Friday, January 6, 2012

सफ़र एक डोंगी में डगमग


सफ़र एक डोंगी में डगमग 
(दिल्ली से कलकत्ता नाव यात्रा)

राकेश तिवारी


लंगड़ उठने से पहले


घर की अलमारी में ढेरों किताबें, किताबों में अनगिनत दिलचस्प किस्से, जीवन चरित्र, यात्रा विवरण और ललित लेख, होश संभालते ही इन्हें उलटने का सुयोग सहज ही पाया. 

अँधेरी रात में एकांत नदी-तट पर जाना, मांझी की छोटी डोंगी की गुपचुप चोरी और अँधेरे की काली छाती चीरते आहिस्ते-आहिस्ते सरकते जाना, संपेरों से दोस्ती और सांपों के विष-कोटर निकालने की विद्या सीखने के उपक्रम जैसे कथानक बेहद रोमांचक लगते.


चार आदमियों को साथ लिए बिना स्कूल के सांध्य-कालीन जलसों में जाने तक से डरता, फिर भी, जोखिम और रहस्य भरे किस्सों की ओर सहज झुकाव, दूरस्थ प्रदेशों के अनजाने-अनदेखे कोनों की यात्रा करते, विकट परिस्थितियों से जूझते कथा-नायकों के सपने सजा बैठा. वैसी ही काल्पनिक यात्राओं का नायक बन अर्ने के कर तरह-तरह की विकटताओं से डो-डो हाथ करने के ताने बुने.

पिता जी अक्सर कहते - जो ज्ञान किताबों में नहीं, वह घूमने से मिलता है. घुमक्कड़ 'राहुल' की चर्चा करते, 'घुमक्कड़ शास्त्र' पढने पर जोर देते और इस तरह रोपित बीज से देश-देशान्तरों तक अनजानी-अनदेखी धरती का परिचय पाने की अभिलाषा अन्खुआई. पर्वत-मैदान, वन-उपवन, नदी-पाट, तट-धारा कैसे लगते हैं ? कैसा दिखता है इनका प्रकृत-स्वरुप ? इस जिज्ञासा ने उकसाया. चाँद-तारे, सिकता-सलिल और तुषार-कणों से खेलने को टेरती आदिम बंजारा आवाज़ ने जोर मारा. जोखिम और रहस्य के प्रति सहज आकर्षण ने खींचा. धरती का चक्कर लगाने, ध्रुवों तक चलते जाने और 'एवरेस्ट' पर चढ़ने में किता श्रम लगा होगा ? सोचता और थाह लेता - कि क्या मैं भी ऐसा साथ सकता हूँ.

अखबारों में खबरें छपतीं - फलां ने यह किया, पदक पाया; उसने इतने अंक पाए, विदेश गया, और उतना ही ऊपर उठने की अभिलाषा सिर उठाने लगती. कल का फिसड्डी आज विश्वविद्यालय का नेता, वह मेरा शत्रु मुझसे आगे, थोड़ी ईर्ष्या के साथ सहज स्पर्धा की भावना जागती. क्या मैं उनसे कम हूँ ? क्या मेरा नाम उनके बराबर नहीं होना चाहिए ? डरता, कहीं उन स्नेहिल नज़रों से घेरने वालों में मेरी पहचान तो नहीं मिटती जा रही ? जोखिम भरे किसी कारनामे की चर्चा सुन याद न करेंगी क्या ? वे मधुर छंड़, मुद्दत से बिसरे चेहरे, एक के बाद एक आते, जुगनू जैसे जलते-बुझते भाग जाते.

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