल कर चुके थे।



इन संरचनाओं को उस वक्त के मंदिरों के रूप में पहचाना गया है जिन्हे आस-पास के १०० मील के दायरे के अहेरियों-संग्राहकों ने बनाया था।  वे इस पाक जगह पर जुटते और शायद ढेर सा चढ़ावा चढ़ाते, ढोल नगाड़ा बजाते, मशालों की रोशनी में नाचते गाते, जश्न मनाते और दावतें उड़ाते रहे होंगे।

गोल मंदिरों के ऊपर कोई छाजन रहा होगा या नहीं और रहा होगा तो कैसा ? इस बारे में तो बस अंदाज़े ही लगाए जा सकते हैं लेकिन अंदर बैठने के लिए पत्थर की बेंच बनाने की गवाही पक्की है।  इनके बाद दूसरे दौर में १००००-८०००० बरस के बीच बने  खम्भे उनके मुकाबले छोटे कद के बने।  इसके बाद इस जगह की अहमियत ख़त्म हो जाने पर यहां बचे रह गए निशानात चकमक पत्थर, पत्थर के औज़ारों और जानवरों की हड्डियों के ढेर में दबा दिए गए।
       
इस विज़िट का आखिरी शगल रहा हमारे गाइड का फ़र्ज़ निभा रहे बुज़ुर्ग का परिचय, हममें से ज्यादातर अचरज में पड़ गए यह  जान कर कि वे ही हैं यहां की ज़मीन की परतें खोल कर वहाँ दबी कहानी के सफे पढ़ कर सुनाने वाले 'क्लॉउस स्किमिड'।



लौटते सफर में 'वेस्ट एशियन निओलिथिक कल्चर्स' पढ़ाने वाले बांसगांव वाले गुरू जी बहुत याद आए।  पढ़ाते पढ़ाते मगन हो बताते नक़्शे पर गौर से देखिए खेती की शुरुआत हुई 'फर्टाइल क्रेसेंट' से।  यह क्रेसेंट या ईद के चाँद जैसा अर्ध चंद्राकार इलाका कहाँ था ? जिसका एक सिरा मध्य एशिआ में इज़राइल, फिलिस्तीन की गाज़ा पट्टी से उठता चला जाता है लेबनान, जॉर्डन और पश्चिमी सीरिआ से होता हुआ दखिनी टर्की तक, और फिर घूम कर चला जाता है उत्तरी ईराक़ में दरिया दज़ला और फ्रात के मेल तक। जौ और गेंहू की खेती यहीं से चल कर साड़ी दुनिया में फैली।  १२००० बरस पहले मिनी आइस एज की सूखी आब-ओ-हवा ने इस इलाके के जंगली अनाज के खित्ते और जानवर कम होते गए। लोग अनाज जुटाने दूर पास टटोलने लगे। इस टोह ने जंगली अनाज के खित्तों की साफ़ सफाई और हिफाज़त के बाद धीरे धीरे उन्हें उपजाने की हिकमत सीखी। घुमक्कड़ अहेरियों के कबीले घुमक्कड़ी छोड़ कर एक जगह बसे तो धरम-करम, खेती-बारी, बड़े समाज, कला और क्राफ्ट वगैरह का विकास हुआ।



गुरु जी का ज़ोर रहता यहां शुरू हुई खेती की धुरी रहे नतूफ़िआ, अबू हिरेयरा, म्युरेबिट, टेल कार्मेल, चतल होयूक और चायून्यू जैसे पुराने गाँव  नक़्शे पर मार्क कराने पर। कहते नक्शा नहीं देखिएगा तो सब हवा में ही टंगा रहेगा, भीतर तक उतरेगा नहीं।  तब कभी सोचा भी नहीं था कि यह इलाका इस तरह दूर-दूर तक घूम-टहल कर अपनी आँखों देख सकूँगा। मन ही मन 'नेशनल जिओग्राफिआ वालों को' लाख-लाख दुआऐं दीं ।

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बकिया आगे

कुस्तुंतुनिया से आगे: १७

सालिन ऊर्फ़ा: 'मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर' - ६ मई २०१४

 




नींद टूटी तो खिड़की के बाहर नया नवेला बन रहा शहर दिखा। हरियाले घास वाले गोल चैराहे पर ऊंचे पोल पर लहराता आधे चाँद से सजा लाल कौमी परचम। उससे लगी सड़क पार करती स्याह हिजाब के बीच से खिलती खूबसूरत गोरी सूरतें। डिवाइडर से बंटी चौड़ी सड़को के साथ सलीके से बनी या बन रही इमारतें। इक्का दुक्का सवारियां। खुलता हुआ सुन्दर नया शहर, आलीशान होटलों, रेस्टोरेंट, खेल के मैदानों और चौड़ी सड़कों के बावजूद कांक्रीट के जंगल की तरह उग रहा है।

 

 

Courtesy Wikimedia

पुराना उर्फ़ा पुरानी मस्जिदों, मीनारों, पुरानी बाज़ार, आँगन वाले मकानात, गली-कूचों, दुकानों के किनारे बैठे चौकियों पर खाते-पीते लोग, अरबी-कुर्दी पहनावों की वजह से टर्की की रूमानी यादगारों में से एक बना हुआ है। लोग मानते हैं कि 'सीक-कोफ्ते' इसी शहर की देन हैं जिसे प्रोफेट अब्राहम ने अपने हाथ से ईजाद किया था। मेमने के गोश्त से बनने वाले दो सौ से ज़्यादा मेल के यहाँ के केबाब के ज़ायके के चटखारे चलते हैं अक्खा टर्की ही नहीं सरहद पार सीरिया तक। याद रहे कि यहां के ज़्यादातर होटलों में  दारू हराम है ।

अपनी जानकारी पर रहम आया, पता ही नहीं था कि दुनिया में कहीं सानली ऊर्फ़ा नाम का ऐसा शहर भी बसता है। सानली बना है अरबी शब्द शान से। मतलब उर्फ़ा शानदार या ऊर्फ़ा महान। आम तौर पर लोग इसे ऊर्फ़ा ही पुकारते है। आर्मीनियाईइ इसे अर-रूह, कुर्द रीह, प्राचीन ग्रीक एदेस्सा नाम से जानते रहे।  इसी नाम के सूबे के दारुल-ए-हुकूमत की गर्मी और सर्दी का पारा बहुत ऊंचा-नीचा रहता है।  यूं तो इस शहर की कहानी चौबीस सौ बरस पहले तक जाती है, लेकिन आस पास के दारु, हर्रान और नेवाली कोरी की सनद पर यहां की बसावट के ११००० बरस पहले शुरू होने का अंदाज़ भी लगाया जाता है।  थोड़ा और दूर की बात करें तो यहां से ज़्यादा दूर नहीं हैं खेती की शुरुआत से जुड़े मुकाम गोबेकी टेपे वगैरह। यह इलाका दज़ला और फरात के ऊपरी दोआबे के 'फर्टाइल क्रिसेंट' नाम से मशहूर उस खित्ते में आता है जहाँ से खेती की शुरुआत मानी जाती है। आर्मीनियाई मानते हैं कि इसी जगह उनकी भाषा के हरफ ईज़ाद हुए। इसकी किस्मत की तवारीख में भी वक्त दर वक्त बहुत सी हुकूमतों में शामिल होना दर्ज़ होता रहा। फिर ६३८ ईस्वी में इस्लाम का असर साया हुआ।

 



नीचे के उसी हाल में आज का सेशन जमा - जिसमें कल रात का दस्तरख्वान सजा था, नए मंज़र के साथ।  मंच के पीछे डाइलॉग का बैनर और सामने तरतीब से सजी कुर्सियां। हॉल की रोशनी पिछली रात की ही तरह लाल गुलाबी। रुनझुन साज के साथ मेहमानों का आना जगह पाना चलता रहा। असरदार खूबसूरत शख्सियतें जब सामने की कतार में मुतमइन हुई तो उद्घोषिका ने तुर्की जुबान में शुरू किया - सईम वालीं  --- फिर बकीर करिंगा की लम्बी तक़रीर, फिर  होटल की खूबसूरती, मिनिस्ट्री ऑफ़ कल्चर एंड टूरिज्म और वहाँ जुटे बड़े ओहदेदारों की तारीफ में कसीदे पढ़ते शुक्रिया अदा करते क्रिस की रस्मी तक़रीर, फिर उर्फ़ा  के सदर मुकाम, तब, तोहफों की लेन-देन में ज़्यादा वक्त निकल गया।

डायलाग के लिए बचे बचाए वक्त में एडजस्ट करने के नज़रिए से दूर-दूर से बुलाए गए छोट-भइयों से गुज़ारिश हुई कम से कम में ज़्यादा बात कहने की। एक एक कर बुलाए गए - सेशन की सदारत करने के लिए प्रोफेसर अब्दुल्लाह एकिंची, प्रोफेसर विल्लेके वेंडरिच, डॉ लिंग क्यीं, डॉ राकेश तेवारी, और प्रोफेसर रेसेप सेंतुर्क, पहले और आखिरी टर्की से, दो मोह्तरमाओं में से एक 'यू एस' और एक चीन से और अपन हिन्द के नुमाइंदे।



सदारत करने वाले दस मिनट से कम बोलते तो तौहीन होती, उतनी देर कान में आला लगाए तुर्की बयान का तर्जुमा सुनने में बिताए। हमारे हिस्से बीस की जगह दस दस मिनट ही आए। प्रोफ़ेसर वेंडरिच ने मिस्र ----ली क्विन ने चीन ---- और अपन ने हिन्द में पहलौटी  खेती पर अपने पहलू साया किये।  

हमने बताया कि - आम तौर पर माना जाता रहा है, और, ज़्यादातर लोग अब भी मानते हैं कि गंगा घाटी में घने जंगल और दलदल होने की वज़ह से आज से  २७०० बरस पहले तक यहां बड़े तादाद में बसवाट नहीं हो सकी। लेकिन हाल की खोजों से साबित हो गया है - मध्य गंगा घाटी के बाशिंदों की तारीख १० ००० बरस और धान की खेती की पहल ९ ००० बरस पहले, पांच हज़ार बरस पहले पश्चिमी भारत से आपसी रिश्ते रखने और फिर बड़ी तादाद में बसावटें बसने, साढ़े तीन हज़ार बरस पहले ही लोहा गलाने का हुनर हासिल कर लेने की जानकारी के पोख्ता सुबूत, और यह भी कि कोलम्बस के हिन्दुस्तान आने के बाद पिछले चार सौ बरस में अमरीका से यहां आए माने जाने वाले शरीफा, भटकटैया जैसे फल भी साढ़े तीन हज़ार बरस से ही मौजूदगी।

 



एंड्रू ने इस सेशन पर इस तरह ट्वीट किया -           

खेती के इंकलाब (निओलिथिक रिवोल्यूशन) और धान की खेती इस सेशन में  दो ख़ास पहलू रहे -
'यू सी एल' की वेंडरिच ने मिस्र (इजिप्ट) पर फोकस करते हुए बताया कि वहाँ खेती की शुरुआत गरम मौैसम के साथ हुई जिसने खेती को आसान बनाया।  फिर जब मौसम एक बार फिर से सर्द हुआ तब तक लोग खेती के आदी हो चुके थे इसलिए और ज़्यादा मेहनत से खेती करने लगे।

"Rakesh Tewari, former director of State Archaeology Department of Government of Uttar Pradesh, India, pointed out that rice agriculture has now been shown to have developed in the Ganges Plain at the same time as rice cultivation in China. People in the past assumed it must have happened once and spread everywhere. He replies that the use of different strains of wild rice, and of different levels of cultivation in the lands between China and India argue convincingly that the great innovation occurred multiple times in multiple places. In the context of the dialogue of civilizations, this raises the point that similarities between cultures don’t always indicate a shared heritage or a single starting point."

सेशन ख़त्म हुआ और नहीं हुआ। बस में दूसरा सेशन चलने लगा। दक्षिण अमरीका के माहिर प्रोफेसरों चिंचिला, रिचर्ड और ताकेशी को कोलम्बस पहले अमरीकी फूल पौधों  हिन्दुस्तान में मौजूदगी की बात हज़म नहीं हुई सो लगे तरह तरह के सवालों  घेरने - आखिर अमरीकी इलाके के फल- फूल इतना पहले कैसे हिन्द पहुँच सकते हैं ? अपनी बात  और मज़बूती से रखने के वास्ते कुछ और खोजों का हवाला दे कर मकई के भी बहुत पहले ही यहां आने के तस्वीरी सुबूत बुतों के हवाले से दिखलाए तो पहले आँखें फाड़े ताकते रहे फिर उसकी पहचान पर  ही सुबहा करने लगे।  कुछ देर डिस्कशन बाद मैंने भी कह दिया - जो सुबूत साफ़ दीखते हैं, आपके सामने हैं, इन्हे भी कसौटी पर कस कर परखने वाले आप जैसे मानिन्द साइंसदां ही ठहरे, 'मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर'।

 


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बकिया आगे